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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

सातवाँ प्रकरण (शान्त-स्थिति / आत्मविश्रांति)

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सातवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः ।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, विश्वपोतः, इतः, भ्रमति, स्वान्तवातेन, न, मम, अस्ति, असहिष्णुता ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मयि अनन्त-महाम्भोधौ =मुझ अनन्त महासमुद्र मेंभ्रमति =भ्रमती है
+ परन्तु =परन्तु
विश्वपोतः =विश्व-रूपी नौकामम =मुझको
स्वान्तवातेन =मन-रूपी पवन करकेअसहिष्णुता =असहनशीलता
इतः ततः =इधर-उधर सेन अस्ति =नहीं है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**यदि लय चिंतन नहीं होगा, तो सांसारिक विक्षेप भी बने रहेंगे और वे कदापि दूर नहीं होंगे ?

**उत्तर—**वे बने रहें, मेरी क्या हानि है । अनन्त महान् समुद्र-रूपी मुझ आत्मा में यह विश्व-रूपी नौका मन-रूपी पवन करके इधर-उधर भ्रमती है, उसका भ्रमण करना मेरे को असहन नहीं है । जैसे समुद्र में पवन करके इधर-उधर

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११६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भ्रमती हुई नौका समुद्र को क्षुब्ध नहीं कर सकती है, वैसे
मन-रूपी पवन करके इधर-उधर भ्रमती हुई विश्व-रूपी
नौका भी समुद्र-रूपी आत्मा को क्षुब्ध नहीं कर सकती
है ॥ १ ॥

मूलम् ।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः ।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।
मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, जगद्वीचिः, स्वभावतः, उदेतु,
वा, अस्तम्, आयातु, न, मे, वृद्धिः, न, च, क्षतिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
$\left.\begin{aligned} &मयि अनन्त- \ &महाम्भोधौ = \end{aligned}\right}$$\left{\begin{aligned} &मुझ अनन्त \ &महासमुद्र में \end{aligned}\right.$आयातु = प्राप्त हो
जगद्वीचिः = जगत्-रूपी कल्लोलमे = मेरी
स्वभावतः = स्वभाव सेन = न
उदेतु = उदय होंवृद्धिः = वृद्धि है
वा = और चाहेच = और
अस्तम् = लय कोन = न
क्षति = हानि है ॥

भावार्थ ।
पूर्ववाले वाक्य करके जगत् के व्यवहार को अनिष्टता
का अभाव कहा । अब इस वाक्य करके जगत् की उत्पत्ति
आदिकों को भी अनिष्टता का अभाव कथन करते हैं ।

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सातवाँ प्रकरण ११७

जनकजी कहते हैं कि विनाश से रहित व्यापक आत्मा-
रूप समुद्र में जगत्-रूपी अनेक लहरें उदय होती हैं, और
फिर अस्त हो जाती हैं। उनके उदय होने से आत्मा की वृद्धि
नहीं होती है और उनके अस्त होने से आत्मा की कोई हानि
नहीं होती है। जैसे समुद्र की लहरों के उदय और अस्त होने
से समुद्र की कुछ भी हानि नहीं है ॥ २ ॥

मूलम् ।

मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना ।
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, विश्वम्, नाम, विकल्पना,
अतिशान्तः, निराकारः, एतत्, एव, अहम्, आस्थितः ।

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मयि=मुझअहम्=मैं
अनन्त- महाम्भोधौ=अनन्त महा- समुद्र मेंअतिशान्तः=अत्यन्त शान्त हूँ
निराकारः=निराकार हूँ
नाम=निश्चय करकेच=और
विश्वम्=संसारएतत् एव=इसी आत्मा के
विकल्पना=कल्पना मात्र हैंआस्थितः=आश्रय हूँ ॥

समुद्र और लहर के दृष्टान्त से किसी को ऐसा भ्रम न
हो जावे कि आत्मा का विकार जगत् है, इस भ्रम के दूर
करने के लिये जनकजी दूसरी रीति से कहते हैं।

