अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
बारहवाँ प्रकरण (स्वरूप-स्थिति)
बारहवाँ प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः ।
अथ चिन्तासहस्तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
कायकृत्यासहः, पूर्वम्, ततः, वाग्विस्तरासहः, अथ, चिन्तासहः, तस्मात्, एवम्, आस्थितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| पूर्वम् = | पहले | अथ = | उसके पीछे |
| कायकृत्यासहः = | शारीरिक कर्म का न सहारने- वाला हुआ अर्थात् कायिक कर्म का त्यागनेवाला हुआ | चिन्तासहः = | चिन्ता के व्या- पार को न सहारनेवाला हुआ अर्थात् मानसिक कर्म का त्याग करने- वाला हुआ |
| ततः = | उसके पीछे | तस्मात् एवम् = | इसी कारण |
| वाग्विस्तरासहः = | वाणी के जप्य- रूप कर्म का न सहारनेवाला हुआ अर्थात् वाचिक कर्म का त्यागनेवाला हुआ | अहम् एव = | मैं ही |
| आस्थितः = | स्थित हूँ |
१८४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
अब द्वादशाष्टक प्रकरण का आरम्भ करते हैं—
पूर्व जो गुरु ने शिष्य के प्रति ज्ञानाष्टक कहा है, उसी को अब शिष्य अपने में दिखाता है । शिष्य कहता है कि हे गुरो ! प्रथम जो शरीर के कर्म यज्ञादि हैं, उनका मैं असहन करनेवाला हुआ अर्थात् शारीरिक कर्म मेरे से सहारे नहीं गये हैं, फिर वाणी के कर्म जो निन्दा स्तुति आदिक हैं, उनका मैंने असहन किया । फिर मन के कर्म जो जपादिक हैं, उनका मैंने असहन किया अर्थात् कायिक, वाचिक और मानसिक संपूर्ण कर्मों को त्याग करके मैं स्थित हो गया ॥ १ ॥
मूलम् ।
प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः ।
विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
प्रीत्यभावेन, शब्दादेः, अदृश्यत्वेन, च, आत्मनः, विक्षे-
पैकाग्रहृदयः, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| शब्दादेः= | शब्द आदि की | विक्षेपेकाग्रहृदयः= | विक्षेपों से एकाग्र हुआ है मन जिसका |
| प्रीत्यभावेन= | प्रीति के अभाव से | ||
| च= | और | एवम् एव= | ऐसा |
| आत्मनः= | आत्मा के | अहम्= | मैं |
| अदृश्यत्वेन= | अदृश्यता से | आस्थितः= | सब तरफ से स्थित हूँ ॥ |
बारहवाँ प्रकरण । १८५
भावार्थ ।
अब तीन प्रकार के कर्मों के त्याग के हेतु को कहते
हैं—कायिक, वाचिक और मानसिक ये तीनों कर्म मन की
एकाग्रता विषे विक्षेप के करनेवाले हैं। लोकान्तर की प्राप्ति
करनेवाले जो यज्ञादिक कर्म हैं; उनसे शरीर में विक्षेप
होता है। शरीर में विक्षेप के होने से मन का निरोध नहीं
हो सकता है। वाणी के कर्म जो निन्दा, स्तुति आदिक हैं,
उनसे भी मन का निरोध नहीं हो सकता है, और मन के
जो जपादिक कर्म हैं, वे भी मन के विक्षेप करनेवाले हैं।
तीनों कर्मों में जो प्रीति है, उसका त्याग करना आवश्यक
है। आत्मा अदृश्य है अर्थात् ध्यानादिकों का अविषय है।
आत्मा चेतन है, मन, बुद्धि आदिक सब अचेतन हैं याने जड़
हैं। जड़ चेतन को विषय नहीं कर सकता है, इस वास्ते
आत्मा के ध्यान करने की चिन्तारूपी विक्षेप भी मेरे को
नहीं है और मैं संपूर्ण विक्षेपों से रहित होकर अपने स्वरूप
में ही स्थित हूँ ॥ २ ॥
मूलम् ।
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये ।
एवं विलोक्य नियममेवमेवाहमास्थितः ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
समाध्यासादिविक्षिप्तौ, व्यवहारः, समाधये, एवम्,
विलोक्य, नियमम्, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
१८६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः। | शब्दार्थ । | अन्वयः। | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सामाध्यासा-दिविक्षिप्तौ = | सम्यक् अध्यास आदि करके विक्षेप होने पर | एवम् नियमम् = | ऐसे नियमको |
| विलोक्य = | देख करके | ||
| समाधये = | समाधि के लिये | एवम् एव = | समाधि-रहित |
| व्यवहारः = | व्यवहार है | अहम् = | मैं |
| आस्थितः = | स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ ।
प्रश्न— किसी प्रकार के विक्षप के न होने पर भी समाधि के लिये तो कुछ मन आदिकों को व्यापार करना ही पड़ेगा ?
