अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ (भूमिका एवं विषय-सूची)
ॐ
अष्टावक्र-गीता
भाषा-टीका सहित
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टीकाकार
रायबहादुर
बाबू जालिमसिंह
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प्रकाशक
तेजकुमार-प्रेस, बुकडिपो, लखनऊ.
उत्तराधिकारी—नवलकिशोर-प्रेस, बुकडिपो, लखनऊ.
पोस्ट-बाक्स नं० ८५, हजरतगंज, लखनऊ.
पाँचवीं बार ६००० सन् १९७१ ई० मूल्य ४ रु०-५० पै०
ॐ
अष्टावक्र-गीता
भाषा-टीका सहित
टीकाकार
रायबहादुर
बाबू जालिमसिंह
प्रकाशक
तेजकुमार-प्रेस, बुकडिपो, लखनऊ.
उत्तराधिकारी—नवलकिशोर-प्रेस, बुकडिपो,
लखनऊ.
पोस्ट-बाक्स नं० ८५, हजरतगंज, लखनऊ.
प्रकाशक —
तेजकुमार बुकडिपो,
लखनऊ.
सर्वाधिकार सुरक्षित ।
029641
मुद्रक —
मुरलीधर मिश्र
तेजकुमार-प्रेस, लखनऊ.
निवेदन ।
जब मैं पाठशाला में विद्याध्ययन करता था, तभी से हरिकीर्तन करने की, शुभ मार्ग पर चलने की, असत् मार्ग के त्याग और सन्मार्ग के ग्रहण करने को मेरे मन में इच्छा उत्पन्न हुआ करती थी ।
जब मैं इन्स्पेक्टर डाकखानेजात गोंडा और बहराइच का हुआ, तब गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी कृत रामायण पढ़ने की ओर श्रीसत्यदेवजी स्वामी की कथा सुनने की अति रुचि उत्पन्न हुई । तदनुसार जो समय सरकारी काम करने से बचता था, उसमें भगवत् आराधन करने लगा ।
दैव की इच्छा से कभी-कभी महात्मा पुरुषों का सत्संग हो जाता, और उनसे वेदान्त-शास्त्र की सूर्यवत् वाणी को सुनकर अन्तःकरण के अन्धकार को नाश करने लगा।
जब मैं लखनऊ में असिस्टेण्ट सुपरिंटेंडेंट होकर आया, तब ईश्वर की कृपा से मेरे पूर्व-जन्म के शुभ कर्म उदय हो आये और पण्डित श्री १०८ श्रीयमुनाशुङ्करजी वेदान्ती का दर्शन हुआ । उनके सरल एवं प्रीतियुक्त उपदेश से मेरे यावत् तमोमय अन्धकार थे सब नष्ट हो गये और मैं अपने शान्त, अद्वैत और निर्मल आत्मा में स्थित हो गया ।
जब पण्डितजी का देहान्त हो गया, तब अन्य अनेक वेदान्तविद् पण्डितों और संन्यासियों का संग रहा । उनमें श्री १०८ स्वामी परमानन्दजी का भी संग होता रहा और उनकी सदा पूर्ण कृपा बनी रही ।
जब मैं नैनीताल में पोस्टमास्टर था, तब यह इच्छा हुई थी कि वेदान्त के प्रसिद्ध ग्रन्थों को पदच्छेद, अन्वय और शब्दार्थ के साथ सरल मध्यदेशीय भाषा में अनुवाद करूँ । मेरे इस सत्सङ्कल्प को परमात्मा ने पूरा किया, तदर्थ उस परब्रह्म परमात्मा को कोटिशः धन्यवाद ! ! !
