अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उन्नीसवाँ प्रकरण (आत्मविश्राम)
उन्नीसवाँ प्रकरण।
—:०:—
मूलम्।
तत्त्वविज्ञानसंदंशमादाय हृदयोदरात्।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया ॥ १ ॥
पदच्छेदः।
तत्त्वविज्ञानसंदंशम्, आदाय, हृदयोदरात्, नानाविध-परामर्शशल्योद्धारः, कृतः, मया ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| भवतः | = आपसे | नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः | = नाना प्रकार के विचार-रूपबाण का उद्धार |
| तत्त्वविज्ञानसंदंशम् | = तत्त्वज्ञानरूप संसी को | मया | = मुझ करके |
| आदाय | = ले करके | कृतः | = किया गया है ॥ |
| हृदयोदरात् | = हृदय और उदर से |
भावार्थ।
अब एकोनविंशति प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं—
शिष्य गुरु के मुख से तत्त्व-ज्ञानी की स्वाभाविक शान्ति को श्रवण करके, अपने को कृतार्थ मानकर, अब गुरु के तोष के लिये अपनी शान्ति को आठ श्लोकों द्वारा कहता है।
हे गुरो! मैंने आपके सकाश से तत्त्वज्ञान के उपदेश की संसीरूपी शास्त्र द्वारा अपने हृदय से नाना प्रकार के संकल्पों और विकल्पों को निकाल दिया है ॥ १ ॥
उन्नीसवाँ प्रकरण । ३७७
मूलम् ।
क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेककता ।
क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, धर्मः, क्व, च, वा, कामः, क्व, च, अर्थः, क्व, विवेककता,
क्व, द्वैतम्, क्व, च, वा, अद्वैतम्, स्वमहिम्न, स्थितस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | च | = और |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | क्व | = कहाँ |
| मे | = मुझको | अर्थः | = अर्थ है ? |
| क्व | = कहाँ | वा | = अथवा |
| धर्मः | = धर्म है ? | क्व | = कहाँ |
| च | = और | द्वैतम् | = द्वैत है ? |
| क्व | = कहाँ | वा | = अथवा |
| कामः | = काम है ? | क्व | = कहाँ |
| अद्वैतम् | = अद्वैत है ? |
भावार्थ ।
शिष्य कहता है कि मेरे को धर्म कहाँ है ? और काम कहाँ है ? मैंने धर्म, अर्थ, और काम को अपने हृदय से निकाल दिया है । क्योंकि ये सब विनाशी हैं, और जो मैं अपनी महिमा में स्थित हूँ, तो मेरे को विवेक कहाँ ? विवेक से भी मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है, और चेतन आत्मा में जो विश्रान्ति को प्राप्त हुआ है, उसको द्वैत और अद्वैत से भी कुछ प्रयोजन नहीं है ।
३७८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
दृष्टांत-उत्तीर्णे तु गते पारे नौकायाः किं प्रयोजनम्।
जब कि पुरुष नदी के परलेपार उतर जाता है, तब नौका का भी कुछ प्रयोजन नहीं रहता है। इसी तरह द्वैत का जब आत्मज्ञान करके बाध हो जाता है, तब फिर द्वैत के साथ अद्वैत का भी कुछ प्रयोजन नहीं रहता है, क्योंकि अद्वैत भी द्वैत की अपेक्षा करके कहा जाता है। जब द्वैत न रहा, तब अद्वैत कहना भी व्यर्थ ही है। इस वास्ते द्वैत और अद्वैत दोनों मेरे में नहीं हैं ॥ २ ॥
मूलम् ।
क्व भूतं भविष्यद्वा वर्तमानमपि क्व वा ।
क्व देशः क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, भूतम्, क्व, भविष्यत्, वा, वर्तमानम्, अपि, क्व, वा, क्व, देशः, क्व, च, वा, नित्यम्, स्वमहिम्नि, स्थितस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| नित्यम् | = नित्य | भविष्यत् | = भविष्यत् है ? |
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | वा | = अथवा |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | क्व | = कहाँ |
| मे | = मुझको | वर्तमानम् अपि | = वर्तमान भी है ? |
| क्व | = कहा | वा | = अथवा |
| भूतम् | = भूत है ? | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | देशः | = देश है ? |
भावार्थ ।
शिष्य कहता है कि हे गुरो ! काल का भी मेरे को स्फुरण
उन्नीसवाँ प्रकरण । ३७९
नहीं होता है । मेरी दृष्टि में भूत, भविष्यत्, और वर्तमान
कोई नहीं हैं; और न कोई देश है । क्योंकि मैं नित्य अपनी
महिमा में ही स्थित हूँ और सबमें मेरी एक आत्मदृष्टि
है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
क्व चात्मा क्व च वानात्मा क्व शुभं क्वाशुभं तथा ।
क्व चिन्ताक्व चवा ऽचिन्तास्वमहिम्निस्थितस्य मे ॥४ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, च, आत्मा, क्व, च, वा, अनात्मा, क्व, शुभम्, क्व,
अशुभम्, तथा, क्व, चिन्ता, क्व, च, वा, अचिन्ता, स्व-
महिम्नि, स्थितस्य, मे ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ ।
स्वमहिम्नि = अपनी महिमा में | शुभम् = शुभ है ?
स्थितस्य = स्थित हुए | क्व = कहाँ
मे = मुझको | अशुभम् = अशुभ है
क्व = कहाँ | तथा = और
आत्मा = आत्मा है ? | क्व = कहाँ
च = और | चिन्ता = चिन्ता है ?
वा = अथवा | वा = अथवा
क्व = कहाँ | क्व = कहाँ
अनात्मा = अनात्मा है ? | अचिन्ता = अचिन्ता है ?