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११८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

मुझ महान् समुद्र-रूपी आत्मा में जो जगत् की कल्पना है, सो भ्रम-मात्र ही है । वास्तव में नहीं है, क्योंकि मेरा अनन्तस्वरूप निराकार है । निराकार से साकार की उत्पत्ति नहीं बनती है । जब कि आत्मा में जगत् की वास्तव में उत्पत्ति नहीं बनती है, तो मैं प्रपंच से रहित शान्त-रूप होकर स्थित हूँ । एवं लय योगादिक भी मेरे को करना उचित नहीं हैं ॥ ३ ॥

मूलम् ।

नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरञ्जने ।
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

न, आत्मा, भावेषु, नो, भावः, तत्र, अनन्ते, निरञ्जने, इति, असक्तः, अस्पृहः, शान्त, एतत्, एव, अहम्, आस्थितः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
आत्मा = आत्मानो = नहीं है
भावेषु = देह आदि मेंइति = इस प्रकार
न = नहींअसक्तः = संग-रहित
+ च = औरशान्तः = शान्त हुआ
भवः = देहादिअहम् = मैं
तत्र = उसएतत् एव = इसी आत्मा के
अनन्ते = अनन्तआस्थितः = आश्रित हूँ ॥
निरञ्जने = निर्द्वन्द्व आत्मा में

भावार्थ ।

आत्मा देहादिभावों में आधेय अर्थात् आश्रित-रूप करके

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सातवाँ प्रकरण । ११९

नहीं है, क्योंकि आत्मा व्यापक है, देहादिक सब परिच्छिन्न हैं। व्यापक, परिच्छिन्न के आश्रित नहीं होता। और आत्मा निराकार होने से देहादिकों की उपाधि भी नहीं हो सकता है, क्योंकि आत्मा सत्य है, देहादिक सब मिथ्या है। सत्य वस्तु मिथ्या वस्तु की उपाधि नहीं हो सकती है। और देह इन्द्रियादिक आत्मा की उपाधि भी नहीं हो सकते हैं, क्योंकि आत्मा अनन्त और निरञ्जन है और देहादिक अन्तवान् और नाशवान् हैं, इसी कारण आत्मा सम्बन्ध से रहित है और इच्छा आदिकों से भी रहित है एवं आत्मा शान्त स्वरूप है ॥ ४ ॥

मूलम् ।
अहो चिन्मात्रमेवाहमिन्द्रजालोपमं जगत् ।
अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।
अहो, चिन्मात्रम्, एव, अहम्, इन्द्रजालोपमम्, जगत्, अतः, मम, कथम्, कुत्र, हेयोपादेयकल्पना ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो= आश्चर्य है किमम= मेरी
अहम्= मैंहेयोपादेय-कल्पना= हेय और उपादेय की कल्पना
चिन्मात्रम्= चैतन्य-मात्र हूँ
जगत्= संसारकथम्= क्योंकर
इन्द्रजालोपमम्= इन्द्रजाल की तरह हैच= और
अतः= इसलियेकुत्र= किसमें हो ॥
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१२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

विद्वान् में इच्छा आदिक भी स्वतः नहीं होते हैं, इसमें जो कारण है उसको कहते हैं—
जनकजी कहते हैं कि मैं चैतन्य-स्वरूप हूँ और संपूर्ण जगत् इन्द्रजाल के तुल्य मेरी सत्ता के बल और अपनी सत्ता से रहित प्रतीत होता है। चूँकि जगत् की अपनी सत्ता कुछ भी नहीं है इस वास्ते मेरे को किसी पदार्थ में भी किसी प्रकार करके त्याग और ग्रहण की बुद्धि नहीं होती है। जो पुरुष जगत् के पदार्थों को सत्य मानता है, उसी की उनमें ग्रहण और त्यागबुद्धि होती है ॥ ५ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां सप्तमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ७ ॥

