अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
तेरहवाँ प्रकरण (कैवल्य-सुख)
तेरहवाँ प्रकरण
—:०:—
मूलम् ।
अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम् ।
त्यागादानेविहायास्मादहमासेयथासुखम् ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
अकिञ्चनभवम्, स्वास्थ्यम्, कौपीनत्वे, अपि, दुर्लभम्,
त्यागादाने, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अकिञ्चनभवम्= नहीं है कुछ, ऐसे विचार से पैदा हुई | अस्मात्=इस कारण से |
| स्वास्थ्यम्= जो चित्त की स्थिरता, सो | त्यागादाने= त्याग और ग्रहण को |
| कौपीनत्वे= कौपीन के धारण करने पर | विहाय=छोड़ करके |
| अपि=भी | अहम्=मैं |
| दुर्लभम्=दुर्लभ है | यथासुखम्=सुख-पूर्वक |
| आसे=स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ ।
इस त्रयोदश प्रकरण में जीवन्मुक्त के फल का निरूपण करते हैं—
१९४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
संपूर्ण विषयों में जा आसक्ति है, उस आसक्ति के त्याग
करने से जो चित्त की स्थिरता हुई है, वह स्थिरता कौपीन-
मात्र में आसक्ति करने मे नहीं होती है, ऐसी स्थिरता अति
दुर्लभ है । इसी कारण मे शिष्य कहता है कि पदार्थों के
त्याग करने में और ग्रहण करने में जो आसक्ति है, उसको
भी त्याग करके आत्मानंद में स्थित हूँ ॥ १ ॥
मूलम् ।
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते ।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम् ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
कुत्र, अपि, खेदः, कायस्य, जिह्वा, कुत्र, अपि, खिद्यते,
मनः, कुत्र, अपि, तत्, त्यक्त्वा, पुरुषार्थे, स्थितः, सुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कुत्र अपि = | कहीं तो | मनः = | मन |
| कायस्य = | शरीर का | खिद्यते = | खेद करता है |
| खेदः = | दुःख है | अतः = | इससे |
| कुत्र अपि = | कहीं | तत् = | तीनों को |
| जिह्वा = | वाणी | त्यक्त्वा = | त्याग करके |
| खिद्यते = | दुःखी है | सुखम् = | सुख-पूर्वक |
| कुत्र अपि = | कहीं | स्थितः = | स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ ।
शारीरिक कर्मों में शरीर को खेद होता है, अर्थात्
शरीर के जो कर्म चलना-फिरना, सोना-जागना, लेना-देना,
तेरहवाँ प्रकरण । १९५
ग्रहण-त्यागादिक हैं, उनके करने में शरीर को ही खेद होता
है, और वाणी के कर्म जो सत्य मिथ्या भाषणादिक हैं, उनके
करने में जिह्वा को खेद होता है, और मन के कर्म जो
संकल्प-विकल्पनादिक का ध्यान-धारणादिक हैं उनके करने
में मन को खेद होता है, इसलिये शिष्य कहता है कि उन
तीनों के कर्मों का त्याग करके मैं अपने आत्मानन्द में स्थित
हूँ ॥ २ ॥
मूलम् ।
कृतं किमपि नैव स्यादिति संचिन्त्य तत्त्वतः ।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वाऽऽसे यथासुखम् ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
कृतम्, किम्, अपि, न, एव, स्यात्, इति, संचिन्त्य, तत्त्वतः,
यदा, यत्, कर्तुम्, आयाति, तत्, कृत्वा, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कृतम् = | $\Big{$ शरीर आदि करके किया हुआ कर्म | संचिन्त्य = | विचार करके |
| किमपि = | कुछ भी | यदा = | जब |
| एव = | वास्तव में | यत् = | जो कुछ कर्म |
| न आत्मकृतम् = | $\Big{$ आत्मा करके नहीं किया हुआ | कर्तुम् = | करने को |
| स्यात् = | होय है | आयाति = | आ पड़ता है |
| इति = | ऐसा | तत् = | उसको |
| तत्त्वतः = | यथार्थ | कृत्वा = | करके |
| यथासुखम् = | सुख-पूर्वक | ||
| आसे = | मैं स्थित हूँ ॥ |
१९६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
**प्रश्न—**कायिक, वाचिक और मानसिक कर्मों में त्याग होने से शरीर का भी त्याग हो जावेगा; क्योंकि बिना कर्मों के भोजनादिक क्रिया का त्याग होगा और बिना भोजन के शरीर रहेगा नहीं ?
**उत्तर—**शरीर और इन्द्रियादिकों करके किया हुआ जो कर्म है, वह वास्तव में आत्मा करके किया हुआ नहीं होता है। ऐसे चिंतवन करके विद्वान् को जब शरीरादिकों के खान-पानादिक कर्म करने पड़ते हैं, तब वह अहंकार से रहित होकर उन कर्मों को करता हुआ भी अपने सुख-स्वरूप में ही रहता है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
कर्मनैष्कर्म्यनिर्वंधभावा देहस्थयोगिनः ।
संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम् ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
कर्मनैष्कर्म्यनिबन्धभावाः, देहस्थयोगिनः, संयोगायोग-विरहात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कर्मनैष्कर्म्यनिबन्धभावा = | कर्म और निष्कर्म के बंधन से संयुक्त स्वभाववाले | संयोगायोगविरहात् = | देह के संयोग और वियोग के पृथक् होने के कारण |
| देहस्थयोगिनः = | देह विषे आसक्त योगी हैं | यथासुखम् = | सुख-पूर्वक |
| अहम् = | मैं | आसे = | स्थित हूँ ॥ |
तेरहवाँ प्रकरण । १९७
भावार्थ ।
प्रश्न—कर्मों के करने में अथवा कर्मों के न करने में अर्थात् दोनों में से एक ही निष्ठा हो सकती है, दोनों में निष्ठा कैसे हो सकती है ?
