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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
आदि समर्पित कर रहे हैं. आप इन सब को स्वीकारने की कृपा कीजिए. ( २९ )
बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम्.
येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो देवं देवाय जागृवि.. ( ३० )
हे मरुद्गण! इंद्र देव वृत्रहंता है. आप उन के लिए बृहत्साम गाइए, जिन्होंने
ज्योति उत्पन्न की, अन्न की बढ़ोत्तरी की, देवों को देवों के लिए जाग्रत
किया. ( ३० )
अध्वर्वो अद्रिभिः सुत ष्यं सोमं पवित्र ऽ आनय. पुनीहीन्द्राय पातवे.. ( ३१)
हे अध्वर्यु! आप पत्थरों से कूट कर निचोड़े गए पवित्र सोम को अपने पुत्रों के
लिए लाइए. इंद्र देव के पीने के लिए आप इसे पवित्र कीजिए. ( ३१ )
यो भूतानामधिपतिर्यस्मिँल्लोका ऽ अधि श्रिताः.
य ऽ ईशे महतो महाँस्तेन गृह्णामि त्वामहं मयि गृह्णामि त्वामहम्.. (३२)
जो प्राणियों के अधिपति हैं, सब लोक जिस के आश्रित हैं, जो ईश्वर हैं,
महान् हैं, हम उस महान् को ग्रहण करते हैं. आप हम को ग्रहण कीजिए. हम आप
को ग्रहण करते हैं. ( ३२ )
उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्ण ऽ एष ते योनिरश्विभ्यां
त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्णे.. ( ३३)
हे ओषधि रूप रस! आप को दोनों अश्विनीकुमारों के लिए उपयाम में ग्रहण
किया गया है. आप को सरस्वती के उत्तम संरक्षण हेतु ग्रहण किया गया है. आप
को इंद्र के उत्तम संरक्षण हेतु ग्रहण किया गया है. यह अश्विनीकुमार, सरस्वती देवी
और इंद्र देव का मूल स्थान है. अश्विनीकुमार, सरस्वती देवी और इंद्र देव की कृपा
से हमारा संरक्षण हो. ( ३३ )
प्राणपा मे अपानपाश्चक्षुष्पाः श्रोत्रपाश्च मे.
वाचो मे विश्वभेषजो मनसोसि विलायकः.. ( ३४)
हे ओषधे! आप हमारे प्राण, अपान, नेत्र, कर्ण और वाणी रक्षक हैं, आप सब
के वैद्य हैं. आप मन का विलय करने की कृपा करें. ( ३४ )
अश्विनकृतस्य ते सरस्वतिकृतस्येन्द्रण सुत्राम्णा कृतस्य.
उपहूत ऽ उपहूतस्य भक्षयामि.. (३५)
हे ओषधे! अश्विनी देवों द्वारा संस्कार किए गए, सरस्वती देवी द्वारा पुष्ट किए
गए, इंद्र देव द्वारा उत्पन्न किए गए, आप को हम आमंत्रित करते हैं. आप का हम
सेवन करते हैं. ( ३५ )
२६० – यजुर्वेद

पूर्वाध [L1R] बीसवां अध्याय

पूर्वाध [L1_R] बीसवां अध्याय
समिद्ध ऽ इन्द्र ऽ उषसामनीके पुरोरुचा पूर्वकृद्वावृधानः.
त्रिभिर्देवैस्त्रि १४ शता वज्रबाहुर्जघान वृत्रं वि दुरो ववार.. (३६)
इंद्र देव समिधावान हैं. सब से पहले उषा काल में पूर्व दिशा को प्रकाशित
करते हैं. पहले किए की बढ़ोतरी करते हैं. तीन के तिगुने सैकड़ों देवों के साथ आगे
बढ़ते हैं. इंद्र देव ने वृत्र को मारा और द्वार खोले. ( ३६ )
नराश १४ सः प्रति शूरो मिमानस्तनूनपात्प्रति यज्ञस्य धाम.
गोभिर्वपावान् मधुना समजन् हिरण्यैश्चन्द्री यजति प्रचेताः.. (३७)
आप सब से प्रशंसित, सुखवीर, शरीर के रक्षक व यज्ञ के धाम हैं. गायों का
दूध पीने वाले व मीठे घी से पुष्ट हैं. सुनहरी कांति वाले का उत्तम चित्त वाले
यजमान यज्ञ करते हैं. ( ३७ )
ईडितो देवैर्हरिवाँ २ अभिष्टिराजुह्वानो हविषा शर्धमानः.
पुरन्दरो गोत्रभिद्वज्रबाहुरा यातु यज्ञमुप नो जुषाणः.. (३८)
इंद्र देवों से उपासित, गतिवान, अभीष्ट, यज्ञ में पूजनीय, हवि हेतु आमंत्रित,
शत्रुनगरी भेदक, गोनाशक के नाशक व वज्रबाहु है. इंद्र देव हमारे यज्ञ का सेवन
करने की कृपा करें. ( ३८ )
जुषाणो बर्हिर्हरिवान् न ऽ इन्द्रः प्राचीन १४ सीदत् प्रदिशा पृथिव्याः.
उरुप्रथाः प्रथमान १४ स्योनमादित्यैरक्तं वसुभिः सजोषः.. (३९)
इंद्र देव तेजोमय, वैभववान, सब के अभीष्ट व प्राचीन हैं. आप पृथ्‍वी की दिशा
में विराजिए. आप आदित्यों और वसुओं के साथ हमारे यज्ञ में पधारने की कृपा
कीजिए. विशाल कुश के आसन पर विराजिए. ( ३९ )
इन्द्रं दुरः कवष्यो धावमाना वृषाणं यन्तु जनयः सुपत्नीः.
द्वारो देवीरभितो वि श्रयन्ता १४ सुवीरा वीरं प्रथमाना महोभिः.. (४०)
जैसे विदुषी और श्रेष्ठ पत्नी पति के साथ शोभा पाती है, वैसे ही देवताओं से
शोभित वीरों से युक्त विशाल द्वारों वाले प्रख्यात इंद्र देव विधिविधान से पूर्ण यज्ञ
शाला में पधारने की कृपा करें. ( ४० )
उषासानक्ता बृहती बृहन्तं पयस्वती सुदुघे शूरमिन्द्रम्.
तन्तुं ततं पेशसा संवयन्ती देवानां देवं यजतः सुरुक्मे.. (४१)
उषा देवी विशाल दिन और रात को चमकाती हैं. वे महान् व रसीली हैं. देवों
के देव इंद्र देव को भी दीप्तिमान बनाती हैं. ( ४१ )
दैव्या मिमाना मनुषः पुरुत्रा होताराविन्द्रं प्रथमा सुवाचा.
मूर्धन् यज्ञस्य मधुना दधाना प्राचीनं ज्योतिर्हविषा वृधातः.. (४२)
[L47_R] यजुर्वेद – २६१

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
दिव्य कार्य करने वाले यजमान श्रेष्ठ प्रार्थनाओं से यज्ञ के मूर्धन्य देव इंद्र देव
की स्थापना करते हैं. होता पूर्व दिशा में स्थित हैं. वे हवि से अग्नि की बढ़ोतरी करते
हैं. अग्नि ज्योतिमान हैं. ( ४२ )
तिस्रो देवीर्हविषा वर्धमाना ऽ इन्द्रं जुषाणा जनयो न पत्नी:.
अच्छिन्नं तन्तुं पयसा सरस्वतीडा देवी भारती विश्वतूर्तिः.. ( ४३ )
तीनों देवियां हवि से बढ़ोतरी पाती हैं. वे पत्नी के समान इंद्र देव को पोसती हैं.
वे हमारे तंतु को न तोड़ें. सरस्वती देवी, भारती देवी और इड़ा देवी दूध और हवि से
हमारा यज्ञ पूर्ण करें. सारे विश्व को विघ्नों से बचाएं. ( ४३ )
त्वष्टा दधच्छूष्ममिन्द्राय वृष्णेपाकोचिष्टुर्यशसे पुरूणि.
