यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
यज्ञ हमें फलीभूत हो. ज्येष्ठता हमारे आधिपत्य में रहे. अनीति हमारे नियंत्रण
में रहे. क्रोध हम से दूर रहे. दुष्टों का हम प्रतिकार कर सकें. हमारी परिपक्वता में
बढ़ोत्तरी हो. हमारी गरिमा में बढ़ोत्तरी हो. हमारी वरिष्ठता में बढ़ोत्तरी हो. हम सर्वत्र
प्रथम (श्रेष्ठ) साबित हों. हमारी व्यापकता में बढ़ोत्तरी हो. हमारी आयु में बढ़ोत्तरी
हो. हमारे बड़प्पन में बढ़ोत्तरी हो. हमारे वंश में बढ़ोत्तरी हो. हमारी उत्कृष्टता में
बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ हमें (सर्वविध) फलीभूत हो. (४)
सत्यं च मे श्रद्धा च मे जगच्च मे धनं च मे विश्वं च मे महश्च मे क्रीडा च
मे मोदश्च मे जातं च मे जनिष्यमाणं च मे सूक्तं च मे सुकृतं च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. (५)
यज्ञ फलीभूत हो. सत्य की बढ़ोत्तरी हो. श्रद्धा की बढ़ोत्तरी हो. धन की
बढ़ोत्तरी हो. विश्व में स्तर की बढ़ोत्तरी हो. मनोविनोद की बढ़ोत्तरी हो. हर्ष स्तर
की बढ़ोत्तरी हो. संतान की बढ़ोत्तरी हो. सूक्तों में स्तर की बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ
सर्वविध फलीभूत हो. (५)
ऋतं च मेमृतं च मेयक्ष्मं च मेनामयच्च मे जीवातुश्च मे दीर्घायुत्वं च मेनमित्रं च
मेभयं च मे सुखं च मे शयनं च मे सूषाश्च मे सुदिनं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (६)
यज्ञ से हमारे ऋत को बढ़ोत्तरी मिले. यज्ञ से हमारे अमृत को बढ़ोत्तरी मिले.
यज्ञ से हमारे यक्ष्मा में कमी हो. यज्ञ से हमारे आरोग्य में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे
जीने की क्षमता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारी आयु में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे
शत्रुओं का अभाव हो. यज्ञ से हमारे अभय में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे सुख में
बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे शयन में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे संध्याकर्म में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से हमारे सुदिन में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ हमें सर्वविध फलीभूत हो. (६)
यन्ता च मे धर्ता च मे क्षेमश्च मे धृतिश्च मे विश्वं च मे महश्च मे संविच्च मे ज्ञात्रं
च मे सूश्च मे प्रसूश्च मे सीरं च मे लयश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (७)
यज्ञ से हम धारक हो जाएं. धैर्य की क्षमता बढ़े. यज्ञ से हमें संसार की सारी
महानता प्राप्त हो. यज्ञ से हमें संपूर्ण सामर्थ्य प्राप्त हो. यज्ञ से हमें ज्ञान प्राप्त हो. यज्ञ
से उत्पादन की क्षमता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से खेती के साधनों की क्षमता में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से कष्टों में कमी हो. यज्ञ सर्वविध फलीभूत हो. (७)
शं च मे मयश्च मे प्रियं च मेनुकामश्च मे कामश्च मे सौमनसश्च मे भगश्च मे द्रविणं
च मे भद्रं च मे श्रेयश्च मे वसीयश्च मे यशश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (८)
यज्ञ से सब सुखों में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब आनंद में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब
प्रकार के आमोदप्रमोद में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब अनुकूल कामनाओं में बढ़ोत्तरी
हो. यज्ञ से सब सौमनस्य कामनाओं में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब सौभाग्य में बढ़ोत्तरी
यजुर्वेद - २२५
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हो. यज्ञ से सब वैभव में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब भद्रता में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब
श्रेय में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब वास सुख में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से सब यश में बढ़ोतरी
हो. यज्ञ हमें सर्वविध फलीभूत हो. ( ८ )
ऊर्क् च मे सूनृता च मे पयश्च मे रसश्च मे घृतं च मे मधु च मे सग्धिश्च मे सपीतिश्च
मे कृषिश्च मे वृष्टिश्च मे जैत्रं च म ऽ औद्भिद्यं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( ९ )
यज्ञ हमें फलीभूत हो. यज्ञ से अन्न की प्राप्ति हो. यज्ञ से अच्छी वाणी की प्राप्ति
हो. यज्ञ से पेय की प्राप्ति हो. यज्ञ से रस की प्राप्ति हो. यज्ञ से घी की प्राप्ति हो. यज्ञ
से मधु की प्राप्ति हो. हम संबंधियों के साथ भोजन करें. हम संबंधियों के साथ पीएं.
वर्षा हमारी कृषि को फलीभूत व बढ़ोतरी करे. हम शत्रुओं का भेदन करें. यज्ञ हमें
सर्वविध फलीभूत हो. ( ९ )
रयिश्च मे रायश्च मे पुष्टं च मे पुष्टिश्च मे विभु च मे प्रभु च मे पूर्णं च मे पूर्णतरं
च मे कुयवं च मेक्षितं च मेन्नं च मेक्षुच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १० )
यज्ञ से हमारे धन में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से हमारी संपत्ति में बढ़ोतरी हो. हम
धन से पुष्ट हों. हम वैभव से पुष्ट हों. हम प्रभु से पुष्ट हों. हम पूर्ण से पुष्ट हों.
हम पूर्णतर से पुष्ट हों. हमारे यहां पशुओं के खाद्य में बढ़ोतरी हो. हमारे यहां
अक्षय अन्न में व हमारी भूख में भी बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत
हो. ( १० )
वित्तं च मे वेद्यं च मे भूतं च मे भविष्यच्च मे सुगं च मे सुपथ्यं च म ऽ ऋद्धं च म ऽ
ऋद्धिश्च मे क्लृप्तं च मे क्लृप्तिश्च मे मतिश्च मे सुमतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( ११ )
यज्ञ से हमारे वित्त, ज्ञान, अतीत, भविष्य व अच्छे धन को बढ़ोतरी मिले. यज्ञ
से हमारे पथ सुगम हों. यज्ञ से हमारे पथ के रोड़े समाप्त हों. यज्ञ से हमारे अच्छे
कर्म, सामर्थ्य, सत्य, बुद्धि व सद्बुद्धि में बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध
फलीभूत हो. ( ११ )
व्रीहयश्च मे यवाश्च मे माषाश्च मे तिलाश्च मे मुद्गाश्च मे खल्वाश्च मे प्रियङ्गवश्च
मेणवश्च मे श्यामाकाश्च मे नीवाराश्च मे गोधूमाश्च मे मसूराश्च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. ( १२ )
यज्ञ से हमारे धान, जौ, उड़द, तिल, मूंग, चना, प्रियंग ( राई ), छोटे चावलों
में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से हमारे सावां चावल, नीवार, गेहूं, मसूर में बढ़ोतरी हो. यज्ञ
हमें सर्वविध फलीभूत हो. ( १२ )
अश्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च मे पर्वताश्च मे सिकताश्च मे वनस्पतयश्च मे हिरण्यं
च मेयश्च मे श्यामं च मे लोहं च मे सीसं च मे त्रपु च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १३ )
२२६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
यज्ञ कर्म से खनिज, मिट्टी, पहाड़ों, पर्वतों, रेत, वनस्पतियों में बढ़ोतरी हो.
