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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

उत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय

उत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्. शतं भवास्यूतये.. (४१)
हे इंद्र देव! आप हमारे मित्र जैसे हैं. आप हम लोगों की रक्षा के लिए सैकड़ों
यत्न करते हैं. ( ४१ )
यज्ञा यज्ञा वो अग्नये गिरा गिरा च दक्षसे.
प्र प्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न श १७ सिषम्.. (४२)
हर यज्ञ में अग्नि की स्तोत्रों से उपासना की जाती है. आप अमर, सर्वज्ञ, हमारे
प्रिय व मित्र हैं. आप प्रशंसित हैं. ( ४२ )
पाहि नो अग्न ऽ एकया पाहुत द्वितीयया.
पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जां पते पाहि चतसृभिर्वसो.. (४३)
हे अग्नि! आप हमारी रक्षा कीजिए. हम एक स्तुति करते हैं. आप हमारी रक्षा
कीजिए. हम दो प्रार्थनाओं से उपासना करते हैं. आप हमारी रक्षा कीजिए. हम तीन
प्रार्थनाओं से आप की उपासना करते हैं. आप हमारी रक्षा कीजिए. हम चार
प्रार्थनाओं से आप की उपासना करते हैं. आप हमारी रक्षा कीजिए. ( ४३ )
ऊर्जो नपात १७ स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये.
भुवद्वाजेष्वविता भुवद्वृध ऽ उत त्राता तनूनाम्.. (४४)
अग्नि ऊर्जस्वी हैं. हवि देने के लिए उन का आह्वान करते हैं. वे हमारे तन की
रक्षा करते हैं और हमारी मनोकामना पूरी करते हैं. ( ४४ )
संवत्सरोसि परिवत्सरोसीदावत्सरोसीद्वत्सरो ऽ सि वत्सरोसि.
उषसस्ते कल्पन्तामहोरात्रास्ते कल्पन्तामर्धमासास्ते कल्पन्तां मासास्ते कल्पन्तामृतवस्ते
कल्पन्ता १७ संवत्सरस्ते कल्पताम्.
प्रेत्या ऽ एत्यै सं चाञ्च प्र च सारय.
सुपर्णचिदसि तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवः सीद.. (४५)
हे अग्नि! आप संवत्सर, परिवत्सर, इद्वत्सर व वत्सर हैं. उषा आप की है.
दिनरात आप के हैं. आधा मास ( पक्ष ) आप का है. माह आप के हैं. वर्ष आप के हैं.
कल्पांत संवत्सर आदि का आप समुचित विस्तार करते हैं. आप आइए. आप इन सब
को संवारिए. आप चित्त की प्राणवायु जैसे हैं. आप ध्रुव ( स्थिर ) हो कर विराजिए.
आप हमारी आहुति अंगीकार कीजिए और देवताओं से अंगीकार कराइए. ( ४५ )
यजुर्वेद - ३३३

अठ्ठाईसवां अध्याय

अठ्ठाईसवां अध्याय
होता यक्षत्समिधेन्द्रमिडस्पदे नाभा पृथिव्या ऽ अधि.
दिवो वर्ष्मन्त्समिध्यत ऽ ओजिष्ठश्चर्षणीसहां वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. (१)
होता ( पुरोहित ) समिधा से इंद्र देव के लिए यज्ञ करते हैं. यज्ञ पृथ्वी और
अंतरिक्ष की नाभि है. स्वर्गलोक में समिधा चमक रही है. इंद्र देव ओजस्वी और
विजेता हैं. यजमान से अनुरोध है कि वह उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. उन
से अनुरोध है कि वे हवि ग्रहण करने की कृपा करें. ( १ )
होता यक्षत्तनूनपातमूर्तिभिर्जेतारमपराजितम्.
इन्द्रं देव २४ स्वर्विदं पथिभिर्मधुमत्तमैर्नराश २४ सेन तेजसा वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( २ )
इंद्र देव तेजस्वी, शरीर के रक्षक, अपने रक्षा साधनों से जीतने वाले और कभी
नहीं हारने वाले हैं. होता उन के प्रति प्रसन्नतादायी आहुतियों से यज्ञ करते हैं. वे
आत्मज्ञाता हैं. वे मधुर हवि ग्रहण करने की कृपा करें. होता उन के लिए यज्ञ करने
की कृपा करें. ( २ )
होता यक्षदिडाभिरिन्द्रमीडितमाजुह्वानममर्त्यम्.
देवो देवैः सवीर्यो वज्रहस्तः पुरन्दरो वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( ३ )
इंद्र देव अमर, उपासना के योग्य है. वे देवताओं के सर्वेसर्वा और उन के हाथ
में वज्र हैं. वे शत्रुओं के नगर नष्ट करने वाले हैं. होता उन के लिए मधुर प्रार्थनाओं
से यज्ञ करने की कृपा करें. वे हवि द्वारा आनंदित होने की कृपा करें. ( ३ )
होता यक्षद्बर्हिषीन्द्रं निष्षद्वरं वृषभं नर्यापसम्.
वसुभी रुद्रैरादित्यैः सयुग्भिर्बर्हिरासदद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. (४)
इंद्र देव धनवर्षक, यजमानों का हित चाहने वाले व बलवान हैं. होता कुश के
आसन पर विराज कर उन के लिए यज्ञ करते हैं. वे वसु, रुद्र, आदित्य और अपने
साथ के अन्य देवों के साथ कुश के आसन पर बैठ कर हवि ग्रहण करने की कृपा
करें. होता उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४ )
३३४ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय
होता यक्षदोजो न वीर्य १७ सहो द्वार ऽ इन्द्रमवर्धयन्.
सुप्रायणा ऽ अस्मिन्यज्ञे वि श्रयन्तामृतावृधो द्वार ऽ
इन्द्राय मीढुषे व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (५)
होता ने इंद्र देव हेतु यज्ञ किया. उन्होंने उन की बढ़ोत्तरी की एवं उन के ओज
और वीर्य की बढ़ोत्तरी की. इस यज्ञ में यज्ञ को बढ़ाने वाले द्वार की ओर देवता
अच्छी तरह प्रयाण करें. वे इच्छापूर्ति करने वाले हैं. वे यज्ञ में पधारें. अमृत स्वरूप
हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. हम उन के लिए यज्ञ करते हैं. होता उन के लिए
यज्ञ कीजिए. ( ५ )
होता यक्षदुषे इन्द्रस्य धेनू सुदुघे मातरा मही.
सवातरौ न तेजसा वत्समिन्द्रमवर्धतां वीतामाज्यस्य होतर्यज.. (६)
इंद्र देव के लिए पृथ्वि मां जैसी है, अच्छे दूधवाली गायों जैसी है. होता ने महान्
उन के लिए पवित्र यज्ञ किया. होता ने अपने तेज से उन की बढ़ोत्तरी की. जैसे मां
के प्यार से बच्चा दृढ़ बनता है, वैसे ही वे हवि से दृढ़ हों. होता ! आप उन के लिए
यज्ञ कीजिए. ( ६ )
होता यक्षदैव्या होतारा भिषजा सखाया हविषेन्द्रं भिषज्यतः.
कवी देवौ प्रचेतसाविन्द्राय धत्त ऽ इन्द्रियं वीतामाज्यस्य होतर्यज.. (७)
अश्विनीकुमार दिव्य, भिषगाचार्य ( चिकित्सक ) हमारे सखा, इंद्र देव के वैद्य
और कवि हैं. वे श्रेष्ठ चित्त वाले हैं. इंद्र देव के लिए स्वास्थ्य धारण करते हैं. होता
देवों ने अश्विनीकुमारों के लिए यज्ञ किया. अश्विनीकुमार हवि ग्रहण करने की
कृपा करें. होता उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ७ )
होता यक्षत्तिस्रो देवीर्न भेषजं त्रयस्त्रिधातवो ऽ पस ऽ इडा सरस्वती भारती मही:.
इन्द्रपत्नीर्हविष्मतीर्व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (८)
होता ने इड़ा, सरस्वती व भारती के लिए यज्ञ किया. तीनों देवियों के लिए
होता ने यज्ञ किया. ये तीनों देवियां तीनों लोकों में तीनों ऋतुओं को धारण करने
वाले इंद्र देव की आज्ञा का पालन करती हैं. ये तीनों देवियां ओषधि युक्त हैं. तीनों
देवियां हविष्मती हों. यजमान इन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ८ )
होता यक्षत्त्वष्टारमिन्द्रं देवं भिषज १७ सुयजं घृतश्रियम्.
पुरुरूप १७ सुरेतसं मघोनमिन्द्राय त्वष्टा दधदिन्द्रियाणि वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. (९)
त्वष्टा देव वैभववान, दानी, रोगनाशक, श्रेष्ठ यज्ञकर्त्ता, शोभाधारी व अनेक
रूप वाले हैं. उत्तम वीर्य वाले धनवान त्वष्टा ने इंद्र के लिए शक्तियां धारीं. त्वष्टा
देव हवि ग्रहण करने की कृपा करें. होता उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ९ )
यजुर्वेद – ३३५