वृषा यजन्वूषणं भूरिरेता मूर्धन्यज्ञस्य समनक्तु देवान्.. (४४)
त्वष्टा देव इंद्र देव का बल और परिपक्व धन को धारें. यश से पूजे जाएं.
यज्ञ में वर्षा करें और शक्ति दें. देव समान मन वाले हों. यज्ञ के मूर्धन्य देवों को
तृप्त करें. ( ४४ )
वनस्पतिरवसृष्टो न पाशैस्तमन्या समञ्जञ्छमिता न देव:.
इन्द्रस्य हव्यैर्जठरं पृणानः स्वदाति यज्ञं मधुना घृतेन.. (४५)
इंद्र देव हवि से जठराग्नि को पूर्ण करें. यज्ञ को मीठे घी से स्वादिष्ट
बनाएं. देवगण बंधनहीन हैं. अपनी सामर्थ्य से प्रकाशमान हैं. वनस्पति के देवता
हैं. ( ४५ )
स्तोकानामिन्दुं प्रति शूर ऽ इन्द्रो वृषायमाणो वृषभस्तुराषाट्.
घृतप्रुषा मनसा मोदमानाः स्वाहा देवा ऽ अमृता मादयन्ताम्.. (४६)
इंद्र देव शत्रुओं के प्रति गर्जना करते हैं. वे शूरवीर, शक्तिशाली शत्रुओं के
नाशक और घी की आहुति से मन से प्रसन्न होते हैं. इंद्र देव हेतु स्वाहा. इंद्र देव
अमृत से सभी को आनंदित करें. ( ४६ )
आ यात्विन्द्रोवस ऽ उप न ऽ इह स्तुतः सधमादस्तु शूरः.
वावृधानस्तवर्षीयस्य पूर्वीर्र्द्यौर्न क्षत्रमभिभूति पुष्यात्.. (४७)
इंद्र देव हमारी रक्षा के लिए हमारे पास आएं. वह यहां बैठें. उन की यहां स्तुति
की जाए. उन के पराक्रम से बड़ेबड़े कार्यों की बढ़ोतरी हुई. वे हमारे बल को
स्वर्गलोक जैसा विस्तृत व पुष्ट करें. ( ४७ )
आ न ऽ इन्द्रो दूरादा न ऽ आसादभिष्टिकृदवसे यासदुग्रः.
ओजिष्ठेभिर्नृपतिर्वज्रबाहुः सङ्गे समत्सु तुर्वणिः पृतन्यून्.. (४८)
२६२ – यजुर्वेद

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
इंद्र देव दूर या पास जहां कहीं भी हों हमारे पास पधारने की कृपा करें. वे उग्र,
बलवान, अभीष्टपूरक, ओजिष्ठ व राजा हैं. वे वज्र जैसी मजबूत भुजा वाले हैं.
युद्धों में शत्रुओं का मर्दन करने वाले हैं. (४८)
आ न ऽ इन्द्रो हरिभिर्यात्वच्छावाॅचीनोवसे राधसे च.
तिष्ठाति वज्री मघवा विरप्शीमं यज्ञमनु नो वाजसातौ.. (४९)
इंद्र देव अपने घोड़ों से हमारी रक्षार्थ हमें संपत्ति देने के लिए पधारें. वे वज्र
वाले और धनवान हैं. वे यज्ञशाला में पधारें और अपनी अन्नमयी हवि स्वीकारने
की कृपा करें. (४९)
त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र १४ हवे हवे सुहव १४ शूरमिन्द्रम्.
ह्वयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्र १४ स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः... (५०)
इंद्र देव त्राता हैं. हम बारबार उन का आह्वान करते हैं. प्रत्येक हवन में उन का
आह्वान करते हैं. हम शूरवीर का अच्छी तरह आह्वान करते हैं. वे कल्याणकारी,
धनवान और धारणशील हैं. (५०)
इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ २ अवोभिः सुमृडीको भवतु विश्ववेदाः.
बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (५१)
इंद्र देव अच्छे रक्षक, बहुत सहायकों वाले, सर्व वैभव संपन्न व सर्वज्ञ हैं. वे
हम से द्वेष रखने वाले को बाधित करें और हमें निर्भय बनाएं. उन की कृपा से हम
अच्छे पराक्रम के पालक हो जाएं. (५१)
तस्य वय १४ सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.
स सुत्रामा स्ववाँ २ इन्द्रो अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु.. (५२)
इंद्र देव के प्रति हम सुमतिपूर्वक यज्ञ करने वाले, भद्र व अच्छे मन वाले हो
जाएं. वे अच्छे रक्षक व सहायकों वाले हैं. वे दूर होते हुए भी हमारा दुर्भाग्य दूर
करने के लिए शीघ्र ही हमारे पास आएं. (५२)
आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः.
मा त्वा के चिन्नि यमन् विं न पाशिनोति धन्वेव ताँ २ इहि.. (५३)
इंद्र देव मोर के पंख जैसे रोमों वाले हैं. अपने घोड़ों से यहां आने की कृपा
करें. कोई भी जाल फैला कर आप को पाश में बांध न सके. आप बड़े धनुर्धारी
की तरह यहां पधारिए. (५३)
एवेदिन्द्रं वृषणं वज्रबाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः.
स न स्तुतो वीरवद्धात्तु गोमद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः... (५४)
यजुर्वेद - २६३

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
हे इंद्र देव! आप बलवान व वज्र जैसी भुजाओं वाले हैं. वसिष्ठ ऋषि के वंशज
मंत्रों से आप की अभ्यर्थना कर रहे हैं. वे इंद्र देव हमारे वीरों व गोधन को अपने
संरक्षण में लें. वे सदा हमारा कल्याण करें. (५४)
समिद्धो अग्निरश्विना तप्तो घर्मो विराट् सुतः.
दुहे धेनुः सरस्वती सोम १७४ शुक्क्रमहेन्द्रियम्.. (५५)
अग्नि को समिधा से प्रज्वलित किया गया है. अश्विनी देव को दीप्यमान
बनाया गया है. सरस्वती देवी गाय दुहने की तरह उन के लिए चमकीले महान् सोम
का दोहन करती हैं. (५५)
तनूपा भिषजा सुतेश्विनोभा सरस्वती.
मध्वा रजा १७४ सीन्द्रियमिन्द्राय पर्थिभिर्वहान्.. (५६)
दोनों वैद्य अश्विनीकुमार हमारे तन के रक्षक हैं. देवी सरस्वती मधुर सोमरस
को अनेक मार्गों से वहन करती हुई इंद्र देव के लिए ले जाती हैं. (५६)
इन्द्रायेन्दु १७४ सरस्वती नराश १७४ सेन नग्नहुम्.
अधातामश्विना मधु भेषजं भिषजा सुते.. (५७)
यजमान ने सोमरस तैयार किया. देवी सरस्वती ने उस को महान् ओषधि से
युक्त बनाया. वैद्य अश्विनीकुमारों ने ओषध स्वरूप उस को धारण किया. (५७)
आजुह्वाना सरस्वतीन्द्रायेन्द्रियाणि वीर्यम्.
इडाभिरश्विनाविष १७४ समूर्ज १७४ स १७४ रयिं दधुः... (५८)
सरस्वती देवी इंद्र देव का आह्वान करने वाली हैं. सरस्वती देवी ने उन के लिए
इंद्रियों में पराक्रम स्थापित किया. इड़ा देवी और अश्विनीकुमारों ने उन के लिए
ऊर्जा और धन धारण किया. (५८)
अश्विना नमुचेः सुत १७४ सोम १७४ शुक्क्रं परिस्रुता.
सरस्वती तमा भरद्बर्हिषेन्द्राय पातवे.. (५९)
अश्विनी देवों ने निचोड़े गए चमकीले सोम को ओषधियों के साथ मिलाया.