यज्ञ कर्म से सोने, लोहे, कांसे, सीसे व टिन में बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध
फलीभूत हो. ( १३ )
अग्निश्च म ऽ आपश्च मे वीरुधश्च म ऽ ओषधयश्च मे कृष्टपच्याश्च मेऽकृष्टपच्याश्च
मे ग्राम्याश्च मे पशव ऽ आरण्याश्च मे वित्तं च मे वित्तिश्च मे भूतं च मे भूतिश्च मे
यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १४)
इस यज्ञ से अग्नि, जल, पौधे, ओषधियां, कष्ट से पचने वाली ओषधियां हमारे
अनुकूल होने की कृपा करें. इस यज्ञ से आसानी से पचने वाली ओषधियां, गांव
के पशु, जंगल के पशु, वित्त, संपत्ति, अतीत व भविष्य की बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमें
सर्वविध फलीभूत हों. ( १४ )
वसु च मे वसतिश्च मे कर्म च मे शक्तिश्च मेर्थश्च म ऽ एमश्च म ऽ इत्या च मे
गतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १५)
यज्ञ से देवगण हमें धन, संपत्ति, कर्म सामर्थ्य, अर्थ, इष्ट साधन व गति प्रदान
करें. यह यज्ञ सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. ( १५ )
अग्निश्च म ऽ इन्द्रश्च मे सोमश्च म ऽ इन्द्रश्च मे सविता च म ऽ इन्द्रश्च मे सरस्वती
च म ऽ इन्द्रश्च मे पूषा च म ऽ इन्द्रश्च मे बृहस्पतिश्च म ऽ इन्द्रश्च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. (१६)
यज्ञ से अग्नि, इंद्र देव, सोम और इंद्र देव, सविता देव और इंद्र देव, सरस्वती
देवी और इंद्र देव व पूषा देव और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से
बृहस्पति देव और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध
फलीभूत हो. ( १६ )
मित्रश्च म ऽ इन्द्रश्च मे वरुणश्च म ऽ इन्द्रश्च मे धाता च म ऽ इन्द्रश्च मे त्वष्टा च म ऽ
इन्द्रश्च मे मरुतश्च म ऽइन्द्रश्च मे विश्वे च मे देवा ऽ इन्द्रश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (१७)
यज्ञ से मित्र देव और इंद्र देव, वरुण देव और इंद्र देव, धाता देव और इंद्र देव,
त्वष्टा और इंद्र देव व मरुत् और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से विश्व
देव और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यह यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत
हो. ( १७ )
पृथिवी च म ऽ इन्द्रश्च मेन्तरिक्षं च म ऽ इन्द्रश्च मे द्यौश्च म ऽ इन्द्रश्च मे समाश्च
म ऽ इन्द्रश्च मे नक्षत्राणि च म ऽ इन्द्रश्च मे दिशश्च म ऽ इन्द्रश्च मे यज्ञेन
कल्पन्ताम्.. (१८)
इस यज्ञ से हमारे लिए पृथ्वी देव इंद्र, अंतरिक्ष देव इंद्र, स्वर्गलोक के देव,
यजुर्वेद - २२७
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
वृष्टि देव इंद्र, नक्षत्र देव इंद्र व दिशा देव इंद्र की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यह यज्ञ
सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. ( १८ )
अ ᳵ शुश्च मे रश्मिश्च मेदाभ्यश्च मेधिपतिश्च म ऽ उपा ᳵ शुश्च मेन्तर्यामश्च म ऽ
ऐन्द्रवायवश्च मे मैत्रावरुणश्च म ऽ आश्विनश्च मे प्रतिप्रस्थानश्च मे शुक्रश्च मे मन्थी
च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (१९)
इस यज्ञ से अंशुग्रह, रश्मिग्रह, अदाभ्यग्रह, उपांशुग्रह, अंतर्याम, इंद्र देव और
वायु, मित्र देव और वरुण देव, आश्विनग्रह व प्रतिस्थानग्रह अधिपति होने की कृपा
करें. इस यज्ञ से शुक्रग्रह अधिपति होने की कृपा करें. इस यज्ञ से मंधीग्रह अधिपति
होने की कृपा करें. यह यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत हो. ( १९ )
आग्रयणश्च मे वैश्वदेवश्च मे ध्रुवश्च मे वैश्वानरश्च म ऽ ऐन्द्राग्नश्च मे
महावैश्वदेवश्च मे मरुत्वतीयाश्च मे निष्केवल्यश्च मे सावित्रश्च मे सारस्वतश्च मे
पात्नीवतश्च मे हारियोजनश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२०)
इस यज्ञ से आग्रयण, विश्व, ध्रुव देव, वैश्वानर, इंद्र देव और अग्नि, महावैश्व
देव, मरुत्वतीय देव, निष्केवल्य देव, सावित्र देव, सारस्वत देव हमारे अनुकूल होने
की कृपा करें. इस यज्ञ से पालीवत व हारियोजन हमारे अनुकूल होने की कृपा करें.
यज्ञ सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. ( २० )
सुचश्च मे चमसाश्च मे वायव्यानि च मे द्रोणकलशश्च मे ग्रावाणश्च मेधिषवणे च
मे पूतभृच्च म ऽ आधवनीयश्च मे वेदिश्च मे बर्हिश्च मेवभृथश्च मे स्वगाकारश्च मे
यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२१)
यज्ञ से सुक ( घी डालने का पात्र ), चमस, वायव्य, द्रोणकलश, पत्थर,
अधिषवण ( सोम कूटने वाला पत्थर ) हमारे अनुकूल हो. यज्ञ से पूतभृत ( सोम
रखने का पात्र ) आह्वनीय पात्र, वेदिका, कुशा, अवभृथ स्नान व शम्युवाक हमारे
अनुकूल हो. यज्ञ सर्वविध फलीभूत होने की कृपा करे. ( २१ )
अग्निश्च मे घर्मश्च मेर्कश्च मे सूर्यश्च मे प्राणश्च मेश्वमेधश्च मे पृथिवी च मेदितिश्च
मे दितिश्च मे द्यौश्च मेङ्गुलयः शक्वरयो दिशश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२२)
यज्ञ से अग्नि, गर्मी, अर्क, सूर्य, प्राण, अश्वमेध, पृथ्वी, अदिति व दिति हमारे
अनुकूल होने की कृपा करे. यज्ञ से स्वर्गलोक विराट् पुरुष की अंगुलियां, शक्ति
व दिशाएं हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. यह यज्ञ सर्वविध फलीभूत होने की
कृपा करे. ( २२ )
व्रतं च म ऽ ऋतवश्च मे तपश्च मे संवत्सरश्च मेहोरात्रे ऊर्ध्वष्ठीवे बृहद्रथन्तरे च मे
यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२३)
२२८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
यज्ञ से व्रत, तप, वर्षा, दिनरात व यज्ञ से ऊर्वष्ठि हमारे अनुकूल होने की कृपा
करे. यज्ञ से बृहद्रथंतर हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. यह यज्ञ सर्वविध फलीभूत
होने की कृपा करे. ( २३ )
एका च मे तिस्रश्च मे तिस्रश्च मे पञ्च च मे पञ्च च मे सप्त च मे सप्त च मे नव
च मे नव च म ऽ एकादश च म ऽ एकादश च मे त्रयोदश च मे त्रयोदश च मे पञ्चदश
च मे पञ्चदश च मे सप्तदश च मे सप्तदश च मे नवदश च मे नवदश च म ऽ एकवि
ꣳ शतिश्च म ऽ एकवि ꣳ शतिश्च मे त्रयोवि ꣳ शतिश्च मे त्रयोवि ꣳ शतिश्च मे
पञ्चवि ꣳ शतिश्च मे पञ्चवि ꣳ शतिश्च मे सप्तवि ꣳ शतिश्च मे सप्तवि ꣳ शतिश्च
मे नववि ꣳ शतिश्च मे नववि ꣳ शतिश्च म ऽ एकत्रि ꣳ शच्च म ऽ एकत्रि ꣳ शच्च
मे त्रयस्त्रि ꣳ शच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२४)
यज्ञ से हम एक, तीन, पांच, पांच और सात, सात और नौ, नौ और ग्यारह,
ग्यारह और तेरह, तेरह और पंद्रह, पंद्रह और सत्रह, उन्नीस और इक्कीस, तेईस और
पच्चीस स्तोम इच्छा को फलीभूत करें. यज्ञ से हम पच्चीस और सत्ताईस, सत्ताईस
और उनतीस, उनतीस और इकतीस, इकतीस और तैंतीस स्तोम इच्छा को फलीभूत
करें. यज्ञ सर्वविध फलीभूत होने की कृपा करे. ( २४ )
चतस्रश्च मेष्टौ च मेष्टौ च मे द्वादश च मे द्वादश च मे षोडश च मे षोडश च मे
वि ꣳ शतिश्च मे वि ꣳ शतिश्च मे चतुर्वि ꣳ शतिश्च मे चतुर्वि ꣳ शतिश्च मेष्टावि
ꣳ शतिश्च मेष्टावि ꣳ शतिश्च मे द्वात्रि ꣳ शच्च मे द्वात्रि ꣳ शच्च मे षट्त्रि ꣳ शच्च
मे षट्त्रि ꣳ शच्च मे चत्वारि ꣳ शच्च मे चत्वारि ꣳ शच्च मे चतुश्चत्वारि ꣳ शच्च
मे चतुश्चत्वारि ꣳ शच्च मेष्टाचत्वारि ꣳ शच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२५)
यज्ञ से चार और आठ, आठ और बारह, बारह और सोलह, सोलह और बीस,
बीस और चौबीस, चौबीस और अट्ठाईस स्तोम अभीष्ट प्राप्ति की कृपा करें. यज्ञ
से अट्ठाईस और बत्तीस स्तोम, बत्तीस और छत्तीस, छत्तीस और चालीस, चालीस
और चवालीस व चवालीस और अड़तालीस स्तोम अभीष्ट प्राप्ति की कृपा करें.
