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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप हमें पुनः ऊर्जस्वी और आयुष्मान बनाइए. आप हमें पुनः पाप
से बचाइए. (४०)
सह रय्या निवर्त्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया. विश्वप्सन्या विश्वतस्परि.. (४१)
हे अग्नि! आप हमें पुनः धन के साथ प्राप्त होइए. आप वर्षा की धारा से पृथ्वी
पर सारी वनस्पति को बढ़ाने की कृपा करें. (४१)
बोधा मे अस्य वचसो यविष्ठ म ँ४ हिष्ठस्य प्रभृतस्य स्वधावः.
पीयति त्वो अनु त्वो गृणाति वन्दारुष्टे तन्वं वन्दे अग्ने.. (४२)
हे अग्नि! आप हमारे इन वचनों को सुनिए. प्रसन्न व्यक्ति आप की और रुष्ट
व्यक्ति आप को कोसते हैं. हम आप के तन का वंदन करते हैं. (४२)
स बोधि सूरिर्मघवा वसुपते वसुदावन्.
युयोध्यस्मद् द्वेषा ँ४ सि विश्वकर्मणे स्वाहा.. (४३)
हे अग्नि! आप धन के स्वामी और धनदाता हैं. आप हमारे द्वेषियों को दूर करने
की कृपा कीजिए. सर्वकर्मा अग्नि के लिए स्वाहा. (४३)
पुनस्त्वादित्या रुद्रा वसवः समिन्धतां पुनर्ब्रह्माणो वसुनीथ यज्ञैः.
घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः.. (४४)
हे अग्नि! आप को आदित्य, रुद्र, वसु पुनः प्रज्वलित करने की कृपा करें.
अग्नि धन के नेता हैं. वे यज्ञ से यजमान आप को बारबार प्रज्वलित करने की कृपा
करें. वे घी से आप अपने शरीर की बढ़ोतरी करने और अपने यजमान की कामनाएं
पूरी करने की कृपा करें. (४४)
अपेत वीत वि च सर्पतातो येत्र स्थ पुराणा ये च नूतनाः.
अदाद्यमोवसानं पृथिव्या ऽ अक्रन्निमं पितरो लोकमस्मै.. (४५)
नए पुराने जो भी यमदूत यहां हों वे दूर, बहुत दूर चले जाएं. बहुत दूर हट
जाएं. पृथ्वी का यह स्थान यमराज ने स्वयं यज्ञ हेतु हमारे पूर्वजों को देने की
कृपा की है. (४५)
संज्ञानमसि कामधरणं मयि ते कामधरणं भूयात्.
अग्नेर्भस्मास्यग्नेः पुरीषमसि चित स्थ परिचित ऽ ऊर्ध्वचितः श्रयध्वम्.. (४६)
हे उषा! आप सम्यक् ज्ञान हैं. आप कामनाएं धारण करती हैं. आप हमारे लिए
भी कामना धारण करने वाली हों. आप भस्म और अग्नि की पूरक हैं. धरती पर
बालू की पतली रेखाएं बिछाई गई हैं. आप चारों ओर तथा ऊपर की ओर स्थापित
होने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ को श्रेयस्कर बनाइए. (४६)
यजुर्वेद - १४७

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
अय छ्ष सो अग्निर्यस्मिन्त्सोममिन्द्रः सुतं दधे जठरे वावशानः.
सहस्रियं वाजमत्यं न सप्ति छ्ष ससवान्त्सन्स्तूयसे जातवेदः.. (४७)
यह वही अग्नि है, जिसे सोम के रूप में इंद्र देव अपनी जठराग्नि में भरते हैं.
यह हजार गुना है. यह अन्नमय, बलदायी और सर्वज्ञ है. हजारों के द्वारा इन की
स्तुति की जाती है. ( ४७ )
अग्ने यत्ते दिवि वर्चः पृथिव्यां यदोषधीष्वप्स्वा यजत्र.
येनान्तरिक्षमुर्वाततन्थ त्वेषः स भानुरर्णवो नृचक्षाः.. (४८)
हे अग्नि! आप का जो वर्चस्व स्वर्गलोक में है, वही वर्चस्व पृथ्वीलोक में है.
वही वर्चस्व ओषधियों व जलों में है. जिस से आप ने अंतरिक्ष का विस्तार किया
वही यह सूर्य है. वह सभी मनुष्यों को देखने वाला है. ( ४८ )
अग्ने दिवो अर्णमच्छा जिगास्यच्छा देवाँ २ ऊचिषे धिष्ण्या ये.
या रोचने परस्तात् सूर्यस्य याश्चावस्तादुपतिष्ठन्त ऽ आपः.. (४९)
हे अग्नि! आप स्वर्गलोक से सीधे जल पाते हैं. देवगण हमारी बुद्धि को
ऊंचाई की ओर प्रेरित करते हैं. जो सामने सूर्य के रूप को भासित है और जो
नीचे जल के रूप में स्थित है, आप दोनों प्रकार के जलों की बरसात करने की
कृपा करते हैं. ( ४९ )
पुरीष्यासो अग्नयः प्रावणेभिः सजोषसः.
जुषन्तां यज्ञमद्रुहोनमीवा ऽ इषो महीः.. (५०)
हे अग्नि! पशुओं का हित साधने वाली, लोक में व्यापक मन के साथ प्रेम
रखने वाली, बीमारियां दूर करने वाली, अन्न देने वाली, वर्षा करने वाली, इष्ट
सिद्धि करने वाली अग्नियां प्रेमपूर्वक इस यज्ञ का सेवन करने की कृपा करें. ( ५० )
इडामग्ने पुरुद छ्ष स छ्ष सनिं गोः शश्वत्तम छ्ष हवमानाय साध.
स्यानः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (५१)
हे अग्नि! आप बहुकर्मा हैं. आप यजमान के लिए गाय के ( दूध, दही ) घी
आदि का दान कीजिए. हमें पुत्र संतान दीजिए. हमारी संतान हमारा और आगे वंश
बढ़ाए. अपनी वह कल्याणकारी बुद्धि हमें प्राप्त कराइए. ( ५१ )
अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः.
तं जानन्नग्न ऽ आ रोहाथा नो वर्धया रयिम्.. (५२)
हे अग्नि! आप की यह वेदी ऋतु को जन्म देने वाली है. इसी से उत्पन्न हो कर
आप चमकते हैं. आप यह जानते हुए इस पर चढ़ने की कृपा कीजिए. आप हमारे
धन की बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. ( ५२ )
१४८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
चिदसि तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.
परिचिदसि तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.. (५३)
हे अग्नि! अब आप की स्थापना कर दी गई है. अब आप अंगअंग में रमने की
कृपा कीजिए. आप चित्त हैं. अब आप विराजिए. आप को चारों ओर स्थापित कर
दिया गया है. आप चित्त से स्थापित होने की कृपा कीजिए. ( ५३ )
लोकं पृण छिद्रं पृणाथो सीद ध्रुवा त्वम्.
इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पतिरस्मिन् योनावसीषदन्.. (५४)
हे अग्नि! लोक को पूरने से जो जगह रह गई आप उन छेदों को भरने की कृपा
कीजिए. आप वहां स्थिर हो कर स्थापित होने की कृपा कीजिए. आप को इंद्र देव
अग्नि और बृहस्पति देव ने यहां स्थापित किया है. ( ५४ )
ता ऽ अस्य सूददोहसः सोम १७ श्रीणन्ति पृश्नयः.
जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वा रोचने दिवः.. (५५)
स्वर्गलोक से जो जल मिलता है, उस से सोम शोभा पाते हैं. देवों के जन्मजन्म
और प्रत्येक यज्ञ में यह सोम इस स्वर्गिक जल से परिपक्व होता है. ( ५५ )
इन्द्रं विश्वा ऽ अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः.
रथीतम १७ रथीनां वाजाना १७ सत्पतिं पतिम्.. (५६)
सभी वाणियां समुद्र के समान विस्तृत हैं. वे वाणियां रथियों में महारथी इंद्र
देव की महिमा का गुणगान करती हैं. इंद्र देव बलवानों में सर्वाधिक बलशाली हैं.
इंद्र देव पालकों में श्रेष्ठ पालक हैं. ( ५६ )
समित १७ सङ्कल्पेथा १७ संप्रीयौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ.
इषमूर्जमभि संवसानौ.. (५७)
हे इंद्र देव! हम समान मति वाले हों. हम सब आपस में प्रिय हों. हम सब
प्रकाशवान हों. हम सब एक साथ प्रेरित हों. हम सब समान ऊर्जस्वी हों. हमारे यज्ञ
का सफलतापूर्वक समापन हो. ( ५७ )
सं वां मना १७ सि सं व्रता समु चित्तान्याकरम्.
अग्ने पुरीष्याधिपा भव त्वं न ऽ इषमूर्जं यजमानाय धेहि.. (५८)
हे अग्नि! हमारे मन समान हों. हमारे संकल्प समान हों. हे अग्नि! आप पुरियों
के स्वामी हैं. आप हमें ऊर्जस्वी बनाइए. आप यजमान के लिए ऊर्जा धारिए. ( ५८ )
अग्ने त्वं पुरीष्यो रयिमान् पुष्टिमाँ २ असि.
शिवाः कृत्वा दिशः सर्वाः स्वं योनिमिहासदः.. (५९)
यजुर्वेद - १४९

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप नगरों के स्वामी हैं. आप धनवान हैं. आप पुष्टिमान हैं. आप
सभी दिशाओं को कल्याणकारी बनाइए. आप यहां अपने मूल स्थान में प्रतिष्ठित
होने की कृपा कीजिए. (५९)
भवतन्नः समनसौ सचेतसावरेपसौ.
मा यज्ञ १४ हि १४ सिष्टं मा यज्ञपतिं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः.. (६०)
हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. आप हमें समान मन वाला बनाइए. आप हमें समान चित्त
वाला बनाइए. आप हमें समान श्रद्धा वाला बनाइए. आप यज्ञ में हिंसा मत कीजिए.
आप यज्ञपति हैं. आप आज हमारे प्रति कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. (६०)
मातेव पुत्रं पृथिवी पुरीष्यमग्नि १४ स्वे योनावभारुखा.
तां विश्वैर्देवैर्ऋतुभिः संविदानः प्रजापतिर्विश्वकर्मा वि मुञ्चतु.. (६१)
जैसे माता पुत्र को धारती है, वैसे ही उखा कल्याणकारी अग्नि को धारती है.
समस्त देवगणों और ऋतु द्वारा ऐक्य भाव से प्रेरित उखा को प्रजापति विश्वकर्मा
पाश से मुक्त करने की कृपा करें. (६१)
असुन्वन्तमयजमानमिच्छ स्तेनस्येत्यामन्विहि तस्करस्य.
अन्यमस्मदिच्छ सा त ऽ इत्या नमो देवि निर्ऋते तुभ्यमस्तु.. (६२)
हे दुष्ट दलन में समर्थ! आप चोरों और तस्करों का नाश करने में समर्थ हैं. आप
विशिष्ट शक्तिवान हैं. आप चोरडाकू छोड़ कर अन्य लोग हमें दीजिए. हे देवी! आप
के लिए हमारा नमस्कार. (६२)
नमः सु ते निर्ऋते तिग्मतेजो ऽ यस्मयं विचृता बन्धमेतम्.
यमेन त्वं यम्या संविदानोत्तमे नाके अधि रोहयैनम्.. (६३)
हे निर्ऋते! आप तेजस्वी हैं. आप शक्तिमान हैं. आप लोहे जैसी दृढ़ हैं. आप हमें
सांसारिक सत्व बंधन से मुक्त कीजिए. यजमान को यमलोक से उत्तम स्वर्गलोक में
पहचानने की कृपा कीजिए. (६३)
यस्यास्ते घोर ऽ आसञ्जुहोम्येषां बन्धानामवसर्जनाय.
यां त्वा जनो भूमिरिति प्रमन्दते निर्ऋतिं त्वाहं परिवेद विश्वतः.. (६४)
हे निर्ऋते! आप क्रूर स्वभाव वाली हैं. हम जन्ममरण के बंधन से मुक्त होने के
लिए आप को आहुति भेंट करते हैं. भले ही लोग आप को भूमि कहते हैं, पर वे
आप को सब ओर से सर्वज्ञ मानते हैं. (६४)
यं ते देवी निर्ऋतिराबबन्ध पाशं ग्रीवास्वविचृत्यम्.
तं ते विष्याम्यायुषो न मध्यादथैतं पितुमद्धि प्रसूतः.
नमो भूत्यै येदं चकार.. (६५)
१५० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
निर्ऋत देवी उन बंधनों को हटाती हैं जिन पाशों ने आप की गरदन को जकड़
रखा था, आप उन बंधनों से छूटिए. आप पोषक अन्न को ग्रहण कीजिए. आप हमें
धन दीजिए. देवी को हमारा नमन. ( ६५ )
निवेशनः सङ्गमनो वसूनां विश्वा रूपाभिचष्टे शचीभिः.
देव ऽ इव सविता सत्यधर्मेन्द्रो न तस्थौ समरे पथीनाम्.. (६६)
हे अग्नि! आप वासदाता, धनदाता, रूपवान और अभीष्ट फलदाता हैं. आप
सविता देव जैसे प्रकाशवान हैं. सत्य रूपी धर्म वाले हैं. युद्ध में इंद्र देव की भांति
स्थिर रहने वाले हैं. ( ६६ )
सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वितन्वते पृथक्. धीरा देवेषु सुम्नया.. (६७)
आप कवि व धीर हैं. देवों के अच्छे मन के लिए आप हल को बैल के जोड़े
के साथ जोतते हैं. ( ६७ )
युनक्त सीरा वि युगा तनुध्वं कृते योनौ वपतेह बीजम्.
गिरा च श्रुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय ऽ इत्सृण्यः पक्वमेयात्.. (६८)
हे किसानो! आप हल को जोड़िए. बैल के कंधों पर जुआ रखिए. आप खेत
को जोतिए. आप बीज बोइए. सृष्टि में अच्छी फसल के लिए स्तुति कीजिए. अन्न
भरभर कर तैयार हो. अन्न अच्छी तरह पके. ( ६८ )
शुन १४ सु फाला वि कृषन्तु भूमि १४ शुनं कीनाशा ऽ अभि यन्तु वाहैः.
