बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
(१८६)
६. स्वास्थ्य रेखा।
७. विवाह रेखा ।
इनके अतिरिक्त बारह गौण रेखाएं होती है। यद्यपि ये गौण रेखाएं कहलाती
हैं परन्तु हथेली में इनका महत्त्व स्वतंत्र होता है और वह जीवन में बहुत अधिक महत्त्व
रखने वाली होती हैं।
गौण रेखाएं :
१. गुरु वलय
२. मंगल रेखा
३. शनि वलय
४. रवि वलय
५. शुक्र वलय
६. चन्द्र रेखा
७. प्रतिभा प्रभावक रेखा
८. यात्रा रेखा
९. सन्तति रेखा
१०. मणिबन्ध रेखाएं
११. आकस्मिक रेखाएं
१२. उच्च पद रेखाएं
इन रेखाओं का अध्ययन सावधानी के साथ करना चाहिए। परन्तु रेखाओं
का अध्ययन करने से पूर्व रेखा के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर लेनी उचित रहेगी।
मुख्यतः चार प्रकार की रेखाएं होती हैं :
१. मोटी रेखा : ये वे रेखाएं होती हैं जो अपने आप में गहरी, स्पष्ट और
सामान्यतः चौड़ाई लिये हुए होती हैं। ऐसी रेखाएं धुंधल में भी स्पष्ट देखी जा
सकती हैं।
२. पतली रेखाएं: ये रेखाएं प्रारम्भ से लेकर अन्त तक पतली परन्तु स्पष्ट
होती हैं। ऐसी रेखाएं ज्यादा प्रभावपूर्ण कही जाती हैं।
३. गहरी रेखा : ये रेखाएं सामान्यतः पतली तो होती हैं परन्तु साथ ही
साथ गहरी भी होती हैं, और ऐसा प्रतीत होता है जैसे हथेली के मांस में धंसी हुई
सी हों।
४. ढलवा रेखा :- ये रेखाएं प्रारम्भ में तो मोटी होती हैं परन्तु ज्यों-ज्यों
आगे बढ़ती है त्यों-त्यों अपेक्षाकृत पतली होती जाती हैं।
( ६० )
इन रेखाओं की जानकारी के साथ-ही-साथ निम्न प्रकार की जानकारी भी
पाठकों के लिए आवश्यक कही जाती है ।
१. रेखाएं स्पष्ट सुन्दर लालिमा लिये हुए तथा साफ-सुथरी होनी चाहिए ।
इनके मार्ग में न तो किसी प्रकार का चिह्न होना चाहिए, और न किसी प्रकार का
द्वीप होना चाहिए । साथ ही ये रेखाएं टूटी हुई भी नहीं होनी चाहिए ।
२. यदि हथेली में रेखाएं किंचित् पीलापन लिये हुए हों तो ऐसी रेखाएं
स्वास्थ्य में कमी और रक्त दूषितता को स्पष्ट करती है । ऐसी रेखाएं निराशावादी
भावना को भी बताती हैं ।
३. रक्तिम रेखाएं व्यक्ति की प्रसन्नता और स्वस्थ मनोवृत्ति को स्पष्ट करती
है । इससे ऐसा ज्ञात होता है कि व्यक्ति प्रसन्नचित्त स्वस्थ और स्पष्ट वक्ता है ।
४. हथेली पर काली रेखाएं पाया जाना निराशा तथा कमजोरी को सूचित
करती हैं ।
५. मुर्झाई हुई या कमजोर रेखाएं : भविष्य में आने वाली बाधाओ की सूचक
कही जाती हैं ।
६. यदि किसी रेखा के साथ-साथ कोई और रेखा आगे बढ़ती हो तो उस रेखा
को विशेष बल मिलता है और उस रेखा का प्रभाव विशेष समझना चाहिए ।
७. यदि किसी टूटी हुई रेखा के साथ साथ सहायक रेखा चलती हुई दिखाई
दे तो उस भग्न रेखा का विपरीत फल न्यूनतम होता है ।
८. जीवन रेखा के अलावा यदि कोई रेखा अपने अन्तिम सिरे पर जाकर दो