सरस्वती ने नमुची राक्षस से सोम का हरण किया. इंद्र देव के पीने के लिए कुश के
आसन पर स्थापित किया. (५९)
कवष्यो न व्यचस्वतीरश्विभ्यां न दुरो दिशः.
इन्द्रो न रोदसी उभे दुहे कामान्त्सरस्वती.. (६०)
अश्विनी, सरस्वती और इंद्र देव ने विराट् यज्ञ से स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक
दोनों का दोहन किया. सारी दिशाओं से अपनी कामनाओं का दोहन किया. (६०)
२६४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
उषासानक्तमश्विना दिवेन्द्र  सायमिन्द्रियैः.
सञ्जानाने सुपेशसा समज्याते सरस्वत्या.. (६१)
उषा, रात्रि, दिन और सायंकाल में इंद्र देव को अश्विनीकुमार देवी सरस्वती
के साथ विशेष बल से युक्त करते हैं. (६१)
पातं नो अश्विना दिवा पाहि नक्त  सरस्वति.
दैव्या होतारा भिषजा पातमिन्द्र  सचा सुते.. (६२)
हे अश्विनी देव! आप दिन में हमारी रक्षा करें. हे सरस्वती देवी! आप रात्रि में
हमारी रक्षा करें. वैद्य अश्विनीकुमार दिव्य होता हैं. वे सचेत सोम के द्वारा इंद्र देव
की रक्षा करें. (६२)
तिस्रस्त्रेधा सरस्वत्यश्विना भारतीडा.
तीव्रं परिस्रुता सोममिन्द्राय सुषुवुर्मदम्.. (६३)
तीन प्रकार से अश्विनी सरस्वती, भारती और इड़ा देवी ने तीव्रता से सोम को
इंद्र देव के लिए चुआया है. यह सोम ओषधि से युक्त हैं. (६३)
अश्विना भेषजं मधु भेषजं नः सरस्वती.
इन्द्रे त्वष्टा यशः श्रिय  रूप  रूपमधुः सुते.. (६४)
अश्विनी देव व सरस्वती देवी मीठी ओषधि हमें दें. त्वष्टा देव ने इंद्र देव हेतु
यश, शोभा, रूप, मधु और सोम को धारण किया है. (६४)
ऋतुथेन्द्रो वनस्पतिः शशमानः परिस्रुता.
कीलालमश्विभ्यां मधु दुहे धेनुः सरस्वती.. (६५)
इंद्र देव ऋतु के अनुसार वनस्पति और निचोड़ी हुई सामग्रियों से बढ़ोतरी को
प्राप्त हुए. अश्विनी देव और सरस्वती देवी ने गाय का दूध निकालने के समान इन
के लिए मधुर रस दुहे. (६५)
गोभिर्न सोममश्विना मासरेण परिस्रुता.
समधात  सरस्वत्या स्वाहेन्द्रे सुतं मधु.. (६६)
हे अश्विनीकुमारो! आप दोनों देवी सरस्वती, गाय के दूध के साथ व सोमरस
को ओषधियों के साथ मिलाइए. वह रस इंद्र देव को अर्पित कीजिए. वे इस आहुति
को भलीभांति ग्रहण करने की कृपा करें. (६६)
अश्विना हविरिन्द्रियं नमुचेर्धिया सरस्वती.
आ शुक्रमसुराद्वसु मघमिन्द्राय जभ्रिरे.. (६७)
सरस्वती देवी ने अश्विनीकुमार के साथ बुद्धिपूर्वक नमुचि राक्षस से हवि और
यजुर्वेद - २६५

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
धन पाया. उस हवि और श्रेष्ठ धन को इंद्र देव के लिए अर्पित किया. ( ६७ )
यमश्विना सरस्वती हविषेन्द्रमवर्धयन्.
स बिभेद बलं मघं नमुचावासुरे सचा.. ( ६८)
अश्विनीकुमार और सरस्वती देवी ने उस हवि से इंद्र देव की बढ़ोत्तरी की.
सचेत इंद्र देव ने उस से नमुचि असुर के बल को भेदा. ( ६८ )
तमिन्द्रं पशवः सचाश्विनोभा सरस्वती.
दधाना ऽ अभ्यनूषत हविषा यज्ञ ऽ इन्द्रियैः.. ( ६९)
अश्विनीकुमार और सरस्वती देवी ने इंद्र देव को पशुओं के दूध, दही और घी
से बनी हवि अर्पित की. उस हवि से उन का बल और यज्ञ बढ़ाया. उन दोनों की
सब प्रकार से प्रशंसा हुई. ( ६९ )
य ऽ इन्द्र इन्द्रियं दधुः सविता वरुणो भगः.
स सुत्रामा हविष्पतिर्यजमानाय सचत.. ( ७०)
सविता देव, वरुण देव और भग देव ने इंद्र देव की इंद्रियों में बल धारण किया.
इंद्र देव ने हविपति की अच्छी तरह रक्षा की. यजमान की मनोकामनाएं पूरी कीं. ( ७० )
सविता वरुणो दधद्यजमानाय दाशुषे.
आदत्त नमुचेर्वसु सुत्रामा बलमिन्द्रियम्.. ( ७१)
सविता देव एवं वरुण देव ने यजमानों की प्रसन्नता हेतु धन और बल धारा.
इंद्र देव ने नमुचि राक्षस से रक्षा और बल तथा धन ले कर यजमानों को समृद्ध
बनाया. ( ७१ )
वरुणः क्षत्रमिन्द्रियं भगेन सविता श्रियम्.
सुत्रामा यशसा बलं दधाना यज्ञमाशत.. (७२)
यजमानों को क्षत्रियोचित बल और इंद्रियों की सामर्थ्य देने वाले वरुण देव
हमारे इस यज्ञ में पधारने की कृपा करें. सौभाग्य और ऐश्वर्यदाता सविता देव तथा
यश और बलधारी इंद्र देव हमारे इस यज्ञ में पधारने की कृपा करें. ( ७२ )
अश्विना गोभिरिन्द्रियमश्वेभिर्वीर्यं बलम्.
हविषेन्द्र १४ सरस्वती यजमानमवर्धयन्.. ( ७३)
अश्विनीकुमारों और देवी सरस्वती ने गायों, घोड़ों और हवियों से इंद्र देव और
यजमान के पराक्रम शक्ति और वैभव की बढ़ोत्तरी की. ( ७३ )
ता नासत्या सुपेशसा हिरण्यवर्तनी नरा.
सरस्वती हविष्मतीन्द्र कर्मसु नोवत.. (७४)
२६६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
सुनहरे पथ पर घूमने वाले विशिष्ट श्रेष्ठ मनुष्य जैसे अश्विनीकुमार देवी
सरस्वती और इंद्र देव हम मनुष्यों के यज्ञ में पधारें. हवि ग्रहण करें. सब प्रकार से
हमारी रक्षा करें. ( ७४ )
ता भिषजा सुकर्मणा सा सुदुघा सरस्वती.
स वृत्रहा शतक्रतुरिन्द्राय दधुरिन्द्रियम्.. (७५)
अश्विनीकुमार वैद्य व सुकर्मा हैं. सरस्वती देवी अच्छा दोहन करने वाली हैं.
वृत्रासुर नाशक सैकड़ों यज्ञ करने वाले इंद्र देव यजमानों के लिए उन की इंद्रियों में
सामर्थ्य प्रदान करें. ( ७५ )
युव १oꣳ सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा.
विपिपानाः सरस्वतीन्द्रं कर्मस्वावत.. (७६)
हे अश्विनीकुमारो ! देवी सरस्वती ! आप युवा हैं. आप नमुचि राक्षस से ओषधि
रस ले कर विभिन्न प्रकार से इंद्र देव को पान कराइए. सब प्रकार से उन की रक्षा
कीजिए. ( ७६ )
पुत्रमिव पितरावश्विनोभेन्द्रावथुः काव्यैर्द १oꣳ सनाभिः.