शुनासीरा हविषा तोशमाना सुपिप्पला ऽ ओषधीः कर्तनास्मे.. (६९)
भूमि को हल के फाल से अच्छी तरह जोतिए. किसान बैलों के साथ आराम
से जाएं. हे वायु! हे सूर्य! आप हवि से प्रसन्न होइए. आप पृथ्वी को जल से सींचिए.
आप ओषध उपजाइए. आप पृथ्वी को श्रेष्ठ फलों से पूरिए. ( ६९ )
घृतेन सीता मधुना समंज्यतां विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः.
ऊर्जस्वती पयसा पिन्वमानास्मान्त्सीते पयसाभ्याववृत्स्व.. (७०)
विश्व और मरुद्गण हल के फाल को अनुमति देने की कृपा करें. उसे शहद से
सींचने की कृपा करें. आप ऊर्जस्वी होइए. आप दूध से दिशाओं को और हमें घी व
दूध से सींचिए. ( ७० )
लाङ्गलं पवीरवत्सुशेव १४ सोमपित्सरु.
तदुद्वपति गामविं प्रफर्व्यं च पीवरीं प्रस्थावद्रथवाहनम्.. (७१)
हल फाल युक्त हैं. पृथ्वी को खोदते हैं. सोम के रक्षक और कल्याणकारी हैं.
कृषि उत्पादन के साथ ही भेड़, बकरी पुष्ट, गौएं रथ वहन करने वाले उत्तम घोड़े
प्रदान करते हैं. ( ७१ )
यजुर्वेद - १५१

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
कामं कामदुघे धुक्ष्व मित्राय वरुणाय च.
इन्द्रायाश्विभ्यां पूष्णे प्रजाभ्य ऽ ओषधीभ्यः.. (७२)
हल सभी कामनाओं का दोहन करने वाले हैं. मित्र देव और वरुण देव के लिए
इंद्र देव तथा अश्विनी देव के लिए पूषा देव एवं प्रजागण के लिए ओषधियां
उपलब्ध कराने वाले हैं. ( ७२ )
विमुच्यध्वमघ्न्या देवयाना ऽ अगन्म तमस्सपारमस्य. ज्योतिरापाम.. (७३)
मनुष्य अवध्य और यज्ञ के द्वारा देव मार्ग पर ले जाते हैं. आप संसार के पार
ले जाने वाले हैं. हम ईश्वर की कृपा से ज्योति को प्राप्त करें. ( ७३ )
सजूरब्दो अयवोभिः सजूरुषा ऽ अरुणीभिः.
सजोषसावाश्विना द ँश्व सोभिः सजूः सूर ऽ एतशेन सजूर्वैश्वानर ऽ इडया घृतेन
स्वाहा.. (७४)
महीने, दिन और वर्ष से प्रेम रखने वाले के लिए स्वाहा. लाल किरणों से प्रेम
रखने वाली उषा देवी के लिए स्वाहा. चिकित्सकीय कार्यों से प्रेम रखने वाले
अश्विनी देवों के लिए स्वाहा. घोड़ों से प्रेम रखने वाले सूर्य देवों के लिए स्वाहा.
घी से प्रेम रखने वाले अग्नि देव के लिए स्वाहा. ( ७४ )
या ऽ ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा.
मनै नु बभ्रूणामह ँश्व शतं धामानि सप्त च.. (७५)
पहले देवताओं के लिए तीन युग में ओषधियां उत्पन्न हुई हैं. हमें सैकड़ों धाम
और सात धान्यों की क्षमता का ज्ञान है. ओषधियां पक कर भूरेपीले रंग की हो जाती
हैं. ( ७५ )
शतं वो अम्ब धामानि सहस्रमुत वो रुहः.
अधा शतक्रत्वो यूयमिमं मे अगदं कृत.. (७६)
ओषधियों के सैकड़ों नाम हैं. मां के समान गुण युक्त हैं. उन के सैकड़ों
धाम हैं. वे सैकड़ों यज्ञ कराने वाली हैं. आप हमारे अंगों को पुष्ट करने की कृपा
कीजिए. ( ७६ )
ओषधीः प्रति मोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः.
अश्वा ऽ इव सजित्त्वरीर्वीरुधः पारयिष्ण्वः.. (७७)
ओषधियां पुष्पवती हैं. फल उपजाने वाले गुणों से युक्त हैं. ओषधियां हमें
आनंद प्रदान करने वाली और घोड़े की तरह वेगवती हैं. रुकावटों ( बीमारियों ) को
तेजी से दूर ( नष्ट ) करने की कृपा करें. ( ७७ )
१५२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
ओषधीरिरिति मातरस्तद्वो देवीरुप ब्रुवे.
सनेयमश्वं गां वास ऽ आत्मानं तव पूरुष.. (७८)
ओषधियां मातापिता के समान और दिव्य गुणों से संपन्न हैं. हम उन के गुणों
के बारे में कहते रहते हैं. हे यज्ञ पुरुष! आप से प्राप्त घोड़े, गाय और आत्मिक सुखों
का उपभोग करें. ( ७८ )
अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता.
गोभाज ऽ इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्.. (७९)
ओषधियों का निवास पीपल और पत्तों में है. आप गो भाजन बनिए. आप
आकाश का सेवन कीजिए. आप वर्षा करिए. आप यजमान को अन्नधन संपन्न
बनाइए. ( ७९ )
यत्रौषधी: समग्मत राजान: समिताविव.
विप्र: स ऽ उच्यते भिषग्रक्षोहामीवचातन:... (८०)
जैसे राजा राक्षसों पर विजय पाने के लिए युद्ध में जाते हैं, वैसे ही ओषधियां
रोगी और रोग के पास जाती हैं. रोगनाशक होने के ही कारण उन्हें वैद्य और विप्र
कहा जाता है. ( ८० )
अश्वावती ४ सोमावतीमूर्जयन्तीमुदोजसम्.
आवित्सि सर्वा ऽ ओषधीरस्मा ऽ अरिष्टतातये.. (८१)
अनिष्ट का निवारण करने के लिए अश्ववती और सोमवती ऊर्जा से हम
परिचित हैं. यह ऊर्जा ओजस्विता की पोषक है. ( ८१ )
उच्छुष्मा ऽ ओषधीनां गावो गोष्ठादिवेरते.
धन ४ सनिष्यन्तीनामात्मानं तव पूरुष.. (८२)
जैसे गोशाला से गाएं जंगल में जाती हैं, वैसे ही यज्ञ का धुआं वायुमंडल में
जाता है. अग्नि के शरीर से निकलती हुई लपट से उन की शक्ति और सामर्थ्य प्रकट
होती है. ( ८२ )
इष्कृतिर्नाम वो माताथो यूय ४ स्थ निष्कृती:.
सीरा: पतत्रिणी स्थन यदामयति निष्कृथ.. (८३)
आप रोग निवारक हैं. आप माता जैसी हैं. आप विकारनाशक हैं. आप अन्न
की भांति मनुष्य को शक्तिमान बनाने की कृपा करें. ( ८३ )
अति विश्वा: परिष्ठा स्तेन ऽ इव व्रजमक्रमू:.