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय
होता यक्षद्वनस्पति ᳵ शमितार ᳵ शतक्रतुं धियो जोष्टारमिन्द्रियम्.
मध्वा समजन्पथिभिः सुगेभिः स्वदाति यज्ञं मधुना घृतेन वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. (१०)
वनस्पति देव शांतिदाता, सैकड़ों यज्ञ करने वाले, बुद्धि योजक (जोड़ने
वाले) और इंद्र देव से संबंधित हैं. वे पथ को सुगम बनाने वाले हैं. यज्ञ को मधुर
हवियों से पूरते हैं. वे वनस्पति मधुर हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. होता उन
वनस्पति देव के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (१०)
होता यक्षदिन्द्र ᳵ स्वाहाज्यस्य स्वाहा मेदसः स्वाहा स्तोकाना ᳵ स्वाहा स्वाहाकृतीना
ᳵ स्वाहा हव्यसूक्तीनाम्.
स्वाहा देवा ऽ आज्यपा जुषाणा ऽ इन्द्र ऽ आज्यस्य व्यन्तु होतर्यज.. (११)
इंद्र देव के लिए स्वाहा. आज्य के लिए स्वाहा. मेद के लिए स्वाहा. स्तोत्र के
लिए स्वाहा. स्वाहा करने वाले के लिए स्वाहा. हवि के लिए सूक्त गाने वालों के
लिए स्वाहा. देवों के लिए स्वाहा. हवि का पान करने वालों के लिए स्वाहा. इंद्र
देव हवि का पान करने की कृपा करें. यजमान इंद्र देव के लिए यज्ञ करने की
कृपा करें. (११)
देवं बर्हिरिन्द्र ᳵ सुदेवं देवैर्वीरवत्स्तीर्णं वेद्यामवर्धयत्.
वस्तोर्वृतं प्राक्तोर्भृत ᳵ राया बर्हिष्मतोत्यगाद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (१२)
हे इंद्र देव! देवता अच्छी वेदी पर बढ़ोतरी पाते हैं. देवताओं की भी बढ़ोतरी
करते हैं. देवगण कुश के आसन पर विराजने व हवि का भोग लगाने की कृपा करें.
यजमान कुश के आसन से युक्त हैं. यजमान ऐश्वर्य पाने व धन धारण करने के
लिए यज्ञ करते हैं. (१२)
देवीर्द्वार ऽ इन्द्र ᳵ सङ्घाते वीड्वीर्यामन्नवर्धयन्.
आ वत्सेन तरुणेन कुमारेण च मीवतापावार्ण ᳵ रेणुककाटं नुदन्तां वसुवने वसुधेयस्य
व्यन्तु यज.. (१३)
इंद्र देव देवों के द्वार हैं. सब ने मिल कर उन के पराक्रम व बल की बढ़ोतरी
की. इंद्र देव बाल्य, युवा और कुमारावस्था में होने वाले हानिकारी तत्त्वों व धूल
भरे बादलों को भी रोकते हैं. वे यजमान को वैभव प्रदान करने व वैभव धारण
करने की कृपा करें. वे यजमान के घर में सुखशांति के लिए यज्ञ करने की कृपा
करें. हे यजमानो! आप इंद्र देव के लिए यज्ञ कीजिए. (१३)
देवी उषासानक्तेन्द्रं यज्ञे प्रत्यह्वेताम्.
दैवीर्विशः प्रायासिष्टा ᳵ सुप्रीते सुधिते वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज.. (१४)
उषा देवी और रात्रि देवी प्रेमिल हैं. यज्ञ में उन का आह्वान कीजिए. वे यजमानों
को अच्छी प्रीति और अच्छी बुद्धि के लिए प्रेरित करती हैं. हे यजमानो! आप
३३६ - यजुर्वेद 632/21

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय
यज्ञ कीजिए ताकि वे आप के लिए धन धारण कर सकें. आप को धन प्रदान कर
सकें. ( १४ )
देवी जोष्ट्री वसुधिती देवमिन्द्रमवर्धताम्.
अयाव्यन्याघा द्वेषा १७ स्यान्या वक्षद्वसु वार्याणि यजमानाय शिक्षिते वसुवने वसुधेयस्य
वीतां यज.. ( १५)
देवी जोशीली, धन धारण करने वाली, इंद्र देव की बढ़ोत्तरी करने वाली, द्वेषों
व पापों को दूर करने वाली हैं. यजमान के लिए धन धारने की कृपा कीजिए. यजमान
को धन प्राप्ति की शिक्षा दीजिए. यजमान इस सब के लिए यज्ञ करें. ( १५ )
देवी ऊर्जाहुती दुघे सुदुघे पयसेन्द्र मवर्धताम्.
इषमूर्जमन्या वक्षत्सग्धि १७ सपीतिमन्‍या नवेन पूर्वं दयमाने पुराणेन
नवमधातामूर्जमूर्जाहुती ऊर्जयमाने वसु वार्याणि यजमानाय शिक्षिते वसुवने वसुधेयस्य
वीतां यज.. (१६)
देवी ने इंद्र देव को ऊर्जस्वी बनाया. पयस से उन की बढ़ोत्तरी की. देव अन्न
शक्ति से युक्त हैं. देवी जल शक्ति से युक्त हैं. देवी दयामयी, पुरातन तत्त्वों को
जानने वाली हैं व नए और पुराने अन्न को धारण करती हैं. वे यजमान के लिए
महान् ऐश्वर्य प्रदान करने उस को स्थायित्व प्रदान करने की कृपा करें. देवगण
हव्यपान की कृपा करें. यजमान गण इन के लिए यज्ञ करें. ( १६ )
देवा दैव्या होतारा देवमिन्द्रमवर्धताम्.
हताघश १७ सावाभार्ष्टां वसु वार्याणि यजमानाय शिक्षितौ वसुवने वसुधेयस्य वीतां
यज.. (१७)
होता दिव्य है. वह ( यज्ञ से ) देवी की बढ़ोत्तरी करने की कृपा करे. होता इंद्र
देव की बढ़ोत्तरी करने की कृपा करें. देव और देवी हमारा वैभव बढ़ाने की कृपा
करें. देवी और देव यजमान को वैभव प्रदान कराने के लिए हवि ग्रहण करने की
कृपा करें. देव और देवी उस वैभव को स्थायी बनाने की कृपा करें. हे यजमान!
आप भी इसीलिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( १७ )
देवीस्तिस्रस्तिस्रो देवीः पतिमिन्द्रमवर्धयन्.
अस्पृक्षद्भारती दिव १७ रुदैर्यज्ञ १७ सरस्वतीडा वसुमती गृहान् वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु
यज.. (१८)
इंद्र देव पालक हैं. तीन देवियों ने उन की बढ़ोत्तरी की. भारती देवी स्वर्गलोक
का व रुद्र यज्ञ का स्पर्श करते हैं. सरस्वती, इड़ा और वसुमती घर का स्पर्श करती
हैं. तीनों देवियां यजमान के लिए धन धारने की कृपा करें. यजमान इस के लिए
यज्ञ करने की कृपा करें. ( १८ )
यजुर्वेद - ३३७