यत्सुरामं व्यपिबः शचीभिः सरस्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्.. (७७)
हे अश्विनीकुमारो ! आप यजमान की मातापिता द्वारा पुत्र की रक्षा करने
के समान रक्षा करते हैं. इंद्र देव विद्वान् हैं. वे यजमान की प्रार्थनाओं को सुनते
हैं. संग्राम में विपत्तिग्रस्त होने पर अश्विनी देव रक्षा करते हैं. इंद्र देव अपनी
सामर्थ्य से ओषधियों का पान करते हैं, तो सरस्वती देवी आप की स्तुति करती
हैं. ( ७७ )
यस्मिन्नश्वास ऽ ऋषभास ऽ उक्षणो वशा मेषा ऽ अवसृष्टास ऽ आहुताः.
कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हृदा मतिं जनय चारुमग्नये.. (७८)
हे यजमानो ! अग्नि अन्न ग्रहण करने वाले हैं. सोम को ग्रहण करने वाले हैं.
श्रेष्ठ बुद्धि वाले हैं. आप उन के लिए अपना मन शुद्ध कीजिए. आप उन के लिए
अपनी बुद्धि शुद्ध कीजिए. इस से घोड़े सिंचाई योग्य बैल और सुंदर वस्तुओं की
प्राप्ति होती है. ( ७८ )
अहाव्यग्ने हविरास्ये ते स्रुचीव घृतं चम्वीव सोमः.
वाजसनि १oꣳ रयिमस्मे सुवीरं प्रशस्तं धेहि यशसं बृहन्तम्.. (७९)
हे अग्नि ! हम आप का आह्वान करते हैं. हम आप के मुख में हवि भेंट करते
हैं. आप के लिए सुवा में घी और पात्र में सोम रहता है. आप हमें अन्न, धन,
श्रेष्ठवीर, प्रशंसनीय धन, यश व प्रचुर धन प्रदान कीजिए. ( ७९ )
यजुर्वेद - २६७

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
अश्विना तेजसा चक्षुः प्राणेन सरस्वती वीर्यम्.
वाचेन्द्रो बलेनेन्द्राय दधुरिन्द्रियम्.. (८०)
यजमान हेतु अश्विनी देव ने तेज से नेत्र ज्योति प्रदान की. यजमान हेतु सरस्वती
देवी ने प्राण के साथ पराक्रम प्रदान किया. यजमान हेतु इंद्र देव ने वाणी के साथ
इंद्रिय सामर्थ्य धारण की. (८०)
गोमद् षु णासत्याश्वावद्यातमश्विना. वर्ती रुद्रा नृपाय्यम्.. (८१)
अश्विनीकुमारो! गोमय, अश्वमय और श्रेष्ठ राह वाले इस सोमयाग में
पधारने की कृपा कीजिए. आप सत्य में निरत हैं. आप अन्यायियों को पीड़ित
कीजिए. (८१)
न यत्परो नान्तर ऽ आदधर्षदृवृषण्वसू. दुःश १७ सो मर्त्यो रिपुः.. (८२)
हे अश्विनीकुमारो! आप ओषधरस की वर्षा करते हैं. जो दुष्ट हो, जो हमारा
शत्रु हो, वह हमें पीड़ित न करे. (८२)
ता न ऽ आ वोढमश्विना रयिं पिशङ्गरसन्दृशम्. धिष्ण्या वरिवोविदम्.. (८३)
हे अश्विनीकुमारो! आप सब को धारने वाले हो. आप दोनों हमारे लिए पीली
सोने जैसी बढ़ने वाली संपदा प्रदान कीजिए. (८३)
पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती. यज्ञं वष्टु धियावसुः.. (८४)
सरस्वती देवी पवित्र हैं. अन्न द्वारा शक्तिशाली कार्य करने वाली हैं. यज्ञ को
धारें. धन और बुद्धि बरसाएं. (८४)
चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम्. यज्ञं दधे सरस्वती.. (८५)]
सरस्वती देवी सत्य वचन और सत्य मार्ग की प्रेरणादायिनी हैं. सुमतियों को
चेताने वाली हैं. सरस्वती देवी यज्ञ को धारण करें. (८५)
महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना. धियो विश्वा वि राजति.. (८६)
सरस्वती देवी सब की बुद्धियों को विशेष रूप से प्रकाशित करती हैं. सरस्वती
देवी महान् और ज्ञान का समुद्र हैं. वे ज्ञान की पताका फहराती हैं. (८६)
इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता ऽ इमे त्वायवः. अण्वीभिस्तना पूतासः.. (८७)
हे इंद्र देव! आप अद्भुत हैं. आप अपने पुत्रों के यज्ञ में पधारने की कृपा
कीजिए. हम ने अंगुलियों से निचोड़ कर आप के लिए सोमरस को पवित्र बनाया
है. (८७)
इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः. उप ब्रह्माणि वाघतः.. (८८)
२६८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
हे इंद्र देव! आप मनोयोग से हमारे यज्ञ में पधारिए. हम आप के लिए सोमरस
संस्कारित करने वाले हैं. आप आ कर इन हवियों को ग्रहण करने की कृपा
कीजिए. ( ८८ )
इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः. सुते दधिष्व नश्चनः... (८९)
हे इंद्र देव! आप अपने हरि नाम के घोड़ों से आवाजाही करते हैं. आप अपने
पुत्रों के लिए इस हवि को ग्रहण कीजिए. ( ८९ )
अश्विना पिबतां मधु सरस्वत्या सजोषसा.
इन्द्रः सुत्रामा वृत्रहा जुषन्ता ३४ सोम्यं मधु.. (९०)
अश्विनीकुमार देवी सरस्वती के साथ समान मन वाले हों. वे देवी सरस्वती के
साथ मधुर सोमरस का पान करें. इंद्र देव सुरक्षक व वृत्र हंता हैं. वे भी सोमरस का
पान करें. ( ९० )
यजुर्वेद - २६१

इक्कीसवां अध्याय

उत्तरार्ध
इक्कीसवां अध्याय
इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय. त्वामवस्युरा चके.. (१)
हे वरुण देव! हमारी प्रार्थना सुनने की कृपा करें. आज जो हम हवन कर
रहे हैं, उस से हमें सुख प्रदान करें. हम अपनी रक्षा के लिए आप का आह्वान
करते हैं. ( १ )
तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः.
अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश १४ स मा न ऽ आयुः प्र मोषीः.. ( २)
ये यजमान ब्रह्मज्ञानमय ऋचाओं से आप की वंदना कर रहे हैं. आहुतियां अर्पित
कर रहे हैं. उन से आप यजमान पर प्रसन्न होइए. वरुण देव बहुप्रशंसित व देव पूजित
हैं. आप जाग्रत होइए और हमारी आयु क्षीण मत कीजिए. ( २ )
त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अव यासिसीष्ठाः.
यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषा १४ सि प्र मुमुग्ध्यस्मत्.. (३)
हे अग्नि! आप विद्वान् हैं. आप आहुतियों को देवताओं तक पहुंचाने वाले हैं.
आप यज्ञ में पूजित, बहुत दीप्तिमान व पवित्र हैं. आप वरुण देव को हम पर प्रसन्न
कराइए. हमारे सभी द्वेषियों को नष्ट करने की कृपा कीजिए. ( ३ )
स त्वं नो अग्नेवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या ऽ उषसो व्युष्टौ.
अव यक्ष्व नो वरुण १४ रराणो वीहि मृडीक १४ सुहवो न ऽ एधि.. (४)
हे अग्नि! प्रातः अपने रक्षा साधनों सहित हमारे पास पधारिए. हमारी रक्षा करने
व आहुतियों को देवताओं तक पहुंचाने की कृपा कीजिए. आप उन्हें तृप्ति दीजिए.
आप अच्छी तरह बुलाने योग्य हैं. आप इस सुखदायक आहुति को स्वीकारने की
कृपा कीजिए. ( ४ )
महीम् षु मातर १४ सुव्रतानामृतस्य पत्नीमवसे हुवेम.
