अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
आठवाँ प्रकरण (मोक्ष-लक्षण / बन्ध-मुक्ति)
आठवाँ प्रकरण ।
——:०:——
मूलम् ।
तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद्वाञ्छति शोचति ।
किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
तदा, बन्धः, यदा, चित्तम्, किञ्चित्, वाञ्छति, शोचति, किञ्चित्, मुञ्चति, गृह्णाति, किञ्चित्, हृष्यति, कुप्यति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा | जब | किञ्चित् | कुछ |
| चित्तम् | मन | गृह्णाति | ग्रहण करता है |
| वाञ्छति | चाहता है | हृष्यति | प्रसन्न होता है |
| किञ्चित् | कुछ | कुप्यति | दुःखित होता है |
| शोचति | सोचता है | तदा | तब |
| किञ्चित् | कुछ | बन्धः | बन्ध है ॥ |
| मुञ्चति | त्यागता है |
भावार्थ ।
पहले के सात प्रकरणों द्वारा अष्टावक्रजी ने सब प्रकार से जनकजी के अनुभव की परीक्षा कर ली । अब इस आठवें प्रकरण में चार श्लोकों द्वारा अपने शिष्य के अनुभव की श्लाघा को करते हैं—
हे जनक ! जो तूने पूर्व कहा है कि मुझ अनन्त-स्वरूप आत्मा में त्याग और ग्रहण करने की कल्पना नहीं है, सो तूने ठीक कहा है । क्योंकि जब चित्त विषयों की इच्छावाला होकर किसी पदार्थ की प्राप्ति की इच्छा करता है और
१२२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
उसके अप्राप्त होने से फिर शोच करता है और कष्ट होता
है, तब उसके त्याग की इच्छा करता है। और जब चित्त में
लोभ उत्पन्न होता है, तब ग्रहण की इच्छा करता है तथा
पदार्थ की प्राप्ति होने पर हर्ष को प्राप्त होता है, अप्राप्ति
होने पर क्रोधित होता है। इस प्रकार जब कि अनेक वास-
नाओं करके चित्त युक्त होता है, तब जीव को बन्ध होता
है। योगवाशिष्ठ में भी कहा है—
स्नेहेन धनलोभेन लाभेन मणियोषिताम् ।
आपातरमणीयेन चेतो गच्छति पीनताम् ॥ १ ॥
अर्थात् स्त्री-पुत्रादिकों में स्नेह करके, धन के लोभ करके,
मणियों और स्त्री आदिकों के लाभ करके चित्त दीनता को
प्राप्त होता है ॥ १ ॥
बन्धो हि वासनाबन्धो मोक्षः स्याद्वासनाक्षयः ।
वासनास्त्वं परित्यज्य मोक्षार्थित्वमपि त्यज ॥ २ ॥
चित्त में अनेक प्रकार के भोगों की वासना ही पुरुष
के बंधन का कारण है। समग्र-रूप से वासना के क्षय हो
जाने का नाम ही मोक्ष है। हे राम ! जब तुम वासना का
त्याग करोगे और मोक्ष की इच्छा न करोगे, तब सुखी हो
जाओगे ॥ २ ॥
प्रश्न—आपने कहा है कि जब तक चित्त में वासनाएं
भरी हुई हैं, तब तक इसकी मुक्ति कदापि नहीं होती है, सो
संसार में निर्वासनिक पुरुष तो कोई भी नहीं दिखाई देता
है, क्योंकि जितने गृहस्थाश्रमी हैं, उनके चित्त में स्त्री, पुत्र,
आठवाँ प्रकरण । १२३
धनादिकों की प्राप्ति की वासनाएँ भरी रहती हैं । यदि कोई
पुरुष ईश्वर का स्मरण और दानादिकों को करता है, तो
उसके चित्त में यही कामना रहती है कि मेरे धनादिक सर्वदा
बने रहें, निर्वासनिक होकर कोई भी नहीं करता है । और
जितने त्यागी, साधु और महात्मा कहलाते हैं, उनके चित्त
में भी अनेक प्रकार की कामनाएँ भरी हुई हैं । कोई मठों
को बनाता है, कोई सेवको को बढ़ाता है, निर्वासनिक तो
उनमें भी कोई नहीं दिखाई देता है । यदि निर्वासनिक होवें,
तो वेषों को, चेलों को और मठों को क्यों बढ़ावें, और क्यों
प्रपंच को फैलावें, अतएव सब कोई प्रपंच को फेलाते हैं—क्या
गृहस्थ, क्या संन्यासी । इस हालत में कोई भी ज्ञानी नहीं
सिद्ध होता है । ज्ञानी के अभाव होने से मुक्ति का भी
अभाव ही सिद्ध होता है ?
