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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

चौदहवाँ प्रकरण (चित्त-शान्ति)

चौदहवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाभावभावनः ।
निद्रितो बोधित इव क्षीणसंसरणो हि सः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

प्रकृत्या, शून्यचित्तः, यः, प्रमादात्, भावभावनः, निद्रितः, बोधितः, इव, क्षीणसंसरण, हि, सः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः =जो पुरुषच =और
प्रकृत्या =स्वभाव सेनिद्रितः =सोता हुआ
शून्यचित्तः =शून्य चित्त वाला हैबोधितः इव =जागते हुए के तुल्य है ऐसा
च =परस =वह पुरुष
प्रमादात् =प्रमाद सेक्षीणसंसरणः =संसार से रहित है ॥
भावभावनः =विषयों का सेवन करनेवाला है

भावार्थ ।

इस प्रकरण में जनकजी अपने शान्तिचतुष्टय को कहते हैं ।
जो पुरुष स्वभाव से विषयों में शून्य चित्तवाला है अर्थात् अपने स्वभाव से चित्त के धर्म जो विषयों में राग-

२०२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

द्वेष हैं, उनसे जो रहित है और प्रारब्धकर्म्मों के वशीभूत
होकर विषयों का चिन्तन भी करता है, और भोगता भी
है, उसको हानि-लाभ कुछ नहीं है । इसी में दृष्टान्त को
कहते हैं—
जैसे निद्रा के वश जो पुरुष शून्यचित्त होकर सो रहा
है उसको किसी पुरुष ने जगाकर उससे कहा कि तू इसकाम
को कर । वह जागकर उस काम को तो करता है, परन्तु
अपनी इच्छा के अनुसार नहीं करता है, किन्तु दूसरे पुरुष
की प्रेरणा करके वह काम को करता है ।

दाष्टान्त ।

इसी प्रकार जो पुरुष शान्तचित्त है, वह भी प्रारब्धवश
से विषयों को भोगता है, अपनी इच्छा से नहीं भोगता है
और जैसे कोई पुरुष अपने आनन्द में बैठा है, किसी सिपाही
ने आकर उसको बिगारी पकड़कर उसके शिर पर गठरी
रखवाया और वह पुरुष गठरी को उठाकर ले जाता है ।
यदि न उठावे या कहीं धर देवे, तो सिपाही उसके कमची
मारे । वह अपनी खुशी से उठाकर नहीं ले जाता है, किन्तु
दूसरे की प्रेरणा से वह उठाकर लिये जाता है, वैसे ही
ज्ञानवान् भी अपनी खुशी से तो विषय-भोगों को नहीं भोगता
है, परन्तु प्रारब्धरूपी सिपाही की प्रेरणा करके भोगता है,
इसलिये उसको हानि-लाभ कुछ भी नहीं है ॥ १ ॥

मूलम् ।

क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः ।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा ॥ २ ॥

चौदहवाँ प्रकरण । २०३

पदच्छेदः ।

क्व, धनानि, क्व, मित्राणि, क्व, मे, विषयदस्यवः, क्व,
शास्त्रम्, क्व, च, विज्ञानम्, यदा, मे, गलिता, स्पृहा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा= जबमित्राणि= मित्र है
मे= मेरीक्व= कहाँ
स्पृहा= इच्छाविषयदस्यवः= विषय-रूपी चोर है
गलिता= गलिता हो गई हैक्व= कहाँ
तदा= तबशास्त्रम्= शास्त्र है
मे= मेरे कोच= और
क्व= कहाँक्व= कहाँ
धनानि= धन हैविज्ञानम्= ज्ञान है
क्व= कहाँ

भावार्थ ।

जनकजी कहते हैं कि विषयों की भावना से शून्य चित्तवाला मैं हूँ, मुझ पूर्णात्मदर्शी को जब विषय-भोगों की इच्छा नष्ट हो गई है, तब मेरा धन कहाँ है ? मेरे मित्र कहाँ हैं ? शास्त्र का अभ्यास कहाँ है ? और निदिध्यासनादिक कहाँ है ? मेरी तो किसी में भी आस्थाबुद्धि नहीं रही ॥ २ ॥

मूलम् ।

विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे ।
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्तामुक्तये मम ॥ ३ ॥

२०४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

विज्ञाते, साक्षिपुरुषे, परमात्मनि, च, ईश्वरे, नैराश्ये, बन्धमोक्ष, च, न, चिन्ता, मुक्तये, मम ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
साक्षिपुरुषे='त्वं' पद का अर्थ साक्षी पुरुष अर्थात् जीव हैनैराश्ये=आशा-रहित
च=औरबन्धमोक्षे=बन्ध के मोक्ष होने पर
परमात्मनि=तत्पद का अर्थ परमात्मा हैमम=मुझको
ईश्वरे=ईश्वर केमुक्तये=मुक्ति के लिये
विज्ञाते=जानने परचिन्ता=चिन्ता
न=नहीं है ॥

भावार्थ ।

देह और इन्द्रियों का साक्षी पुरुष जो 'त्वं' पद का अर्थ है, और तत्पद का अर्थ जो परमात्मा ईश्वर है, इन दोनों के लक्ष्यार्थ चेतन का 'तत्त्वमसि' महावाक्य और भागत्याग-लक्षणा करके साक्षात्कार करने से और बंध और मोक्ष में भी इच्छा के अभाव होने से मुक्ति के निमित्त भी विद्वान् को कोई चिन्ता बाकी नहीं रहती है ।

प्रश्न— महावाक्य का लक्षण क्या है ? और लक्षणा का अर्थ क्या है ?