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय
देव ऽ इन्द्रो नराश १४ सस्त्रिवरूथस्त्रिबन्धुरो देवमिन्द्रमवर्धयत्.
शतेन शितिपृष्ठानामाहितः सहस्रेण प्रवर्त्तते मित्रावरुणेदस्य होत्रमर्हतो बृहस्पतिः
स्तोत्रमश्विनाध्वर्यवं वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (१९)
इंद्र बहुप्रशंसित हैं. तीनों लोकों के बंधु हैं. यज्ञ देव इंद्र देव की बढ़ोतरी की
कृपा करें. इंद्र देव सैकड़ों काली पीठ वाली गायों से शोभते हैं. कर्मनिष्ठ वरुण,
स्तोता बृहस्पति एवं अध्वर्यु अश्विनीकुमारद्वय इस यज्ञ के होता हैं. देवगण यजमानों
को वैभव दें. देवगण यजमानों के लिए धन धारने की कृपा करें. होता इस के लिए
यज्ञ करने की कृपा करें. (१९)
देवो देवैर्वनस्पतिर्हिरण्यपर्णो मधुशाखः सुपिप्पलो देवमिन्द्रमवर्धयत्.
दिवमग्रेणास्पृक्षदान्तरिक्षं पृथिवीमदृ १४ हीद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (२०)
वनस्पति देव सोने के पत्तों से युक्त, मधुर शाखाओं वाले और उत्तम फलों
वाले हैं. वनस्पति इंद्र देव की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. वनस्पति देव अपने उग्र
त्याग से स्वर्गलोक व अंतरिक्षलोक का स्पर्श करते हैं. वनस्पति देव पृथ्वीलोक में
व्याप्त हैं. वनस्पति देव यजमानों को धन देने व धन धारने की कृपा करें. होता इस
के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (२०)
देवं बर्हिर्वारितीनां देवमिन्द्रमवर्धयत्.
स्वासस्थमिन्द्रेणासनमन्या बर्ही १४ ष्यभ्यभूद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (२१)
हे देवगण! इंद्र देव कुश के आसन पर विराजते हैं. हे देवगण! उन की बढ़ोतरी
करने की कृपा करें. वे आकाश में स्थित वस्तुओं को अभिभूत करने व यजमान
को ऐश्वर्य देने की कृपा करें. उस वैभव को स्थिर करने की कृपा करें. यजमान उस
वैभव को पाने के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (२१)
देवो अग्निः स्विष्टकृद्देवमिन्द्रमवर्धयत्.
स्विष्टं कुर्वन्त्स्विष्टकृत्स्विष्टमद्य करोतु नो वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (२२)
अग्नि इष्ट कार्य की पूर्ति करते हैं. इंद्र देव की बढ़ोतरी करते हैं. इंद्र देव आज
हमारे इष्ट कार्य की पूर्ति करने की कृपा करें. (सदैव) इष्ट कार्य की पूर्ति करने की
कृपा करें. वे यजमान को वैभव प्रदान करने की कृपा करें. आप यजमान के लिए
वैभव धारण करने की कृपा करें. यजमान उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (२२)
अग्निमद्य होतारमवृणीतायं यजमानः पचन्पक्तीः पचन्पुरोडाशं बध्नन्निन्द्राय छागम्.
सूपस्था ऽ अद्य देवो वनस्पतिरभवदिन्द्राय छागेन.
अघतं मेदस्तः प्रति पचताग्रभीदवी वृधत्पुरोडाशेन.
त्वामद्य ऋषे.. (२३)
३३८ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय
अग्नि ने आज होता का वरण किया. पचने योग्य वस्तु व पुरोडाश को पकाया.
इंद्र देव के लिए बकरी को बांधा. आज वनस्पति देव ने बकरी के दूध से इंद्र देव
की बढ़ोतरी की. आज पुरोडाश पका कर उस से उन की बढ़ोतरी की. हे ऋषि
गणो! आप भी ऐसा करने की कृपा कीजिए. ( २३ )
होता यक्षत्समिधानं महद्यशः सुसमिद्धं वरेण्यमग्निमिन्द्रं वयोधसम्.
गायत्रीं छन्द ऽ इन्द्रियं त्र्यविं गां वयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( २४ )
होता ने अग्नि और इंद्र देव के लिए यज्ञ किया. दोनों देव महान् यशस्वी,
श्रेष्ठ समिधा से युक्त, वरेण्य व आयुधारी हैं. होता गायत्री छंद और इंद्रिय
शक्ति के द्वारा उन के लिए आहुति भेंट करते हैं. होता ऊर्जा प्रकाश और उन
की किरणों से उन के लिए आहुति भेंट करते हैं. ( २४ )
होता यक्षत्तनूनपातमृद्धिदं यं गर्भमदितिर्दधे शुचिमिन्द्रं वयोधसम्.
उष्णिहं छन्द ऽ इन्द्रियं दित्यवाहं गां वयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( २५)
होता ने इंद्र देव के लिए यज्ञ किया. उन को अदिति देवी ने गर्भ में धारा. वे
आयुधारी हैं. होता उष्णिक् छंद में इंद्र देव की स्तुति करते हैं. होता इंद्रियशक्ति से
उन को हवि प्रदान करते हैं. वे दित्यवाट् गौ ( यज्ञीय प्रक्रिया संचालित करने वाली
किरणें ) धारने वाले हैं. यजमान उन के लिए आहुति समर्पित करते हैं. प्रयाज देव
के साथ वे हमारी हवि ग्रहण करें. ( २५ )
होता यक्षदीडेन्यमीडितं वृत्रहन्तममिडाभिरीड्य २४ सहः सोममिन्द्रं वयोधसम्.
अनुष्टुभं छन्द ऽ इन्द्रियं पञ्चाविं गां वयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( २६ )
होता इंद्र देव के लिए यज्ञ करते हैं. वे वृत्रासुरनाशक व सुखदाता हैं. सोम के
साथ आनंददाता व आयुधारी हैं. हम अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा बारंबार उन की
उपासना करते हैं. हम इंद्र देव के लिए यज्ञ करते हैं. हम अनुष्टुप् छंद में उन की
स्तुति करते हैं. इंद्रिय शक्ति के द्वारा हम पंचावि गायों ( पंचभूतों में व्याप्त किरणें )
से उन को आहुति भेंट करते हैं. प्रयाज देव इंद्रादि देवता के साथ आहुति ग्रहण
करने की कृपा करें. ( २६ )
होता यक्षत्सुबर्हिषं पूषण्वन्तममर्त्य २४ सीदन्तं बर्हिषि प्रियेमृतेन्द्रं वयोधसम्.
बृहतीं छन्द ऽ इन्द्रियं त्रिवत्सं गां वयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( २७)
होता इंद्र देव के लिए यज्ञ करते हैं. वे कुश के आसन पर विराजते हैं. वे
पोषकता से युक्त, अमर हैं, प्रिय हैं, अमृतराज व आयुधारी हैं. हम बृहती छंद में
उन की स्तुति करते हैं. हम इंद्रिय शक्ति से उन की स्तुति करते हैं. हम तीन बछड़ों
वाली गाय से उन की स्तुति करते हैं. प्रयाज देव इंद्र आदि देव सहित हवि ग्रहण
करने की कृपा करें. यजमान आहुति भेंट करने की कृपा करें. ( २७ )
यजुर्वेद - ३३९