यज्ञ सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. ( २५ )
त्र्यविश्च मे त्र्यवी च मे दित्यवाट् च मे दित्यौही च मे पञ्चाविश्च मे पञ्चावी च
मे त्रिवत्सश्च मे त्रिवत्सा च मे तुर्यवाट् च मे तुर्यौही च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२६)
यज्ञ से तीन से आधे वर्ष का बछड़ा, तीन वर्ष की बछिया, दो वर्ष का बछड़ा,
बछिया, ढाई वर्ष का बछड़ा व बछिया. यज्ञ से तीन वर्ष का बैल व गाय सहायक
हो. यज्ञ से साढ़े तीन वर्ष का बैल व गाय सहायक हो. यज्ञ सर्वविध हमारे लिए
फलीभूत हो. ( २६ )
पष्ठवाट् च मे पष्ठौही च म ऽ उक्षा च मे वशा च म ऽ ऋषभश्च मे वेहच्च मेनड्वाँश्च
मे धेनुश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२७)
यजुर्वेद - २२१
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
यज्ञ से चार वर्ष का बैल और गाय सहायक हो. यज्ञ से सेचन समर्थ बैल और
वंध्या गाय सहायक हो, यज्ञ से तंदुरुस्त बैल गर्भ घातिनी गाय सहायक हो. गाड़ी
खींचने वाले बैल और हाल ही में ब्याई गाय हमें प्राप्त हो. अभिप्राय यह है कि हमें
सब प्रकार का पशु धन मिले. (२७)
वाजाय स्वाहा प्रसवाय स्वाहापिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा वसवे स्वाहाहर्पतये
स्वाहाहे मुग्धाय स्वाहा मुग्धाय वैन १७ शिनाय स्वाहा विन १७ शिन ऽ आन्त्यायनाय
स्वाहान्त्याय भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहाधिपतये स्वाहा प्रजापतये स्वाहा.
इयं ते राण्मित्राय यन्तासि यमन ऽ ऊर्जे त्वा वृष्ट्यै त्वा प्रजानां त्वाधिपत्याय.. (२८)
यह आहुति अन्न रूप चैत्र मास के लिए समर्पित है. यह आहुति प्रसव रूप
वैशाख, मास के लिए समर्पित है. यह आहुति जलक्रीड़ा आदि में आनंददायक
ज्येष्ठ मास के लिए है. यह आहुति क्रतु रूप आषाढ़ मास के लिए है. यह आहुति
चातुर्मास में यात्रा निषेधक वसु रूप श्रावण मास के लिए है. यह आहुति भाद्र मास
के लिए है. यह आहुति मनमोहक आश्विन मास के लिए है. यह आहुति कार्तिक
मास के लिए है. यह आहुति विष्णु रूप मार्गशीर्ष मास के लिए है. यह आहुति पौष
मास के लिए है. यह आहुति माघ मास के लिए है. यह आहुति ऋतुराज रूप फाल्गुन
मास के लिए है. हे प्रजापति! आप हमारे मित्र के समान हितैषी हैं. आप यज्ञ आदि
के बनाने वाले हैं. ऊर्जा और प्रजा की बढ़ोतरी के लिए हम आप को प्रेमपूर्वक
प्रणाम करते हैं. (२८)
आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्यज्ञेन कल्पता १७ श्रोत्रं यज्ञेन कल्पतां
वाग्यज्ञेन कल्पतां मनो यज्ञेन कल्पतामात्मा यज्ञेन कल्पतां ब्रह्मा यज्ञेन कल्पतां
ज्योतिर्यज्ञेन कल्पता १७ स्वर्ग्यज्ञेन कल्पतां पृष्ठं यज्ञेन कल्पतां यज्ञो यज्ञेन कल्पताम्.
स्तोमश्च यजुश्च ऋक् च साम च बृहच्च रथन्तरं च. स्वर्देवा ऽ अगन्मामृता ऽ अभूम
प्रजापतेः प्रजा ऽ अभूम वेट् स्वाहा.. (२९)
यज्ञ से हमारी उमर बढ़े. प्राणों में तेज और बल बढ़े. नेत्र और कान श्रेष्ठ हों.
वाणी उत्कृष्ट हो. आत्मा आनंदमय हो. वेदों के ज्ञाता ब्रह्मा संतोषी हों. यज्ञ से
ज्योतिष्मान परम तत्त्व मिले, यज्ञ से स्वर्ग अर्थात् सुख मिले. यज्ञ और स्तुति के मंत्र
हमें अभीष्ट फल दें. सभी देव हमें देवत्व प्रदान करें. अर्थात् सुख दें. हम भी
प्रजापति परमात्मा के रूप में सुख भोगें. इसी लिए यह आहुति समर्पित है. (२९)
वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे.
यस्यामिदं विश्वं भुवनमाविवेश तस्यां नो देवः सविता धर्म साविषत्.. (३०)
पृथ्वी माता अन्न पैदा करती हैं. हम पृथ्वी माता की महिमा को वाणी से गागा
कर व्यक्त करते हैं. उस में सारा विश्व और लोक समाए हुए हैं. सविता देव इस
पृथ्वी पर हमारी स्थिति को दृढ़तर करने की कृपा करें. (३०)
२३० - यजुर्वेद
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
विश्वे अद्य मरुतो विश्व ऽ ऊती विश्वे भवन्त्वग्नयः समिद्धाः.
विश्वे नो देवा ऽ अवसागमन्तु विश्वमस्तु द्रविणं वाजो अस्मे.. (३१)
आज हमारे इस यज्ञ में (सभी) मरुद्गण पधारने की कृपा करें. सभी देवगण
अपने रक्षा साधनों सहित पधारने की कृपा करें. सभी अग्नियां प्रज्वलित होने की
कृपा करें. हमारे लिए सब प्रकार के अन्न, धन प्राप्त कराने की कृपा कराएं. (३१)
वाजो नः सप्त प्रदिशश्चतस्रो वो परावतः.
वाजो नो विश्वैर्देवैर्धनसाताविहावतु.. (३२)
हमारे अन्न, धन की सातों उपदिशाओं और चारों दिशाओं में बढ़ोत्तरी हो.
समस्त देवगण (विश्व) हमारे धनधान्य की रक्षा करने की कृपा करें. (३२)
वाजो नो अद्य प्र सुवाति दानं वाजो देवाँ २ ऋतुभिः कल्पयाति.
वाजो हि मा सर्ववीरं जजान विश्वा ऽ आशा वाजपतिर्जयेयम्.. (३३)
देवगण आप अन्न के अधिष्ठाता हैं. आप हमें अन्नदान करने की प्रेरणा देने
की कृपा कीजिए. देवताओं को ऋतु के अनुसार अन्न फलीभूत होता रहे. (३३)
वाजः पुरस्तादुत मध्यतो नो वाजो देवान् हविषा वर्धयाति.
वाजो हि मा सर्ववीरं चकार सर्वा ऽ आशा वाजपतिर्भवेयम्.. (३४)
अन्न हमारे सामने उपजता है. वह हमारे घर के बीच उपजता है. अन्न हवि से
देवताओं की बढ़ोत्तरी करता है. वह ही हम सब को वीर बनाता है. हम आप की
कृपा से अन्नपति व आशावादी बनें. (३४)
सम्मा सृजामि पयसा पृथिव्याः सम्मा सृजाम्यद्भिरोषधीभिः.
सोहं वाज ४५ सनेयमग्ने.. (३५)
हे अग्नि! आप पृथ्वी पर रस से सृजन करते हैं. आप पृथ्वी पर रस, जल और
ओषध से सृजन करते हैं. हम अग्नि की कृपा से ओषध और जल पाते हैं. (३५)
पयः पृथिव्यां पय ऽ ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः.
