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सर्वकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 405 में से

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पृष्ठ 137

१३० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

उत्तर— यह मेरे को कर्त्तव्य है, और यह मेरे को कर्त्तव्य नहीं है, इसी का नाम कृत और अकृत है अर्थात् इस तरह का जो आग्रह है अर्थात् अवश्य ही मेरे को यह करना उचित है, और अवश्य ही मेरे को यह करना उचित नहीं है, इन दोनों में अभिनिवेश अर्थात् हठ न करना और द्वन्द्व जो सुख-दुःख हैं, मैं इन दोनों से रहित हो जाऊँ इसमें आग्रह न करना, क्योंकि वे दोनों किसी भी देहधारी के कभी शान्त नहीं हुए हैं और न होवेंगे, इस वास्ते अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! इन कृताऽकृत आदिकों के त्याग से भी तू वैराग्य को प्राप्त हो । क्योंकि हे शिष्य ! तू अव्रती है, तेरा आग्रह याने हठे किसी में भी नहीं है ॥ १ ॥

मूलम् ।

कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात् ।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गता ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

कस्य, अपि, तात, धन्यस्य, लोकचेष्टावलोकनात्, जीवितेच्छा, बुभुक्षा, च, बुभुत्सा, उपशमम्, गता ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तात =हे प्रियजीवितेच्छा =जीने की इच्छा
लोकचेष्टावलोकनात् =उत्पत्ति और विनाश- रूप लोकों की चेष्टा के देखने सेच =और
बुभुक्षा =भोगने की इच्छा
कस्य =किसीच =और
धन्यस्य =महात्मा काबुभुत्सा =ज्ञान की इच्छा
अपि =भीउपशमम् =शान्ति को
गता =प्राप्त हुई है ॥