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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 421 में से

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पृष्ठ 231

पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
विश्वे अद्य मरुतो विश्व ऽ ऊती विश्वे भवन्त्वग्नयः समिद्धाः.
विश्वे नो देवा ऽ अवसागमन्तु विश्वमस्तु द्रविणं वाजो अस्मे.. (३१)
आज हमारे इस यज्ञ में (सभी) मरुद्गण पधारने की कृपा करें. सभी देवगण
अपने रक्षा साधनों सहित पधारने की कृपा करें. सभी अग्नियां प्रज्वलित होने की
कृपा करें. हमारे लिए सब प्रकार के अन्न, धन प्राप्त कराने की कृपा कराएं. (३१)
वाजो नः सप्त प्रदिशश्चतस्रो वो परावतः.
वाजो नो विश्वैर्देवैर्धनसाताविहावतु.. (३२)
हमारे अन्न, धन की सातों उपदिशाओं और चारों दिशाओं में बढ़ोत्तरी हो.
समस्त देवगण (विश्व) हमारे धनधान्य की रक्षा करने की कृपा करें. (३२)
वाजो नो अद्य प्र सुवाति दानं वाजो देवाँ २ ऋतुभिः कल्पयाति.
वाजो हि मा सर्ववीरं जजान विश्वा ऽ आशा वाजपतिर्जयेयम्.. (३३)
देवगण आप अन्न के अधिष्ठाता हैं. आप हमें अन्नदान करने की प्रेरणा देने
की कृपा कीजिए. देवताओं को ऋतु के अनुसार अन्न फलीभूत होता रहे. (३३)
वाजः पुरस्तादुत मध्यतो नो वाजो देवान् हविषा वर्धयाति.
वाजो हि मा सर्ववीरं चकार सर्वा ऽ आशा वाजपतिर्भवेयम्.. (३४)
अन्न हमारे सामने उपजता है. वह हमारे घर के बीच उपजता है. अन्न हवि से
देवताओं की बढ़ोत्तरी करता है. वह ही हम सब को वीर बनाता है. हम आप की
कृपा से अन्नपति व आशावादी बनें. (३४)
सम्मा सृजामि पयसा पृथिव्याः सम्मा सृजाम्यद्भिरोषधीभिः.
सोहं वाज ४५ सनेयमग्ने.. (३५)
हे अग्नि! आप पृथ्वी पर रस से सृजन करते हैं. आप पृथ्वी पर रस, जल और
ओषध से सृजन करते हैं. हम अग्नि की कृपा से ओषध और जल पाते हैं. (३५)
पयः पृथिव्यां पय ऽ ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः.
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्.. (३६)
हे अग्नि! आप पृथ्वी पर दूध धारण कीजिए. आप पृथ्वी पर ओषधियों में
जीवन धारण कीजिए. आप स्वर्गलोक में दिव्य रस धारण कीजिए. आप
अंतरिक्ष में दिव्य रस धारण कीजिए. आप की कृपा से हमारे लिए सभी दिशाएं,
प्रदिशाएं पयस्विनी (दूध देने वाली) हो जाएं. (३६)
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
सरस्वत्यै वाचो यन्तुर्यन्त्रेणाग्नेः साम्राज्येनाभिषिञ्चामि.. (३७)
यजुर्वेद - २३१