भागों में विभक्त हो जाती है तो ऐसी रेखा अत्यन्त श्रेष्ठ एवं प्रभावपूर्ण मानी जाती
है परन्तु यदि हृदय रेखा अन्त में जाकर दो भागों में विभक्त होती है तो ऐसे व्यक्ति
की मृत्यु कम आयु में ही हार्ट एटेक से हो जाती है ।
६. यदि कोई रेखा अपने अन्तिम सिरे पर जाकर कई भागों में बंट जाय
तो उस रेखा का फल विपरीत समझना चाहिए ।
१०. यदि किसी रेखा में से कोई नई रेखा निकल कर ऊपर की ओर बढ़ती
हो तो उस रेखा के फल में वृद्धि होती है ।
११. यदि किसी रेखा में से कोई रेखा निकल कर नीचे की ओर झुक रही हो
या नीचे के माग की ओर गतिशील हो तो उसका विपरीत फल मिलता है ।
१२. भोग रेखा या प्रणय रेखा में से कोई रेखा निकल कर ऊपर की ओर बढ़
रही हो तो सुन्दर पति मिलने का योग बनता है इसके विपरीत यदि उसमें से कोई
रेखा निकलकर नीचे की ओर बढ़ रही हो तो उस व्यक्ति की पत्नी की मृत्यु शीघ्र
ही हो जाती है ।
( ११ )
१३. यदि मस्तिष्क रेखा में से कोई रेखा ऊपर की ओर बढ़ रही हो तो
वह व्यक्ति विशेष यश प्राप्त करता है।
१४. जंजीरदार रेखा अशुभ मानी गई है।
१५. यदि विवाह रेखा जंजीरदार हो तो उसको प्रेम में असफलता मिलती है।
१६. यदि मस्तिष्क रेखा जंजीरदार दिखाई दे तो वह व्यक्ति पागल बन
जाता है।
१७. हथेली में लहरियादार रेखा शुभ फल देने वाली नहीं होती।
१८. टूटी हुई रेखाएं अशुभ फल ही देती है।
१९. यदि कोई रेखा बहुत अधिक सूक्ष्म और कमजोर हो तो उसका प्रभाव
नहीं के बराबर होता है।
२०. यदि किसी रेखा के मार्ग में वह द्वीप या कोई चिन्ह हो तो उसे शुभ नहीं
समझना चाहिए।
२१. यदि रेखा के मार्ग में वर्ग हो तो इससे उस रेखा को बल मिलता है तथा
उस रेखा का शुभ फल प्राप्त होता है।
२२. यदि रेखा पर कोई बिन्दु हो तो इससे उस रेखा से संबंधित कार्य की
हानी होती है।
२३. यदि किसी रेखा पर त्रिकोण का चिह्न दिखाई दे तो उस रेखा से
संबंधित कार्य शीघ्र ही होना समझना चाहिए।
२४. रेखाओं पर तिरछी रेखाएं हानिकारक मानी गई हैं।
२५. यदि रेखाओं पर नक्षत्र दिखाई दे तो इससे कार्य सफलता शीघ्र प्राप्त
होती है।
२६. मोटी रेखाएं व्यक्ति की दुर्बलता को स्पष्ट करती है।
२७. पतली रेखाएं व्यक्ति के जीवन में श्रेष्ठ फल देने में समर्थ मानी गई हैं।
२८. ढ़लवा रेखाएं व्यक्ति के परिश्रम को तो स्पष्ट करती हैं परन्तु उससे श्रेष्ठ
फल मिलने का योग नहीं बनता।
२९. यदि कोई गहरी रेखा चलते-चलते बीच में ही रुक जाय या कमजोर
पड़ जाय तो ऐसी रेखा दुर्घटना की परिचायक होती है।
३०. रेखा यदि कहीं पर पतली और कहीं पर मोटी हो तो वह शुभ नहीं है
और ऐसा व्यक्ति जीवन में कई बार धोखा खायेगा ऐसा समझना चाहिए।
३१. रेखाओं के बारे में सावधानी के साथ विचार करना चाहिए और यदि