तुविक्षत्रामजरन्तीमुरूचीं १४ सुशर्माणमदिति १४ सुप्रणीतिम्.. (५)
२७० - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
अदिति देवी महामहिमाशालिनी, माता, सुव्रतों वाली, अमर, कभी वृद्ध नहीं
होने वाली हैं, सुखदायिनी व नीतिज्ञा हैं. हम अपनी रक्षा हेतु उन का आह्वान करते
हैं. ( ५ )
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहस ᳪ सुशर्माणमदिति ᳪ सुप्रणीतिम्.
दैवीं नाव ᳪ स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये.. ( ६ )
अदितिमाता भलीभांति रक्षा करने वाली, पृथ्‍वीलोक से स्वर्गलोक तक
विस्तार वाली, अत्यंत सुखदायिनी, अच्छा आसरा ( आश्रय ) देने वाली, दोषरहित,
मृत्यु का भय दूर करने वाली हैं. अपनेआप चलने वाली, बिना छेदों वाली इस नौका
में आप की कृपा से हम आरोहण करें. हम अपने कल्याण के लिए उस पर चढ़ते
हैं. ( ६ )
सुनावमा रुहेयमस्त्रवन्तीमनागसम्. शतारित्रा ᳪ स्वस्तये.. (७)
यह नाव दोष रहित, बिना छेदों वाली, अपनेआप चलने वाली व सैकड़ों
शत्रुओं से त्राण करने वाली है. हम अपने कल्याण के लिए इस पर आरूढ़ ( चढ़ने )
होने की कृपा करें. ( ७ )
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्. मध्वा रजा ᳪ सि सुक्रतू.. (८)
हे मित्र व वरुण देव! आप हमारे यहां गाय के घी से सींचिए. आप हमारे खेतों
को मधुर अमृत से सींचिए. ( ८ )
प्र बाहवा सिसृतं जीवसे न ऽ आ नो गव्यूतिमुक्षतं घृतेन.
आ मा जने श्रवयतं युवाना श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमा.. (९)
हे मित्र व वरुण देव! आप दोनों देव हमारी प्रार्थना सुनिए. आप अपनी भुजाएं
फैला कर हमें आशीर्वाद व इस जीवन में यश दीजिए. आप हमारे यज्ञ को गाय के
घी से व खेत को मधु अमृत से सींचिए. ( ९ )
शन्नो भवन्तु वाजिनो हवेषु देवताता मितद्रवः स्वर्काः.
जम्भयन्तो ऽ हिं वृक ᳪ रक्षा ᳪ सि सनेम्यस्मद्युयवन्नमीवाः... (१०)
हे मित्र व वरुण देव! आप हमारे लिए सुखदायी होइए. हम आप के लिए
अन्नमय हवि देते हैं. आप हमारे रोग दूर कीजिए. आप हमारे शत्रुओं व राक्षसों का
विनाश कीजिए. आप भेड़िए और ऐसे ही हिंसक जीवों को हम से दूर भगाइए. ( १० )
वाजे वाजेवत वाजिनो नो धनेषु विप्रा ऽ अमृता ऽ ऋतज्ञाः.
अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः... (११)
हे मित्र व वरुण देव! आप ब्राह्मण, अमर व सत्यज्ञ हैं. युद्ध में अन्न, बल तथा
यजुर्वेद - २७१

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
धन प्राप्त कीजिए. आप इस यज्ञ में मधुर रस पीजिए. मदमस्त व तृप्त होइए. देवपथों
से गमन करने की कृपा कीजिए. (११)
समिद्धो अग्निः समिधा सुसमिद्धो वरेण्यः.
गायत्री छन्द ऽ इन्द्रियं त्र्यविर्गौर्वयो दधुः... (१२)
हे अग्नि! आप समिधावान हैं. समिधा से आप को अच्छी तरह प्रदीप्त किया
गया है. आप वरेण्य हैं. तीनों लोक और तीनों अवस्थाएं, अग्नि और गायत्री छंद
आप के शरीर को बल और आयु प्रदान करें. (१२)
तनूनपाच्छुचिव्रतस्तनूपाश्च सरस्वती.
उष्णिहा छन्द ऽ इन्द्रियं दित्यवाड्गौर्वयो दधुः... (१३)
अग्नि तन की रक्षा करने वाले और पवित्र संकल्प वाले हैं. सरस्वती देवी
उष्णिक् छंद और दिव्य हवि को धारण करने वाले अंग हमारे लिए बल और आयु
धारण करने की कृपा करें. (१३)
इडाभिरग्निरीड्यः सोमो देवो अमर्त्यः.
अनुष्टुप्छन्द ऽ इन्द्रियं पञ्चाविर्गौर्वयो दधुः.. (१४)
अग्नि प्रार्थनाओं से प्रसन्न होने योग्य हैं. सोम अमर हैं. अनुष्टुप् छंद और पांचों
इंद्रिय रूपी गायों से हमारे लिए बल तथा आयु धारण करने की कृपा करें. (१४)
सुबर्हिरग्निः पूषण्वान्स्तीर्णबर्हिरमर्त्यः.
बृहती छन्द ऽ इन्द्रियं त्रिवत्सो गौर्वयो दधुः... (१५)
अग्नि कुश के अच्छे आसन वाले, पुष्टिदायी, विस्तृत आकाश को शुद्ध करने
वाले व अमर हैं. बृहती छंद तीन बछड़ों वाली गायों से तथा इंद्रियों से हमारे लिए
बल और आयु धारण करने की कृपा करें. (१५)
दुरो देवीर्दिशो महीर्ब्रह्मा देवो बृहस्पतिः.
पङ्क्तिश्छन्द ऽ इहेन्द्रियं तुर्यवाड्‍गौर्वयो दधुः... (१६)
बृहस्पति देव, दूर की देवियां, महिमाशाली ब्रह्मा देव हमारे लिए बल और
आयु धारण करने की कृपा करें. पंक्ति, छंद, इंद्रियां, प्राणिमात्र का पोषण करने
वाली गायों से हमारे लिए बल तथा आयु धारण करने की कृपा करें. (१६)
उषे यह्वी सुपेशसा विश्वे देवा ऽ अमर्त्याः.
त्रिष्टुप्छन्द ऽ इहेन्द्रियं पष्ठवाड्गौर्वयो दधुः... (१७)
महान् तथा श्रेष्ठ स्वरूप वाली उषा देवी, सभी देवता एवं अमर देवगण
हमारे लिए बल एवं आयु धारण करने की कृपा करें. त्रिष्टुप् छंद इंद्रियां पोषण
२७२ – यजुर्वेद 632/17

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
का भार वहन करने वाली गाय हमारे लिए बल एवं आयु धारण करने की कृपा
करें. ( १७ )
दैव्या होतारा भिषजेन्द्रेण सयुजा युजा.
जगती छन्द ऽ इन्द्रियमनड्वागौर्वयो दधु:... ( १८ )
देवताओं के होता, वैद्य इंद्र देव के साथ जुड़ कर रहने वाले हमारे लिए बल और
आयु धारण करने की कृपा करें. जगती छंद, इंद्रियां, मन की गाड़ी को खींचने वाली
गाय हमारे लिए बल और आयु को धारण करने की कृपा करें. ( १८ )
तिस्र ऽ इडा सरस्वती भारती मरुतो विश:.
विराट् छन्द ऽ इहेन्द्रियं धेनुर्गौर्न वयो दधु:... ( १९ )
इड़ा देवी, सरस्वती देवी और भारती देवी तीनों देवियां, मरुद्गण हमारे लिए
बल और आयु धारण करने की कृपा करें. विराट् छंद, इंद्रियां तथा दूध देने वाली
गाय हमारे लिए बल एवं आयु धारण करने की कृपा करें. ( १९ )
त्वष्टा तुरीपो अद्भुत ऽ इन्द्राग्नी पुष्टिवर्धना.