उत्तर— कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनर्थों का हेतु जो अध्यास है, उसी करके विक्षेप होता है । उस विक्षेप के दूर करने के लिये समाधि के वास्ते मन आदिकों का व्यापार होता है, अन्यथा नहीं होता है । ऐसे नियम को देख करके प्रथम मैंने अध्यास को दूर कर दिया है, इस वास्ते समाधि के लिये भी मन आदिकों के व्यापार की कोई आवश्यकता नहीं है, किंतु समाधि से रहित अपने आत्मानंद में मैं स्थित हूँ ॥ ३ ॥
मूलम् ।
हेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषादयोः ।
अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
हेयोपादेयविरहात्, एवम्, हर्षविषादयोः, अभावात्, अद्य, हे ब्रह्मन्, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
बारहवाँ प्रकरण । १८७
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| हे ब्रह्मन्= | हे प्रभो ! | अभावात्= | अभाव से |
| हेयोपादेयविरहात्= | त्याज्य और ग्राह्य वस्तु के वियोग से | अद्य= | अब |
| अहम्= | मैं | ||
| एवम्= | वैसे ही | एवम् एव= | जैसा हूँ वैसा ही |
| हर्षविषादयोः= | हर्ष और विषाद के | आस्थितः= | स्थित हूँ |
भावार्थ ।
जनकजी फिर अपने अनुभव को कहते हैं कि हे प्रभो ! त्यागने-योग्य और ग्रहण करन योग्य वस्तु का अभाव होने से अर्थात् आत्म-ज्ञान की प्राप्ति होने से न तो मेरे को कुछ त्याग करने-योग्य रहा है, और न कुछ ग्रहण करने के योग्य रहा है, इसी वास्ते हर्ष विषादादिक भी मेरे को नहीं हैं, क्योंकि हर्ष विषादादिक भी ग्रहण और त्याग करने से ही होते हैं, इस वास्ते अब मैं अपने स्वरूप में ही स्थित हुआ हूँ ॥ ४ ॥
मूलम् ।
आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम् ।
विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
आश्रमानाश्रमम्, ध्यानम्, चित्तस्वीकृतवर्जनम्, विकल्पम्, मम, वीक्ष्य, एतैः, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
१८८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| + यत्= | जो | एतैः= | उन सबसे |
| आश्रमाना-श्रमम्= | आश्रम और अनाश्रम है | उत्पन्नः= | उत्पन्न हुए |
| मम= | अपने | ||
| ध्यानम्= | ध्यान है | विकल्पम्= | विकल्प को |
| च= | और | वीक्ष्य= | देख करके |
| अहम्= | मैं | ||
| चित्तस्वीकृत-वर्जनम्= | चित्त से स्वीकार की हुई वस्तु का त्याग है | एवम्= | इन तीनों से रहित |
| आस्थितः= | स्थित हुआ हूँ |
भावार्थ ।
शिष्य कहता है कि हे गुरो ! आश्रमों के धर्मों से और उनके फलों के सम्बन्ध से भी मैं रहित हूँ । अनाश्रमी जो त्यागी संन्यासी है, उनके धर्म जो दण्डादिकों का धारण करना है, उनके सम्बन्ध से भी मैं रहित हूँ और योगियों के धर्म जो धारणा ध्यानादिक हैं, उनसे भी मैं रहित हूँ, क्योंकि ये सब अज्ञानियों के लिये बने हैं, मैं इन सबका साक्षी चिद्रूप हूँ ।
यः शरीरेन्द्रियादिभ्यो विभिन्नं सर्वसाक्षिणम् ।
पारमार्थिकविज्ञानं सुखात्मानं च स्वप्रभम् ॥ १ ॥
परं तत्त्वं विजानाति सोऽतिवर्णाश्रमी भवेत् ॥ २ ॥
जो पुरुष शरीर इन्द्रियादिकों से भिन्न और शरीरादिकों के साक्षी विज्ञान-स्वरूप, सुख-स्वरूप, स्वयंप्रकाश परम तत्त्व अपने आत्मा को जान लेता है, वह अतिवर्णाश्रमी कहलाता है। सो मैं वर्णाश्रमों से अतीत सबका साक्षी चिद्रूप हूँ ॥ ५ ॥
बारहवाँ प्रकरण । १८९
मूलम् ।
कर्माऽनुष्ठानमज्ञानाद्यथैवोपरमस्तथा ।
बुद्ध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
कर्माऽनुष्ठानम्, अज्ञानात्, यथा, एव उपरमः, तथा,
बुद्ध्वा, सम्यक्, इदम्, तत्त्वम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यथा | =जैसे | सम्यक् | =भली प्रकार |
| कर्मानुष्ठानम् | =कर्म का अनुष्ठान | बुद्ध्वा | =जान करके |