कोई चिह्न दोनों ही हाथों में दिखाई दे तभी उससे संबंधित भविष्य कथन करना
चाहिए।
( ६२ )
रेखाओं के उद्गम स्थान :
पीछे की पंक्तियों में मैंने रेखाओं के बारे में साधारण जानकारी दी है परन्तु
हमें यह भी ज्ञात करना चाहिए कि इन रेखाओं का वास्तविक उद्गम स्थान कौन-सा
होता है।
१. जीवन रेखा :—इसे अंग्रेजी में 'लाइफ लाइन' कहते हैं हिन्दी में कुछ
विद्वान इसे पितृ रेखा या आयु रेखा के नाम से भी सम्बोधित करते हैं पूरी हथेली
में इस रेखा का महत्त्व सबसे अधिक है, क्योंकि यदि जीवन है तो सब कुछ है
जिस दिन जीवन ही समाप्त हो जायगा उस दिन बाकी रेखाओं का प्रभाव भी व्यर्थ
हो जायगा।
जीवन रेखा जीवन रेखा
जीवन रेखा बृहस्पति पर्वत के नीचे हथेली की बगल से उठ कर तर्जनी और
अंगूठे के बीच में से प्रारंभ होकर शुक्र पर्वत को घेरती हुई मणिबन्ध पर जाकर विश्राम
करती है संसार में जितने भी प्राणी हैं उन सब के हाथों में यह रेखा यहीं पर दिखाई
देती हैं इसी रेखा से व्यक्ति की आयु, स्वास्थ्य, बीमारी, स्वस्थता आदि की जानकारी
अथवा ज्ञान प्राप्त होता है।
सभी व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा एक-सी दिखाई नहीं देती कुछ लोगों के
हाथों में यह रेखा गहरी और लम्बी होती है तो कुछ रेखाएं व्यक्ति के शुक्र पर्वत
को बहुत संकीर्ण बना लेती हैं किसी-किसी व्यक्ति के हाथ में यह रेखा शुक्र पर्वत के
पास में जाकर टूट-सी जाती है ऐसे व्यक्ति निश्चय ही कम आयु के होते हैं तथा उनकी
मृत्यु दुर्घटना से होती है।
इस रेखा से व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन के बारे में साधारणतः जाना जा
सकता है।
( १३ )
२. मस्तिष्क रेखा:—अंग्रेजी में इस रेखा को 'हैड-लाइन' हिन्दी
में इसको बुद्धि रेखा शीश रेखा, प्रज्ञा रेखा अथवा मातृ रेखा, के नाम से पुकारते हैं।
[चित्र १ (बायाँ):]
मस्तिष्क रेखा
[चित्र २ (दायाँ):]
मस्तिष्क रेखा
[चित्र ३ (हस्त-रेखा चित्र):]
विवाह रेखा
सूर्य रेखा
भाग्य रेखा
हृदय रेखा
मस्तिष्क रेखा
स्वास्थ्य रेखा
जीवन रेखा
मंगल रेखा
मणिबन्ध रेखाएँ ६२
( १४ )
[•••••] का प्रारंभ वृहस्पति पर्वत के पास से या वृहस्पति पर्वत के ऊपर से
होता है। अधिकांश हाथों में मैंने जीवन रेखा और मस्तिष्क रेखा का उद्गम एक ही
स्थान पर देखा है। परन्तु कई हाथों में यह उद्गम एक ही न होकर पास-पास होता
देखा गया है। यह रेखा हथेली को दो भागों में बांटती हुई राहू और हर्षल क्षेत्रों को
अलग-अलग करती हुई बुध क्षेत्र के नीचे तक चली जाती है, इस पूरी रेखा को
मस्तिष्क रेखा कहते हैं।
इस रेखा की स्थिति अलग-अलग हाथों में अलग-अलग प्रकार से देखी जाती
है। जिन व्यक्तियों का मस्तिष्क पैना, उर्वर, तथा क्रियाशील होता है या जो व्यक्ति