द्विपदा छन्द ऽ इन्द्रियमुक्षा गौर्न वयो दधु:... ( २० )
त्वष्टा देव तेज गति वाले, विलक्षण व मोक्षदाता हैं. इंद्र देव एवं अग्नि
पुष्टिवर्द्धक हैं. द्विपद छंद, इंद्रियां मोक्षदायी गायें हमारे लिए बल और आयु धारण
करने की कृपा करें. ( २० )
शमिता नो वनस्पति: सविता प्रसुवन् भगम्.
ककुप्छन्द ऽ इहेन्द्रियं वशा वेहद्वयो दधु:... ( २१ )
वनस्पति हमारे लिए शांतिदायी हो. सविता देव हमारे लिए सौभाग्य उपजाने
वाले हों. ककुप् छंद, इंद्रियां एवं अनुशासित गौ हमारे लिए आयु तथा बल धारण
करने की कृपा करे. ( २१ )
स्वाहा यज्ञं वरुण: सुक्षत्रो भेषजं करत्.
अतिच्छन्दा ऽ इन्द्रियं बृहदृषभो गौर्वयो दधु:... ( २२ )
यज्ञ के लिए स्वाहा. वरुण देव के लिए स्वाहा. श्रेष्ठ क्षत्रिय के लिए स्वाहा.
ओषधियों के लिए स्वाहा. अतिच्छंदा छंद, इंद्रियां विशाल बैल वाली गाय हमारे
लिए बल एवं आयु धारण करने की कृपा करें. ( २२ )
वसन्तेन ऋतुना देवा वसवस्त्रिवृता स्तुता:.
रथन्तरेण तेजसा हविरिन्द्रे वयो दधु:... ( २३ )
वसुदेवगणों की वसंत ऋतु तथा त्रिवृत छंद से स्तुति की गई है. वसुदेवगण की
यजुर्वेद - २७३

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
रथंतर छंद से स्तुति की गई है. हम तेज और हवि को इंद्र देव हेतु स्थापित करते हैं.
इंद्र देव हमारे लिए बल और आयु धारने की कृपा करें. ( २३ )
ग्रीष्मेण ऋतुना देवा रुद्राः पञ्चदशे स्तुताः.
बृहता यशसा बल १७ हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२४)
रुद्र देव गणों की पंद्रह प्रार्थनाओं एवं ग्रीष्मऋतु से स्तुति की गई है. विशाल
यश व बल से हवि को इंद्र देव हेतु स्थापित करते हैं. इंद्र देव हमारे लिए बल एवं
आयु धारने की कृपा करें. ( २४ )
वर्षाभिर्ऋतुनादित्याः स्तोमे सप्तदशे स्तुताः.
वैरूपेण विशौजसा हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२५)
आदित्य देवगणों की सत्रह स्तोत्रों एवं वर्षा ऋतु से उपासना की गई है. वैरूप
छंद और ओज से हम इंद्र देव हेतु हवि स्थापित करते हैं. इंद्र देव हमारे लिए बल
एवं आयु धारने की कृपा करें. ( २५ )
शारदेन ऋतुना देवा ऽ एकवि १७ श ऋभव स्तुताः.
वैराजेन श्रिया श्रिय १७ हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२६)
ऋभु देवगणों की इक्कीस स्तोत्रों तथा शरद ऋतु से उपासना की गई है. वैराज
छंद श्रिया ( लक्ष्मी ) की श्री बढ़ाते हैं. हम उस से इंद्र देव हेतु हवि स्थापित करते
हैं. इंद्र देव हमारे लिए बल तथा आयु धारने की कृपा करें. ( २६ )
हेमन्तेन ऋतुना देवास्त्रिणवे मरुत स्तुताः.
बलेन शक्वरीः सहो हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२७)
मरुद् गण की नौ से तिगुने स्तोत्रों और हेमंत ऋतु से उपासना की गई है.
शक्वरी छंद और बल से हम इंद्र देव के लिए हवि स्थापित करते हैं. इंद्र देव हमारे
लिए बल और आयु धारने की कृपा करें. ( २७ )
शैशिरण ऋतुना देवास्त्रयस्त्रि १७ शेमृताः स्तुताः.
सत्येन रेवतीः क्षत्र १७ हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२८)
हम तीस और तीन देवगणों की रेवती छंद से और शिशिर ऋतु से उपासना
करते हैं. हम सत्य और बल से इंद्र देव की स्थापना करते हैं. इंद्र देव हमारे लिए
बल और आयु धारने की कृपा करें. ( २८ )
होता यक्षत्समिधाग्निमिडस्पदेश्विनेन्द्र १७ सरस्वतीमजो धूम्रो न गोधूमैः कुवलैर्भेषजं
मधुशष्पैर्न तेज ऽ इन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (२९)
होता ने अग्नि में समिधाएं प्रज्वलित की हैं. यह यज्ञ अश्विनी देव, इंद्र देव और
२७४ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
सरस्वती देवी के लिए किया जा रहा है. इस यज्ञ से गोधूम ओषधियां, मधु, दूध, सोम
व घी प्राप्त होते हैं. होता सब के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (२९)
होता यक्षत्तनूनपात्सरस्वतीमविर्मेषो न भेषजं पथा मधुमता भरन्नश्विनेन्द्राय वीर्यं
बदरैरुपवाकाभिर्भेषजं तोक्मभिः पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य
होतर्यज.. (३०)
होता यजमान के शरीर की रक्षा के लिए यज्ञ करते हैं. यह यज्ञ अश्विनीकुमारों,
सरस्वती देवी और इंद्र देव के लिए किया जाता है. देवताओं के लिए अनाज,
ओषध, मधु, पेय, घी, दूध, सोम व घी आदि प्राप्त होते हैं. देवगण इन सब को
ग्रहण करने की कृपा करें. होता सब के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा
करें. (३०)
होता यक्षन्नराशं१४ सन्न नग्नहुं पतिं१४ सुरया भेषजं मेषः सरस्वती भिषग्रथो न
चन्द्र्यश्विनोर्वपाऽ इन्द्रस्य वीर्यं बदरैरुपवाकाभिर्भेषजं तोक्मभिः पयः सोमः
परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३१)
होता ने अन्न और पुष्टिकारी पदार्थों से यज्ञ किया. यज्ञ में देवताओं को
ओषधियां, बेर, अंकुरित धान आदि चढ़ाए गए. इन देवों के लिए मधु, घी, दूध व
सोम प्राप्त होते है. होता सब के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (३१)
होता यक्षदिडेडित ऽ आजुह्वानः सरस्वतीमिन्द्रं बलेन वर्धयन्नृषभेण
गवेन्द्रियमश्विनेन्द्राय भेषजं यवैः कर्कन्धुभिर्मधु लाजैर्न मासरं पयः सोमः परिस्रुता
घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३२)
होता ने इड़ा देवी के लिए यज्ञ किया. होता ने इड़ा देवी का आह्वान किया.