| अज्ञानात् | =अज्ञान से है | अहम् | =मैं |
| तथा | =वैसा ही | एवम् एव | =कर्म करने और कर्म न करने की इच्छा को त्याग करके |
| उपरमः | =कर्म का त्याग | ||
| एव | =भी है | ||
| इदम् | =इस तत्त्व को | आस्थितः | =स्थित हूँ |
भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि कर्मों का अनुष्ठान अज्ञानता से होता है, अर्थात् जिसको आत्मा के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं है, वही कर्मों का अनुष्ठान स्वर्गादि फल की प्राप्ति के लिये करता है, और आत्मा के ज्ञान से ही पुरुष कर्म करने से उपराम को भी प्राप्त हो जाता है । जिसका आत्मा का साक्षात्कार हो गया है, वह न कर्म करता है, और न उनसे उपराम होता है, प्रारब्ध-वश से शरीरादिक कर्मों को
१९० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
करता है वा नहीं करता है, ऐसा जानकर ज्ञानी अपने नित्यानन्द-स्वरूप में स्थित रहता है ॥ ६ ॥
मूलम् ।
अचिन्त्यं चिन्त्यमानोऽपिचिन्तारूपं भजत्यसौ ।
त्यक्त्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ ७ ॥
पदच्छेदः ।
अचिन्त्यम्, चिन्त्यमानः, अपि, चिन्तारूपम्, भजति, असौ, त्यक्त्वा, तद्भावनम्, तस्मात्, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अचिन्त्यम् | =ब्रह्म को | तस्मात् | =इस कारण |
| चिन्त्यमानः | =चितवन करता हुआ | तद्भावनम् | =उस चिन्ता की भावना को |
| अपि | =भी | त्यक्त्वा | =त्याग करके |
| असौ | =यह पुरुष | अहम् | =मैं |
| चिन्तारूपम् | =चिन्ता को | एवम् एव | =भावना-रहित |
| भजति | =भावना करता है | आस्थितः | =स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ ।
ब्रह्म अचिन्त्य है अर्थात् मन और वाणी करके चिन्तन नहीं किया जा सकता है, पर जो आत्मवर्ग अचिन्त्यरूप का चिंतवन करता है, उस चिन्तवन की चिन्ता को भी त्याग करके मैं भावना-रूपी चिन्तवन से रहित अपने आत्मा में ही स्थित हूँ ॥ ७ ॥
बारहवाँ प्रकरण । १९१
मूलम् ।
एवमेव कृतं येन सकृतार्थो भवेदसौ ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
एवम्, एव, कृतम्, येन, सः, कृतार्थः, भवेत्, असौ,
एवम्, एव, स्वभावः, यः, सः, कृतार्थः, भवेत्, असौ ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| येन | = जिस पुरुष करके | यः | = जो |
| एवम् एव | = क्रिया-रहित | एवम् एव | = ऐसा ही अर्थात् स्वतः ही |
| स्वरूपम् | = स्वरूप | स्वभावः | = स्वभाववाला है |
| साधनवशात् | = साधनों के वश से | सः असौ | = सो वह |
| कृतम् | = किया गया है | कृतार्थः | = कृतकृत्य |
| सः असौ | = वह पुरुष भी | भवेत् | = होता है |
| कृतार्थः | = कृतकृत्य | किंवक्तव्यम् | = इसमें कहना ही क्या है |
| भवेत् | = होता है |
भावार्थ ।
जिस पुरुष ने इस प्रकार संपूर्ण क्रियाओं से रहित अपने स्वरूप को जान लिया है, वही कृतार्थ अर्थात् जीवन्मुक्त होता है ।
प्रश्न—जीवन्मुक्त का लक्षण क्या है ?
उत्तर—ब्रह्मैवाहमस्मीत्यपरोक्षज्ञानेन निखिलकर्मबन्धवि-
निर्मुक्तो जीवन्मुक्तः ।
१९२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार के अपरोक्ष-ज्ञान करके जो संपूर्ण कर्मों के बंधनों से छूट गया है, वही जीवन्मुक्त है।
देहपातानन्तरं मुक्तिः विदेहमुक्तिः।
शरीर के पात होने के अनन्तर जो मुक्ति है, उसका नाम विदेह-मुक्ति है। तात्पर्य यह है कि साधनों करके क्रम से जिसने संपूर्ण शरीर और इन्द्रियादिकों की क्रिया का त्याग किया है और आत्मानंद का अनुभव किया है, वही जीवन्मुक्त है ॥ ८ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां द्वादशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १२ ॥
—:०:—