मुख्यतः बुद्धिजीवी होते हैं उन व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा लम्बी गहरी और स्पष्ट
होती है। इसके विपरीत जो शारीरिक श्रम करने वाले होते हैं या जिनका मस्तिष्क
कमजोर होता है अथवा जो श्रमजीवी होते हैं उनके हाथों में या तो यह रेखा धूमिल
और अस्पष्ट-सी होती है अथवा यह रेखा बीच-बीच में कई स्थान पर टूटी हुई-सी
दिखाई देती है। इस रेखा से मानव के मस्तिष्क का भलीभांति अध्ययन किया जा
सकता है।
३. हृदय रेखा :—इस रेखा को अंग्रेजी में 'हार्ट लाइन' और भारत में इस
रेखा को विचार रेखा कहते हैं। यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से प्रारंभ होकर बुध
तथा प्रजापति के क्षेत्रों को अलग-अलग करती हुई तर्जनी के नीचे या गुरु पर्वत के
नीचे तक पहुंच जाती है। सामान्यतः यह रेखा सभी व्यक्तियों के हाथों में दिखाई देती
है क्योंकि इस रेखा का सीधा सम्बन्ध हृदय से होता है, परन्तु मैंने कुछ डाकुओं एव
हृदयहीन व्यक्तियों के हाथों में इस रेखा का सर्वथा अभाव ही देखा है। जिन
व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा कमजोर होती है वस्तुतः वे व्यक्ति अमानवीय एवं
क्रूर होते हैं।
हृदय रेखा हृदय रेखा
( ९५ )
अलग-अलग हाथों में यह रेखा अलग-अलग लम्बाई लिये हुई होती है। किसी
हाथ में यह रेखा तर्जनी तक किसी हाथ में मध्यमा तक तो किसी हाथ में अनामिका
तक ही जाकर समाप्त हो जाती है परन्तु मैंने कुछ हाथों में यह रेखा गुरु क्षेत्र को
पार कर हथेली के दूसरे छोर तक पहुंचती हुई भी देखी है, परन्तु ऐसी लम्बी रेखा
बहुत कम लोगों के हाथों में ही होती है ।
४. सूर्य रेखा :—अंग्रेजी में इसे 'अपोलो लाइन' या 'सन लाइन' अथवा
'लाइन आफ सक्सेस' भी कहते हैं। हिन्दी में इस रेखा को
सूर्य रेखा, रवि रेखा अथवा प्रतिभा रेखा कहते हैं। इस रेखा
का उद्गम विभिन्न व्यक्तियों के हाथों में विभिन्न स्थानों से
देखा गया है, परन्तु एक बात सभी व्यक्तियों के हाथों में
समान होती है वह यह कि इस रेखा की समाप्ति सूर्य पर्वत
पर जाकर होती है। मैंने लगभग इस रेखा का प्रारम्भ तीस
स्थानों से देखा है। अतः रवि रेखा या सूर्य रेखा उसी रेखा
को माननी चाहिए जिसकी समाप्ति सूर्य पर्वत पर होती हो ।
सूर्य रेखा
५. भाग्य रेखा :—इसे अंग्रेजी में 'फेट लाइन' कहते हैं। हिन्दी में इसे भाग्य
रेखा ऊर्ध्व रेखा अथवा प्रारब्ध रेखा भी कहते हैं ।
भाग्य रेखा भाग्य रेखा
यह रेखा सभी व्यक्तियों के हाथों में दिखाई नहीं देती। साथ ही इस रेखा
के उद्गम भी कई होते हैं परन्तु एक बात भली प्रकार से समझ लेनी चाहिए कि
जिस रेखा की समाप्ति शनि पर्वत पर होती है वही रेखा भाग्य रेखा कहला सकती है।
(२६)
जब तक यह शनि पर्वत पर नहीं पहुंच जाती तब तक इस रेखा को भाग्य रेखा कहना