—:०:—

आठवाँ प्रकरण (मोक्ष-लक्षण / बन्ध-मुक्ति)

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आठवाँ प्रकरण ।

——:०:——

मूलम् ।

तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद्वाञ्छति शोचति ।
किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

तदा, बन्धः, यदा, चित्तम्, किञ्चित्, वाञ्छति, शोचति, किञ्चित्, मुञ्चति, गृह्णाति, किञ्चित्, हृष्यति, कुप्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदाजबकिञ्चित्कुछ
चित्तम्मनगृह्णातिग्रहण करता है
वाञ्छतिचाहता हैहृष्यतिप्रसन्न होता है
किञ्चित्कुछकुप्यतिदुःखित होता है
शोचतिसोचता हैतदातब
किञ्चित्कुछबन्धःबन्ध है ॥
मुञ्चतित्यागता है

भावार्थ ।

पहले के सात प्रकरणों द्वारा अष्टावक्रजी ने सब प्रकार से जनकजी के अनुभव की परीक्षा कर ली । अब इस आठवें प्रकरण में चार श्लोकों द्वारा अपने शिष्य के अनुभव की श्लाघा को करते हैं—

हे जनक ! जो तूने पूर्व कहा है कि मुझ अनन्त-स्वरूप आत्मा में त्याग और ग्रहण करने की कल्पना नहीं है, सो तूने ठीक कहा है । क्योंकि जब चित्त विषयों की इच्छावाला होकर किसी पदार्थ की प्राप्ति की इच्छा करता है और

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१२२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

उसके अप्राप्त होने से फिर शोच करता है और कष्ट होता
है, तब उसके त्याग की इच्छा करता है। और जब चित्त में
लोभ उत्पन्न होता है, तब ग्रहण की इच्छा करता है तथा
पदार्थ की प्राप्ति होने पर हर्ष को प्राप्त होता है, अप्राप्ति
होने पर क्रोधित होता है। इस प्रकार जब कि अनेक वास-
नाओं करके चित्त युक्त होता है, तब जीव को बन्ध होता
है। योगवाशिष्ठ में भी कहा है—

स्नेहेन धनलोभेन लाभेन मणियोषिताम् ।
आपातरमणीयेन चेतो गच्छति पीनताम् ॥ १ ॥

अर्थात् स्त्री-पुत्रादिकों में स्नेह करके, धन के लोभ करके,
मणियों और स्त्री आदिकों के लाभ करके चित्त दीनता को
प्राप्त होता है ॥ १ ॥

बन्धो हि वासनाबन्धो मोक्षः स्याद्वासनाक्षयः ।
वासनास्त्वं परित्यज्य मोक्षार्थित्वमपि त्यज ॥ २ ॥

चित्त में अनेक प्रकार के भोगों की वासना ही पुरुष
के बंधन का कारण है। समग्र-रूप से वासना के क्षय हो
जाने का नाम ही मोक्ष है। हे राम ! जब तुम वासना का
त्याग करोगे और मोक्ष की इच्छा न करोगे, तब सुखी हो
जाओगे ॥ २ ॥

प्रश्न—आपने कहा है कि जब तक चित्त में वासनाएं
भरी हुई हैं, तब तक इसकी मुक्ति कदापि नहीं होती है, सो
संसार में निर्वासनिक पुरुष तो कोई भी नहीं दिखाई देता
है, क्योंकि जितने गृहस्थाश्रमी हैं, उनके चित्त में स्त्री, पुत्र,