उत्तरार्ध अठ्ठाईसवां अध्याय

उत्तरार्ध अठ्ठाईसवां अध्याय
होता यक्षद्व्यचस्वतीः सुप्रायणा ऽ ऋतावृधो द्वारो देवीर्हिरण्ययीर्ब्रह्माणमिन्द्रं वयोधसम्.
पङ्क्तिं छन्द ऽ इहेन्द्रियं तुर्यवाहं गां वयो दधद्व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (२८)
होता इंद्र देव के लिए यज्ञ करते हैं. वे तुर्यवाट्, वाहक ( स्वेदज, अंडज,
उद्भिज एवं जरायुज चारों योनियों ), आयुधारी, ब्रह्मज्ञानी, सुनहरे द्वार जैसे यज्ञ
की वेदी वाले व सुगम हैं. होता उन के लिए पंक्ति छंद से स्तुति व इंद्रिय शक्ति से
उन की उपासना करते हैं. प्रयाज एवं इंद्र देव आहुति स्वीकार करने की कृपा करें.
यजमान गण उन के लिए यज्ञ करें. ( २८ )
होता यक्षत्सुपेशसा सुशिल्पे बृहती उभे नक्तोषासा न दर्शते विश्वमिन्द्रं वयोधसम्.
त्रिष्टुभं छन्द ऽ इहेन्द्रियं पष्ठवाहं गां वयो दधद्वीतामाज्यस्य होतर्यज.. (२९)
होता ने इंद्र देव के लिए यज्ञ किया. वे आयुधारी हैं. उषा और रात्रि विशाल हैं.
वे अच्छे शिल्प वाली और सर्वव्यापक हैं. दोनों देवियां हवि स्वीकारने की कृपा करें.
हम त्रिष्टुप् छंद से इन की व इंद्रिय शक्ति से उन की उपासना करते हैं. हम उन के
लिए भार सहने वाली पृष्टवाही गौएं धारण करते हैं. प्रयाज एवं इंद्र देव हवि स्वीकारें
यजमान उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( २९ )
होता यक्षत्प्रचेतसा देवानामूत्तमं यशो होतारा दैव्या कवी सयुजेन्द्रं वयोधसम्.
जगतीं छन्द ऽ इन्द्रियमनड्वाहं गां वयो दधद्वीतामाज्यस्य होतर्यज.. (३०)
होता इंद्र देव और सहयोगी देवों के लिए यज्ञ करते हैं. इंद्र देव दिव्य, यशस्वी,
कवि व आयुधारी हैं. यजमान जगती छंद से उन की उपासना करते हैं. इंद्रिय शक्ति
से उन की उपासना करते हैं. प्रयाज सहित इंद्र देव हवि स्वीकारें. यजमान उन के
लिए यज्ञ करें. ( ३० )
होता यक्षत्पेशस्वतीस्तिस्रो देवीर्हिरण्ययीर्भारतीर्बृहतीर्महीः पतिमिन्द्रं वयोधसम्.
विराजं छन्द ऽ इहेन्द्रियं धेनुं गां न वयो दधद्व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३१)
होता ने इंद्र देव के लिए यज्ञ किया. पालक इंद्र देव इड़ा, सरस्वती व भारती
देवी के साथ हैं. ये देवियां आयुधारी, स्वर्णमयी, विशाल और महिमामयी हैं. हम
विराज छंद से इंद्र देव के लिए उपासना करते हैं. हम इंद्रिय शक्ति से इंद्र देव की
उपासना करते हैं. हम दुधारू गाएं उन के लिए धारण करते हैं. हम यजमान उन के
लिए आहुति भेंट करें. यजमान उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ३१ )
होता यक्षत्सुरेतसं त्वष्टारं पुष्टिवर्धन ६४ रूपाणि बिभ्रतं पृथक् पुष्टिमिन्द्रं वयोधसम्.
द्विपदं छन्द ऽ इन्द्रियमुक्षाणं गां न वयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. (३२)
होता ने त्वष्टा और इंद्र देव के लिए यज्ञ किया. दोनों देव पोषकता बढ़ाने वाले
हैं, वे रूपधारी व प्राणियों के पालनहार हैं. हम द्विपदा छंद में रची प्रार्थना से उन
की उपासना करते हैं. हम इंद्रिय शक्ति से उन के लिए उपासना करते हैं. यजमान
३४० - यजुर्वेद

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय
इन दोनों देवों को हवि भेंट करें. यजमान इन दोनों देवों के लिए यज्ञ करने की कृपा
करें. ( ३२ )
होता यक्षद्वनस्पति १७ शमितार १४ शतक्रतु १४ हिरण्यपर्णमुक्थिन १४ रशनां बिभ्रतं वशिं
भगमिन्द्रं वयोधसम्.
ककुभं छन्द ऽ इहेन्द्रियं वशां वेहतं गां वयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. ( ३३ )
होता ने इंद्र देव के लिए यज्ञ किया. वनस्पति देव शांतिदायी, सैकड़ों यज्ञ करने
वाले, सोने के पत्तों वाले, चाबुकधारी, आयुवर्धक व सौभाग्यदायी हैं. यजमान ने
वनस्पति देव के लिए यज्ञ किया. हम यजमान ककुभ छंद से इन दोनों देवों की
उपासना करते हैं. इंद्रिय शक्ति से उन की उपासना करते हैं. वंध्या गायों को धारण
करते हैं. वनस्पति और इंद्र देव आहुति स्वीकारने की कृपा करें. यजमान इन के
लिए हवन करें. ( ३३ )
होता यक्षत्स्वाहाकृतीरग्निं गृहपतिं पृथग्वरुणं भेषजं कविं क्षत्रमिन्द्रं वयोधसम्.
अतिच्छन्दसं छन्द ऽ इन्द्रियं बृहदृषभं गां वयो दधद्व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. ( ३४ )
होता अग्नि के लिए यज्ञ करते हैं. अग्नि बलवान, आयुधारी, गृहपति, वैद्य,
कवि व स्वाहायुक्त हैं. हम छंदस छंद से अग्नि और इंद्र देव की उपासना करते हैं.
दोनों देव हवि स्वीकारने की कृपा करें. हम इंद्रिय शक्ति से उन की उपासना करते
हैं. यजमान दोनों देवों के लिए यज्ञ करें. ( ३४ )
देवं बर्हिर्वयोधसं देवमिन्द्रमवर्धयत्.
गायत्र्या छन्दसेन्द्रियं चक्षुरिन्द्रे वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. ( ३५ )
इंद्र देव कुश के आसन पर विराजते हैं. वे आयुवर्द्धक हैं. देवताओं ने उन की
बढ़ोत्तरी की. हम गायत्री छंद से इंद्र देव की उपासना और अपनी नेत्र शक्ति से उन
का ध्यान धरते हैं. वे ऐश्वर्य धारण करते हैं. वे धन प्रदान करते हैं. यजमान इंद्र देव
के लिए यज्ञ करें. ( ३५ )
देवीर्द्वारो वयोधस १७ शुचिमिन्द्रमवर्धयन्.
उष्णिहा छन्दसेन्द्रियं प्राणमिन्द्रे वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. ( ३६ )
हे होता! आप इंद्र देव के लिए यज्ञ करते हैं. देवियों ने उन की आयु व पवित्रता
की बढ़ोत्तरी की. हम उष्णिफ् छंद में उन की उपासना करते हैं. हम उन को प्राण
देते हैं. वे हमारे लिए धन धारते हैं. वे हमें धन प्रदान करने की कृपा करें. होता उन
के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ३६ )
देवी उषासानक्ता देवमिन्द्रं वयोधसं देवी देवमवर्धताम्.
अनुष्टुभा छन्दसेन्द्रियं बलमिन्द्रे वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज.. ( ३७ )
यजुर्वेद - ३४१