उचित नहीं ।
कई हाथों में यह रेखा बुध पर्वत पर भी पहुंच जाती है परन्तु वास्तव में यह
रेखा भाग्य रेखा न होकर कोई अन्य रेखा ही होती है। इस रेखा का विकास हथेली
में नीचे से ऊपर की ओर होता है। कुछ हाथों में यह रेखा शुक्र पर्वत से प्रारंभ होती
है तो कुछ हाथों में यह रेखा मणिबन्ध से प्रारंभ होकर ऊपर की ओर उठती हुई
दिखाई देती है। कुछ हाथों में यह रेखा सूर्य पर्वत के पास से भी निकल कर शनि
पर्वत पर पहुंच जाती है। अतः जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि इस रेखा का उद्गम
अलग-अलग होता है अतः इसकी समाप्ति के स्थान से इसके उद्गम का पता लगाना
चाहिए।
संसार में आधे से अधिक लोगों के हाथों में यह रेखा नहीं पाई जाती ।
६. स्वास्थ्य रेखा :-अंग्रेजी में इस रेखा को 'हेल्थ लाइन' कहते हैं । इस
रेखा का सम्बन्ध स्वास्थ्य से होता है परन्तु इस रेखा के उद्गम का कोई निश्चित
स्थान नहीं है। यह हथेली में मंगल पर्वत से, जीवन रेखा से, हथेली के बीच में से,
या कहीं से भी प्रारम्भ हो सकती है, परन्तु यहां यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि
इस रेखा की समाप्ति बुध पर्वत पर ही होती है, और जो रेखा बुध पर्वत तक पहुंचती
है वास्तव में वही रेखा स्वास्थ्य रेखा कहला सकती है। कुछ हाथों में यह रेखा बहुत
स्वास्थ्य रेखा स्वास्थ्य रेखा
मोटी होती है, तो कुछ हाथों में यह रेखा बाल से भी पतली देखी जा सकती है। इस
रेखा का अध्ययन अत्यन्त सावधानी के साथ किया जाना चाहिए । इसके माध्यम से
स्वास्थ्य, तन्दुरुस्ती, बीमारी आदि का अध्ययन होता है।
७. विवाह रेखा :-इसे अंग्रेजी में 'लव लाइन' या 'मैरिज लाइन' कहते हैं।
यह बुध पर्वत पर होती है। हथेली के बाहरी भाग से बुध पर्वत की ओर अन्दर की
( ५७ )
तरफ आती हुई जो रेखा होती है वही विवाह रेखा कहलाती है। कुछ लोगों के हाथों
में ऐसी तीन चार रेखाएं होती हैं, परन्तु इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उस
विवाह रेखा विवाह रेखा
व्यक्ति का विवाह तीन चार स्त्रियों से होगा, परन्तु इसका अर्थ यह होता है कि उसका
सम्बन्ध तीन चार प्राणियों से अवश्य ही रहेगा। इन तीन चार रेखाओं में से जो
रेखा गहरी और स्पष्ट होती है वास्तव में वही रेखा विवाह रेखा कहलाती है।
कई बार यह भी देखने में आया है कि व्यक्ति के हाथ में विवाह रेखा होते
हुए भी वह आजीवन कुंआरा रहता है। इसका कारण यह है कि जब विवाह रेखा पर
किसी प्रकार का कोई क्रॉस बना हुआ हो तो यह समझ लेना चाहिए कि इस व्यक्ति
के सम्बन्ध बन कर समाप्त हो जायेंगे। जीवन में विवाह नहीं हो सकेगा। यदि विवाह
रेखा के साथ में चलने वाली किसी रेखा पर छोटे-छोटे चिह्न हों तो उस व्यक्ति के