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आठवाँ प्रकरण । १२३

धनादिकों की प्राप्ति की वासनाएँ भरी रहती हैं । यदि कोई
पुरुष ईश्वर का स्मरण और दानादिकों को करता है, तो
उसके चित्त में यही कामना रहती है कि मेरे धनादिक सर्वदा
बने रहें, निर्वासनिक होकर कोई भी नहीं करता है । और
जितने त्यागी, साधु और महात्मा कहलाते हैं, उनके चित्त
में भी अनेक प्रकार की कामनाएँ भरी हुई हैं । कोई मठों
को बनाता है, कोई सेवको को बढ़ाता है, निर्वासनिक तो
उनमें भी कोई नहीं दिखाई देता है । यदि निर्वासनिक होवें,
तो वेषों को, चेलों को और मठों को क्यों बढ़ावें, और क्यों
प्रपंच को फैलावें, अतएव सब कोई प्रपंच को फेलाते हैं—क्या
गृहस्थ, क्या संन्यासी । इस हालत में कोई भी ज्ञानी नहीं
सिद्ध होता है । ज्ञानी के अभाव होने से मुक्ति का भी
अभाव ही सिद्ध होता है ?

उत्तर—जैसे एक वन में एक ही सिंह रहता है और
स्यार मृगादिक लाखों रहते हैं वैसे ही संसार-रूपी, गृहस्था-
श्रम-रूपी, अथवा संन्यासाश्रम-रूपी वन में वासना से रहित
ज्ञानवान् कोई एक विरला ही होता है और वासना से भरे
हुए अनेक होते हैं । जैसे सिंह के मारे हुए शिकार को स्यार
आदिक खाते हैं, वैसे निर्वासनिक पुरुषों के चिह्नों को धारण
करके अर्थात् ज्ञान की बातें सुना करके और वैराग्यादिकों
को दिखलाकर, बहुत से मूर्खों को वञ्चक संन्यासी या गृहस्थ
आचार्यादिक ठगते हैं, वे ही संसार के स्यार हैं । इसमें एक
दृष्टान्त को कहते हैं—

एक ग्राम में जुलाहे बसते थे । उन्होंने आपस में एक
दिन सलाह किया कि चलो, रात्रि को क्षत्रियों के ग्राम को

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१२४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

लूट लावें। तदनुसार सब जुलाहे मिलकर रात्रि को क्षत्रियों के ग्राम को लूटने गये। जब क्षत्रिय लोग हथियार लेकर जुलाहों के मारने को दौड़े, तब जुलाहे सब भागे। उनमें से एक जुलाहे ने कहा कि भाइयो ! भागे तो जाते ही हो, भला मारो-मारो तो कहते चलो। वे सब जुलाहे भागते जाते और मारो-मारो भी कहते जाते थे।

दाष्टान्त में यह है कि बहुत से बनावट के ज्ञानी ज्ञान के साधनों से भागे तो जाते हैं, पर औरों से ऐसा कहते जाते हैं कि वासना को त्यागो, ज्ञान को धारण करो, सब संसार मिथ्या है, ऐसे दम्भी ज्ञानी नहीं हो सकते हैं। जो समग्र वासनाओं से रहित हैं, वे ही ज्ञानी हैं। वासनावाला ही बन्ध को प्राप्त होता है ॥ १ ॥

मूलम् ।

तदामुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति ।
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

तदा, मुक्तिः, यदा, चित्तम्, न, वाञ्छति, न, शोचति, न, मुञ्चति, न, गृह्णाति, न, हृष्यति, न, कुप्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा=जबन हृष्यति=न प्रसन्न होता है
चित्तम्=मन+ च=और
न वाञ्छति=न चाहता हैन=न
न शोचति=न शोचता हैकुप्यति=दुःखित होता है
न मुञ्चति=न त्यागता हैतदा=तब भी
न गृह्णाति=न ग्रहण करता हैमुक्तिः=मुक्ति है ॥
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भावार्थ ।

जिस काल में चित्त न भोगों की प्राप्ति की इच्छा करता है, और न शोकों के त्याग की इच्छा करता है, अर्थात् पदार्थ के पाने पर न उसको हर्ष होता है, और न प्यारे सम्बन्धियों के नष्ट या वियोग हो जाने पर शोक होता है, किन्तु एक-रस सदा ज्यों का त्यों बना रहता है, उसी काल में वह पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥

मूलम् ।

तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु ।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

तदा, बन्धः, यदा, चित्तम्, सक्तम्, कासु, अपि, दृष्टिषु,
तदा, मोक्षः, यदा, चित्तम्, असक्तम्, सर्वदृष्टिषु ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा= जबयदा= जब
चित्तम्= मनचित्तम्= मन
कासु= किसीसर्वदृष्टिषु= सब दृष्टियों में अ- र्थात् सब विषयों में से किसी भी विषय में
दृष्टिषु= दृष्टि में अर्थात् विषय मेंअसक्तम्= नहीं
सक्तम्= लगा हुआ हैतदा= तब
तदा= तबमोक्षः= मुक्त है ॥
बन्धः= बन्ध है
अपि= और
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१२६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

पहले एक वाक्य करके बन्ध के लक्षण को कहा और दूसरे वाक्य करके मुक्ति के लक्षण को कहा । अब एक ही वाक्य करके बन्ध और मोक्ष दोनों का कथन करते हैं—

जब चित्त अनात्मपदार्थों में अनात्माकारवृत्तिवाला होता है, तब भी इसको बन्ध होता है । जब चित्त विषयाकार नहीं होता है अर्थात् आसक्ति से रहित होकर सर्वत्र आत्मदृष्टिवाला होता है, तभी जीव मुक्त कहा जाता है ।

प्रश्न—आपने कहा है कि जिस काल में चित्त विषयों में आसक्त होता है, तब बन्ध होता है और जब अनासक्त होता है, तब मुक्त होता है । यदि एक ही चित्त में काल-भेद करके बन्ध और मोक्ष माना जावेगा, तब मुक्ति भी अनित्य हो जावेगी ?

उत्तर—उस वाक्य का यह तात्पर्य नहीं है, जो आपने समझा है, किन्तु उसका यह तात्पर्य है कि आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के पूर्व जितने काल तक पुरुष का चित्त विचार से शून्य होकर विषयों में आसक्त रहता है, उतने काल तक जीव बन्ध में ही पड़ा रहता है । पश्चात् जब विचार करके युक्त हुआ, रचित दोष-दृष्टि करके विषयों में आसक्ति से रहित हो जाता है, और फिर विषय-वासना का बीज भी चित्त में नहीं रहता है, तब फिर वह मुक्त होकर कदापि बन्ध को नहीं प्राप्त होता है । जैसे भुंजे हुए बीज में फिर अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति नहीं रहती है, वैसे ही निर्वासनिक चित्तवाला पुरुष कभी भी जन्म को नहीं प्राप्त होता है ॥ ३ ॥

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आठवाँ प्रकरण । १२७

मूलम् ।

यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा ।
मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

यदा, न, अहम्, तदा, मोक्षः, यदा, अहम्, बन्धनम्, तदा,
मत्वा, इति, हेलया, किञ्चित्, मा, गृहाण, विमुञ्च, मा ॥

अन्वयः । शब्दार्थ । अन्वयः । शब्दार्थ ।
यदा=जब इति=इस प्रकार
अहम्=मैं हूँ मत्वा=मान करके
तदा=तब हेलया=इच्छा करके
बन्धनम्=बन्ध है मा=मत
यदा=जब गृहाण=ग्रहण कर
अहम् न=मैं नहीं हूँ मा=मत
तदा=तब विमुञ्च=त्याग कर ॥
मोक्षः=मोक्ष है

भावार्थ ।

जब तक पुरुष में अहंकार बैठा है—'मैं ब्राह्मण हूँ', 'मैं ज्ञानी हूँ,' 'मैं त्यागी हूँ,' तब तक वह मुक्त कदापि नहीं हो सकता है । ऐसा भी कहा है—

यावत्स्यात्स्वस्य सम्बन्धोऽहंकारेण दुरात्मना ।
तावन्न लेशमात्रापि मुक्तिवार्ता विलक्षणा ॥ १ ॥