ओषधी: प्राचुच्यवुर्यत्किं च तन्वो रप:... (८४)
यजुर्वेद - १५३

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
ओषधियां रोग पर वैसे ही आक्रमण करती हैं, जैसे चोर गायों के बाड़े पर आक्रमण
करते हैं. ओषधियां शरीर के समस्त रोगों और विकारों को नष्ट करती हैं. ( ८४ )
यदिमा वाजयन्नहमोषधीर्हस्त ऽ आदधे.
आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा.. ( ८५ )
जैसे वधगृह में ले जाया जा रहा प्राणी वहां पहुंचने से पहले ही अपने को
मरा हुआ मान लेता है, वैसे ही इन शक्तिशाली ओषधियों को लेने से पहले हम
जब हाथ में रखते हैं, तो राजयक्ष्मा जैसे भीषण रोग भी भाग जाते हैं. ( ८५ )
यस्यौषधीः प्रसर्पथाङ्गमङ्गं परुष्परुः.
ततो यक्ष्मं वि बाधध्व ऽ उग्रो मध्यमशीरिव.. ( ८६ )
जब ओषधि कठोर शरीर के अंगप्रत्यंग में पसरती ( फैलती ) है तो यक्ष्मा आदि
भयंकर रोगों को भी पूरी तरह समाप्त कर देती है. ( ८६ )
साकं यक्ष्म प्र पत चाषेण किकिदीविना.
साकं वातस्य ध्राज्या साकं नश्य निहाकया.. ( ८७ )
ओषधि लेने के साथ ही यक्ष्मा रोग दूर हो जाता है. प्राणवायु की तरह ओषधि
के शरीर में व्याप्त होने के साथ ही शेष रोग भी नष्ट हो जाता है. ( ८७ )
अन्या वो अन्यामवत्वन्यान्यस्या ऽ उपावत.
ताः सर्वाः संविदाना ऽ इदं मे प्रावता वचः.. ( ८८ )
हे ओषधियो! आप एक दूसरे के प्रभाव को बढ़ाने की कृपा कीजिए. सभी
ओषधियां परस्पर सहयोग और हमारे इन वचनों को सुनने की कृपा करें. ( ८८ )
याः फलिनीर्या ऽ अफला ऽ अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः.
बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व ँहसः.. ( ८९ )
फल वाली, फलहीन, पुष्पहीन, पुष्पवती, बहुत उत्पन्न होने वाली ओषधियां
हमें रोगों से मुक्त कराने की कृपा करें. ( ८९ )
मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत.
अथो यमस्य पड्वीशात्सर्वस्माद्देवकिल्बिषात्.. ( ९० )
हे ओषधियो! आप हमें कुपथ्य और दूषित जल से होने वाले विकारों से मुक्त
कीजिए. आप हमें छहों अनुशासन न पालने से उत्पन्न विकारों से भी मुक्त करने
की कृपा कीजिए. ( ९० )
अवपतन्तीरवदन्दिव ऽ ओषधयस्परि.
यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः.. ( ९१ )
१५४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
स्वर्गलोक से ओषधियां पृथ्वीलोक को प्राप्त होती हैं. जो जीव इन का ठीक
से सेवन करता है, वह कभी समय से पहले मरता नहीं है. ( ९१ )
या ऽ ओषधीः सोमराज्ञीर्बहीः शतविचक्षणाः.
तासामसि त्वमुत्तमार्ं कामाय श १७ हृदे.. (९२)
ओषधि सोम की रानी व बहुगुणा है. वह सैकड़ों विलक्षण गुणों वाली है. वे
ओषधियां अभीष्ट सुख देने वाली व हृदय को शक्ति देने में समर्थ हैं. ( ९२ )
या ऽ ओषधीः सोमराज्ञीर्विष्ठिताः पृथिवीमनु.
बृहस्पतिप्रसूता ऽ अस्यै संदत्त वीर्यम्.. (९३)
जो ओषधि सोम की रानी है, वह बहुगुणा है. सैकड़ों विलक्षण गुणों वाली है.
ओषधियां अभीष्ट सुख देने वाली हैं. हृदय को शक्ति देने में समर्थ हैं. ओषधियां
पुरुष को वीर्यवान बनाने की कृपा करें. ( ९३ )
याश्चेदमुपशृण्वन्ति याश्च दूरं परागताः.
सर्वाः संगत्य वीरुधोस्यै संदत्त वीर्यम्.. (९४)
जो ओषधियां पास हैं, जो दूर हैं, जो विभिन्न रूपों में उगी हुई हैं, वे सभी
हमारी प्रार्थनाएं सुनती हैं. सभी ओषधियां साथ मिल कर हमें वीर्य ( शक्ति ) प्रदान
करने की कृपा करें. ( ९४ )
मा वो रिषत् खनिता यस्मै चाहं खनामि वः.
द्विपाच्चतुष्पादस्माक १७ सर्वमस्त्वनातुरम्.. (९५)
हे ओषधियो! जब हम रोग के उपचार के लिए आप को खोदते हैं तो आप की
कृपा से खनन दोष से मुक्त हों. दोपाए, चौपाए और हमारे सभी लोग आप की
कृपा से रोग मुक्त हो जाएं. ( ९५ )
ओषधयः समवदन्त सोमेन सह राज्ञा.
यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्त १७ राजन् पारयामसि.. (९६)
ओषधियां अपने स्वामी सोम राजा के समान ही कहती हैं—राजन्! हम जिसे
ब्राह्मण बना देती हैं, वह पार हो जाता है. ( ९६ )
नाशयित्री बलासस्यार्शस ऽ उपचितामसि.
अथो शतस्य यक्ष्माणां पाकारोरसि नाशनी.. (९७)
ओषधियां बलनाशक व रोगों का भी नाश करने वाली हैं. ओषधियां मस्से जैसे
रोगों का भी उपचार करने वाली हैं. ओषधियां यक्ष्मा जैसे सैकड़ों रोगों व पके हुए
फोड़े का भी नाश करने वाली हैं. ( ९७ )
यजुर्वेद - १५५

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
त्वां गन्धर्वा ऽ अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः.
त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्यत.. (९८)
गंधर्वों, इंद्र देव व बृहस्पति देव ने ओषधियों का खनन किया. राजा सोम ने
ओषधियों का खनन किया. वे राजा और विद्वान् हैं. उन्होंने यक्ष्मा रोग से मुक्त
किया. ( ९८ )
सहस्व मे अरातीः सहस्व पृतनायतः.
सहस्व सर्वं पाप्मान १७ सहमानास्योषधे.. (९९)
हे ओषधियो! आप शरीर के सभी शत्रुओं को दूर करने में समर्थ हैं. उन्हें दूर
करने की कृपा कीजिए. हे ओषधियो! आप अपनी सामर्थ्य से हमें सभी कष्टों से
मुक्त कराने की कृपा कीजिए. ( ९९ )
दीर्घायुस्त ऽ ओषधे खनिता यस्मै च त्वा खनाम्यहम्.
अथो त्वं दीर्घायुर्भूत्वा शतवल्शा विरोहतात्.. (१००)
हे ओषधि! आप का खनन करने वाले दीर्घायु हों. मैं भी आप का खनन करता
हूं. मैं भी दीर्घायु होऊं. आप भी दीर्घायु होने की कृपा करें. सैकड़ों अंकुरों से युक्त
होने की कृपा करें. ( १०० )
त्वमुत्तमास्योषधे तव वृक्षा ऽ उपस्तयः.