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्.. (३६)
हे अग्नि! आप पृथ्वी पर दूध धारण कीजिए. आप पृथ्वी पर ओषधियों में
जीवन धारण कीजिए. आप स्वर्गलोक में दिव्य रस धारण कीजिए. आप
अंतरिक्ष में दिव्य रस धारण कीजिए. आप की कृपा से हमारे लिए सभी दिशाएं,
प्रदिशाएं पयस्विनी (दूध देने वाली) हो जाएं. (३६)
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
सरस्वत्यै वाचो यन्तुर्यन्त्रेणाग्नेः साम्राज्येनाभिषिञ्चामि.. (३७)
यजुर्वेद - २३१
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
सविता देव के जन्मने ( उदय होने ) पर अश्विनीकुमारों के बाहुओं से
अभिषिंचन किया जा रहा है. पूषा देव के हाथों से अभिषिंचन किया जा रहा है.
सरस्वती देवी की वाणी से अभिषिंचन किया जा रहा है. नियामक सत्ता के
नियमन से अभिषिंचन किया जा रहा है. अग्नि के साम्राज्य से अभिषिंचन किया
जा रहा है. ( ३७ )
ऋताषाड्ऋतधामाग्निर्गन्धर्वस्तस्यौषधयोप्सरसो मुदो नाम.
स न ऽ इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् ताभ्यः स्वाहा.. ( ३८)
अग्नि सत्य से विजय पाते हैं. वे श्रेष्ठ धाम वाले हैं. ओषधियां गंधर्व की
अप्सराएं हैं. ये सभी में मोद ( प्रसन्नता ) का संचार करती हैं. अग्नि इन ब्राह्मणों व
क्षत्रियों के रक्षक हों. उन के लिए यह आहुति समर्पित हैं. उन के लिए स्नेहपूर्वक
आहुति समर्पित है. उन के लिए स्वाहा. ( ३८ )
स ष्हि हितो विश्वसामा सूर्यो गन्धर्वस्तस्य मरीचयोप्सरस ऽ आयुवो नाम.
स न ऽ इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् ताभ्यः स्वाहा.. (३९)
सामवेद की सुंदर ऋचाओं से जिन की स्तुति की जाती है, जो दिन और रात
को मिलाते हैं, जिन की किरणें गंधर्व की अप्सराएं हैं, वे हमारी रक्षा करें. वह सूर्य
ब्राह्मणों व क्षत्रियों की रक्षा करें. उन के लिए यह आहुति है. उन के लिए स्वाहा.
उन के लिए स्नेहपूर्वक आहुति अर्पित है. ( ३९ )
सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वस्तस्य नक्षत्राण्यप्सरसो भेकुरयो नाम.
स न ऽ इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् ताभ्यः स्वाहा.. (४०)
सूर्य सुषमा दायक हैं. चंद्र देव सूर्य की किरणों से प्रकाश पाते हैं. नक्षत्रों की
रश्मियां गंधर्व अप्सराएं हैं. ये चमकीली हैं. ये ब्राह्मणों व क्षत्रियों की रक्षा करें. इन
के लिए आहुति अर्पित है. इन के लिए स्नेहपूर्वक आहुति अर्पित है. इन के लिए
स्वाहा. ( ४० )
इषिरो विश्वव्यचा वातो गन्धर्वस्तस्यापो अप्सरस ऽ ऊर्जा नाम.
स न ऽ इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् ताभ्यः स्वाहा.. (४१)
गंधर्व वायु स्वरूप हैं. वे भूमि को धारण करने वाले हैं. यह भूमि सर्वव्यापक
है. वे गंधर्व शीघ्र गमनशील ऊर्जस्वी हैं. उन से निवेदन है कि वे ब्राह्मणों व क्षत्रियों
की रक्षा करें. उन के लिए स्वाहा. जल उन की अप्सराएं हैं. वे हमारी रक्षा करने की
कृपा करें. उन के लिए स्वाहा. ( ४१ )
भुज्युः सुपर्णो यज्ञो गन्धर्वस्तस्य दक्षिणा ऽ अप्सरस स्तावा नाम.
स न ऽ इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् ताभ्यः स्वाहा.. (४२)
२३२ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
गंधर्व सुपर्ण रूप व यज्ञ स्वरूप हैं. भोज्य पदार्थों के दाता हैं. गंधर्व ब्राह्मणों
व क्षत्रियों की रक्षा करने की कृपा करें. स्तुति नामक दक्षिणा यज्ञ की अप्सरा हैं.
उन के लिए यह आहुति समर्पित है. उन के लिए स्वाहा. ( ४२ )
प्रजापतिर्विश्वकर्मा मनो गन्धर्वस्तस्य ऋक्सामान्यप्सरस ऽ एष्टयो नाम.
स न ऽ इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् ताभ्यः स्वाहा.. (४३)
गंधर्व प्रजापति, विश्वकर्मा व मन स्वरूप हैं. गंधर्व ब्राह्मणों व क्षत्रियों की रक्षा
करने की कृपा करें. ऋक् और साम की एष्टि नामक अप्सरा है. वे हमारी रक्षा करने
की कृपा करें. उन के लिए यह आहुति अर्पित है. उन के लिए स्वाहा. ( ४३ )
स नो भुवनस्य पते प्रजापते यस्य त ऽ उपरि गृहा यस्य वेह.
अस्मै ब्रह्मणेस्मै क्षत्राय महि शर्म यच्छ स्वाहा.. (४४)
हे प्रजापति! आप भुवनपति हैं. ऊपर के सारे घर आप की ही कृपा से स्थित
हैं. आप ब्राह्मणों व क्षत्रियों को सुख प्रदान कीजिए. आप के लिए स्वाहा. ( ४४ )
समुद्रोसि नभस्वानार्द्रदानुः शम्भूर्म्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहा.
मारुतोसि मरुतां गणः शम्भूर्म्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहावस्यूरसि
दुवस्वाञ्छम्भूर्म्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहा.. (४५)
आप समुद्र, नभवान, जल दान करने वाले व भूमि को सुख दान करने वाले
हैं. आप के लिए स्वाहा. मरुत् हैं. मरुतों के गण हैं. सुखदायी हैं. सब के आश्रयदाता
हैं. दुःख दूर करने वाले हैं. आप बहुत सुखदायी हैं. आप के लिए यह आहुति अर्पित
है. आप के लिए स्वाहा. ( ४५ )
यास्ते अग्ने सूर्ये रुचो दिवमातन्वन्ति रश्मिभिः.
ताभिर्नो अद्य सर्वाभी रुचे जनाय नस्कृधि.. (४६)
हे अग्नि! आप से सूर्य स्वर्गलोक को चमकाते हैं. सूर्य की किरणें स्वर्गलोक
को चमकाती हैं. उन देव की किरणें आज सभी को चमकाएं व प्रकाशित करें.
सभी को तेजस्वी बनाने के लिए प्रकाशित हों. ( ४६ )
या वो देवाः सूर्ये रुचो गोष्वश्वेषु या रुचः.
इन्द्राग्नी ताभिः सर्वाभी रुचन्नो धत्त बृहस्पते.. (४७)
जो देवगण सूर्य के प्रकाश से ज्योतिमान हैं, जो प्रकाश गायों में विद्यमान है, जो
प्रकाश घोड़ों में विद्यमान है, इंद्र देव उन से हम सभी को चमकाएं. इंद्र देव उसे हम सभी
के लिए धारण करें. अग्नि व बृहस्पति व उसे हम सभी के लिए धारण करें. ( ४७ )
रुचन्नो धेहि ब्राह्मणेषु रुच १७ राजसु नस्कृधि.
रुचं विश्येषु शूद्रेषु मयि धेहि रुचा रुचम्.. (४८)
यजुर्वेद – २३३
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हमारे लिए ज्योति धारिए. ब्राह्मणों व क्षत्रियों में ज्योति स्थापित कीजिए.
वैश्यों, शूद्रों में ज्योति स्थापित कीजिए. मेरे लिए ज्योति धारिए. मुझे ज्योतिष्मान
बनाने की कृपा कीजिए. (४८)
तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः.
अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश १४ स मा न ऽ आयुः प्र मोषीः.. (४९)
हे वरुण देव! ब्राह्मणगण मंत्रों से आप का वंदन करते हैं. यजमान सदैव
हवियों द्वारा आप की अभिशंसा (प्रशंसा और उपासना) करते हैं. हम यहां सुख
चाहते हुए वरुण देव की प्रशंसा और उपासना करते हैं. उन्हें प्रार्थना सुनने के लिए
जाग्रत करते हैं. वे हम पर क्रोध न करें. हमारी आयु को कम न करें. (४९)
स्वर्ण घर्मः स्वाहा स्वर्णार्कः स्वाहा स्वर्ण शुक्रः स्वाहा स्वर्ण ज्योतिः स्वाहा स्वर्ण
सूर्यः स्वाहा.. (५०)
सोने जैसा प्रकाश उकेरने वाले देव के लिए स्वाहा. सोने जैसे सूर्य के लिए
स्वाहा. सोने जैसे चमकने वाले देव के लिए स्वाहा. सोने जैसी ज्योति वाले देव के
लिए स्वाहा. सोने जैसे सूर्य वाले देव के लिए स्वाहा. (५०)
अग्निं युनज्मि शवसा घृतेन दिव्य १४ सुपर्णं वयसा बृहन्तम्.
तेन वयं गमेम ब्रध्नस्य विष्टप १४ स्वो रुहाणा अधि नाकमुत्तमम्.. (५१)
हम अग्नि को घी से युक्त करते हैं. हम घी की आहुतियों से अग्नि की बढ़ोतरी
करते हैं. अग्निदिव्य गुण वाले हैं. अग्निवय वहन करते हैं. उस से हम ऊपर बाधा रहित
स्वर्गलोक जाते हैं. उत्तम स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं. वहीं अधिष्ठित होते हैं. (५१)
इमौ ते पक्षावजरौ पतत्रिणौ याभ्या १४ रक्षा १४ स्यपह १४ स्यग्ने.
ताभ्यां पतेम सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः.. (५२)
हे अग्नि! आप के दोनों पंख अजर हैं. सदैव उड़ने के लिए तत्पर हैं. दोनों
पंख से आप राक्षसों का नाश करते हैं. आप उन दोनों पंखों से श्रेष्ठ कर्म करने
वालों के उस लोक में प्रस्थान कीजिए, जहां पहले ही उत्पन्न पुरातन ऋषिगण
जा चुके हैं. (५२)
इन्दुर्दक्षः श्येन ऽ ऋतावा हिरण्यपक्षः शकुनो भुरण्युः.
महान्तसधस्थे ध्रुव ऽ आ निष्त्तो नमस्ते अस्तु मा मा हि १४ सीः.. (५३)
हे अग्नि! आप चंद्रमा जैसे दक्ष, बाज जैसे वेगशाली हैं. आप सत्यवान, सोने
जैसे पंख वाले, शक्तिमान, भरणपोषण कर्ता हैं व महान् हैं. ध्रुव (स्थिर), यज्ञ में
सध कर रहते हैं. हे अग्नि! आप को नमन! आप हमारे अनुकूल हों. आप हमारे प्रति
हिंसा मत कीजिए. (५३)
२३४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
दिवो मूर्द्धासि पृथिव्या नाभिरूर्गपामोषधीनाम्.
विश्वायुः शर्म सप्रथा नमस्पथे.. (५४)
हे अग्नि! आप स्वर्गलोक की मूर्धा, पृथ्वीलोक की नाभि, ओषधियों का
सारतत्त्व व विश्व का जीवन (आयु) हैं. आप सुखदाता व समस्त पथ में व्याप्त हैं.
आप पथप्रदर्शक हैं. हे अग्नि! आप को नमन. (५४)
विश्वस्य मूर्धन्नधितिष्ठसि श्रितः समुद्रे ते हृदयमप्स्वायुरपो दतोदधिं भिन्त.
दिवस्पर्जन्यादन्तरिक्षात्पृथिव्यास्ततो नो वृष्ट्याव.. (५५)
हे अग्नि! आप विश्व की मूर्धा पर अधिष्ठित हैं. आप का हृदय समुद्र में आश्रित
है. आप जल में व्याप्त हैं. आप समुद्र का भेदन कर के जल निकालिए. आप
स्वर्गलोक व बादलों से हमारे लिए वर्षा कीजिए. आप अंतरिक्ष व पृथ्वी से हमारे
लिए वर्षा कीजिए. (५५)
इष्टो यज्ञो भृगुभिराशीर्दा वसुभिः. तस्य न ऽ इष्टस्य प्रीतस्य द्रविणेहागमेः.. (५६)
धन इष्ट है. यज्ञ में हम बारबार आप की इच्छा करते हैं. आप हमें भरपूर धनों
से आशीर्वाद दीजिए. हम धन से प्रीति रखते हैं. हम धन के लिए उत्तम रीति से यज्ञ
संपादित करते हैं. (५६)
इष्टो अग्निर्राहुतः पिपर्तु न ऽ इष्ट १४ हविः. स्वगेदं देवेभ्यो नमः.. (५७)
हे अग्नि! आप इष्ट हैं. हम आप का आह्वान करते हैं. हम हवि से तृप्त करते
हैं. आप स्वयं प्रकाश व गमनशील हैं. आप हमारी हवि देवों तक पहुंचाने की कृपा
करें. (५७)
यदाकूतात्समुसुस्रोद्धृदो वा मनसो वा सम्भृतं चक्षुषो वा.
तदनु प्रेत सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः.. (५८)
हे यजमानो! ज्ञान श्रेष्ठ बुद्धि के स्रोत से उत्पन्न होता है. मानस से निकलता है.
चक्षुओं से स्रवित होता है. हम उस का और श्रेष्ठ कर्मों का अनुकरण करें. हम उस
लोक को प्राप्त करें, जहां पूर्व में उत्पन्न पुरातन ऋषि पहुंच चुके हैं. (५८)
एतं १४ सधस्थ परि ते ददामि यमावहाच्छेवधिं जातवेदाः.
अन्वागन्ता यज्ञपतिर्वो अत्र त १४ स्म जानीत परमे व्योमन्.. (५९)
हे परम शक्ति! चारों ओर से यज्ञफल हम आप को भेंट करते हैं. अग्नि यजमान
को जो फल भेंट करते हैं, वह हम आप के लिए अर्पित करते हैं, अंततोगत्वा
यजमान परम व्योम में आता है. उस की गति को आप जानिए. (५९)
एतं जानीथ परमे व्योमन् देवाः सधस्था विद रूपमस्य.
यदागच्छात्पथिभिर्देवयानैरिष्टापूर्ते कृणवाथाविरस्मै.. (६०)
यजुर्वेद - २३५
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हे परम व्योम में स्थित दिव्य शक्तियो! आप यजमान के सधे हुए रूप को जानने
की कृपा कीजिए. जब यजमान देवयान (देवताओं के जाने योग्य) पथ से गमन करें,
उस समय आप इस यजमान की अभीष्टपूर्ति करने की कृपा कीजिए. (६०)
उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते स ँ सृजेथामयं च.
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत.. (६१)
हे अग्नि! आप जाग्रत होने व यजमान के अभीष्ट की पूर्ति करने की कृपा
कीजिए. आप यजमान के लिए सब सुख सिरजिए. हे विश्वो! यजमान को आप
चिरकाल तक स्वर्गलोक में अधिष्ठित करने की कृपा कीजिए. (६१)
येन वहसि सहस्रं येनाग्ने सर्ववेदसम्. तेनेमं यज्ञं नो नय स्वर्देवेषु गन्तवे.. (६२)
हे अग्नि! आप जिस से हजारों को वहन करते हैं, आप जिस से सब को
जानते हैं, आप उसी सामर्थ्य से यज्ञ को ले जाने (पहुंचाने) की कृपा कीजिए.
आप देवताओं के गंतव्य पर यजमानों को ले जाने की कृपा कीजिए. (६२)
प्रस्तरेण परिधिना स्रुचा वेद्या च बर्हिषा. ऋचेमं यज्ञं नो नय स्वर्देवेषु गन्तवे.. (६३)
हे अग्नि! पत्थर, परिधि, स्रुक (चम्मच), वेदी, कुशा व ऋचा से आप हमारे
इस यज्ञ को देवताओं के गंतव्य की ओर ले जाने की कृपा कीजिए. (६३)
यद्दत्तं यत्परादानं यत्पूर्तं याश्च दक्षिणाः. तदग्निवैश्वकर्मणः स्वर्देवेषु नो दधत्.. (६४)
हम ने जो कुछ दूसरों को दान किया है, हम ने जो कुछ प्रतिपूर्ति की है, हम ने जो
कुछ दक्षिणा दी है, उसे विश्वकर्मा अग्नि देवताओं के लिए धारने की कृपा करें. (६४)
यत्र धारा ऽ अनपेता मधोर्घृतस्य च याः.