जीवन में अनैतिक सम्बन्ध बने रहते हैं।
ऊपर मैंने सात प्रमुख रेखाओं की विवेचना की है अब आगे मैं गौण रेखाओं
के बारे में जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूं।
१. बृहस्पति वलय :—इसे अंग्रेजी में 'रिंग आफ
जुपिटर' कहते हैं। हिन्दी में इसको गुरुमुद्रा या गुरु रेखा भी
कहते हैं। यह तर्जनी उंगली से नीचे बृहस्पति पर्वत पर
तर्जनी उंगली के नीचे अर्द्ध चन्द्राकार बनाती हुई उसके पूरे
क्षेत्र को घेर लेती है जो कि अंगूठी के समान दिखाई देती है
इसी को गुरुवलय या वृहस्पति मुद्रा कहते हैं।
बृहस्पतिवलय
( ६८ )
२. मंगल रेखा :—इसे अंग्रेजी में 'लाइन आफ मार्स' कहते हैं। यह रेखा
अंगूठे के पास जीवन रेखा के मूल उद्गम से निकल कर मंगल क्षेत्र पर होती हुई शुक्र
पर्वत की ओर जाती है इसे मंगल रेखा कहते हैं परन्तु इसका उद्गम स्थान निश्चित
नहीं होता । कुछ लोगों के हाथों में यह जीवन रेखा के बीच में से, तो कुछ हाथों में
मंगल रेखा मंगल रेखा
यह रेखा जीवन रेखा के बराबर चलती हुई भी दिखाई देती है। शुक्र क्षेत्र की ओर
जब यह रेखा बढ़ती है तो वह जीवन रेखा से दूर हटती जाती है।
हथेली में इस रेखा का महत्त्व बहुत अधिक माना गया है।
३. शनिवलय : इसे 'रिंग आफ सेटर्न' कहते हैं
तथा हिन्दी में शनि मुद्रा या शनि रेखा या शनि वलय कहते
हैं । यह रेखा मध्यमा उंगली के मूल में शनि पर्वत को घेरती
हुई अपना एक छोर तर्जनी और मध्यमा के बीच में तो दूसरा
छोर मध्यमा और अनामिका के बीच में रख देती है। इस
प्रकार से यह शनि पर्वत को अंगूठी की तरह घेर लेती है।
यह वलय हाथ में बहुत महत्व रखता है।
शनिवलय
( ९६ )
रविवलय
४. रविवलय : इसे “रिंग आफ सन” कहते हैं तथा
हिन्दी में इसको सूर्य मुद्रा या सूर्य वलय भी कहा जाता है।
यह अनामिका उंगली के मूल में अंगूठी की तरह सूर्य पर्वत को
घेर लेती है। इस रेखा का एक छोर मध्यमा अनामिका के
बीच में होता है तथा दूसरा छोर अनामिका कनिष्ठिका के
बीच में पाया जाता है जिस किसी हाथ में यह वलय देखा
जाता है वह इसी रूप में होता है।
वाचालता, विज्ञान
चतुराई, चोरी
मानसिक विश्व
दया, अहिंसा, त्याग
उच्चादर्श, आत्मज्ञान
तेज, सम्मान
अध्ययन, विचार, पूजा
अन्धविश्वास, गंभीरता
निराशा, घुटन
धर्म, यश, मान,
नेतृत्व, महत्त्वाकांक्षा
व्यावहारिक विश्व | बुध | सूर्य | शनि | गुरु
साहस, संतुलन
नियमबद्धता, शान्ति | ऊर्ध्व मंगल | मंगल का मैदान | जीवन रेखा
हिंसा, क्रोध
इच्छाशक्ति
तर्क शक्ति
निम्न विश्व | कल्पना | ऊर्ध्व चन्द्र | शुक्र
रहस्य
स्वार्थ | मध्य चन्द्र
वासना
असाधारण प्रकृति | निम्न चन्द्र | सुन्दर, वासना, कला, सहानुभूति
अस्थिरता | १००%
( १०० )
५. शुक्रवलय : इसे अंग्रेजी में "गर्डल आफ वीनस"