उत्तर—जैसे एक वन में एक ही सिंह रहता है और
स्यार मृगादिक लाखों रहते हैं वैसे ही संसार-रूपी, गृहस्था-
श्रम-रूपी, अथवा संन्यासाश्रम-रूपी वन में वासना से रहित
ज्ञानवान् कोई एक विरला ही होता है और वासना से भरे
हुए अनेक होते हैं । जैसे सिंह के मारे हुए शिकार को स्यार
आदिक खाते हैं, वैसे निर्वासनिक पुरुषों के चिह्नों को धारण
करके अर्थात् ज्ञान की बातें सुना करके और वैराग्यादिकों
को दिखलाकर, बहुत से मूर्खों को वञ्चक संन्यासी या गृहस्थ
आचार्यादिक ठगते हैं, वे ही संसार के स्यार हैं । इसमें एक
दृष्टान्त को कहते हैं—
एक ग्राम में जुलाहे बसते थे । उन्होंने आपस में एक
दिन सलाह किया कि चलो, रात्रि को क्षत्रियों के ग्राम को
१२४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
लूट लावें। तदनुसार सब जुलाहे मिलकर रात्रि को क्षत्रियों के ग्राम को लूटने गये। जब क्षत्रिय लोग हथियार लेकर जुलाहों के मारने को दौड़े, तब जुलाहे सब भागे। उनमें से एक जुलाहे ने कहा कि भाइयो ! भागे तो जाते ही हो, भला मारो-मारो तो कहते चलो। वे सब जुलाहे भागते जाते और मारो-मारो भी कहते जाते थे।
दाष्टान्त में यह है कि बहुत से बनावट के ज्ञानी ज्ञान के साधनों से भागे तो जाते हैं, पर औरों से ऐसा कहते जाते हैं कि वासना को त्यागो, ज्ञान को धारण करो, सब संसार मिथ्या है, ऐसे दम्भी ज्ञानी नहीं हो सकते हैं। जो समग्र वासनाओं से रहित हैं, वे ही ज्ञानी हैं। वासनावाला ही बन्ध को प्राप्त होता है ॥ १ ॥
मूलम् ।
तदामुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति ।
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
तदा, मुक्तिः, यदा, चित्तम्, न, वाञ्छति, न, शोचति, न, मुञ्चति, न, गृह्णाति, न, हृष्यति, न, कुप्यति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा= | जब | न हृष्यति= | न प्रसन्न होता है |
| चित्तम्= | मन | + च= | और |
| न वाञ्छति= | न चाहता है | न= | न |
| न शोचति= | न शोचता है | कुप्यति= | दुःखित होता है |
| न मुञ्चति= | न त्यागता है | तदा= | तब भी |
| न गृह्णाति= | न ग्रहण करता है | मुक्तिः= | मुक्ति है ॥ |
भावार्थ ।
जिस काल में चित्त न भोगों की प्राप्ति की इच्छा करता है, और न शोकों के त्याग की इच्छा करता है, अर्थात् पदार्थ के पाने पर न उसको हर्ष होता है, और न प्यारे सम्बन्धियों के नष्ट या वियोग हो जाने पर शोक होता है, किन्तु एक-रस सदा ज्यों का त्यों बना रहता है, उसी काल में वह पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥
मूलम् ।
तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु ।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
तदा, बन्धः, यदा, चित्तम्, सक्तम्, कासु, अपि, दृष्टिषु,
तदा, मोक्षः, यदा, चित्तम्, असक्तम्, सर्वदृष्टिषु ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा | = जब | यदा | = जब |
| चित्तम् | = मन | चित्तम् | = मन |
| कासु | = किसी | सर्वदृष्टिषु | = सब दृष्टियों में अ- र्थात् सब विषयों में से किसी भी विषय में |
| दृष्टिषु | = दृष्टि में अर्थात् विषय में | असक्तम् | = नहीं |
| सक्तम् | = लगा हुआ है | तदा | = तब |