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय
उषा देवी और रात्रि देवी इंद्र देव की आयुवृद्धि व उन की बढ़ोतरी करने की
कृपा करें. हम उन की अनुष्टुप् छंद में उपासना करते हैं. देवियों ने इंद्र देव में बल
व आयु की स्थापना की. देव हमारे लिए धन धारते हैं. देव हमें धन प्रदान करें. हे
होता! आप उन के लिए यज्ञ करने की कृपा कीजिए. ( ३७ )
देवी जोष्ट्री वसुधिती देवमिन्द्रं वयोधसं देवी देवमवर्धताम्.
बृहत्या छन्दसेन्द्रिय १४ श्रोत्रमिन्द्रे वयो दधद्दुसुवने वसुधेयस्य वीतां यज.. ( ३८)
देवी जोशीली, धनधारिणी और इंद्र देव की आयु बढ़ाती हैं. हम देवताओं
की उपासना करते हैं. हम अपनी कर्णशक्ति व अपनी आयुशक्ति इंद्र देव में
लगाते हैं. वे हमारे लिए धन धारते हैं. वे हमें धन प्रदान करें. उन के लिए यजमान
यज्ञ करें. ( ३८ )
देवी ऊर्जाहुती दुघे सुदुघे पयसेन्द्रं वयोधसं देवी देवमवर्धताम्.
पङ्क्त्या छन्दसेन्द्रिय १४ शुक्लमन्द्रे वयो दधद्दुसुवने वसुधेयस्य वीतां यज.. (३९)
देवी ऊर्जावती हैं. इंद्र देव के लिए अच्छी तरह दूध का दोहन करती हैं. देवी
इंद्र देव के लिए आयु धारती और उन की बढ़ोतरी करती हैं. हम पंक्ति छंद में उन
की उपासना करते हैं. हम अपना पराक्रम उन को देते हैं. हम अपनी आयु उन के
लिए धारते हैं. वे हमारे लिए धन धारते हैं. यजमान उन के लिए हवन करने की कृपा
करें. ( ३९ )
देवा दैव्या होतारा देवमिन्द्रं वयोधसं देवौ देवमवर्धताम्.
त्रिष्टुभा छन्दसेन्द्रियं त्विषिमिन्द्रे वयो दधद्दुसुवने वसुधेयस्य वीतां यज.. (४०)
दिव्य होता इंद्र देव के लिए यज्ञ करते हैं. वे उन के लिए आयु धारण करते हैं.
देवताओं ने उन की बढ़ोतरी की. हम त्रिष्टुप् छंद से उन की उपासना करते हैं. वे
हमारे लिए धन धारते हैं. वे हमें धन प्रदान करें. यजमान उन के लिए यज्ञ करने की
कृपा करें. ( ४० )
देवीस्तिस्रस्तिस्रो देवीर्वयोधसं पतिमिन्द्रमवर्धयन्.
जगत्या छन्दसेन्द्रिय १४ शूषमिन्द्रे वयो दधद्दुसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (४१)
तीनों देवियां इंद्र देव के लिए आयु धारती हैं. वे पालक इंद्र देव की बढ़ोतरी
करती हैं. हम जगती छंद से उन की उपासना करते हैं. हम अपनी आयु व अपनी
इंद्रिय शक्ति उन को अर्पित करते हैं. यजमान उन के लिए यज्ञ करें. ( ४१ )
देवो नराश १४ सो देवमिन्द्रं वयोधसं देवो देवमवर्धयत्.
विराजा छन्दसेन्द्रिय १४ रूपमिन्द्रे वयो दधद्दुसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (४२)
यज्ञ देव ने इंद्र देव की बहुविध प्रशंसा की. वे उन के लिए आयु धारते हैं. वह
३४२ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय
उन की बढ़ोतरी करते हैं. हम विराज छंद से उन की उपासना करते हैं. हम अपना
रूप व आयु उन को अर्पित करते हैं. वे धन धारी हैं. वे हमें धन प्रदान करें. यजमान
उन के लिए यज्ञ करें. ( ४२ )
देवो वनस्पतिर्देवमिन्द्रं वयोधसं देवो देवमवर्धयत्.
द्विपदा छन्दसेन्द्रियं भगमिन्द्रे वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (४३)
वनस्पति देव इंद्र देव के लिए आयु धारते हैं. वनस्पति देव उन की बढ़ोतरी
करते हैं. हम द्विपद छंद से उन की स्तुति करते हैं. हम अपना सौभाग्य व अपनी आय
उन को सौंपते हैं. वे धनधारी हैं. वे हमें धन प्रदान करें. यजमान उन के लिए यज्ञ
करें. ( ४३ )
देवं बर्हिर्वारितीनां देवमिन्द्रं वयोधसं देवं देवमवर्धयत्.
ककुभा छन्दसेन्द्रियं यश ऽ इन्द्रे वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (४४)
इंद्र देव कुश के आसन पर विराजते हैं. बर्हिदेव उन के लिए आयु धारते व उन
की बढ़ोतरी करते हैं. हम ककुप् छंद से उन की स्तुति करते हैं. हम अपना यश उन
को सौंपते हैं. हम अपनी आयु उन को सौंपते हैं. वे धनधारी हमें धन प्रदान करें.
यजमान उन के लिए यज्ञ करें. ( ४४ )
देवो अग्निः स्विष्टकृद्देवमिन्द्रं वयोधसं देवो देवमवर्धयत्.
अतिच्छन्दसा छन्दसेन्द्रियं क्षत्रमिन्द्रे वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (४५)
अग्नि इंद्र देव की वीरता और आयु की बढ़ोतरी करते हैं. हम अतिच्छंद से उन
की उपासना करते हैं. हम अपनी वीरता व अपनी आयु उन को सौंपते हैं. वे धनधारी
हैं. वे हमें जीवन प्रदान करें. यजमान उन के लिए यज्ञ करें. ( ४५ )
अग्निमद्य होतारमवृणीतायं यजमानः पचन्पक्तीः पचन्पुरोडाशं बध्नन्निन्द्राय
वयोधसे छागम्.
सूपस्था ऽ अद्य देवो वनस्पतिरभवदिन्द्राय वयोधसे छागेन.
अद्यत्तं मेदस्तः प्रतिपचताग्रभीदवीवृधत्पुरोडाशेन. त्वामद्य ऋषे.. (४६)
अग्नि ने आज होता को वरण किया! पचने योग्य वस्तु और पुरोडाश को
पकाया. इंद्र देव के लिए बकरी को बांधा. वनस्पति देव ने बकरी के दूध से व
पुरोडाश पका कर उन की बढ़ोतरी की. हे ऋषि गणो! आप भी ऐसा करने की
कृपा कीजिए. ( ४६ )
यजुर्वेद - ३४३

उनतीसवां अध्याय

उनतीसवां अध्याय
समिद्धो अञ्जन् कृदरं मतीनां घृतमग्ने मधुमत्पिन्वमानः.
वाजी वहन् वाजिनं जातवेदो देवानां वक्षि प्रियमा सधस्थम्.. (१)
हे अग्नि! आप समिधा को प्रज्वलित करें. आप मतिमान के हृदय के प्रिय भावों
को भी देवों तक पहुंचाइए. आप मधुर घी का सेवन कीजिए. आप सर्वज्ञ हैं. आप
हवि वहन कर के बलशाली देवता को उसे भेंट कीजिए. ( १ )
घृतेनाञ्जन्तसं पथो देवयानान् प्रजानन् वाज्यप्येतु देवान्.
अनु त्वा सप्ते प्रदिशः सचन्ता ष्ठं स्वधामस्मै यजमानाय धेहि.. (२)
हे अग्नि! आप देवताओं का पथ घी से अभिषिंचित व उन्हें हवि से आप्यायित
( प्रसन्न ) कर दीजिए. आप सातों दिशाएं सींच दीजिए. आप यजमान के लिए स्वधा
धारिए. ( २ )
ईड्यश्चासि वन्द्यश्च वाजिन्नाशुश्चासि मेध्यश्च सप्ते.
अग्निष्ट्वा देवैर्वसुभिः सजोषाः प्रीतं वहिं वहतु जातवेदाः.. (३)
हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. आप वसुओं से प्रेम रखते हैं. आप प्रीतिपूर्वक अग्नि
को ले जाने व अन्न को पवित्र कीजिए. आप वंदनीय हैं. ( ३ )
स्तीर्णं बर्हिः सुष्टरीमा जुषाणोरु पृथु प्रथमानं पृथिव्याम्.
देवेभिर्युक्तमदितिः सजोषाः स्योनं कृण्वाना सुविते दधातु.. (४)
देवताओं से युक्त अदिति देवी प्रसन्नता सहित सविता देव को धारण करें.
अदिति देवी का कुश का आसन विस्तृत है. अदिति देवी सुखदायी हैं. अदिति देवी
पृथ्वी पर अपनी विशालता से फैली हुई हैं. ( ४ )
एता ऽ उ वः सुभगा विश्वरूपा वि पक्षोभिः श्रयमाणा ऽ उदातैः.
ऋष्वाः सतीः कवषः शुम्भमाना द्वारो देवीः सुप्रायणा भवन्तु.. (५)
देवी के द्वार सौभाग्यदाता, बहुत स्वरूप व पंख के आकार वाले हैं. खोलते
और बंद करते समय वे उदात्त ध्वनि करते हैं. ऋषि, सती और कवियों द्वारा खोले
जाने पर जाने में सुकर हों. ( ५ )
३४४ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
अन्तरा मित्रावरुणा चरन्ती मुखं यज्ञानामभि संविदाने.
उषासा वा १७ सुहिरण्ये सुशिल्पे ऋतस्य योनाविह सादयामि.. (६)
हे रात्रि और उषा देवी! आप स्वर्णमयी, श्रेष्ठ शिल्पी व ऋत की योनि हैं. हम
यहां आप को स्थापित करते हैं. आप मित्र देव और वरुण देव के बीच भ्रमण करती
हैं. आप यज्ञ का मुख हैं. आप यज्ञ को ज्योतित ( प्रकाशित ) करने वाली हैं. ( ६ )
प्रथमा वा १७ सरथिना सुवर्णा देवौ पश्यन्तौ भुवनानि विश्वा.
अपिप्रयं चोदना वां मिमाना होतारा ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (७)
दोनों देव प्रथम वंदनीय, सारथी युक्त रथ वाले और श्रेष्ठ वर्ण वाले हैं. आप
सभी भुवनों को देखते हुए जाते हैं. आप यजमानों को उन के प्रिय कामों के लिए
प्रेरित करते हैं. आप दिशाओं और प्रदिशाओं को प्रकाशित करते हैं. ( ७ )
आदित्यैर्नो भारती वष्टु यज्ञ १७ सरस्वती सह रुद्रैर्न ऽ आवीत्.
इडोपहूता वसुभिः सजोषा यज्ञं नो देवीरमृतेषु धत्त.. (८)
आदित्य गणों के साथ भारती देवी व रुद्रगणों के साथ सरस्वती देवी हमारे
यज्ञ की रक्षा करने की कृपा करें. वसुओं के साथ आमंत्रित इड़ा देवी यज्ञ की रक्षा
करने व हमारे लिए अमृत धारने की कृपा करें. ( ८ )
त्वष्टा वीरं देवकामं जजान त्वष्टुरर्वा जायत आशुरश्वः.
त्वष्टेदं विश्वं भुवनं जजान बहोः कर्तारमिह यक्षि होतः.. (९)
त्वष्टा देव ने देवों को चाहने वाली वीर संतान पैदा की. त्वष्टा देव ने शीघ्र
जाने वाले अश्व पैदा किए. त्वष्टा देव ने सारा विश्व पैदा किया. त्वष्टा देव बहुरूपी
जगत् के कर्ता हैं. होता यज्ञ करने की कृपा करें. ( ९ )
अश्वो घृतेन त्मन्या समक्त उप देवाँ २ ऋतुशः पाथ ऽ एतु.
वनस्पतिर्देवलोकं प्रजानन्नग्निना हव्या स्वदितानि वक्षत्.. (१०)
हे वनस्पति देव! आप अग्नि की कृपा से घी से घोड़े को भलीभांति सींचिए.
अन्नमय हवि को देवों और उपदेवों के पास पहुंचाने की कृपा कीजिए. आप हवि
को अन्य देवों के पास पहुंचाने की कृपा कीजिए. ( १० )
प्रजापतेस्तपसा वावृधानः सद्यो जातो दधिषे यज्ञमग्ने.
स्वाहाकृतेन हविषा पुरोगा याहि साध्या हविरदन्तु देवाः.. (११)
हे अग्नि! आप तुरंत उत्पन्न होते ही बढ़ोतरी को प्राप्त हो जाते हैं. आप यज्ञ को
धारण कर लेते हैं. आप अग्रगामी हैं. स्वाहा कर के हवि समर्पित किए जाने पर आप
उसे स्वीकार करते हैं. आप आगे चलिए. आप हमारा कार्य साधिए. आप की कृपा
से देवगण शीघ्र हमारी हवि को स्वीकारने की कृपा करें. ( ११ )
यजुर्वेद - ३४५

