अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पाँचवाँ प्रकरण (लय-चिन्तन)
पाँचवाँ प्रकरण।
—:०:—
मूलम् ।
न ते सङ्गोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि ।
संघातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
न, ते, सङ्गः, अस्ति, केन, अपि, किम्, शुद्धः, त्यक्तुम्, इच्छसि, संघातविलयम्, कुर्वन्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| ते | = तेरा | त्यक्तम् | = त्यागना |
| केन अपि | = किसी के साथ भी | इच्छसि | = चाहता है |
| संग | = संग | एवम् एव | = इस प्रकार ही |
| न | = नहीं | संघातविलयम् | = देहाभिमान का त्याग |
| अस्ति | = है | कुर्वन् | = करता हुआ |
| अतः | = इसलिये | लयम् | = मोक्ष को |
| शुद्धः | = तू शुद्ध है | व्रज | = प्राप्त हो ॥ |
| किम् | = किसको |
भावार्थ ।
चतुर्थ प्रकरण में शिष्य की परीक्षा के लिए उपदेश किया था, अब उसकी दृढ़ता के लिये चार श्लोकों करके लय का उपदेश करते हैं—
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे शिष्य ! तू शुद्धबुद्ध-स्वरूप है, तेरा देह गेहादिकों के साथ अहंकार और ममत्व का
पाँचवाँ प्रकरण । १०५
आस्पद-रूप करके सम्बन्ध नहीं है। जब तू असंग है, और शुद्ध है, तब फिर तेरे विषे त्याग और ग्रहण कहाँ है, इस-वास्ते अब तू देह-संघात को लय कर, अर्थात् 'मैं देह हूँ, या 'मेरा यह देह है'—ऐसे अहंकार को भी दूर करके अपने स्वरूप में स्थित हो ॥ १ ॥
मूलम् ।
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः ।
इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
उदेति, भवतः, विश्वम्, वारिधेः, इव, बुद्बुदः, इति, ज्ञात्वा, एकम्, आत्मानम्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| भवतः= | तुझसे | एकम्= | एक |
| विश्वम्= | संसार | आत्मानम्= | आत्मा को |
| उदेति= | उत्पन्न होता है | एवम् एव= | ऐसा |
| इव= | जैसे | ज्ञात्वा= | ज्ञान करके |
| वारिधेः= | समुद्र से | लयम्= | शान्ति को |
| बुद्बुदः= | बुद्बुद | व्रज= | प्राप्त हो ॥ |
| इति= | इस प्रकार |
भावार्थ ।
जैसे समुद्र में अनेक बुद्बुदे और तरंग उत्पन्न होते हैं, फिर समुद्र में ही लय हो जाते हैं, समुद्र से भिन्न नहीं हैं,
१०६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
वैसे ही मन के संकल्प से यह जगत् उत्पन्न हुआ है और मन के ही लय होने से जगत् लय हो जाता है । देवीभागवत में कहा है—
शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।
बन्धमोक्षौ मनस्संस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ १ ॥
आत्मा सदैव शुद्ध और मुक्त है, वह कदापि बंध को नहीं प्राप्त होता है बंध और मोक्ष दोनों मन के धर्म हैं । मन के शान्त होने से बंध और मोक्ष का नाम भी नहीं रहता है । आत्मा में मन के लय करने से सारा जगत् लय को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥
मूलम् ।
प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद्विश्वं नास्त्यमले त्वयि ।
रज्जुसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
प्रत्यक्षम्, अपि, अवस्तुत्वात्, विश्वम्, न, अस्ति, अमले, त्वयि, रज्जुसर्पं, इव, व्यक्तम्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| व्यक्तम् = | दृश्यमान | रज्जुसर्पं = | रज्जु सर्पं |
| विश्वम् = | संसार | इव = | सदृश भी |
| प्रत्यक्षम् अपि = | प्रत्यक्ष होता हुआ भी | न अस्ति = | नहीं है |
| अवस्तुत्वात् = | वास्तव में | एवम् एव = | इसी लिये |
| अमले = | मल रहित | लयम् = | शान्ति को |
| त्वयि = | तुझ विषे | व्रज = | ( तू ) प्राप्त हो ॥ |
पाँचवाँ प्रकरण । १०७
भावार्थ ।
प्रश्न—प्रत्यक्ष प्रमाण करके रज्जु विषे सर्पादिकों का
भेद प्रतीत होता है, उनका कैसे लय हो सकता है ? क्योंकि
जो वस्तु प्रत्यक्ष प्रमाण का विषय है, उसका लय नहीं
होता है ?
उत्तर—प्रत्यक्ष प्रमाण का जो विषय है, उसका भी बाध
शास्त्र करके हो जाता है । जैसे चन्द्रमा का मंडल प्रत्यक्ष
प्रमाण से तो एक बित्ता भर का दिखाई देता है, परन्तु
ज्योतिष-शास्त्र में वह दश हजार योजन का लिखा है । उस
शास्त्र करके बित्ता भर का नहीं माना जाता है । वैसे ही
प्रत्यक्ष प्रमाण का विषय जो जगत् है, वह भी श्रुति-वाक्यों
करके बाधित हो जाता है, क्योंकि जगत् वास्तव में तीनों
कालों में नहीं है, और जैसे स्वप्न की सृष्टि और गंधर्व-
नगरादिक तीनों कालों में नहीं हैं, वैसे ही यह जगत् भी
वास्तव में तीनों कालों में नहीं है । ऐसा चिन्तन ही जगत्
के लय का हेतु है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः ।
समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
समदुःखसुखः, पूर्णः, आशानैराश्ययोः, समः, समजीवित्-
मृत्युः, सन्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥
१०८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| समदुःखसुखः= | तुल्य है दुःख और सुख जिसको | समजीवितः= मृत्युः | तुल्य है जीना और मरना जिसको |
| पूर्णः= | जो पूर्ण है | एवम् एव= | ऐसा |
| आशानैराश्ययोः= | आशा और निराशा में | सन्= | होता हुआ |
| लयम्= | ब्रह्म-दृष्टि को | ||
| समः= | जो बराबर है | व्रज= | (तू) प्राप्त हो ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! तू आत्मानंद करके पूर्ण है । दैवयोग से शरीर में उत्पन्न हुए जो सुख दुःख हैं, उनमें भी तू पूर्ण है, आशा और निराशा में भी तू सम है, जीने और मरने में भी तू सम है, तू निर्विकार है, सुख दुःखादि सब अनात्मा के धर्म हैं, और मिथ्या हैं । क्योंकि इनके धर्मी जो देहादिक हैं, वे भी सव मिथ्या हैं । उत्पत्ति से पूर्व जो देहादिक नहीं थे, और नाश से उत्तर भो नहीं रहते हैं, वे बीच में भी प्रतीतिमात्र हैं । जो वस्तु उत्पत्ति से पूर्व और नाश से उत्तर न हो, वह बीच में भो वास्तविक नहीं होती है, केवल प्रतीतमात्र ही होती है । जैसे स्वप्न के पदार्थ और रज्जु विषे सर्पादिक मिथ्या हैं, वैसे यह जगत् भी मिथ्या है । वास्तव में, तीनों कालों में नहीं है, केवल ब्रह्म ही ब्रह्म है ॥
सर्वं खल्विदं ब्रह्म ॥
यह संपूर्ण जगत् निश्चय करके ब्रह्म-रूप ही है, ऐसे चिंतन का नाम ही लयचिंतन है ॥ ४ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां पंचमं प्रकरणं समाप्तम् ॥