उत्तर— वेद में दो प्रकार के वाक्य हैं—एक अवान्तर्वाक्य हैं, दूसरे महावाक्य हैं । दोनों के लक्षण को दिखाते हैं—

स्वरूपबोधकं वाक्यमवान्तर्वाक्यम् ।

चौदहवाँ प्रकरण । २०५

आत्मा के स्वरूप का बोधक जो वाक्य है, उसका नाम
अवान्तरवाक्य है । जैसे—
“सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म”
आत्मा ब्रह्मसद्रूप है, ज्ञान-स्वरूप है, अनन्त-स्वरूप है ।
यह वाक्य तो केवल आत्मा के स्वरूप को ही बोधन
करता है, इसी वास्ते इसका नाम अवान्तरवाक्य है ।
अभेदबोधकं वाक्यं महावाक्यम् ।
अभेद का बोधक जो वाक्य है, उसी का नाम महा-
वाक्य है । जैसे—
ब्रह्माहमस्मि ।
मैं ही ब्रह्म हूँ ।
अयमात्माब्रह्म ।
यह अपना आत्मा ही ब्रह्म है ।
तत्त्वमसि ।
तत् = वही अर्थात् ईश्वर । त्वं = तू अर्थात् जीव ।
असि = है, ये सब वाक्य जीव और ईश्वर की अभेदता को
ही बोधन करते हैं, इसी से इनका नाम महावाक्य है ।
अब लक्षणा को दिखाते हैं—
पद के अर्थ का ज्ञान दो तरह से होता है । एक तो
शक्तिवृत्ति करके होता है, जैसे किसी ने किसी से कहा

२०६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

"घटमानय" अर्थात् घट को लाओ । अब यहाँ पर 'घट'-पद
की शक्ति कम्बुग्रीवादिवाली व्यक्ति में है, अर्थात् घड़े में है
और लानेवाले को भी उसका ज्ञान है कि घड़े के लाने को
दूसरा पुरुष कहता है । वह 'घटमानय' शब्द को सुनकर
तुरन्त घड़े को उठा लाता है यहाँ पर तो शक्ति-वृत्ति करके
पद के अर्थ का बोध होता है । और जहां पर शक्ति-वृत्ति
करके बोध नहीं होता है, वहाँ पर लक्षणावृत्ति करके पद के
अर्थ का बोध होता है, सो दिखाते हैं ।

शक्यसम्बन्धो हि लक्षणा ।

शक्ति के आश्रय का नाम शक्य है, अर्थात् पद जिस
अर्थ को बोधन करे, उस अर्थ का नाम शक्य है ।

दृष्टान्त ।

किसी ने एक गुवाल से पूछा, तेरा मकान कहाँ है ।
उसने कहा—गंगायां घोषः । अर्थात् मेरा मकान गंगा में है ।

अब यहाँ पर शक्तिवृत्ति करके तो अर्थ नहीं बनता है,
क्योंकि 'गंगा' पद की शक्ति प्रवाह में है, अर्थात् 'गंगा' पद
का अर्थ जल का प्रवाह है । उस प्रवाह में मकान का होना
असंभव है, इस वास्ते यहाँ पर जो लक्षणा करके अर्थ का
बोध होता है, उसको दिखाते हैं—'गंगा' पद का शक्य प्रवाह
है, उसका सम्बन्ध तीर के साथ है, इस वास्ते गंगा के तीर
पर इसका ग्राम है—'गंगायां घोषः' इस पद से ऐसा बोध
होता है । और तात्पर्यानुपपत्ति लक्षणा में बीज है । जिस

चौदहवाँ प्रकरण । २०७

अर्थ में वक्ता के तात्पर्य की असिद्धि हो, वहाँ पर ही लक्षणा होती है । 'गंगायां घोषः' यहाँ पर गंगा के प्रवाह में मेरा ग्राम है, ऐसा वक्ता का तात्पर्य नहीं है, क्योंकि ऐसा हो नहीं सकता है, इसी वास्ते—'गंगायां घोषः' में लक्षणा होती है ।