क्व = कहाँ |
भावार्थ ।
शिष्य कहता है कि हे गुरो ! अपनी महिमा में स्थित
जो मैं हूँ, मेरी दृष्टि में आत्मा कहाँ ? और अनात्मा कहाँ
३८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
है ? अर्थात् आत्मा और अनात्मा का व्यवहार अज्ञानी मूर्ख की दृष्टि में होता है। और शुभ कहाँ है ? और अशुभ कहाँ है ? चिन्ता और अचिन्ता कहाँ है ? किन्तु केवल चेतन ही अपनी महिमा में स्थित है ॥४॥
मूलम् ।
क्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणं तथा ।
क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्निस्थितस्य मे ॥५॥
पदच्छेदः ।
क्व, स्वप्नः, क्व, सुषुप्तिः, वा, क्व, च, जागरणम्, तथा, क्व, तुरीयम्, भयम्, वा, अपि, स्वमहिम्नि, स्थितस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | तथा | = और |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | जागरणम् | = जाग्रत् है ? |
| मे | = मुझको | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | तुरीयम् | = तुरीय है ? |
| स्वप्नः | = स्वप्न है ? | अपि | = और |
| च | = और | वा | = अथवा |
| वा | = अथवा | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | भयम् | = भय है ? |
| सुषुप्तिः | = सुषुप्ति है ? |
भावार्थ ।
हे गुरो ! मेरी दृष्टि में जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति ये तीनों अवस्थाएँ भी नहीं हैं; क्योंकि ये तीनों अवस्थाएँ बुद्धि के धर्म हैं, सो बुद्धि ही मिथ्या भान होती है। तुरीय अवस्था
उन्नीसवाँ प्रकरण । ३८१
कहाँ है ? और भय कहाँ है ? और अभय कहाँ है ? ये सब
अन्तःकरण के ही धर्म हैं, सो अन्तःकरण ही मिथ्या है ॥ ५ ॥
मूलम् ।
क्व दूरं क्व समीपं वा बाह्यं क्वाभ्यन्तरं क्व वा ।
क्वस्थूलंकवचवा सूक्ष्मं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, दूरम्, क्व, समीपम्, वा, बाह्यम्, क्व, आभ्यन्तरम्,
क्व, वा, क्व, स्थूलम्, क्व, च, वा, सूक्ष्मम्, स्वमहिम्नि,
स्थितस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | समीपम् | = समीप है ? |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | च | = और |
| मे | = मुझको | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | अभ्यन्तरम् | = आभ्यन्तर है ? |
| दूरम् | = दूर है ? | च | = और |
| च | = और | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | स्थूलम् | = स्थूल है ? |
| बाह्यम् | = बाह्य है ? | च | = और |
| च | = और | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | सूक्ष्मम् | = सूक्ष्म है ? |
भावार्थ ।
मेरे में दूर कहाँ है ? समीप कहाँ है ? बाह्य कहाँ है? अन्तर
३८२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
कहाँ है ? स्थूल कहाँ है ? सूक्ष्म कहाँ है ? जो सर्वत्र
परिपूर्ण है, उसमें कुछ भी नहीं बनता है ॥ ६ ॥
मूलम् ।
क्व मृत्युर्जीवितं वा क्व लोकाः क्वास्य क्व लौकिकम् ।
क्व लयः क्व समाधिर्वा स्वमहिम्निस्थितस्य मे ॥ ७ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, मृत्युः, जीवितम, वा, क्व, लोकाः, क्व, अस्य, क्व,
लौकिकम्, क्व, लयः, क्व, समाधिः, वा, स्वमहिम्नि
स्थितस्य मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | लोकाः | = भू आदि लोक है ? |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | अस्य | = इस मुझ ज्ञानी को |
| मे | = मुझको | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | लौकिकम् | = लौकिक व्यवहार है ? |
| मृत्युः | = मृत्यु है ? | क्व | = कहाँ |
| वा | = अथवा | लयः | = लय है ? |
| क्व | = कहाँ | वा | = अथवा |
| जीवितम् | = जीवित है ? | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | समाधि | = समाधि है ? |
भावार्थ ।
मृत्यु कहाँ है ? और जीवन कहाँ है ? आत्मा तीनों
कालों में एकरस ज्यों का त्यों अपनी महिमा में स्थित है ।
उसमें जन्म कहाँ ? मरण कहाँ ? लोक कहाँ ? लोकों में
उन्नीसवाँ प्रकरण । ३८३
होनेवाले पदार्थ कहाँ हैं ? लय कहाँ है ? और समाधि
कहाँ ? अपनी महिमा में जो स्थित है, उसमें लयादिक भी
तीनों कालों में नहीं है ॥ ७ ॥
मूलम् ।
अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाऽप्यलम् ।
अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
अलम्, त्रिवर्गकथया, योगस्य, कथया, अपि, अलम्,
अलम्, विज्ञानकथया, विश्रान्तस्य, मम, आत्मनि ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| आत्मनि=आत्मा में | योगस्य=योग की |
| विश्रान्तस्य=विश्रान्त हुए | कथया=कथा से |
| मम=मुझको | अलम्=पूर्णता है |
| त्रिवर्गकथया=धर्म, अर्थ और काम की कथा से | च=और |
| अलम्=पूर्णता है ? | विज्ञानकथया=विज्ञान की कथा से भी |
| अलम्=पूर्णता है ॥ |
भावार्थ ।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इनकी कथाओं से, योग
की कथाओं से विज्ञान की कथाओं से भी कुछ प्रयोजन नहीं
है । क्योंकि मैं आत्मा में विश्रान्ति को प्राप्त हुआ हूँ ॥ ८ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायामेकोनविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ।
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