अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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उधर से एक बरात आती थी । वह संन्यासी खड़ा हो गया
और उसने पूछा, यह क्या है ? लोगों ने कहा, यह बरात
है । यह जो लड़का घोड़ी पर सवार है, इसकी शादी एक
लड़की से होगी । तब उसने पूछा, फिर क्या होगा, तो कहा,
जब इसकी स्त्री इसके घर में आवेगी, तब दोनों आपस में
विषयानंद को प्राप्त होवेंगे । फिर स्त्री के लड़के पैदा होवेंगे ।
इतना सुनकर वह संन्यासी चला गया । रास्ते में एक कुएँ
पर छाया में सो रहा तब उसने स्वप्न देखा कि मेरी शादी
हुई है, स्त्री आई है और मैं उसके साथ सोया हूँ । उस स्त्री
ने कहा, थोड़ा सा पीछे हटो । जब वह हटने लगा, तब वह
धम्म से कुएँ में गिर पड़ा । गिरने की आवाज को सुनकर
लोग दौड़कर कहने लगे कि किसने तुझको कुएँ में गिरा दिया
है ? उसने कहा, स्वप्न की स्त्री ने मेरे को कुएँ में गिरा
दिया है, न मालूम जाग्रत् की स्त्री पुरुषों की क्या दुर्दशा
करती होगी । तात्पर्य यह है कि विवेकी के लिये स्त्री
साक्षात् नरक का कुण्ड है ।
प्रश्न—हे भगवन् ! कर्मकाण्डी कहते हैं कि जिसके पुत्र
नहीं है, उसकी गति भी नहीं होती है, इस वास्ते येनकेन
उपाय करके पुत्र उत्पन्न करना चाहिए, ऐसा 'देवी-भागवत'
में लिखा है ।
उत्तर—हे प्रियदर्शन ! यह जो तुमने कहा है कि अपुत्र की
गति नहीं होती है, सो गति शब्द का क्या अर्थ है । गति शब्द
का अर्थ मोक्ष करते हो वा दोनों लोकों का सुख करते हो ।
यदि गति शब्द का अर्थ मोक्ष करो, तब सब पुत्रवालों की
मुक्ति होनी चाहिए और मनुष्य, पशु आदिक सभी ज्ञान के