होता ने इड़ा, सरस्वती देवी, इंद्र और अश्विनीकुमार की बढ़ोतरी के लिए यज्ञ
किया. होता ने उन के लिए जौ, बेर, अनाज और इंद्र देव के लिए बलदायी
ओषधियां चढ़ाईं. देवताओं के लिए मधु, घी, दूध व दही प्राप्त होते हैं. होता सब
के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (३२)
होता यक्षद्बर्हिरूर्णम्म्रदा भिषङ्नासत्या भिषजाश्विनाश्वा शिशुमती भिषग्धेनुः
सरस्वती भिषग्दुह ऽ इन्द्राय भेषजं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य
होतर्यज.. (३३)
होता ने देव वैद्य अश्विनीकुमारों और सरस्वती देवी के लिए कुश का आसन
बिछाया. इंद्र देव बछड़े वाली गाय और बच्चे वाली घोड़ी के चिकित्सक हैं. उन
के लिए इस यज्ञ में मधु, घी व दूध आदि प्राप्त होते हैं. वे इस को ग्रहण करें. यजमान
सब के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (३३)
यजुर्वेद - २७५

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
होता यक्षद्दुरो दिशः कवष्यो न व्यचस्वतीरश्विभ्यां न दुरो दिश ऽ इन्द्रो न रोदसी दुघे
दुहे धेनुः सरस्वत्यश्विनेन्द्राय भेषज १७ शुक्रं न ज्योतिरिन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं
मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३४)
होता ने दिशाओं के द्वार के लिए यज्ञ किया. विद्वान् यजमान ने अश्विनीकुमारों,
इंद्र देव तथा देवी सरस्वती के लिए यज्ञ किया. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक देवताओं
के लिए ओषधि हुए. वाणी गौ हुई. इन्होंने सभी देवताओं के लिए दिव्य तेज और दिव्य
बल प्रदान किया. यज्ञ में देवताओं के लिए मधु, घी व दूध आदि टपकते हैं. देवगण
उन्हें ग्रहण करने व यजमान सब के कल्याण हेतु यज्ञ करने की कृपा करें. (३४)
होता यक्षत्सुपेशासोषे नक्तं दिवाश्विना समञ्जाते सरस्वत्या त्विषिमिन्द्रे न
भेषज १७ श्येनो न रजसा हृदा श्रिया न मासरं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु
व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३५)
होता ने दिनरात के लिए यज्ञ किया. होता ने अश्विनीकुमारों और सरस्वती देवी
के लिए यज्ञ किया. उस यज्ञ से दिनरात में स्थित प्रकाश ने मन एवं श्रिया के साथ
मांड, ओषधि तथा श्येन पत्र ने चमक को इंद्र देव में स्थापित किया. उन के लिए
मधु, घी व दूध प्राप्त होता है. देवगण उन्हें ग्रहण करने की कृपा करें. यजमान सब
के कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (३५)
होता यक्षद्दैव्या होतारा भिषजाश्विनेन्द्रं न जागृवि दिवा नक्तं न भेषजैः शूष १७ सरस्वती
भिषक् सीसेन दुह ऽ इन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३६)
दिव्य होता ने देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों तथा इंद्र देव को प्रसन्न करने
के लिए यज्ञ किया. सरस्वती देवी योग्य वैद्या और दिनरात काम में लगी रहती हैं.
उन्होंने सीसा से (धातु) शक्ति और बल को दुहा. उस यज्ञ में देव के लिए मधु, घी
और दूध प्राप्त होता है. देवगण उन्हें ग्रहण करने की कृपा करें. यजमान सब के
कल्याण के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (३६)
होता यक्षत्तिस्रो देवीर्न भेषजं त्रयस्त्रिधातवोपसो रूपमिन्द्रे हिरण्ययमश्विनेडा न भारती
वाचा सरस्वती मह ऽ इन्द्राय दुह ऽ इन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य
होतर्यज.. (३७)
होता ने भारती देवी, वाणी देवी और सरस्वती देवी के लिए यज्ञ किया. उस
ने इंद्र देव तथा अश्विनीकुमारों के लिए यज्ञ किया. उस ने तीनों गुणों को धारण
करने वाले मंत्रों से यज्ञ किया. सरस्वती देवी ज्योतिर्मय स्वरूप वाली हैं. उन्होंने इंद्र
देव के लिए बल को दुहा. यज्ञ में इंद्र देव के लिए मधु, घी व दूध प्राप्त होते हैं. वे
उन्हें ग्रहण करने की कृपा करें. यजमान सब के कल्याण के लिए यज्ञ करने की
कृपा करें. (३७)
२७६ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
होता यक्षत् सुरेतसमृषभं नर्यापसं त्वष्टारमिन्द्रमश्विना भिषजं न सरस्वतीमोजो न
जूतिरिन्द्रियं वृको न रभसो भिषग् यशः सुरया भेषज १७ श्रिया न मासरं पयः सोमः
परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (३८)
होता ने त्वष्टा देव के लिए यज्ञ किया. त्वष्टा देव अच्छे वीर्यवाले, बलवान व
परोपकारी हैं. होता ने देव वैद्य अश्विनी देवों के लिए यज्ञ किया. होता ने सरस्वती
देवी के लिए यज्ञ किया. होता ने चिकित्सा और इन सब देवताओं को प्रसन्न करने
के लिए यज्ञ किया. होता ने वृक, सुरा और मांड की ओषधि के रस से यज्ञ किया.
यह यज्ञ वैभवपूर्ण है. ओज, गति, बल तथा यश इंद्र देव में स्थापित किया. इस यज्ञ
में घी व दूध देवगण के लिए प्राप्त होते हैं. यजमान सब के कल्याण के लिए यज्ञ
करने की कृपा करे. (३८)
होता यक्षद्वनस्पति १४ शमितार १७ शतक्रतुं भीमं न मन्यु १४ राजानं व्याघ्रं नमसाश्विना
भाम १४ सरस्वती भिषगिन्द्राय दुह ऽ इन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य
होतर्यज.. (३९)
होता ने इंद्र देव, अश्विनी देव और देवी सरस्वती के लिए यज्ञ किया. ये देव
वनस्पति को शुद्ध करने वाले, सैकड़ों यज्ञ करने वाले, भीम, राजा, शेर के समान
गर्जना करने वाले हैं. उपयुक्त क्रोध वाले हैं. होता ने संस्कारयुक्त अन्न से इन देवों
की प्रसन्नता के लिए यज्ञ किया. सरस्वती ने इंद्र देव में क्रोध और बल को दुहा.
इस यज्ञ में देवों के लिए मधु, घी व दूध प्राप्त होते हैं. देवगण उन्हें ग्रहण करें. होता
सब का कल्याण करने की कृपा करें. (३९)
होता यक्षदग्नि १७ स्वाहाज्यस्य स्तोकाना १७ स्वाहा मेदसां पृथक् स्वाहा छागमश्विभ्या
१४ स्वाहा मेष १७ सरस्वत्यै स्वाहा ऋषभमिन्द्राय सिं १७ हाय सहस ऽ इन्द्रिय १४ स्वाहाग्निं
न भेषज १७ स्वाहा सोममिन्द्रिय १४ स्वाहेन्द्र १७ सुत्रामाण १७ सवितारं वरुणं भिषजां
पति १४ स्वाहा वनस्पतिं प्रियं पाथो न भेषज १७ स्वाहा देवा ऽ आज्यपा जुषाणो
अग्निर्भेषजं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (४०)
होता ने अग्नि के लिए यज्ञ किया. अग्नि के लिए स्वाहा. स्तोत्रों के लिए स्वाहा.
मद के लिए अलग से स्वाहा. अश्विनीकुमारों के लिए स्वाहा. छाग के लिए स्वाहा.
देवी सरस्वती के लिए स्वाहा. मेष के लिए स्वाहा. इंद्र देव सिंह के समान
शक्तिशाली हैं. इंद्र देव के लिए स्वाहा. ऋषभ के लिए स्वाहा. सविता देव सुरक्षक
हैं, उन के लिए स्वाहा. वैद्य वरुण बलदायी है, उन के लिए स्वाहा. वनस्पति को
प्रिय अन्न से स्वाहा. देव वैद्य को प्रिय अन्न से स्वाहा. देवगणों के लिए मधु, घी व
दूध प्राप्त होते हैं. देवगण उन्हें स्वीकारने की कृपा करें. यजमानगण सब के लिए
यज्ञ करने की कृपा करें. (४०)
यजुर्वेद - २७७

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
होता यक्षदश्विनौ छागस्य वपाया मेदसो जुषेता ꣳ हविर्होतर्यज.
होता यक्षत्सरस्वती मेषस्य वपाया मेदसो जुषता ꣳ हविर्होतर्यज.