तदग्निवैश्वकर्मणः स्वर्देवेषु नो दधत्.. (६५)
जहां मधु व घी की धाराएं लगातार प्रवाहित होती रहती हैं, उन धाराओं को
विश्वकर्मा अग्नि देवताओं के लिए धारने की कृपा करें. (६५)
अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म ऽ आसन्.
अर्कस्त्रिधातू रजसो विमानोजस्रो घर्मो हविरस्मि नाम.. (६६)
अग्नि जन्म से ही सर्वज्ञ हैं. घी उन की आंखें हैं. हवि अमृत है. तीनों धातुओं
का सार रज है. वह अजस्र जल का निर्माता है. ग्रीष्म का निर्माता और हवि वही
है. (६६)
ऋचो नामास्मि यजूं षि नामास्मि सामानि नामास्मि.
ये अग्नयः पाञ्चजन्या ऽ अस्यां पृथिव्यामधि.
तेषामसि त्वमुत्तमः प्र नो जीवतवे सुव.. (६७)
२३६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
ऋचा नामक अग्नि है. यजु नामक अग्नि है. साम नामक अग्नि है. इस पृथ्वि
पर जो पंच अग्नियां हैं, उन में आप श्रेष्ठ हैं. आप हम सब को दीर्घ काल तक
जिलाने की कृपा कीजिए. (६७)
वार्त्रहत्याय शवसे पृतनाषाह्वाय च. इन्द्र त्वा वर्तयामसि.. (६८)
हे इंद्र देव! आप शत्रुओं पर आक्रमण कर के उन का नाश कर देते हैं. आप
सामर्थ्यवान हैं. हम बारबार आप का आह्वान करते हैं. (६८)
सहदानुं पुरुहूत क्षियन्तमहस्तमिन्द्र सं पिणक् कुणारुम्.
अभि वृत्रं वर्धमानं पियारूमपादमिन्द्र तवसा जघन्थ.. (६९)
हे इंद्र देव! आप को हजारों यजमान हवि भेंट करते हैं. आप यजमान द्वारा भेंट
की गई हवि को ग्रहण करते हैं. आप हमारे नजदीक के शत्रुओं को कुचल दीजिए.
आप गालीगलौज करने वाले शत्रुओं को साधनहीन कर दीजिए. आप ऐसे शत्रुओं
का नाश कर दीजिए. आप सब ओर आतंक फैला सकते हैं. आप सब ओर से
बढ़ोतरी पाने वाले हैं. आप से अनुरोध है कि आप वृत्रासुर को पैर रहित बना
दीजिए. आप वृत्रासुर का नाश कर दीजिए. (६९)
वि न ऽ इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः.
यो अस्माँ २ अभिदासत्यधरं गमया तमः.. (७०)
हे इंद्र देव! आप से अनुरोध है कि आप युद्धों में हमारे दुश्मनों को नष्ट कर
दीजिए. जो शत्रु हमारे साथ युद्ध करने के लिए तैयार खड़े हों, उन्हें आप पतन के
गर्त में पहुंचा दीजिए. जो शत्रु हमें दास बनाने की इच्छा रखते हैं, आप उन्हें अंधेरे
गर्त में पहुंचा दीजिए. (७०)
मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत ऽ आ जगन्था परस्याः.
सृक ण्ष स ण्ष शाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रून् ताढि वि मृधो नुदस्व.. (७१)
हे इंद्र देव! आप हमारे (कुचाल वाले) चालाक, पर्वत व गुफाओं में छिपे,
शेर जैसे खतरनाक व हमारे पास दूर के शत्रुओं को सब ओर से घेर लीजिए. आप
हमारे तीखे हथियारों से शत्रुओं को भेदिए व पीछे खदेड़ दीजिए. (७१)
वैश्वानरो न ऽ ऊतय ऽ आ प्र यातु परावतः. अग्निनः सुष्टुतीरुप.. (७२)
हे अग्नि! आप विश्व का कल्याण करने वाले हैं. आप आइए. आप हमारी रक्षा
कीजिए. आप हमारी स्तुतियां सुनिए. आप हमारी रक्षा कीजिए. (७२)
पृष्टो दिवि पृष्टो अग्निः पृथिव्यां पृष्टो विश्वा ओषधीरा विवेश.
वैश्वानरः सहसा पृष्टो अग्निः स नो दिवा स रिषस्पातु नक्तम्.. (७३)
यजुर्वेद - २३७
पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप स्वर्गलोक का आधार हैं. आप से स्वर्गलोक के बारे में पूछा
गया. आप से पृथ्वीलोक के बारे में पूछा गया. आप से विश्व की ओषधियों में
प्रवेश के बारे में पूछा गया. आप सब का कल्याण करने वाले हैं. हम साहस के
साथ आप से पूछते हैं कि आप कौन हैं. आप दिन में व रात्रि में हिंसा से हमारी
रक्षा कीजिए. ( ७३ )
अश्याम तं काममग्ने तवोती अश्याम रयि ᳲष रयिवः सुवीरम्.
अश्याम वाजमभि वाजयन्तोश्याम द्युम्नमजराजरं ते.. (७४)
हे अग्नि! आप हमारी सभी कामनाएं फलीभूत करें. आप हमें धनवान, श्रेष्ठ
वीर पुत्रों वाला, बलवान व धनवान बनाएं. हम आप से सदा अजर व अमर रहने
वाली द्युति ( कांति चमक ) पाएं. ( ७४ )
वयं ते अद्य ररिमा हि काममुत्तानहस्ता नमसोपसद्य.
यजिष्ठेन मनसा यक्षि देवानस्रेधता मन्मना विप्रो अग्ने.. (७५)
हे अग्नि! हम सब नमस्कार कर के आज आप के पास पहुंचते हैं. हम हाथ
ऊंचे कर के आप को नमस्कार करते हैं. हम यज्ञ में दत्तचित्त हैं. हम मन से आप
को हवि भेंट करते हैं. आप इस हवि को ब्राह्मणगणों तक पहुंचाने की कृपा
कीजिए. ( ७५ )
धामच्छदग्निरिन्द्रो ब्रह्मा देवो बृहस्पतिः.
सचेतसो विश्वे देवा यज्ञं प्रावन्तु नः शुभे.. (७६)
हे अग्नि! आप सब के धाम हैं. हे ब्रह्मा! हे बृहस्पति! आप सब के धाम हैं.
सभी देवगणों से अनुरोध है कि वे अच्छे मन से किए जा रहे यजमान के इस यज्ञ
को शुभ परिणति ( परिणाम ) प्रदान करने की कृपा करें. ( ७६ )
त्वं यविष्ठ दाशुषो नूं: पाहि शृणुधी गिरः. रक्षा तोकमुत त्मना.. (७७)
हे अग्नि! आप जौमय व दाता हैं. आप मनुष्यों की रक्षा करें. आप हमारी
वाणियां सुनने, हमारी संतान और हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ७७ )
२३८ – यजुर्वेद
उन्नीसवां अध्याय
उन्नीसवां अध्याय
स्वादीं त्वा स्वादुना तीव्रां तीव्रेणामृताममृतेन.
मधुमर्तीं मधुमता सृजामि स १७ सोमेन.
सोमोस्यश्विभ्यां पच्यस्व सरस्वत्यै पच्यस्वेन्द्राय सुत्राम्णे पच्यस्व.. (१)
हे ओषध देव! आप स्वादिष्ट, स्वादु, तीव्र व अमृतमय हैं. आप को मधु मिश्रित
मधुर सोम के साथ मिला कर सृजित करते हैं. आप दोनों अश्विनीकुमारों के लिए
पकने की कृपा करें. आप सरस्वती देवी के लिए पकने की कृपा करें. आप संरक्षक
इंद्र देव के लिए पकने की कृपा करें. ( १ )
परीतो षिञ्चता सुत १७ सोमो य उत्तम १७ हवि:.
दधन्वा यो नर्यो अप्स्वन्तरा सुषाव सोममद्रिभि:.. (२)
हे यजमानो! आप सोम को चारों ओर से उत्तम हवि से सींचिए. आप यजमानों
के लिए नीति धारण कीजिए. सोम जल के बीच में हैं. पत्थरों से उस को कूट कर
सींचा जाता है. ( २ )
वायो: पूतः पवित्रेण प्रत्यङ्क्सोमो अतिद्रुतः.
इन्द्रस्य युज्यः सखा.