उत्तर—कर्म और निष्कर्म का हठरूप स्वभाव उसी को होता है, जिसकी देह में आसक्ति है, जिसकी देहादिकों में आसक्ति नहीं है, उसको हठ नहीं होता है, हे प्रभो ! मेरा तो देह के संयोग और वियोग में भी हठ नहीं है । देह का संयोग बना रहे वा इसका वियोग हो जावे, मैं अहंकार और हठ से रहित अपने आत्मा विषे स्थित हूँ ॥ ४ ॥
मूलम् ।
अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या वा शयनेन वा ।
तिष्ठन् गच्छन् स्वपंस्तस्मादहमासे यथासुखम् ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
अथानर्थौ, न, मे, स्थित्या, गत्या, वा, शयनेन, वा, तिष्ठन्, गच्छन्, स्वपन्, तस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मे | मुझको | तस्मात् | इस कारण |
| स्थित्या | स्थिति से | अहम् | मैं |
| गत्या | चलने से | तिष्ठन् | स्थित होता हुआ |
| वा | या | गच्छन् | जाता हुआ |
| शयनेन | शयन से | स्वपन् | सोता हुआ |
| अर्थानर्थौ | अर्थ और अनर्थ | यथासुखम् | सुख-पूर्वक |
| न | कुछ नहीं है | आसे | स्थित हूँ ॥ |
१९८ अष्टावक्र-गीता भा० टो० स०
भावार्थ ।
शिष्य कहता है कि हे गुरो ! लौकिकव्यवहार जो चलना, फिरना, बैठना, उठना आदिक है, इसमें भी मेरी हानि तथा लाभ कुछ भी नहीं है, क्योंकि लौकिक व्यवहार में भी अभिमान से रहित हूँ, चाहे मैं सोता रहूँ, बैठा रहूँ अथवा चलता फिरता रहूँ, इन सब क्रियाओं में भी मैं अपने आत्मानन्द में एकरस ज्यों का त्यों स्थित रहता हूँ ॥ ५ ॥
मूलम् ।
स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा ।
नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
स्वपतः, न, अस्ति, मे, हानिः, सिद्धिः, यत्नवतः, न, वा, नाशोल्लासौ, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| मे=मुझ | सिद्धिः=सिद्धि है |
| स्वपतः=सोते हुए की | अस्मात्=इस कारण |
| हानिः=हानि | अहम्=मैं |
| न अस्ति=नहीं है | नाशोल्लासौ= { हानि और लाभ को |
| वा=और | विहाय=छोड़ करके |
| न=न | यथासुखम्=सुख-पूर्वक |
| मे=मुझ | आसे=स्थित हूँ ॥ |
| यत्नवतः=यत्न करते हुए की |
तेरहवाँ प्रकरण । १९९
भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि यत्न से रहित होकर यदि मैं सोता ही रहूँ, तब भी मेरी कोई हानि नहीं है और यत्न-विशेष करने से मेरे को किसी फल-विशेष की सिद्धि भी नहीं होती है, इस वास्ते मैं यत्न और अयत्न में भी हर्ष और शोक को त्याग करके सुख-पूर्वक स्थित हूँ । क्योंकि यत्न अयत्नादिक सब देह, इन्द्रियों के धर्म हैं, मुक्त आत्मा के नहीं हैं ॥ ६ ॥
मूलम् ।
सुखादिरूपानियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः ।
शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ७ ॥
पदच्छेदः ।
सुखादिरूपानियमम्, भावेषु, आलोक्य, भूरिशः, शुभाशुभे, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अस्मात् = | इसलिये | च = | और |
| भावेषु = | बहुत जन्मों में | शुभाशुभे = | शुभ और अशुभ को |
| $\left.\begin{matrix} \textbf{सुखादिरूपा-} \ \textbf{नियमम्} \end{matrix}\right}=$ | सुखादिरूप की अनित्यता को | विहाय = | छोड़ करके |
| भूरिशः = | वारंवार | यथासुखम् = | सुख-पूर्वक |
| आलोक्य = | देख करके | आसे = | स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि अनेक जन्मों में मनुष्य और पशु
२०० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
आदिकों के जितने भाव अर्थात् जन्म होते हैं, उनको जो सुख-
दुःखादिक प्राप्त होते हैं, वे सब अनित्य हैं, ऐसा बहुत स्थलों
में देखा जाता है, क्योंकि संसार में सब देहधारियों को दुःख-
सुख बराबर बने रहते हैं। कोई भी ऐसा देहधारी संसार में
नहीं है, जो सदैव सुखी रहे, किन्तु यत्किञ्चित् काल सुख
और बहुत काल दुःख रहता है। प्रथम तो जन्मकाल का
दुःख फिर बाल्यावस्था में अनेक प्रकार के रोगादिकों करके
जन्य दुःख होता है। युवावस्था में भोगों से जन्य रोगादिकों
करके दुःख होता है। फिर स्त्री-पुत्रादिकों में मोह से दुःखों
के समूह उत्पन्न होते हैं। फिर वृद्धावस्था तो दुःखों की
खानि ही है। अनेक प्रकार के विषय-जन्य सुख-दुःखादिकों
को अनित्य जानकर और उनके हेतु जो शुभाशुभ कर्म हैं,
उनका त्याग करके अपने आत्मानन्द में स्थित हूँ ॥ ७ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां त्रयोदश प्रकरणं समाप्तम् ॥ १३ ॥