होता यक्षदिन्द्रमृषभस्य वपाया मेदसो जुषता ꣳ हविर्होतर्यज.. (४१)
होता ने अश्विनीकुमारों के लिए छाग के मेद से यज्ञ किया. आप भी ऐसी ही
हवि से यज्ञ करने की कृपा कीजिए. होता ने सरस्वती देवी के लिए मेष के मेद से
यज्ञ किया. आप भी ऐसी ही हवि से यज्ञ करने की कृपा करें. होता इंद्र की
प्रसन्नता हेतु ऋषभ की वसा को स्थापित करते हैं. होता सब के कल्याण हेतु ऐसा
यज्ञ करें. ( ४१ )
होता यक्षदश्विनौ सरस्वतीमिन्द्र ꣳ सुत्रामाणमिमे सोमाः सुरामाणश्छागैर्न मेषैर्ऋषभैः
सुताः शष्पैर्न तोक्मभिर्लाजैर्महस्वन्तो मदा मासरेण परिष्कृताः शुक्राः पयस्वन्तोमृताः
प्रस्थिता वो मधुश्चुतस्तानश्विना सरस्वतीन्द्रः सुत्रामा वृत्रहा जुषन्ता ꣳ सोम्यं मधु
पिबन्तु मदन्तु व्यन्तु होतर्यज.. (४२)
होता ने अश्विनीकुमारों के लिए सुंदर छागों ( ओषधि ) से यजन किया. होता
ने वैभवशाली इंद्र देव के लिए ऋषभों से यजन किया. होता ने सरस्वती देवी के
लिए इन ओषधियों से यजन किया. यजमान देवों के लिए धान, खील, परिष्कृत
रसीला मधु चुआने वाला सोम आदि भेंट करते हैं. दोनों अश्विनीकुमार, वैभववान
वृत्र नाशक इंद्र देव, सरस्वती देवी इस मधुर सोमरस को पीएं. मदमस्त हों. हे होता!
आप भी ऐसा ही यज्ञ कीजिए. ( ४२ )
होता यक्षदश्विनौ छागस्य हविष ऽ आत्तामद्य मध्यतो मेद ऽ उद्धृतं पुरा द्वेषोभ्यः
पुरा पौरुषेय्या गृभो घस्तां नूनं घासे अज्राणां यवसप्रथमाना ꣳ सुमत्क्षराणा ꣳ
शतरुद्रियाणामग्निष्वात्तानां पीवोपवसनानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ
उत्साहतोङ्गादङ्गादवत्तानां करत ऽ एवाश्विना जुषेता ꣳ हविर्होतर्यज.. (४३)
होता ने अश्विनी कुमारों के लिए छाग ( ओषधि ) के बीच के भाग से यज्ञ
किया. द्वेषियों से पहले जिन्हें पौरुष से अन्न ग्रहण करने का अधिकार है, वे देवगण
अपने पौरुष से अन्न ग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि उस अन्न को पचा कर वायु
रूप में सैकड़ों गुना फैला देते हैं. कांख, कमर, गुप्तांग तथा अन्य अंगों को हानि न
हो. वे अंग पुष्ट हों. हे होता! सब के कल्याण हेतु यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४३ )
होता यक्षत् सरस्वतीं मेषस्य हविष ऽ आवयदद्य मध्यतो मेद ऽ उद्धृतं पुरा द्वेषोभ्यः पुरा
पौरुषेय्या गृभो घसन्नूनं घासे अज्राणां यवसप्रथमाना ꣳ सुमत्क्षराणा ꣳ
शतरुद्रियाणामग्निष्वात्तानां पीवोपवसनानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ उत्साहतो ऽ
ङ्गादङ्गादवत्तानां करदेव ꣳ सरस्वती जुषता ꣳ हविर्होतर्यज.. (४४)
आज होता ने देवी सरस्वती के लिए मेष के बीच के भाग से यज्ञ किया. द्वेषियों
२७८ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
से पहले जिन्हें पौरुष से अन्न ग्रहण करने का अधिकार है, वे देवगण अपने पौरुष
से अन्न ग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि उस अन्न को पचा कर वायु रूप में सैकड़ों
गुना फैला देते हैं. कांख, कमर, गुप्तांग तथा अन्य अंगों को हानि न हो. वे अंग पुष्ट
हों. हे होता! सब के कल्याण हेतु यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४४ )
होता यक्षदिन्द्रमृषभस्य हविष ऽ आवयदद्य मध्यतो मेद ऽ उद्धृतं पुरा द्वेषोभ्यः
पुरा पौरुषेय्या गृभो घसन्नूनं घासे अत्राणां यवसप्रथमाना १७ सुमतक्षराणा १७
शतरुद्रियाणामग्निष्वात्तानां पीवोपवसनानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ उत्साद्तो ऽ
ङ्गादङ्गादवत्तानां करदेवमिन्द्रो जुषता १७ हविर्होतर्यज.. (४५)
आज होता ने इंद्र देव हेतु ऋषभ के बीच के भाग से यज्ञ किया. द्वेषियों से
पहले जिन्हें पौरुष से अन्न ग्रहण करने का अधिकार है, वे देवगण अपने पौरुष से
अन्न ग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि उस अन्न को पचा कर वायु रूप में सैकड़ों
गुना फैला देते हैं. कांख, कमर, गुप्तांग तथा अन्य अंगों को हानि न हो. वे अंग पुष्ट
हों. हे होता! सब के कल्याण हेतु यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४५ )
होता यक्षद्वनस्पतिमभि हि पिष्टतमया रभिष्ठया रशनयाधित. यत्राश्विनोश्छागस्य
हविषः प्रिया धामानि यत्र सरस्वत्या मेषस्य हविषः प्रिया धामानि यत्रेन्द्रस्य ऋषभस्य
हविषः प्रिया धामानि यत्राग्नेः प्रिया धामानि यत्र सोमस्य प्रिया धामानि यत्रेन्द्रस्य
सुत्राम्णः प्रिया धामानि यत्र सवितुः प्रिया धामानि यत्र वरुणस्य प्रिया धामानि यत्र
वनस्पतेः प्रिया पाथा १७ सि यत्र देवानामाज्यपानां प्रिया धामानि यत्राग्नेर्होतुः प्रिया
धामानि तत्रैतान्रस्तुत्येवोपस्तुत्येवोपावस्त्रक्ष्दभीयस ऽ इव कृत्वी करदेवं देवो
वनस्पतिर्जुषता १७ हविर्होतर्यज.. (४६)
होता ने वनस्पति देव के लिए यज्ञ किया. बंधे हुए पशु की भांति वनस्पति
अपने स्थान पर रहने ( स्थिर ) की कृपा करें. जहां छाग की हवि अश्विनीकुमार का
प्रिय धाम है, जहां मेष की हवि सरस्वती देवी का प्रिय धाम है, जहां ऋषभ की हवि
इंद्र देव का प्रिय धाम है, जहां अग्नि का प्रिय धाम है, जहां सोम का प्रिय धाम है,
जहां सुरक्षक इंद्र देव का प्रिय धाम है, जहां सविता देव का प्रिय धाम है, जहां
वरुण देव का प्रिय धाम है, जहां वनस्पति देव का प्रिय धाम है, जहां घी की हवि
पीने वाले का प्रिय धाम है, जहां अग्नि होता हैं, उन का प्रिय धाम है, वहां प्रस्तुत
और अप्रस्तुत हो कर देवगण उत्तम हवि ग्रहण करते हैं. आप भी ऐसा ही यज्ञ
कीजिए. ( ४६ )
होता यक्षदग्नि १७ स्विष्टकृतमयाडग्निरश्विनोश्छागस्य हविषः प्रिया धामान्ययाट् सरस्वत्या
मेषस्य हविषः प्रिया धामान्ययाडिन्द्रस्य ऋषभस्य हविषः प्रिया धामान्ययाडग्नेः प्रिया
धामान्ययाट् सोमस्य प्रिया धामान्ययाडिन्द्रस्य सुत्राम्णः प्रिया धामान्ययाट् सवितुः प्रिया
धामान्ययाड् वरुणस्य प्रिया धामान्ययाड् वनस्पतेः प्रिया पाथा १७ स्ययाड् देवानामाज्यपानां
यजुर्वेद - २७९