वायो: पूतः पवित्रेण प्राङ्क्सोमो अतिद्रुतः.
इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (३)
वायु देव शुद्ध, पवित्र व अति तीव्र गति वाले हैं और इंद्र देव के साथ जुड़ते
हैं. इंद्र देव के सखा हैं. वायु शुद्ध, पवित्र व बहुत द्रुत गति वाले हैं. इंद्र देव के सखा
हैं. ( ३ )
पुनाति ते परिस्रुत १७ सोम १७ सूर्यस्य दुहिता. वारेण शश्वता तना.. (४)
सोम पवित्र हैं. चारों ओर से स्रवित ( झरते ) होते हैं. सोम को पवित्र करते हैं.
सूर्य की दुहिता पवित्र करती हैं. श्रद्धा तुम्हें पवित्र बनाती हैं. ( ४ )
ब्रह्म क्षत्रं पवते तेज ऽ इन्द्रिय—सुरया सोमः सुत ऽ आसुतो मदाय.
शुक्रेण देव देवताः पिपृग्धि रसेनान्नं यजमानाय धेहि.. (५)
यजुर्वेद - २३९
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
हे सोम! आप पवित्र तेज झराइए. आप ब्राह्मणों व क्षत्रियों को पवित्र कीजिए.
सोम इंद्रिय सामर्थ्य को प्रकट करता है. सरस हो कर सोम और अधिक आनंददायी
हो जाता है. यह देवों का देव व चमकीला है. यह यजमानों के लिए रसमय अन्न
धारण करता है. (५)
कुविदङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय.
इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नम ऽ उक्तिं यजन्ति.
उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्ण ऽ एष ते योनिस्तेजसे त्वा
वीर्याय त्वा बलाय त्वा.. (६)
अन्नवान किसान पहले ही अन्न को काट कर रख लेता है, ताकि उस में से
पर्याप्त जौ निकल सके. ये यजमान कुश के आसन पर विराजमान हैं. यजमान
नमस्कारपूर्वक यज्ञ करते हैं. अश्विनी देवों, सरस्वती देवी, संरक्षक इंद्र देव के लिए
आप को उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल निवास है. हम तेज,
वीर्य व बल के लिए आप को यहां स्थापित करते हैं. (६)
नाना हि वां देवहित थ्ं सदस्कृतं मा स थ्ं सृक्षाथां परमे व्योमन्.
सुरा त्वमसि शुष्मिणी सोम ऽ एष मा मा हि थ्ं सी: स्वां योनिमाविशन्ती.. (७)
आप नाना प्रकार से देवताओं का हित व श्रेष्ठ कार्य करने वाले हैं. आप परम
व्योम में स्थित रहते हैं. सुरा तुम बलवती हो. यह सोम अलग स्वभाव का है. आप
उस के मूल स्थान में प्रवेश करते हुए उस के प्रति हिंसा मत कीजिए. (७)
उपयामगृहीतोस्याश्विनं तेजः सारस्वतं वीर्यमैन्द्रं बलम्.
एष ते योनिर्मोदाय त्वा नन्दाय त्वा महसे त्वा.. (८)
सोम देव! आप उपयाम में ग्रहण किए गए हैं. अश्विनीकुमार के तेज के लिए
व सरस्वती देवी के पराक्रम के लिए आप को स्थापित करते हैं. हमारे लिए वीर्य
धारिए. (८)
तेजोसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि बलमसि बलं मयि धेह्योजोस्योजो
मयि धेहि मन्युरसि मन्युं मयि धेहि सहोसि सहो मयि धेहि.. (९)
आप बलवान हैं. हमारे लिए बल धारिए. आप ओजवान हैं. हमारे लिए ओज
धारिए. आप मन्यु (उत्साह) हैं. हमारे लिए उत्साह धारिए. आप सहनशील हैं.
आप हमारे लिए सहनशीलता धारिए. आप संघर्षशील हैं. आप हमारे लिए
संघर्षशीलता धारिए. (९)
या व्याघ्रं विषूचिकोभौ वृकं च रक्षति.
श्येनं पतत्रिण थ्ं सि थ्ं ह थ्ं सेमं पात्व थ्ं हसः.. (१०)
२४० - यजुर्वेद 632/15
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
जो व्याघ्र और विषूचिका दोनों की रक्षा करती है, जो भेड़िए की भी रक्षा
करती है, जो पतनशील बाज की रक्षा करती है, जो सिंह की रक्षा करती है, वही
( शक्ति ) यजमानों की भी रक्षा करने की कृपा करे. ( १० )
यदापिपेष मातरं पुत्रः प्रमुदितो धयन्.
एतत्तदग्ने अनृणो भवाम्यहन्तौ पितरौ मया.
सम्पृच स्थ सं मा भद्रेण पृङ्क्त विपृच स्थ वि मा पाप्मना पृङ्क्त.. (११)
दूध पीता हुआ बालक प्रमुदित होता हुआ मां को प्रताड़ित करता है, उसी
प्रकार हम मातापिता के ऋण से उऋण होना चाहते हैं. मातापिता कल्याणकारी हैं.
आप हमें पापों से दूर या अलग करने की कृपा कीजिए. ( ११ )
देवा यज्ञमतन्वत भेषजं भिषजाश्विना.
वाचा सरस्वती भिषगिन्द्रायेन्द्रियाणि दधतः.. (१२)
देवताओं व वैद्य अश्विनीकुमार ने यज्ञ का विस्तार किया. सरस्वती ने वाणी
से इंद्र देव के लिए इंद्रियों में क्षमता धारते हुए यज्ञ का विस्तार किया. ( १२ )
दीक्षायै रूप १४ शष्पाणि प्रायणीयस्य तोक्मानि.
क्रयस्य रूप १४ सोमस्य लाजाः सोमा १४ शवो मधु.. (१३)
दीक्षा के लिए प्रायणीय ( आरंभिक ) जौ यज्ञ रूप हैं. खरीदे गए लाजा सोम
के लिए कल्याणकारी व मधुमय हैं. ( १३ )
आतिथ्यरूपं मासरं महावीरस्य नग्नहुः. रूपमुपसदामेतत्तिस्रो रात्रीः सुरासुता.. (१४)
धन और ओषधियों का चूर्ण आतिथ्य रूप है. महान् वीरों के लिए उपयोगी है.
तीन रातों तक उपसद ( निकट जाने वाले ) के रूप में टपकता और सुरा बन जाता
है. ( १४ )
सोमस्य रूपं क्रीतस्य परिस्रुत्परिशिच्यते.
अश्विभ्यां दुग्धं भेषजमिन्द्रायेन्द्र १४ सरस्वत्या.. (१५)
खरीदे गए सोम का रूप चारों ओर से टपकता है. वैद्य अश्विनी व सरस्वती
देवी इंद्र देव के लिए दूध दुहती हैं. ( १५ )
आसन्दी रूप १४ राजासन्द्वै वेद्यै कुम्भी सुराधानी.
अन्तर ऽ उत्तरवेद्या रूपं कारोतरो भिषक्.. (१६)
सोम राजा स्वरूप हैं और राजा के आसन पर विराजमान हैं. वेदी पर सुरा का
कुंभ स्थापित किया गया है. दोनों के बीच उत्तरवेदी हैं. भिषक् के रूप में छलने
( छानने का यंत्र ) को स्थापित किया गया है. ( १६ )
यजुर्वेद - २४१
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
वेद्या वेदिः समाप्यते बर्हिषा बर्हिरिन्द्रियम्.
यूपेन यूप ऽ आप्यते प्रणीतो अग्निरग्निना.. (१७)
इस यज्ञ में वेदी से वेदी को प्राप्त किया जाता है. इस यज्ञ में कुशा से कुशा
को प्राप्त किया जाता है. इस यज्ञ में इंद्रियों से इंद्रिय ज्ञान प्राप्त किया जाता है. इस
यज्ञ में स्तंभ से स्तंभ को प्राप्त किया जाता है. इस यज्ञ में अग्नि से अग्नि को प्राप्त
किया जाता है. ( १७ )
हविर्धानं यदश्विनाग्नीध्रं यत्सरस्वती.
इन्द्रायेन्द्र ९४ सदस्कृतं पत्नीशालं गार्हपत्यः.. (१८)
अश्विनीकुमार से हवि का धान प्राप्त होता है. सरस्वती देवी से आग्नीध्र प्राप्त
होता है. यज्ञ सदन में, पत्नीशाला में तथा गार्हपत्य अग्नि में इंद्र देव के ऐश्वर्य के
अनुकूल हवि देवगणों द्वारा प्रस्तुत की जाती है. ( १८ )
प्रैषैभिः प्रैषानाप्नोत्याप्रीभिराप्रीर्यज्ञस्य.