अर्थात् तब तक इस जीव का सम्बन्ध दुरात्मा अहंकारी

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१२८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

के साथ बना रहता है, तब तक मुक्ति लेश-मात्र इसको प्राप्त नहीं होती है ।
इसी वार्ता को कहते हैं—
जब तक जीव का शरीरादिकों से अहंकाराध्यास बना है, तब तक इसकी मुक्ति कदापि नहीं हो सकती है । जिस काल में अहंकाराध्यास इसका निवृत्त हो जाता है, उसी काल में बिना ही परिश्रम अकर्ता, अभोक्ता होकर मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायामष्टमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ८ ॥

---:०:---

नवाँ प्रकरण (निर्वेद / वैराग्य)

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नवाँ प्रकरण ।
—:o:—

मूलम् ।
कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा ।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।
कृताकृते, च, द्वन्द्वानि, कदा, शान्तानि, कस्य, वा, एवम्, ज्ञात्वा, इह, निर्वेदात्, भव, त्यागपरः अव्रती ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
कृताकृते ={ कृत और अकृत कर्मवा =संशय रहित
च =औरज्ञात्वा =जान करके
द्वन्द्वानि =दुःख और सुखइह =इस संसार में
कस्य =किसकेनिर्वेदात् =विचार से
कदा =कबअव्रती ={ व्रत रहित होता हुआ
शान्तानि =शान्त हुए हैंत्यागपरः =त्याग परायण
एवम् =इस प्रकारभव =हो ॥

भावार्थ ।

अब निर्वेदाष्टक नामक नवम प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं—

पहले शिष्य ने जो गुरु के प्रति अपना अनुभव कहा था, उसकी दृढ़ता के लिये अब आठ श्लोकों करके वैराग्य के स्वरूप को दिखलाते हैं ।

प्रश्न—त्याग कैसे करना चाहिए ?

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१३० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

उत्तर— यह मेरे को कर्त्तव्य है, और यह मेरे को कर्त्तव्य नहीं है, इसी का नाम कृत और अकृत है अर्थात् इस तरह का जो आग्रह है अर्थात् अवश्य ही मेरे को यह करना उचित है, और अवश्य ही मेरे को यह करना उचित नहीं है, इन दोनों में अभिनिवेश अर्थात् हठ न करना और द्वन्द्व जो सुख-दुःख हैं, मैं इन दोनों से रहित हो जाऊँ इसमें आग्रह न करना, क्योंकि वे दोनों किसी भी देहधारी के कभी शान्त नहीं हुए हैं और न होवेंगे, इस वास्ते अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! इन कृताऽकृत आदिकों के त्याग से भी तू वैराग्य को प्राप्त हो । क्योंकि हे शिष्य ! तू अव्रती है, तेरा आग्रह याने हठे किसी में भी नहीं है ॥ १ ॥

मूलम् ।

कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात् ।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गता ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

कस्य, अपि, तात, धन्यस्य, लोकचेष्टावलोकनात्, जीवितेच्छा, बुभुक्षा, च, बुभुत्सा, उपशमम्, गता ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तात =हे प्रियजीवितेच्छा =जीने की इच्छा
लोकचेष्टावलोकनात् =उत्पत्ति और विनाश- रूप लोकों की चेष्टा के देखने सेच =और
बुभुक्षा =भोगने की इच्छा
कस्य =किसीच =और
धन्यस्य =महात्मा काबुभुत्सा =ज्ञान की इच्छा
अपि =भीउपशमम् =शान्ति को
गता =प्राप्त हुई है ॥
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नवाँ प्रकरण । १३१