हरिः ॐ तत्सत्, हरिः ॐ तत्सत्, हरिः ॐ तत्सत्
निवेदक—
लाला शिवदयालु सिंहात्मज—
जालिमसिंह
ॐ नमः परमात्मने
उपोद्घात्
एक समय राजा जनकजी घूमने गये थे। राह में अष्टावक्रजी को आते हुए देखा। उन्होंने घोड़े से उतरकर ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया। परंतु ऋषि के शरीर को देखकर राजा के चित्त में यह घृणा उत्पन्न हुई कि परमेश्वर ने इनका कैसा कुरूप शरीर रचा है। ऋषि के शरीर में आठ कुब्ब थे। इसी से उनका शरीर देखने में कुरूप प्रतीत होता था; और जब वे चलते थे तब उनका शरीर आठ अंगों से वक्र याने टेढ़ा हो जाता था। इसी कारण उनके पिता ने उनका नाम अष्टावक्र रक्खा था। वे आत्म-ज्ञान में बड़े निपुण थे और योग-विद्या में भी बड़े चतुर थे । एवं उन्होंने अपनी विद्या के बल से राजा के चित्त की घृणा को जान लिया और उन्होंने उस राजा को उत्तम अधिकारी जानकर कहा—हे राजन् ! जैसे मंदिर के टेढ़ा होने से आकाश टेढ़ा नहीं होता है और मंदिर के गोल किंवा लंबा होने से आकाश गोल किंवा लंबा नहीं होता है, क्योंकि आकाश का मंदिर के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, आकाश निरवयव है और मंदिर सावयव है, वैसे ही आत्मा का भी शरीर के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि आत्मा निरवयव है और शरीर सावयव है। आत्मा नित्य है और शरीर अनित्य है। शरीर के वक्र आदिक धर्म आत्मा में कदापि नहीं आ सकते हैं। अतएव हे राजन् ! ज्ञानवान् को आत्म-दृष्टि रहती है और अज्ञानी की चर्म-दृष्टि रहती है। इस कारण तू चर्म-दृष्टि को त्याग करके और आत्म-दृष्टि को ग्रहण करके जब देखेगा, तब तेरे चित्त से घृणा दूर हो जावेगी। हे राजन् ! चर्म-दृष्टि से अज्ञानी देखते हैं ज्ञानवान् नहीं देखते हैं।
ऋषि के अमृत-रूपी वचनों को सुन करके राजा के मन में आत्म-ज्ञान के प्राप्त होने की उत्कट इच्छा उत्पन्न हुई, अतएव राजा ने ऋषि से प्रार्थना की “हे भगवन् ! आप मेरे घर को पवित्र कीजिए और कुछ दिन वहाँ पर
( ५ )
निवास करके मेरे चित्त के संदेहों को दूर करके मुझमें भी आत्म-दृष्टि को
उत्पन्न कीजिए।" तदनुसार ऋषिजी ने राजा की प्रार्थना को स्वीकार किया
और राजा के साथ आये। उसके बाद राजा ने अपने घर में एक उत्तम
स्थान निश्चित करके एक सिंहासन लगाकर बड़े सत्कार से उसके ऊपर
ऋषिजी को बैठाया और राजा अपने चित्त के संदेहों को पूछने लगा और
अष्टावक्रजी उनका उत्तर देने लगे—इन प्रश्नोत्तरों के द्वारा अज्ञान का
निराकरण और ज्ञान का उदय हुआ। वही ज्ञान इस पुस्तक में मुमुक्षुओं के
लाभार्थ प्रकाशित किया जाता है।
—प्रकाशक
—:०:—
विषय-सूची
| १—पहला प्रकरण | ... | ... | ... | १ |
| २—दूसरा प्रकरण | ... | ... | ... | ४२ |
| ३—तीसरा प्रकरण | ... | ... | ... | ७८ |
| ४—चौथा प्रकरण | ... | ... | ... | ९२ |
| ५—पाँचवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | १०४ |
| ६—छठा प्रकरण | ... | ... | ... | १०९ |
| ७—सातवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | ११५ |
| ८—आठवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | १२१ |
| ९—नवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | १२९ |
| १०—दसवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | १५१ |
| ११—ग्यारहवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | १६४ |
| १२—बारहवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | १८३ |
| १३—तेरहवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | १९३ |
| १४—चौदहवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | २०१ |
| १५—पन्द्रहवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | २११ |
| १६—सोलहवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | २३८ |
| १७—सत्रहवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | २५१ |
| १८—अठारहवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | २७३ |
| १९—उन्नीसवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | ३७६ |
| २०—बीसवाँ प्रकरण | ... | ... | ... | ३८४ |