उपस्तिरस्तु सोस्माकं यो अस्माँ २ अभिदासति.. (१०१)
हे ओषधि! आप उत्तम हैं. आप के समीप वाले वृक्ष आप के लिए कल्याणकारी
हों, जो हमारे प्रति दुर्भावनामय हों, वे भी आप की कृपा से हमारे अनुकूल हो
जाएं. ( १०१ )
मा मा हि १७ सीज्जनिता यः पृथिव्या यो वा दिव १७ सत्यधर्मा व्यानट्.
यश्चापश्चन्द्राः प्रथमो जजान कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१०२)
जो पृथिवी के जन्मदाता हैं, जो स्वर्गलोक के रचयिता हैं, जो आदिपुरुष हैं, जो
सत्यधर्मा हैं, हम उन के प्रति कभी भी विपरीत न हों. हम कभी भी उन के प्रतिकूल
न रहें. जो प्रथम जन्मा है, उस के अलावा हम अन्य किस देव को अपनी आहुति
अर्पित करें. ( १०२ )
अभ्यावर्त्तस्व पृथिवि यज्ञेन पयसा सह. वपां ते अग्निरिषितो अरोहत्.. (१०३)
हे पृथिवी! यज्ञ से होने वाली बरसात के साथ आप हमारे अनुकूल होने की कृपा
कीजिए. आप अग्नि पर आरोहण करने की कृपा कीजिए. ( १०३ )
अग्ने यत्ते शुक्लं यच्चन्द्रं यत्पूतं यच्च यज्ञियम्. तद्देवेभ्यो भरामसि.. (१०४)
१५६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप की जो ज्वाला चमकीली और चंद्रमा जैसी है, आप की जो
ज्वाला पवित्र है और यज्ञ से संबंधित है, हम उन्हें आहुति अर्पित करते हैं. (१०४)
इषमूर्जमहमित आदमृतस्य योनिं महिषस्य धाराम्.
आ मा गोषु विशत्वा तनूषु जहामि सेदिमनिराममीवाम्.. (१०५)
अग्नि ऊर्जस्वी, अमरता के मूल व महान् इच्छाएं पूरी करने वाले हैं. हम अग्नि
को आमंत्रित करते हैं. वे गायों में और हमारे शरीर में प्रवेश करने की कृपा करें.
उन की कृपा से हम निरोगी हो जाएं. (१०५)
अग्ने तव श्रवो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो.
बृहद्दानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे.. (१०६)
हे अग्नि! आप प्रसिद्ध धनवान व त्रिकालज्ञ हैं. आप का धुआं यज्ञ होने की
सूचना देता हुआ स्वर्गलोक तक जाता है. आप यमजान को अन्नधन प्रदान करते
हैं. (१०६)
पावकवर्चाः शुक्रवर्चा ऽ अनूनवर्चा ऽ उदियर्षि भानुना.
पुत्रो मातरा विचरन्नुपावसि पृणक्षि रोदसी उभे.. (१०७)
हे अग्नि! आप पवित्र और अत्यधिक वर्चस्व वाले हैं. आप सूर्य रूप में उदय
होते हैं. जैसे मातापिता बेटे का पालनपोषण करते हैं, वैसे ही आप स्वर्गलोक और
पृथ्वीलोक दोनों लोकों का पालन करते हैं. (१०७)
ऊर्जो नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः.
त्वे इषः सन्दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः.. (१०८)
हे अग्नि! आप ऊर्जस्वी, सर्वज्ञ हैं. हम अच्छी प्रशंसा से आप को आनंदित
करते हैं. आप सब का हित धारिए. यजमान रक्षा साधनों से सुरक्षित और श्रेष्ठ कुल
में जन्म लेने वाले हैं. वे आप को अन्नमयी आहुति भेंट करते हैं. (१०८)
इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायो अमर्त्य.
स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि सानसिं क्रतुम्.. (१०९)
हे अग्नि! आप अविनाशी हैं. यजमान सर्वप्रथम आप को प्रज्वलित करते हैं.
आप यजमानों को धन प्रदान कीजिए. आप अपने सुंदर शरीर से शोभित होते हैं.
आप यज्ञ में सारी आकांक्षाएं पूर्ण करते हैं. (१०९)
इष्कर्त्तारमध्वरस्य प्रचेतसं क्षयन्त ँ१s राधसो महः.
रातिं वामस्य सुभगां महीमिषं दधासि सानसि ँ१s रयिम्.. (११०)
हे अग्नि! आप यज्ञ के कर्ताधर्ता, श्रेष्ठ चिंतन वाले हैं. आप यजमान को महान्
यजुर्वेद - १५७

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
धन प्रदान करते हैं. उस को सौभाग्यशाली और महान् महिमावान बनाते हैं. आप
हमारे लिए भौतिक और आध्यात्मिक वैभव धारण करते हैं. ( ११० )
ऋतावानं महिषं विश्वदर्शतर्माग्न ँ सुम्नाय दधिरे पुरो जनाः.
श्रुत्कर्ण ँ सप्रथस्तमं त्वा गिरा दैव्यं मानुषा युगा.. (१११)
हे अग्नि! आप सत्यवान, महिमाशाली व समस्त विश्व के लिए दर्शनीय
हैं. हम नगरवासी अच्छे मन के लिए आप को धारण करते हैं. आप प्रसिद्ध
और प्रथम वंदनीय हैं. मनुष्य युगयुग से दिव्य गुणों वाले आप का गुणगान करते
हैं. ( १११ )
आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम्. भवा वाजस्य सङ्गथे.. (११२)
हे सोम! विश्व की तेजस्विता आप को प्रसन्न करे. आप वृद्धि को प्राप्त
करने की कृपा करें. आप अन्न की संगति के लिए हमारे पास पधारने की कृपा
करें. ( ११२ )
सन्ते पया ँ सि समु यन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः.
आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवा ँ स्युत्तमानि धिष्व.. (११३)
हे सोम! आप पोषक रस और अन्न बरसाने की कृपा करें. आप अमृत से तृप्त
कीजिए. आप स्वर्गलोक में विख्यात हैं. आप चिरकाल तक स्थिर होने की कृपा
कीजिए. ( ११३ )
आप्यायस्व मदिन्तम सोम विश्वेभिर ँ शुभिः.
भवा नः सप्रथस्तमः सखा वृधे.. (११४)
हे सोम! आप आनंददाता हैं. आप सर्वत्र प्रसन्न होने की कृपा कीजिए. आप
शुभ होइए. आप विख्यात और हमारे मित्र हैं. आप बढ़ोतरी पाइए. ( ११४ )
आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात्. अग्ने त्वाङ्कामया गिरा.. (११५)
हे अग्नि! हम आप के पुत्र हैं. आप परम स्थान पर विराजते हैं. हम श्रेष्ठ स्तोत्रों
से आप की वाणीमय वंदना करते हैं. ( ११५ )
तुभ्यन्ता ऽ अङ्गिरस्तम विश्वाः सुक्षितयः पृथक्. अग्ने कामाय येमिरे.. (११६)
हे अग्नि! आप श्रेष्ठ अंगों वाले हैं. आप के प्रति पृथ्वी की श्रेष्ठ प्रार्थनाएं
अलग से समर्पित की जाती हैं. हम अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए आप की
उपासना करते हैं. ( ११६ )
अग्निः प्रियेषु धामसु कामो भूतस्य भव्यस्य. सम्राडेको वि राजति.. (११७)
१५८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप अपने प्रिय धामों पर स्वेच्छा से सुशोभित हो रहे हैं. आप वर्तमान
और भविष्य की सब मनोकामनाओं के पूरक और सम्राट् हैं. आप दीप्तिमान हो
कर शोभित हो रहे हैं. ( ११७ )
यजुर्वेद - १५९

तेरहवां अध्याय

तेरहवां अध्याय
मयि गृह्णाम्यग्रे अग्नि छँ रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय.