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे शिष्य ! हजारों मनुष्यों
में से किसी एक भाग्यशाली पुरुष के चित्त में वैराग्य उत्पन्न
होता है । उसके जीने की और भोगने की इच्छा भी निवृत्त
हो जाती है । क्योंकि संसार के पदार्थों में ग्लानि और दोष-
दृष्टि का नाम ही वैराग्य है । जितने संसार के उत्पत्ति और
नाशवाले पदार्थ हैं, सबमें दोष लगे हैं । संसार में स्त्री, पुत्र,
धन और शरीर तथा इन्द्रिय आदिक सबको प्यारे हैं, और
इन्हीं के सुख के लिये पुरुष अनेक अनर्थों को करता है, और
ये ही सब जीवों के बन्ध के कारण हैं, इस वास्ते विना इनमें
वैराग्य प्राप्त हुए कदापि मोक्ष को नहीं प्राप्त होता है, इसी
हेतु से प्रथम इन्हीं में दोष-दृष्टि को दिखाते हैं । ‘योग-
वाशिष्ठ’ में कहा है—

गर्भे दुर्गन्धिभूयिष्ठे जठराग्निप्रदीपिते ।
दुःखं मयाप्तं यत्तस्मात्कनीयः कुम्भिपाकजम् ॥ १ ॥

अर्थात् बड़ी भारी दुर्गन्धि करके युक्त जो माता का
उदर है, और जो जठराग्नि करके प्रदीप्त है, उस गर्भ में
आकर जो जीव को दुःख होता है, उससे कुम्भीपाक नरक
का भी दुःख कम है ॥ १ ॥

एवं ‘गर्भोपनिषद्’ में भी गर्भ के दुःखोंका वर्णन किया
है कि जिस काल में गर्भ में जीव अति दुःखी होता है, तो
ईश्वर से प्रार्थना करता है कि हे प्रभो ! इस बार मैं जन्म
लेकर अवश्य ही ज्ञान के साधनों को करूँगा, पर जन्म

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१३२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

लेकर फिर यह जीव संसार के भोगों में फँस जाता है और गर्भवाले दुःखों को भूल जाता है, इसी कारण फिर बार-बार जन्मता और मरता है । 'शिव-गीता' में मरण के दुःखों को भी दिखाया है—

हा कान्ते हा धनं पुत्राः क्रन्दमानः सुदारुणम् ।
मण्डूक इव सर्पेण मृत्युना गीर्यते नरः ॥ १ ॥

अर्थात् जब जीव प्राणों को त्यागने लगता है, तब पुकारता है हे भार्ये ! हे धन ! हे पुत्रो ! मुझको इस मृत्यु से छुड़ाओ, ऐसे भयानक शब्दों को करता है जैसे सर्प के मुख में पड़ा हुआ मेढक पुकारता है ॥ १ ॥

अयः पाशेन कालस्य स्नेहपाशेन बन्धुभिः ।
आत्मानं कृष्यमाणस्य न खल्वस्ति परायणम् ॥ २ ॥

अर्थात् मरण-काल में यह जीव इधर तो काल के पाशों करके बँधा होता है, उधर सम्बन्धियों के स्नेह की रस्सियों करके खेंचा हुआ होता है, पर कोई भी मृत्यु से इसकी रक्षा नहीं कर सकता है ॥ २ ॥

या माता सा पुनर्भार्या या भार्या जननी हि सा ।
यः पिता स पुनः पुत्रो यः पुत्रः स पुनः पिता ॥ १ ॥

अर्थात् पूर्व जन्म में जो माता होती है, वही पुत्र में स्नेह के कारण उत्तर जन्म में उसकी स्त्री बनती है । जो पूर्व जन्म में पिता होता है, वही उत्तर जन्म में पुत्र होता है । जो पूर्व जन्म में पुत्र होता है, वही उत्तर जन्म में पिता होता है ॥ १ ॥

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नवाँ प्रकरण । १३३

एको यदा व्रजति कर्मपुरःसरोऽयं
विश्रामवृक्षसदृशः खलु जीवलोकः ।
सायंसायं वासवृक्षं समेतः
प्रातःप्रातस्तेन तेन प्रयान्ति ॥ २ ॥