| तदा | = तब | मोक्षः | = मुक्त है ॥ |
| बन्धः | = बन्ध है | ||
| अपि | = और |
१२६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
पहले एक वाक्य करके बन्ध के लक्षण को कहा और दूसरे वाक्य करके मुक्ति के लक्षण को कहा । अब एक ही वाक्य करके बन्ध और मोक्ष दोनों का कथन करते हैं—
जब चित्त अनात्मपदार्थों में अनात्माकारवृत्तिवाला होता है, तब भी इसको बन्ध होता है । जब चित्त विषयाकार नहीं होता है अर्थात् आसक्ति से रहित होकर सर्वत्र आत्मदृष्टिवाला होता है, तभी जीव मुक्त कहा जाता है ।
प्रश्न—आपने कहा है कि जिस काल में चित्त विषयों में आसक्त होता है, तब बन्ध होता है और जब अनासक्त होता है, तब मुक्त होता है । यदि एक ही चित्त में काल-भेद करके बन्ध और मोक्ष माना जावेगा, तब मुक्ति भी अनित्य हो जावेगी ?
उत्तर—उस वाक्य का यह तात्पर्य नहीं है, जो आपने समझा है, किन्तु उसका यह तात्पर्य है कि आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के पूर्व जितने काल तक पुरुष का चित्त विचार से शून्य होकर विषयों में आसक्त रहता है, उतने काल तक जीव बन्ध में ही पड़ा रहता है । पश्चात् जब विचार करके युक्त हुआ, रचित दोष-दृष्टि करके विषयों में आसक्ति से रहित हो जाता है, और फिर विषय-वासना का बीज भी चित्त में नहीं रहता है, तब फिर वह मुक्त होकर कदापि बन्ध को नहीं प्राप्त होता है । जैसे भुंजे हुए बीज में फिर अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति नहीं रहती है, वैसे ही निर्वासनिक चित्तवाला पुरुष कभी भी जन्म को नहीं प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
आठवाँ प्रकरण । १२७
मूलम् ।
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा ।
मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
यदा, न, अहम्, तदा, मोक्षः, यदा, अहम्, बन्धनम्, तदा,
मत्वा, इति, हेलया, किञ्चित्, मा, गृहाण, विमुञ्च, मा ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । अन्वयः । शब्दार्थ ।
यदा=जब इति=इस प्रकार
अहम्=मैं हूँ मत्वा=मान करके
तदा=तब हेलया=इच्छा करके
बन्धनम्=बन्ध है मा=मत
यदा=जब गृहाण=ग्रहण कर
अहम् न=मैं नहीं हूँ मा=मत
तदा=तब विमुञ्च=त्याग कर ॥
मोक्षः=मोक्ष है
भावार्थ ।
जब तक पुरुष में अहंकार बैठा है—'मैं ब्राह्मण हूँ', 'मैं ज्ञानी हूँ,' 'मैं त्यागी हूँ,' तब तक वह मुक्त कदापि नहीं हो सकता है । ऐसा भी कहा है—
यावत्स्यात्स्वस्य सम्बन्धोऽहंकारेण दुरात्मना ।
तावन्न लेशमात्रापि मुक्तिवार्ता विलक्षणा ॥ १ ॥
अर्थात् तब तक इस जीव का सम्बन्ध दुरात्मा अहंकारी
१२८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
के साथ बना रहता है, तब तक मुक्ति लेश-मात्र इसको प्राप्त नहीं होती है ।
इसी वार्ता को कहते हैं—
जब तक जीव का शरीरादिकों से अहंकाराध्यास बना है, तब तक इसकी मुक्ति कदापि नहीं हो सकती है । जिस काल में अहंकाराध्यास इसका निवृत्त हो जाता है, उसी काल में बिना ही परिश्रम अकर्ता, अभोक्ता होकर मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायामष्टमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ८ ॥
---:०:---