मामु देवताः सचन्ताम्.. (१)
हे अग्नि! आप धन के उत्पादक, श्रेष्ठ संतति वाले और श्रेष्ठ वीर्य वाले हैं.
हम यह सब पाने के लिए आप को आहुतियों से सींचते हैं. आप हमें ग्रहण करने
की (स्वीकारने की) कृपा कीजिए. (१)
अपां पृष्ठमसि योनिरग्नेः समुद्रमभितः पिन्वमानम्.
वर्धमानो मँहाँ २ आ च पुष्करे दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथस्व.. (२)
आप जलधारी, अग्नि का मूल स्थान और समुद्र के साथ वृद्धि पाते हैं.
आप महान् हैं. आप पृथ्वी की तरह विस्तृत हों. आप स्वर्गलोक की दिव्यता प्राप्त
कीजिए. (२)
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन ऽ आवः.
स बुध्न्या ऽ उपमा ऽ अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (३)
सर्वप्रथम ब्रह्मा उत्पन्न हुआ. उस के बाद शक्ति व्यापक हुई. उस शक्ति ने
व्यक्त जगत् को प्रकाशित किया. उस शक्ति ने अव्यक्त जगत् को प्रकाशित किया.
सत् इस की विष्ठा, मल और असत् इस का मूल स्थान हुआ. (३)
हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्.
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (४)
सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ में परम तत्त्व रहा. उसी से सृष्टि उपजी. वे ही एकमात्र
पालक थे. उन्होंने पृथ्वी को धारण किया. वही स्वर्गलोक को धारण करते हैं. उन
के अलावा हम अन्य किस देव के लिए हवि का विधान करें. (४)
द्रप्सश्चस्कन्द पृथिवीमनु द्यामिमं च योनिमनु यश्चः पूर्वः.
समानं योनिमनु सञ्चरन्तं द्रप्सं जुहोम्यनु सप्त होत्राः.. (५)
प्रारंभ से ही ‘द्रप्स’ रस (एक दिव्य रस) देवता को तृप्ति प्रदान करते हैं और
पृथ्वी को बढ़ाते हैं. स्वर्गलोक की बढ़ोतरी करते हैं. मूल स्थान को सींचते हैं. द्रप्स
१६० - यजुर्वेद 632/10

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
समान मूल स्थान में संचरण करते हैं. सात होता द्रप्स को आहुति प्रदान करते हैं. ( ५ )
नमोस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु.
ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः.. ( ६ )
जो सर्प पृथ्‍वी का अनुकरण करते हैं, उन्हें नमन. जो सर्प अंतरिक्ष और स्वर्ग
का अनुकरण करते हैं, उन्हें भी नमन. ( ६ )
या ऽ इषवो यातुधानानां ये वा वनस्पती ँ४१ रनु.
ये वावटेषु शेरते तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः.. (७)
जो राक्षसों के बाण रूप सर्प हैं, जो वनस्पतियों का अनुकरण करने वाले सर्प
हैं, उन्हें नमन. जो गड्ढों और निचले भागों में रहते हैं, उन सर्पों को भी नमन. ( ७ )
ये वामी रोचने दिवो ये वा सूर्यस्य रश्मिषु.
येषामप्सु सदस्कृतं तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः.. (८)
जो चमकते हुए स्वर्गलोक में वास करते हैं, जो सूर्य की किरणों में वास करते
हैं, जिन का जल के भीतर घर है, उन सर्पों को नमन. ( ८ )
कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवाँ २ इभेन.
तृषीमनु प्रसितिं द्रूणानो ऽ स्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः.. (९)
हे अग्नि! आप दुष्टों को कष्ट दीजिए. आप राजा की तरह हाथी पर सवार हो
कर शत्रुओं पर आक्रमण कीजिए. आप राक्षसों को तपाइए. विस्तृत जाल की तरह
आप अपनी सामर्थ्य का जाल और अधिक पसारिए. ( ९ )
तव भ्रमास ऽ आशुया पतन्त्यनुस्पृश धृषता शोशुचानः.
तपूं ष्यग्ने जुह्वा पतङ्गान्सन्दितो वि सृज विष्वगुल्काः.. (१०)
हे अग्नि! आप भ्रमणशील हैं. आप शीघ्र अपनी चमकती हुई लपटों से राक्षसों
को भस्म कर दीजिए. हमारी आहुति से आप की लपटें ( ऊंचीऊंची ) बढ़ गई हैं.
आप अपनी उन लपटों से राक्षसों का नाश कर दीजिए. ( १० )
प्रति स्पशो वि सृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या ऽ अदब्धः.
यो नो दूरे अघश ँ४ सो यो अन्त्यग्ने मा किष्टे व्यथिरादधर्षीत्.. (११)
हे अग्नि! कोई भी हमें तकलीफ न पहुंचा सके. कोई भी हमें व्यथा न पहुंचा
सके. आप हमारे दूर या पास जहां कहीं भी कोई भी दुश्मन हो, उन्हें अपने पाश में
बांधने की कृपा कीजिए. ( ११ )
उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्व न्यमित्राँ २ ओषतात्तिग्महेते.
यो नो अराति ँ४ समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम्.. (१२)
यजुर्वेद - १६१

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
हे अग्नि! ऊपर की ओर स्थित रहिए. आप अपने तन का विस्तार कीजिए. आप
हमारे अमित्रों को भस्मीभूत कर दीजिए. जो हमारे नीच शत्रु हैं, उन्हें आप सूखी
समिधा की भांति जला कर राख कर दीजिए. ( १२ )
ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्गने.
अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिं प्र मृणीहि शत्रून्.
अग्नेष्ट्वा तेजसा सादयामि.. (१३)
हे अग्नि! आप ऊर्ध्वगामी होइए. आप पूरी तरह हमारे शत्रुओं का नाश कीजिए.
आप दिव्य कार्यों को खोजिए. ( १३ )
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या ऽ अयम्.
अपा ँ७ रेता ँ७ सि जिन्वति.
इन्द्रस्य त्वौजसा सादयामि.. (१४)
हे अग्नि! आप मूर्धन्य हैं. आप स्वर्गलोक के सब से ऊपरी भाग में प्रतिष्ठित
हैं. आप पृथ्वीपालक और जल की पौष्टिकता बढ़ाने वाले हैं. आप को इंद्र देव के
ओज से हम यजमान प्रतिष्ठित करते हैं. ( १४ )
भुवो यज्ञस्य रजसश्च नेता यत्रा नियुद्भिः सचसे शिवाभिः.