जैसे सायंकाल में इधर उधर से पक्षी उड़कर एक ही वृक्ष पर रात्रि को विश्राम के लिये इकट्ठे हो जाते हैं और प्रातःकाल में सब इधर उधर उड़ जाते हैं, वैसे ही इस संसार-रूपी वृक्ष में सब जीवकर्मों के वश्य होकर इकट्ठे हो जाते हैं, फिर प्रारब्ध-कर्म के भोग के पूरे होने पर, सब अकेले अकेले होकर चले जाते हैं । कोई भी स्त्री, पुत्र, धनादि इसके साथ नहीं जाते हैं, और न साथ आते हैं, इस तरह विचार करके इनमें मोह को कदापि न करे ।

एवं 'देवी-भागवत' में शुकदेवजी ने जो स्त्री के सम्बन्ध से दोष दिखाये हैं—

नरस्य बन्धनाथाय शृङ्खला स्त्री प्रकीर्त्तिता ।
लोहबद्धोऽपि मुच्येत स्त्रीबद्धो नैव मुच्यते ॥ १ ॥

पुरुष के बन्धन का हेतु स्त्री को ही बेड़ीरूप करके कहा है। एवं लोहे की बेड़ी करके बाँधा हुआ पुरुष छूट जाता है, परन्तु स्त्री के स्नेह-रूपी पाश करके बाँधा हुआ पुरुष कदापि छूट नहीं सकता है । इसी पर एक दृष्टान्त देते हैं —

एक लड़का बाल्यावस्था में संन्यासी हो गया । जब जवान हुआ, तब तीर्थयात्रा करने को जाता था । रास्ते में

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१३४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

उधर से एक बरात आती थी । वह संन्यासी खड़ा हो गया
और उसने पूछा, यह क्या है ? लोगों ने कहा, यह बरात
है । यह जो लड़का घोड़ी पर सवार है, इसकी शादी एक
लड़की से होगी । तब उसने पूछा, फिर क्या होगा, तो कहा,
जब इसकी स्त्री इसके घर में आवेगी, तब दोनों आपस में
विषयानंद को प्राप्त होवेंगे । फिर स्त्री के लड़के पैदा होवेंगे ।
इतना सुनकर वह संन्यासी चला गया । रास्ते में एक कुएँ
पर छाया में सो रहा तब उसने स्वप्न देखा कि मेरी शादी
हुई है, स्त्री आई है और मैं उसके साथ सोया हूँ । उस स्त्री
ने कहा, थोड़ा सा पीछे हटो । जब वह हटने लगा, तब वह
धम्म से कुएँ में गिर पड़ा । गिरने की आवाज को सुनकर
लोग दौड़कर कहने लगे कि किसने तुझको कुएँ में गिरा दिया
है ? उसने कहा, स्वप्न की स्त्री ने मेरे को कुएँ में गिरा
दिया है, न मालूम जाग्रत् की स्त्री पुरुषों की क्या दुर्दशा
करती होगी । तात्पर्य यह है कि विवेकी के लिये स्त्री
साक्षात् नरक का कुण्ड है ।

प्रश्न—हे भगवन् ! कर्मकाण्डी कहते हैं कि जिसके पुत्र
नहीं है, उसकी गति भी नहीं होती है, इस वास्ते येनकेन
उपाय करके पुत्र उत्पन्न करना चाहिए, ऐसा 'देवी-भागवत'
में लिखा है ।

उत्तर—हे प्रियदर्शन ! यह जो तुमने कहा है कि अपुत्र की
गति नहीं होती है, सो गति शब्द का क्या अर्थ है । गति शब्द
का अर्थ मोक्ष करते हो वा दोनों लोकों का सुख करते हो ।
यदि गति शब्द का अर्थ मोक्ष करो, तब सब पुत्रवालों की
मुक्ति होनी चाहिए और मनुष्य, पशु आदिक सभी ज्ञान के