प्रयाजैर्भिरनुयाजान् वषट्कारेभिराहुतीः.. (१९)
प्रैष ( कष्ट या प्रेरणा ) आदि से प्रैष प्राप्त होता है. प्रिय से प्रियदायी की प्राप्ति
होती है. यज्ञ से यज्ञ की प्राप्ति होती है. यजन से यज्ञ का अनुकरण करने वाले की
प्राप्ति होती है. वषट्कारों से आहुतियों की प्राप्ति होती है. ( १९ )
पशुभिः पशूनाप्नोति पुरोडाशैर्हवी ९४ ष्या.
छन्दोभिः सामिधेनीर्याज्याभिर्वषट्कारान्.. (२०)
पशुओं से पशु प्राप्त होते हैं. पुरोडाश से हवि प्राप्त होती है. छंदों से सामधेनी
( विशेष प्रकार के मंत्र ) की प्राप्ति होती है. यज्ञ से संबंधित क्रियाओं से वषट्कारों
को प्राप्त किया जाता है. ( २० )
धानाः करम्भः सक्तवः परीवापः पयो दधि.
सोमस्य रूप ९४ हविष ऽ आमिक्षा वाजिनं मधु.. (२१)
धान, धान की लपसी, सत्तू आदि, जलमय दूध व दही आदि सोम का रूप है.
हवि, ईक्षु ( गन्ना ) आदि, अन्न हवि व शहद आदि सोम का रूप हैं. ( २१ )
धानाना ९४ रूपं कुवलं परीवापस्य गोधूमाः.
सक्तूना ९४ रूपं बदरमुपवाकाः करम्भस्य.. (२२)
धान का रूप ही यज्ञ में अन्न के रूप में प्रयुक्त किया जाता है. चारों ओर उस
से ही गोधूम फैलता है. बेर सत्तू के रूप में तैयार किया जाता है. जौ को लपसी के
रूप में तैयार किया जाता है. इन्हें हवि के रूप में प्रयोग में लाया जाता है. ( २२ )
२४२ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
पयसो रूपं यद्गवा दध्नो रूपं कर्कन्धूनि.
सोमस्य रूपं वाजिन १७ सौम्यस्य रूपमामिक्षा.. (२३)
जौ दूध और दही दही रूप में है. अन्न सोम से संबंधित इन रूपों को हम पूरी
तरह देखना चाहते व चढ़ाना चाहते हैं. (२३)
आश्रावयेति स्तोत्रियाः प्रत्याश्रावो अनुरूपः.
यजेति धाय्यारूपं प्रगाथा ये यजामहाः.. (२४)
स्तोत्र से संबंधित ऋचाएं आश्रावय व प्रत्याश्राव के अनुरूप हैं. यज से
संबंधित ऋचाएं धाय्या रूप हैं. ‘यजामहे' पद से आरंभ होने वाली ऋचाएं प्रगाथा
रूप हैं. (२४)
अर्धऋचैरुक्थाना १७ रूपं पदैराप्नोति निविदः.
प्रणवैः शस्त्राणा १७ रूपं पयसा सोम ऽ आप्यते.. (२५)
आधी ऋचाओं से उक्थों का बोध होता है. पदों से निविद का बोध होता है.
प्रणवों से शस्त्रों के रूप का बोध होता है. दूध से सोम का रूप प्राप्त किया जाता
है. (२५)
अश्विभ्यां प्रातःसवनमिन्द्रेणैन्द्रं माध्यन्दिनम्.
वैश्वदेव १७ सरस्वत्या तृतीयमाप्त १७ सवनम्.. (२६)
अश्विनीकुमारों से प्रातः सवन की प्राप्ति होती है. इंद्र देव और उन से संबंधित
मंत्रों से माध्यंदिन सवन की प्राप्ति होती है. सरस्वती देवी विश्वों से संबंधित हैं. उन
के माध्यम से तृतीय सवन की प्राप्ति होती है. (२६)
वायव्यैर्वायव्यान्याप्नोति सतेन द्रोणकलशम्.
कुम्भीभ्यामम्भृणौ सुते स्थालीभिः स्थालीराप्नोति.. (२७)
वायव्यों से वायव्य की प्राप्ति होती है. सत् से द्रोणकलश की प्राप्ति होती है.
कुंभियों से अंभृण की प्राप्ति होती है. स्थालियों से स्थाली की प्राप्ति होती है. (२७)
यजुर्भिराप्यन्ते ग्रहा ग्रहैः स्तोमाश्च विष्टुतीः.
छन्दोभिरुक्थाशस्त्राणि साम्नावभृथ ऽ आप्यते.. (२८)
यजुमंत्रों से यजु और ग्रहों से ग्रह की प्राप्ति होती है. स्तोत्रों से इष्ट स्तुतियों,
छंदों से उक्थ व शस्त्र की प्राप्ति होती है. साम मंत्रों से शस्त्र साम व अवभृथ की
प्राप्ति होती है. (२८)
इडाभिर्भक्षानाप्नोति सूक्तवाकेनाशिषः.
शंयुना पत्नीसंयाजान्त्समिष्टयजुषा स १७ स्थाम्.. (२९)
यजुर्वेद - २४३
पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय
यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले अन्न के भक्षण से वर्षा होती है. वाग्सूक्त से आशीष
प्राप्त होता है. संयम से पतिपत्नी संबंध में प्रेम प्राप्त होता है. इष्ट यज्ञ से संस्थिति
( उत्तम स्थिति ) प्राप्त होती है. ( २९ )
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्.
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते.. (३०)
व्रत से दीक्षा प्राप्त होती है. दीक्षा से दक्षिणा प्राप्त होती है. दक्षिणा से श्रद्धा
प्राप्त होती है. श्रद्धा से सत्य प्राप्त किया जाता है. ( ३० )
एतावद्रूपं यज्ञस्य यद्देवैर्ब्राह्मणा कृतम्.
तदेतत्सर्वमाप्नोति यज्ञे सौत्रामणी सुते.. (३१)
ब्राह्मणों ने यज्ञ के इतने ही रूप का वर्णन किया है. यज्ञ में वह सब प्राप्त
किया जाता है. सौत्रामणि यज्ञ में सोम की आहुति से यह सब प्राप्त किया जाता
है. ( ३१ )
सुरावन्तं बर्हिषद १४ सुवीरं यज्ञ १४ हिन्वन्ति महिषा नमोभिः.
दधानाः सोमं दिवि देवतासु मदेमेन्द्रं यजमानाः स्वर्काः.. (३२)
हम सुरावान, कुश के आसन पर स्थित व श्रेष्ठवीर को नमस्कारों से मनाते
हैं. हम महिमाशाली यज्ञ को नमस्कारों से विस्तृत करते हैं. स्वर्गलोक में
विद्यमान देवताओं के लिए सोम धारण करते हुए यजमान इंद्र देव को आनंदित
करते और अत्यंत प्रसन्न होते हैं. ( ३२ )
यस्ते रसः सम्भृत ऽ ओषधीषु सोमस्य शुष्मः सुरया सुतस्य.
तेन जिन्व यजमानं मदेन सरस्वटीमश्विनाविन्द्रमग्निम्.. (३३)
ओषधियों में जो इकट्ठा किया गया सोम का रस है, वह तीक्ष्ण और सारवान
है. उस सोम रस से यजमान को सरस्वती देवी, अश्विनीकुमारों व अग्नि को
आनंदित करना चाहिए. ( ३३ )
यमश्विना नमुचेरासुरादधि सरस्वत्यसुनोदिन्द्रियाय.
इमं त १४ शुक्रं मधुमन्तमिन्दु १४ सोम १४ राजानमिह भक्षयामि.. (३४)
अश्विनीकुमारों ने असुर नमुचि से सोम को पाया. सरस्वती देवी ने इंद्र देव के
लिए सोम को निचोड़ा. सोम राजा, चमकीला व मधुर है. हम उस का पान करते
हैं. ( ३४ )
यदत्र रिप्त १४ रसिनः सुतस्य यदिन्द्रो अपिबच्छचीभिः.
अहं तदस्य मनसा शिवेन सोम १४ राजानमिह भक्षयामि.. (३५)
२४४ - यजुर्वेद