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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

अकबर बीरबल विनोद १८४

Page 198Permalink

अकबर बीरबल विनोद १८४
के नये नये प्रेम और नई नई मनबहलाव की बातों से बादशाह
का मन ऐसा लग गया कि उन्हें अपने दरबार तक की सुध
बुध न रही, राज में क्या होता है और क्या नहीं इसकी
कुछ भी चिन्ता न रही । कई महीनों का समय इसी प्रकार
गुजस्त होगया, परन्तु विचारे दरबारियों को बादशाह की
खोज करते ही बीत गया; उन्हें यहाँ तक भेद न मिला कि
आखिरश बादशाह किस पर्दे में जा छिपे हैं। जनाने में रहने
का तो हवा भी नहीं लगने पाई थी। इधर राज्य में
गदर हो जाने की आशंका उत्पन्न होगई। ऐसी दशा में
दरबारियों को बादशाह का अभाव बहुत खलने लगा ।
बेगमें दरबारियों से बड़ी सतर्क थीं, वे सब पहले ही
से दृढ़ संगठन कर चुकी थीं कि बादशाह का भेद दरबारियों
को न मिलने पावे नहीं तो हमारे रंग में भंग डालने को
उद्यत हो जायेंगे और कोई न कोई चाल चलकर स्वामी को
हमारे कब्जे से बाहर निकाल ले जायँगे । बादशाह प्रेम
पास में ऐसे जकड़ गये थे कि उन्हें इतना भी गम नहीं था कि
कहाँ सुबह हो रहा है और कहाँ साम । बेगमों को अन्य
दरबारियों से तो उतनी चिन्ता न थी, परन्तु बीरबल और
गंग कवि का उन्हें बराबर खटका बना रहता था। उनको
विश्वास था कि यदि इन दोनों में से एक को भी किसी
प्रकार से बादशाह का महल में होना विदित हो जायगा
तो ये हाथ मारकर बादशाह को हमारे कब्जे से बाहर
निकाल ले जायँगे । इसलिये उन्होंने अपनी सहचरियों
और पहरे के सिपाहियों को खूब सावधान कर दिया था