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
यदक्रन्दः प्रथमं जायमान ऽ उद्यन्त्समुद्रादुत वा पुरीषात्.
श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहू उपस्तुत्यं महि जातं ते अर्वन्.. (१२)
हे मेघ देव! आप की गति बाज पक्षी की गति जैसी है. आप हिरण बाहु की
तरह चंचल हैं. आप सर्वप्रथम उत्पन्न हुए. उत्पन्न होते ही आप ने क्रंदन किया. आप
समुद्र से उत्पन्न हुए. उत्पन्न होते ही आप स्तुत्य हो गए. आप की महिमा सर्वत्र व्याप्त
हो गई. ( १२ )
यमेन दत्तं त्रित एनमायुनगिन्द्र ऽ एणं प्रथमो अध्यतिष्ठत्.
गन्धर्वो अस्य रशनामगृह्णात् सूरादश्वं वसवो निरतष्ट.. (१३)
वायु देव ने यम के द्वारा दिए गए घोड़े को रथ में जोता. इंद्र देव सब से पहले
इस घोड़े पर बैठे. गंधर्व ने इस की लगाम ग्रहण की. वसुगणों ने इसे सूर्यमंडल से
निकाला. ( १३ )
असि यमो अस्यादित्यो अर्वन्नसि त्रितो गुह्येन व्रतेन.
असि सोमेन समया विपृक्त ऽ आहुस्ते त्रीणि दिवि बन्धनानि.. (१४)
हे मेघ देव! गुप्त व्रत के कारण आप यम हैं. गुप्त व्रत के कारण आप आदित्य
हैं. गुप्त व्रत के कारण आप तीनों लोकों में व्याप्त हैं. आप सोम के साथ एकमेक हैं.
स्वर्गलोक में आप के तीन बंधन बताए गए हैं. ( १४ )
त्रीणि त ऽ आहुर्दिवि बन्धनानि त्रीण्यप्सु त्रीण्यन्तः समुद्रे.
उतेव मे वरुणश्छन्त्स्यर्वन् यत्रा त ऽ आहुः परमं जनित्रम्.. (१५)
हे मेघ देव! स्वर्गलोक में तीन बंधन बताए गए हैं. तीन ही बंधन जल में बताए
गए हैं. तीन ही बंधन समुद्र में बताए गए हैं. उतने ही बंधन अंतरिक्ष में बताए गए हैं.
आप परम जनक हैं. हम वरुण रूप में आप की स्तुति करते हैं. ( १५ )
इमा ते वाजिन्नवमार्जनानीमा शफाना थ्ष सनितुर्निधाना.
अत्रा ते भद्रा रशना ऽ अपश्यममृतस्य या ऽ अभिरक्षन्ति गोपाः.. (१६)
हे बलवान मेघ देव! आप जिनजिन को सींचते हैं, हम उनउन को देखते हैं.
आप के खुरों के निशान हम ने देखे हैं. यहां आप की कल्याणकारी रस्सी है, जो
ग्वालों व अमरता की रक्षा करती है. ( १६ )
आत्मानं ते मनसारादजानामवो दिवा पतयन्तं पतङ्गम्.
शिरो अपश्यं पथिभिः सुगेभिररेणुभिर्जेहमानं पतत्रि.. (१७)
हम आप को मन से जानते हैं. स्वर्गलोक से नीचे की ओर गिरते हुए सूर्य को
जानते हैं. आप जब पथ से जाते हैं, तब आप के सिरे नीचे की ओर आते हैं. हम
उन सिरों को भी देखते हैं. आप सुगम हैं. ( १७ )
३४६ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
अत्रा ते रूपमुत्तममपश्यं जिगीषमाणमिष ऽ आ पदे गोः.
यदा ते मर्तो अनु भोगमानडादिद् ग्रसिष्ठ ऽ ओषधीर्जीगः.. (१८)
हे हवि रूपी वायु! हम यहां आप के यज्ञ करने की इच्छा वाले उत्तम रूप को
देखते हैं. आप गो मंडल में जाते हैं. जब आप के लिए हवि का भोग लगाया जाता
है तब आप उसे और ओषध रूप हवि को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. (१८)
अनु त्वा रथो अनु मर्यो अर्वन्ननु गावोन्व भगः कनीनाम्.
अनु व्रातासस्तव सख्यमीयुरनु देवा ममिरे वीर्यं ते.. (१९)
हे अर्वन् देव! हमारे रथ आप का अनुकरण करते हैं. हम आप का अनुकरण
करते हैं. हमारी गाएं व हमारी कन्याओं के भाग्य आप का अनुकरण करते हैं. हमारे
व्रत आप का अनुकरण करते हैं. हम ने आप की मित्रता पाई. देवताओं ने आप के
पराक्रम का वर्णन किया है. (१९)
हिरण्यशृङ्गोऽयो अस्य पादा मनोजवा ऽ अवर ऽ इन्द्र ऽ आसीत्.
देवा ऽ इदस्य हविरद्यमायन् यो अर्वन्तं प्रथमो अध्यतिष्ठत्.. (२०)
हे अर्वन्! यह घोड़ा सोने के सींगों वाला है. इस के पैर लोहे के हैं. इस की गति
मन जैसी तीव्र है. देवताओं ने इसे हवि के रूप में ग्रहण किया. इंद्र देव सब से पहले
इस घोड़े पर बैठे हुए. (२०)
ईर्मांन्तासः सिलिकमध्यमासः स ष्ठ् शूरणासो दिव्यासो अत्याः.
ह ष्ठ् सा ऽ इव श्रेणिशो यतन्ते यदाक्षिषुर्दिव्यमज्ममश्वाः.. (२१)
अश्व पतले मध्यभाग (कमर) वाले, बलवान, पुष्ट जांघों व वक्षस्थल वाले
हैं. वे दिव्य और हंसों की तरह एक पांत में चलते हैं. ये घोड़े स्वर्ग में स्वर्गिक आनंद
(दिव्यता) पाते हैं. (२१)
तव शरीरं पतयिष्ण्वर्वन्तव चित्तं वात ऽ इव ध्रजीमान्.
तव शृङ्गाणि विष्ठिता पुरुत्रारण्येषु जर्भुराणा चरन्ति.. (२२)
हे अर्वन्! आप का शरीर ऊपर की ओर जाने वाला है. चित्त वायु जैसा गतिशील
है. आप की पताकाएं जंगलों में दावानल के रूप में विचर रही हैं. (२२)
उप प्रागाच्छसनं वाज्यर्वा देवद्रीचा मनसा दीध्यानः.
अजः पुरो नीयते नाभिरस्यानु पश्चात्कवयो यन्ति रेभाः.. (२३)
हे अर्वन्! हवि गतिशील है. मन की तरह तेजी से ऊपर की ओर जाती है. इस
का धुआं आगे की ओर ले जाया जाता है. नाभि इस का अनुकरण करती है.
पीछेपीछे पाठ करते हुए कविगण चलते हैं. (२३)
यजुर्वेद - ३४७

