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सर्वकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 405 में से

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पृष्ठ 134

आठवाँ प्रकरण । १२७

मूलम् ।

यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा ।
मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

यदा, न, अहम्, तदा, मोक्षः, यदा, अहम्, बन्धनम्, तदा,
मत्वा, इति, हेलया, किञ्चित्, मा, गृहाण, विमुञ्च, मा ॥

अन्वयः । शब्दार्थ । अन्वयः । शब्दार्थ ।
यदा=जब इति=इस प्रकार
अहम्=मैं हूँ मत्वा=मान करके
तदा=तब हेलया=इच्छा करके
बन्धनम्=बन्ध है मा=मत
यदा=जब गृहाण=ग्रहण कर
अहम् न=मैं नहीं हूँ मा=मत
तदा=तब विमुञ्च=त्याग कर ॥
मोक्षः=मोक्ष है

भावार्थ ।

जब तक पुरुष में अहंकार बैठा है—'मैं ब्राह्मण हूँ', 'मैं ज्ञानी हूँ,' 'मैं त्यागी हूँ,' तब तक वह मुक्त कदापि नहीं हो सकता है । ऐसा भी कहा है—

यावत्स्यात्स्वस्य सम्बन्धोऽहंकारेण दुरात्मना ।
तावन्न लेशमात्रापि मुक्तिवार्ता विलक्षणा ॥ १ ॥

अर्थात् तब तक इस जीव का सम्बन्ध दुरात्मा अहंकारी