दिवि मूर्धानं दधिषे स्वर्षां जिह्वामग्ने चकषे हव्यवाहम्.. (१५)
हे अग्नि! आप पृथ्वी और यज्ञ के राजा, नेता व लोक कल्याण को नियुक्त
करने वाले हैं. आप स्वर्गलोक में उच्च स्थान को धारते हैं. आप हव्य वाहक हैं. आप
अपनी जिह्वा से हवि को ग्रहण करते हैं. ( १५ )
ध्रुवासि धरुणास्तृता विश्वकर्मणा.
मा त्वा समुद्र ऽ उद्वधीन्मा सुपर्णो ऽ व्यथमाना पृथिवीं दृ ँ७ ह.. (१६)
हे अग्नि! आप ध्रुव, धारक हैं. आप विश्वकर्मा से विस्तार पाते हैं. समुद्र आप
को नष्ट न करे. वायु अवरोधक ( रुकावट ) न बने. आप व्यथित मत होइए. आप
पृथ्वी को दृढ़ता प्रदान कीजिए. ( १६ )
प्रजापतिष्ट्वा सादयत्वपां पृष्ठे समुद्रस्येमन्.
व्यचस्वतीं प्रथस्वतीं प्रथस्व पृथिव्यसि.. (१७)
प्रजापति आप को समुद्र की पीठ पर स्थापित करें. आप जल में विस्तृत होने
की कृपा कीजिए. आप पृथ्वी की ही तरह विस्तृत होइए. ( १७ )
भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री.
पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृ ँ७ ह पृथिवीं मा हि ँ७ सीः.. (१८)
१६२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
आप भूमि जैसी सुखदायी और विश्व को धारण करने वाली अदिति हैं. आप
सारे विश्व की धारिका हैं. आप पृथ्वी पर अपनी कृपा कीजिए. आप उसे दृढ़
बनाइए. आप उस पर हिंसा मत होने दीजिए. ( १८ )
विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानायोदानाय प्रतिष्ठायै चरित्राय.
अग्निष्ट्वाभि पातु मह्या स्वस्त्या छर्दिषा शन्तमेन तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवा
सीद.. (१९)
हे देवी! समस्त प्राण, अपान, व्यान व उदान शरीरस्थ ( वायु के भेद ) की
प्रतिष्ठा के लिए आप की स्थापना की जाती है. अग्नि आप की रक्षा करें. शीतल
शांतिमय साधनों से आप का कल्याण हो. दिव्यता से आप अंगिरा के समान ध्रुव
हो कर विराजने की कृपा कीजिए. ( १९ )
काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि.
एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन च.. (२०)
हे दूर्वा! आप सभी जगह भलीभांति उग जाती हैं. अपनी तरह हमारी भी संतान
और धनवृद्धि की कृपा कीजिए. ( २० )
या शतेन प्रतनोषि सहस्रेण विरोहसि.
तस्यास्ते देवीष्टके विधेम हविषा वयम्.. (२१)
हे दूर्वा! हम आप के लिए वैसी ही हवि का विधान करते हैं, जिस से आप
सैकड़ों हजारों की संख्या में उग कर बढ़ें. ( २१ )
यास्ते अग्ने सूर्ये रुचो दिवमातन्वन्ति रश्मिभिः.
ताभिर्नो अद्य सर्वाभी रुचे जनाय नस्कृधि.. (२२)
हे अग्नि! सूर्य देव की जो चमकीली किरणें स्वर्गलोक का विस्तार करती हैं,
आज उन किरणों से मनुष्यों का विस्तार हो. ( २२ )
या वो देवाः सूर्ये रुचो गोष्वश्वेषु या रुचः.
इन्द्राग्नी ताभिः सर्वाभी रुचं नो धत्त बृहस्पते.. (२३)
हे इंद्र! हे अग्नि! हे बृहस्पति! आप की जो कांति सूर्यरूप में शोभित है, जो गायों,
घोड़ों में स्थित है, आप वह सारी कांति हमारे लिए धारण करने की कृपा कीजिए. ( २३ )
विराड्ज्योतिर्धारयत्स्वराड्ज्योतिर्धारयत्.
प्रजापतिष्ट्वा सादयतु पृष्ठे पृथिव्या ज्योतिष्मतीम्.
विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानाय विश्वं ज्योतिर्यच्छ.
अग्निष्टेऽधिपतिस्तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.. (२४)
विराट् शक्ति ने ज्योति को धारण किया. स्वयं ज्योतिर्मय ने ज्योति को धारण
यजुर्वेद - १६३

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
किया. प्रजापति ज्योतिर्मयी पृथ्‍वी के पृष्ठ भाग पर विराजने की कृपा करें. वे आप
को प्राण, अपान, व्यान, धान सारे विश्व को प्रभूत ज्योति प्रदान करने की कृपा
करें. अग्नि आप के अधिपति हैं. आप देवताओं के साथ स्थिर होने की कृपा
कीजिए. आप अंगिरा के समान ध्रुव हो कर विराजिए. ( २४ )
मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतू अग्नेरन्तःश्लेषोसि कल्पेतां द्यावापृथिवी
कल्पन्तामाप ऽ ओषधयः कल्पन्तामग्नयः पृथङ् मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः.
ये अग्नयः समनसोन्तरा द्यावापृथिवी इमे.
वासन्तिकावृतू अभिकल्पमाना ऽ इन्द्रमिव देवा ऽ अभिसंविशन्तु तया देवतयाङ्गिरस्वद्
ध्रुवे सीदतम्.. ( २५ )
चैत और वैशाख महीने वसंत ऋतु से संबंधित हैं. दोनों ऋतुएं अग्नि को अंदर
से जोड़े रखने की कृपा करें. स्वर्गलोक और पृथ्‍वीलोक आपस में सहयोग करने
की कृपा करें. ओषधियां हमारे लिए फलीभूत होने की कृपा करें. समान व्रत वाली
अग्नि बड़ेबड़े कामों में सहायता करने की कृपा करें. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक
के बीच जो ये अग्नियां हैं, वे समान मन वाली हों. अग्नियां वसंत ऋतु से आवृत्त
हों. वे फलीभूत होने की कृपा करें. सभी देव इंद्र का आश्रय ग्रहण करें. अग्नि देवता
के साथ अंगिरा की तरह ध्रुव हो कर विराजिए. ( २५ )
अषाढासि सहमाना सहस्वारातीः सहस्व पृतनायतः.
सहस्रवीर्यासि सा मा जिन्व.. ( २६ )
आप अषाढ़ व सहनशील हैं. आप शत्रुओं को पराजित कीजिए. आप सहस्र
वीर्य वाले हैं. आप हमें जिताने की कृपा कीजिए. ( २६ )
मधु वाता ऽ ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः. माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः.. ( २७ )
वायु मधुरता से बहने की कृपा करे. नदियां मधुरतापूर्वक रहें. सारी ओषधियां
मधुरतामय होने की कृपा करें. ( २७ )
मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव १४ रजः. मधु द्यौरस्तु नः पिता.. ( २८ )
रात्रि मधुर हो. उषा मधुर हो. पृथ्‍वी मधुमती हो. रज मधुर हो. हमारे पिता स्वर्गलोक
मधुमय होने की कृपा करें. ( २८ )
मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ २ अस्तु सूर्यः. माध्वीर्गावो भवन्तु नः.. ( २९ )
वनस्पतियां हमारे प्रति मधुमान हों. सूर्य हमारे प्रति मधुमान ( कृपालु ) हों. गाएं
हमारे प्रति माध्वी ( मधुरतामय ) होने की कृपा करें. ( २९ )
अपां गम्भन्त्सीद मा त्वा सूर्योभिताप्सीन्माग्निर्वैश्वानरः.