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
उप प्रागात्परमं यत्सधस्थमर्वाँ २ अच्छा पितरं मातरं च.
अद्या देवाञ्जुष्टतमो हि गम्या ऽ अथा शास्ते दाशुषे वार्याणि.. ( २४)
हे अर्वन्! आप ऊपर परम स्थान की ओर गमन कीजिए. आप मातापिता से
मिलिए. यजमान देवताओं से जुड़े देवगण हमें अपार वैभव प्रदान करने की कृपा
करें. ( २४ )
समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान् यजसि जातवेदः.
आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः.. ( २५)
हे अग्नि! आप समिधा युक्त और सर्वज्ञ हैं. आप मनुष्यों के यज्ञ में देवताओं
को आमंत्रित करने की कृपा कीजिए. हम आप का आह्वान करते हैं. आप हमारे
मित्र, चेतनासंपन्न, कवि व देवताओं के दूत हैं. ( २५ )
तनूनपात्पथ ऽ ऋतस्य यानान्मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व.
मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन् देवत्रा च कृणुह्यध्वरं नः.. ( २६)
हे अग्नि! आप तन के रक्षक हैं. आप ऋत को अच्छी जिह्वा से सींचते हैं. आप
बुद्धि और मनन से यज्ञ की बढ़ोतरी करते हैं. आप हमारे यज्ञ को देवताओं तक
पहुंचाने की कृपा कीजिए. ( २६ )
नराश ँष सस्य महिमानमेषामुप स्तोषाम यजतस्य यज्ञैः.
ये सुक्रतवः शुचयो धियन्धाः स्वदन्ति देवा ऽ उभयानि हव्या.. ( २७)
हे अग्नि! आप प्रशंसित हैं. हम आप की महिमा गाते हैं. आप श्रेष्ठ
यज्ञ कर्म वाले, पवित्र, बुद्धिमान हैं. हम दोनों हवियों से आप का गुणगान करते
हैं. ( २७ )
आजुह्वान ऽ ईड्यो वन्द्यश्चा याह्यग्ने वसुभिः सजोषाः.
त्वं देवानामसि यह्व होता स एनान्यक्षीषितो यजीयान्.. ( २८)
हे अग्नि! आप देवताओं को बुलाने वाले, प्रार्थनीय, वंदनीय व वसुओं जैसे
स्नेहशील हैं. आप आइए. आप देवताओं के होता हैं. आप देवताओं के लिए यज्ञ
करने की कृपा कीजिए. ( २८ )
प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वस्तोरस्या वृज्यते अग्रे अह्नाम्.
व्यु प्रथते वितरं वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम्.. ( २९)
ये कुशाएं प्राचीन हैं. पृथिवी की प्रदिशाओं में फैली हुई हैं. अदिति देवता के
विराजमान होने के लिए इन कुशाओं को फैलाया ( बिछाया ) जाता है. कुशाएं
बिछा कर सुख से बैठा जा सकता है. ( २९ )
३४८ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
व्यचस्वतीरुर्विया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुम्भमानाः.
देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुप्रायणाः.. (३०)
जैसे स्त्रियां श्रृंगार कर के पति को थकान रहित करती हैं, वैसे ही दिव्य द्वार
वाली विशाल देवियां देवताओं के लिए सुगमता से प्रयास करने वाली हों. (३०)
आ सुष्वयन्ती यजते उपा के उषासानक्ता सदतां नि योनौ.
दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्मे अधि श्रिय छँ शुक्रपिशं दधाने.. (३१)
यज्ञ में उषा और रात्रि देवी भलीभांति सुशोभित होने की कृपा करें. दोनों
देवियां दिव्य कार्य करने वाली, विशाल, आभूषणों से युक्त व कपिश रंग की हैं,
वे भलीभांति अधिष्ठित होने की कृपा करें. (३१)
दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै.
प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (३२)
विराट् यज्ञ के दो दिव्य होता हैं. वे श्रेष्ठ वाणी बोलने वाले हैं. वे पूर्व दिशा
से निकलने वाले सूर्य की किरणों से यज्ञ करते हैं. वे मनुष्यों को यज्ञ आदि श्रेष्ठ
कर्म करने की प्रेरणा देते हैं. (३२)
आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विडा मनुष्यदिह चेतयन्ती.
तिस्रो देवीर्बर्हिरिद छँ स्योन छँ सरस्वती स्वपसः सदन्तु.. (३३)
हमारे यज्ञ में भारती देवी, इड़ा देवी और सरस्वती देवी पधारने की कृपा
करें. तीनों देवियां मनुष्यों को चेताने और कुश के आसन पर विराजने की कृपा
करें. (३३)
य ऽ इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपि छँ शद्भुवनानि विश्वा.
तमद्य होतरिषितो यजीयान् देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान्.. (३४)
हे यज्ञकर्ता विद्वान्! आज आप त्वष्टा देव की पूजा करें, जो स्वर्गलोक,
पृथ्वीलोक आदि सभी लोकों की रचना करते हैं. (३४)
उपावसृज त्मन्या समञ्जन् देवानां पाथ ऽ ऋतुथा हवीछंषि.
वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन.. (३५)
हे यजमानो! आप देवताओं को पाथेय प्रदान कीजिए. आप देवताओं की
आहुतियों को मधुर घी से सींचिए. वनस्पति देव, शमिता देव और अग्नि इन हवियों
को ग्रहण करने की कृपा करें. (३५)
सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानांमभवत् पुरोगाः.
अस्य होतुः प्रदिश्यृतस्य वाचि स्वाहाकृत छँ हविरदन्तु देवाः.. (३६)
यजुर्वेद - ३४९

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
हे अग्नि! आप उत्पन्न होते ही देवताओं का नेतृत्व करते हैं. आप देवताओं
का आह्वान करते हैं. आप पूर्व दिशा में ज्योति स्वरूप स्थित हैं. देवगण आप के
मुख में स्वाहाकार रूप से समर्पित आहुति ग्रहण करते हैं. ( ३६ )
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या ऽ अपेशसे. समुषद्भिरजायथाः.. (३७)
हे अग्नि! आप अज्ञानी को ज्ञानी बनाते हैं. आप अपरूप को सुंदर रूप प्रदान
करते हैं. आप उषा देवी के साथ उत्पन्न होते हैं. ( ३७ )
जीमूतस्येव भवति प्रतीकं यद्वर्मी याति समदामुपस्थे.
अनाविद्धया तन्वा जय त्व १७ स त्वा वर्मणो महिमा पिपर्तु.. (३८)
युद्ध के लिए जाते हुए कवचधारी बादल की भांति शोभित होते हैं. वीर
घायल हुए बिना जीतें. वह आप की कवच की महिमा आप की रक्षा करने की
कृपा करें. ( ३८ )
धन्वना गा धन्वनाजिं जयेम धन्वना तीव्राः समदो जयेम.
धनुः शत्रोरपकामं कृणोति धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम.. (३९)
धनुष से हम गायों को जीतें. धनुष से हम सदा युद्ध व मार्ग जीतें. धनुष शत्रु
का बुरा करने वाला हो. धनुष से हम सारी प्रदिशाओं को जीतें. ( ३९ )
वक्ष्यन्तीवेदा गनीगन्ति कर्णं प्रिय १७ सखायं परिषस्वजाना.
योषेव शिङ्क्ते वितताधि धन्वञ्ज्या इय १७ समने पारयन्ती.. (४०)
धनुष की प्रत्यंचा को योद्धा कान तक खींचता है. उस समय ऐसा लगता है,
जैसे योद्धा उस का मित्र है. वह उस के कान में कुछ कहना चाहती है. वह प्रत्यंचा
युद्ध में विजय दिलाने वाली है. वह प्रत्यंचा धनुष पर चढ़ कर अत्यंत आवाज करती
है. बाण उस का मित्र है. वह उस से मिलती है. ( ४० )
ते आचरन्ती समनेव योषा मातेव पुत्रं बिभृतामुपस्थे.
अप शत्रून् विध्यता १७ संविदाने आर्नी इमे विष्फुरन्ती अमित्रान्.. (४१)
जैसे मां बेटे को गोद में लेती है, वैसे ही प्रत्यंचा बाण को धारण करती है. यह
प्रत्यंचा समान मन वाली स्त्री जैसा आचरण करती है. यह डोरी शत्रुओं का संहार करे.
यह डोरी झनझनाती हुई अमित्रों का विनाश करने की कृपा करे. ( ४१ )
बह्वीनां पिता बहुरस्य पुत्रश्चिश्चा कृणोति समनावगत्य.
इषुधिः सङ्कः पृतनाश्च सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः.. (४२)
यह तरकस बहुतों का पिता है. बहुत से इस के पुत्र हैं. इस के संरक्षण में
रहते हैं. तरकस पीठ पर बंधता है. यह सेना के सभी योद्धाओं पर विजय पाता
है. ( ४२ )
३५० - यजुर्वेद