अब लक्षणा के भेद को दिखलाते हैं—

वाच्यार्थमशेषतया परित्यज्य तत्सम्बन्धिन्यर्थान्तरे वृत्तिर्जहल्लक्षणा ।

जहाँ पर वाच्यार्थ का समग्ररूप से त्याग करके तत्सम्बन्धी अर्थान्तर में वृत्ति हो, वहाँ पर जहल्लक्षणा होती है । जैसे—गंगायां घोषः । यहाँ पर गंगा पद का वाच्यार्थ जो प्रवाह है, उसका समग्ररूप से त्याग करके उसके साथ सम्बन्धवाला जो तीर है, उस तीर में गंगा पद की लक्षणा होती है, अर्थात् गंगा के तोर पर इसका ग्राम है । घोष नाम अहीरों के ग्राम का है ।

वाच्यार्थापरित्यागेन तत्सम्बन्धिन्यर्थान्तरे वृत्तिरजहल्लक्षणा ।

जहाँ पर वाच्यार्थ का त्याग न करके उसके सम्बन्धवाले का भी ग्रहण हो, वहाँ पर अजहल्लक्षणा होती है ।

किसी के गृह में दण्डी संन्यासियों का निमन्त्रण था । वहाँ पर जाकर दण्डी लोग बाहर बैठे । जब भोजन तैयार हुआ, तब मालिक ने अपने नौकर से कहा कि—यष्टी प्रवेशय । अर्थात् लाठी का भीतर प्रवेश कराओ ।

२०८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अब यहाँ पर लाठी का भीतर प्रवेश तो बन सकता है, परन्तु उस में वक्ता का तात्पर्य नहीं है, किन्तु यष्टिधर के प्रवेश कराने में वक्ता का तात्पर्य है, इस वास्ते 'यष्टी'-पद का वाच्यार्थ यष्टि है, उसका त्याग न करके उसके साथ सम्बन्धवाला जो पुरुष है, उस पुरुष में जो लक्षणा करनी है, इसी का नाम अजहल्लक्षणा है ।

वाच्यार्थैकदेशपरित्यागे नैकदेशवृत्तिर्जहदजहल्लक्षणा ।

अर्थात् वाच्यार्थ के एकदेश को त्याग करके एकदेश का ग्रहण करना जो है, इसी का नाम जहत् अजहत् लक्षणा है जैसे—'तत्त्वमसि' ।

यहाँ पर 'तत्' पद का वाच्यार्थ सर्वज्ञत्वादिक गुणों करके युक्त ईश्वर चेतन है, और 'त्वं' पद का वाच्यार्थ अल्पज्ञत्वादिक गुणों करके युक्त जीव चेतन है । 'तत्' वह सर्वज्ञत्वादि गुणवाला ईश्वर 'त्वं' तू अल्पज्ञत्वादि गुणवाला जीव, ये जो दोनों के वाक्यार्थ हैं इनका अभेद नहीं हो सकता है, पर दोनों का लक्ष्यार्थ जो गुणों से रहित केवल चेतन है, उसी का अभेद हो सकता है, सो अभेद जहद् अजहद् अर्थात् भागत्यागलक्षणा करके ही होता है । तत्पद के वाच्यार्थ का जो एकदेश सर्वज्ञत्वादिक गुण हैं, उनके त्याग करने से, और त्वं पद के वाच्यार्थ का जो एकदेश अल्पज्ञत्वादिक गुण हैं उनके भी त्याग करने से, दोनों पदों विषे एक जो लक्ष्यार्थ चेतन स्थित है, उसके ग्रहण करने से दोनों का अर्थात् ईश्वर और जीव का अभेद केवल चेतन में

चौदहवाँ प्रकरण । २०९

होता है, सो जिस विद्वान् ने महाकाव्यों करके और भाग-
त्यागलक्षणा करके जीव ईश्वर की अभेदता को जान लिया
है, वही मुक्त है, उसको मुक्ति की कोई चिन्ता नहीं
है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः ।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

अन्तर्विकल्पशून्यस्य, बहिः, स्वच्छन्दचारिणः, भ्रान्तस्य, इव, दशाः, ताः, ताः, तादृशा, एव, जानते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
$अन्तर्विकल्प-\ शून्यस्य = जो अन्तःकरण में विकल्प से शून्य है$\begin{aligned}स्वच्छन्द-\ चारिणः\end{aligned} = स्वतंत्र चलनेवाले की
च=और (जो)ताः ताः=उन उन
बहिः=बाहरदशाः=दशाओं को
$भ्रान्तस्य इव = भ्रान्त हुए पुरुष की नाईं है ऐसे$तादृशाः एव = वैसे ही दशावाले पुरुष
जानते=जानते हैं ॥

भावार्थ ।

जिस पुरुष का अन्तःकरण विकल्प अर्थात् संकल्प से रहित है, अर्थात् जिसको कोई भी विषय-वासना भीतर से

२१० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

नहीं फुरती है, और बाहर से जो उन्मत्त की तरह स्वेच्छा-
पूर्वक विहार करता है, वही ज्ञानी है । उसको ज्ञानी पुरुष
ही जानता है, दूसरा अज्ञानी पुरुष नहीं जान सकता
है ॥ ४ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां चतुर्दशप्रकरणं समाप्तम् ॥

—:०:—