अच्छिन्नपत्राः प्रजा ऽ अनुवीक्षस्वानु त्वा दिव्या वृष्टिः सचताम्.. ( ३० )
१६४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
(हे कूर्म!) आप जल के गर्भ में विराजिए. आप सूर्य के मंडल में विराजिए.
सूर्य आप को न तपाए. वैश्वानर भी आप को संतप्त न करें. आप प्रजा का निरंतर
निरीक्षण कीजिए. दिव्य दृष्टि सदैव आप को सचेत करती रहे. (३०)
त्रीन्त्समुद्रान्त्समसृपत् स्वर्गानपां पतिर्वृषभ ऽ इष्टकानाम्.
पुरीषं वसानः सुकृतस्य लोके तत्र गच्छ यत्र पूर्वे परेताः.. (३१)
आप ने तीनों लोकों के समुद्र को व्याप्त किया है. आप स्वर्ग के मालिक हैं.
आप शक्तिमान हैं. आप इष्टकों (विश्व निर्माण में प्रयुक्त इकाइयों) में शक्ति
भरने वाले हैं. आप पशुओं को बसाते हुए उसी लोक में जाइए, जहां अच्छे काम
करने वाले पहले ही पहुंच चुके हैं. (३१)
मही द्यौः पृथिवी च न ऽ इमं यज्ञं मिमिक्षताम्. पिपृतां नो भरीमभिः.. (३२)
महान् पृथ्वी और स्वर्गलोक हमारे इस यज्ञ को अपनेअपने अंशों से पूरने की
कृपा करें. भरणपोषण करने वाली सामग्रियां हमारी पिपासा शांत करें. (३२)
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (३३)
विष्णु इंद्र देव से जुड़े हुए हैं. वे इंद्र देव के सखा हैं. विष्णु सभी कर्मों को
देखते हैं और व्रतों का निर्माण करते हैं. (३३)
ध्रुवासि धरुणेतो जज्ञे प्रथममेभ्यो योनिभ्यो अधि जातवेदाः.
स गायत्र्या त्रिष्टुभानुष्टुभा च देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्.. (३४)
हे उखा! आप ध्रुव व धारक हैं. सर्वज्ञ अग्नि यज्ञ में सर्वप्रथम आप के यहां
उत्पन्न हुए. अग्नि, गायत्री, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् आदि छंदों से देवताओं के लिए हवि
वहन करने की कृपा करें. (३४)
इषे राये रमस्व सहसे द्युम्न ऽ ऊर्जे अपत्याय.
सम्राडसि स्वराडसि सारस्वतौ त्वोत्सौ प्रावताम्.. (३५)
हे उखा! आप सम्राट्, स्वयं प्रकाशित, सरस्वतीमय व पालन पोषणकर्ता हैं.
आप अन्न, यश, साहस और ऊर्जा में रमण करते हैं. आप हमारे पुत्र पौत्रों को भी
उस में रमण कराइए. (३५)
अग्ने युक्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः. अरं वहन्ति मन्यवे.. (३६)
हे अग्नि! आप दिव्य गुणों वाले हैं. आप अपने घोड़े रथ में जोतिए. वे आप के
रथ के अरों का वहन कर के शीघ्र आप को गंतव्य तक ले जाएं. (३६)
युक्ष्वा हि देवहूतमाँ २ अश्वाँ २ अग्ने रथीरिव. नि होता पूर्व्यः सदः.. (३७)
हे अग्नि! आप हमारे लिए देवताओं को आमंत्रित करने वाले हैं. आप अपने
यजुर्वेद - १६५

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
रथ में घोड़े जोतिए. आप चिरकाल से हमारे होता हैं. आप यज्ञ स्थान में
विराजिए. ( ३७ )
सम्यक् स्रवन्ति सरितो न धेना ऽ अन्तर्ह्रदा मनसा पूयमाना:.
घृतस्य धारा ऽ अभि चाकशीमि हिरण्ययो वेतसो मध्ये अग्ने:... ( ३८)
सम्यक् रूप से प्रवाहित होने वाली सरिता के समान हमारे हृदय और मन से
पवित्र वाणियां प्रवाहित होती हैं. यज्ञ की अग्नि स्वर्णिम प्रकाश वाली है. घी की
धाराएं अग्नि के बीच बहा कर उसे स्वर्णिम बना देती हैं. ( ३८ )
ऋचे त्वा रुचे त्वा भासे त्वा ज्योतिषे त्वा.
अभूदिदं विश्वस्य भुवनस्य वाजिनमग्नेर्वैश्वानरस्य च.. ( ३९)
आप गाए जाते हैं, प्रकाशित हैं, भासित व ज्योतिष हैं. आप की कृपा से सारे
लोकों, वैश्वानर और बल को हम समझ सके हैं. ( ३९ )
अग्निर्ज्योतिषा ज्योतिष्मान् रुक्मो वर्चसा वर्चस्वान्.
सहस्रदा ऽ असि सहस्राय त्वा.. (४०)
हे अग्नि! आप ज्योति से ज्योतिष्मान हैं. आप वर्चस्व से वर्चस्वी हैं. आप हजारों
के लिए हजार वैभव देने वाले हैं. ( ४० )
आदित्यं गर्भं पयसा समङ्ग्धि सहस्रस्य प्रतिमां विश्वरूपम्.
परि वृङ्ग्धि हरसा माभि म १४ स्था: शतायुषं कृणुहि चीयमान:... (४१)
आप आदित्य के गर्भ को दूध से सींचिए. आप हजारों रूपों वाले हैं. आप
अपने तेज से रोगों का नाश कीजिए. आप यजमान को शतायु और उसे अहंकार से
मुक्त कीजिए. ( ४१ )
वातस्य जूतिं वरुणस्य नाभिमश्वं जज्ञान १४ सरिरस्य मध्ये.
शिशुं नदीना १४ हरिमद्रिबुध्नम्ग्ने मा हि १४ सी: परमे व्योमन्.. (४२)
हे अग्नि! आप वायु के प्रिय, वरुण देव की नाभि, ज्ञान के अश्व और जल
के बीच रहते हैं. आप नदियों के शिशु, हरे, जलमय व पर्वत पर चिह्न अंकित करने
वाले हैं. आप परम व्योमवासी हैं. आप हिंसा मत कीजिए. ( ४२ )
अजस्रमिन्दुमरुषं भुरण्युमग्निमीडे पूर्वचित्तिं नमोभि:.
स पर्वभिऋतुशः कल्पमानो गां मा हि १४ सीरदितिं विराजम्.. (४३)
हे अग्नि! आप अजस्र, शांतिदायी, ऊर्जावान और ऋषियों द्वारा सेवित हैं. आप
अन्न से भरणपोषण करने वाले हैं. हम पूर्व से ही मन से आप को नमन करते हैं.
आप पर्वों और ऋतु के अनुसार फलते हैं. आप गौ के समान पोषण करते हैं. आप
हिंसा मत कीजिए. आप विराजने की कृपा कीजिए. ( ४३ )
१६६ - यजुर्वेद