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
रथे॑ ति॒ष्ठन् न॑यति वा॒जिनः॑ पु॒रो यत्र॑ यत्र का॒मय॑ते सुषा॒रथिः॑..
अ॒भीशू॑नां महि॒मानं॑ पनायत॒ मनः॑ प॒श्चाद॑नु॒ यच्छ॑न्ति र॒श्मयः॑.. (४३)
रथ पर बैठा हुआ अच्छा सारथी जहांजहां चाहता है, वहांवहां अश्वों को ले
जाता है. लगाम की भी प्रशंसा की जानी चाहिए. वे घोड़ों के मन को अपने नियंत्रण
में रखती हैं, जहां चाहती हैं, वही उन्हें ले कर जाती हैं. (४३)
ती॒व्रान् घोषा॑न् कृण्वते वृषपा॒णयो॑श्वा॒ रथे॑भिः स॒ह वा॒जय॑न्तः..
अव॒क्राम॑न्तः प्रप॒दैरि॒मित्रान्॑ क्षि॒णन्ति॒ शत्रूँ १॒ र॒नप॑व्ययन्तः.. (४४)
घोड़ों की लगाम जिन के हाथ में है, वे लोग तीव्र घोष करते हैं. घोड़े रथ के साथ
जाते हैं. वे अपने पैरों से शत्रुओं को रौंदें. अश्व शत्रुओं का नाश करते हैं. (४४)
र॒थ॒वाह॑न॒ ᳪ॒ ह॒विर॑स्य॒ नाम॒ यत्रा॑यु॒धं निहि॑तमस्य॒ वर्म॑.
तत्रा॒ रथमुप॑ श॒ग्मं ᳪ॒ सदे॑म विश्वा॒हा व॒य ᳪ॒ सु॑मन॒स्यमा॑नाः.. (४५)
रथ वाहन इस का नाम है, जहां आयुध रखे हैं, जहां कवच रखे हैं, अच्छे मन
वाले होते हुए हम सभी इस रथ में बैठें. (४५)
स्वा॒दु॒ष ᳪ॒षदः॑ पि॒तरो॑ वयो॒धाः कृ॑च्छ्रे॒श्रितः॒ शक्ती॑वन्तो गभी॒राः.
चि॒त्रसे॑ना॒ ऽ इषु॑बला॒ ऽ अमृ॑ध्राः स॒तोवी॑रा॒ ऽ उ॒रवो॑ व्रातसा॒हाः.. (४६)
हमारे रथ सदन में रहने वाले, पालक, आयुधारी, संरक्षी, सहनशील, शक्तिमान,
गंभीर, अच्छी सेना से संपन्न व अतीव बलशाली हैं. वे संकल्पशील और शत्रुओं का
मुकाबला करने वाले हैं. (४६)
ब्रा॒ह्म॒णासः॑ पि॒तरः॑ सोम्या॑सः॒ शिवे॑ नो॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॑ने॒हसा॑.
पू॒षा नः॑ पातु दुरि॒तादृ॑तावृधो॒ रक्षा॒ माकि॑र्नो अ॒घश॑ ᳪ॒ स ई॑शत.. (४७)
ब्राह्मणगण, पितरगण, व सोमरस पीने वाले हमारी रक्षा करें. कल्याणकारी
देव हमारी रक्षा करें. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक हमें पापों से रोकें. पूषा देव हमारी
रक्षा करें, अवरोधों व पापों को हम से दूर करें. कोई पापी हम पर शासन न कर
पाए. (४७)
सु॒प॒र्णं व॑स्ते मृ॒गो अ॑स्या॒ दन्तो॒ गोभिः॒ संन॑द्धा पतति॒ प्रसू॑ता.
यत्रा॒ नरः॒ सं च॒ वि च॒ द्रव॑न्ति॒ तत्रा॒स्मभ्य॒मिष॑वः॒ शर्म॑ य ᳪ॒ सन्.. (४८)
बाण अच्छा पंख धारता है. इस के दांत शत्रुओं को ढूंढ़ लेते हैं. यह शत्रुओं पर
गिरता है. जहां कहीं शत्रु जाते हैं, वहां यह शत्रुओं पर गिरता है. बाण हमारे लिए
अहानिकर व कल्याणकारी हों. (४८)
ऋजी॑ते॒ परि॑ वृङ्धि नो॒श्मा भ॑वतु नस्त॒नूः.
सोमो॒ अधि॑ ब्रवीतु नोदि॑तिः॒ शर्म॑ यच्छतु.. (४९)
यजुर्वेद - ३५१

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
हे बाण! आप सरल रहिए. आप हम पर मत गिरिए. हमारे तन पत्थर की तरह
सख्त हो जाएं. सोम देव हमारी ओर बोलें. अदिति देव हमें सुख देने की कृपा
करें. (४९)
आ जङ्घन्ति सान्वेषां जघनाँ २ उप जिघ्नते.
अश्वाजनि प्रचेतसोश्वान्तसमत्सु चोदय.. (५०)
हे अश्व प्रेरक! चाबुक आप घोड़ों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दें. चेते हुए मन
वाले घुड़सवार घोड़ों के उभरे अंग पर चोट करते हैं. उन के पुट्ठों पर चाबुक
चलाते हैं. चाबुक घोड़ों को प्रेरित करने वाले हों. (५०)
अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः.
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमा ँस् सं परि पातु विश्वतः.. (५१)
सांप की तरह बाहु से लिपटता है. प्रत्यंचा के प्रहार को हटाता है. विद्वान्
वीर पुरुष सब की सब ओर से रक्षा करता है. वीर सभी शत्रुओं को मार कर रक्षा
करता है. (५१)
वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया ऽ अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः.
गोभिः सन्नद्धो असि वीडयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि.. (५२)
रथ वनस्पति (लकड़ी) से बना हुआ है. रथ हमारा मित्र हो. सुवीर इस के
द्वारा युद्ध में पार पाए. हम गायों से जुड़े रहें. हम वीरतापूर्वक स्थित रहें. वीर सभी
को जीत सकें. (५२)
दिवः पृथिव्याः पर्योज उद्धृतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृत ँस् सहः.
अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्र ँस् हविषा रथं यज.. (५३)
हे पुरोहितो! आप स्वर्ग और पृथ्वी के तेज को सर्वत्र फैलाइए. वनस्पति से उगे
प्राप्त हुए तेज को सर्वत्र फैलाइए. जल के साथ प्राप्त हुए तेज को सर्वत्र फैलाइए.
इंद्र के वज्र की तरह हम रथ को यज्ञीय कार्य में लगाएं. रथ सूर्य की किरणों के
समान चमकता है. (५३)
इन्द्रस्य वज्रो मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः.
सेमां नो हव्यदातिं जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गृभाय.. (५४)
हे रथ! आप दिव्य, इंद्र के वज्र जैसे व मरुतों की सैन्यशक्ति की भांति दृढ़ हैं.
आप मित्र देव के गर्भ व वरुण देव की नाभि हैं. रथ में बैठे देवता हमारे द्वारा भेंट
किए गए हवि को ग्रहण कर के तृप्त होने की कृपा करें. (५४)
उप श्वासय पृथिवीमुत द्यां पुरुत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत्.
स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयो अप सेध शत्रून्.. (५५)
३५२ - यजुर्वेद 632/22