कहते हैं तथा संस्कृत में इसको भृगु रेखा, शुक्र रेखा या शुक्र
वलय कहा जाता है। यह वलय तर्जनी और मध्यमा के बीच में
से प्रारम्भ होकर अनामिका और कनिष्ठिका के बीच में जाकर
समाप्त होता है। इस प्रकार यह रेखा शनि और सूर्य दोनों
पर्वतों को घेर लेता है। कई हाथों में यह वलय दोहरी रेखाओं
से बनता है। यद्यपि इसका नाम शुक्र वलय होता है परन्तु
इसका शुक्र पर्वत से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं होता।
यह वलय व्यक्ति के हाथों में बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण कहा जाता
है।
शुक्रवलय
६. चन्द्र रेखा : यह धनुष के आकार की रेखा होती
है तथा यह चन्द्र क्षेत्र से प्रारम्भ होकर वरुण तथा प्रजापति
क्षेत्रों के ऊपर से चलती हुई बुध पर्वत तक जाकर रुकती है,
बहुत ही कम लोगों के हाथों में यह रेखा देखने को मिलती
है।
चन्द्र रेखा
७. प्रभावक रेखा : अंग्रेजी में इस रेखा को "लाइन ऑफ
इन्फ्लुएन्स" कहते हैं। तथा यह जिस रेखा के साथ में भी होता
है उस रेखा के प्रभाव को बढ़ा देती है। यह रेखा चन्द्र क्षेत्र
तथा वरुण क्षेत्र के ऊपर से चलकर भाग्य रेखा तक पहुँचती
है। कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा दुहरी तथा कुछ लोगों
के हाथों में यह तिहरी दिखाई पड़ती है। इसका प्रारम्भ शुक्र
पर्वत से भी देखा जा सकता है परन्तु इस प्रकार का प्रारम्भ
बहुत कम हाथों में अनुभव हुआ है।
प्रभावक रेखा
( १०१ )
८. यात्रा रेखा : अंग्रेजी भाषा में इसको 'ट्रेवलिंग
लाइन' कहा जाता है । यह यात्रा वायुयान यात्रा, जल यात्रा
या पैदल यात्रा किसी भी प्रकार की यात्रा को स्पष्ट करती
है । परन्तु सूक्ष्मता से देखने पर ज्ञात होता है कि इस रेखा पर
अलग-अलग प्रकार के चिह्न होते हैं जिनमें यात्राओं का भेद
ज्ञात किया जा सकता है यह रेखा चन्द्र रेखा पर या शुक्र
क्षेत्र से, मंगल क्षेत्र की ओर जाती हुई राहू क्षेत्र को पार कर
चन्द्र पर्वत की ओर जाती हुई दिखाई देती है । ऐसी रेखाएं
मोटी और पतली दोनों ही प्रकार की दिखाई देती हैं ।
यात्रा रेखा
९. सन्तति रेखा : इन रेखाओं को 'लाइन्स आफ
चिल्ड्रन' भी कहते हैं। ये रेखाएं बुध पर्वत के पास में विवाह-
रेखा पर खड़ी लकीरों के रूप में दिखाई देती है । वास्तव में
ये रेखाएं बाल के समान पतली होती है जिनको नंगी आंखों
से देखना सम्भव नहीं रहता ।
सन्तति रेखा
१०. मणिबन्ध रेखा : ये रेखाएं कलाई पर पाई जाती हैं
परन्तु इनकी संख्या अलग-अलग हाथों में अलग-अलग होती है।
किसी व्यक्ति के हाथ में एक मणिबन्ध रेखा किसी में दो तीन
या चार मणिबन्ध रेखाएं भी देखने को मिल जाती है ।
मणिबन्ध रेखा
( १०२ )
आकस्मिक रेखाएं
११. आकस्मिक रेखाएं : ये रेखाएं समय-समय पर
बनती रहती हैं तथा अच्छे और बुरे समय को प्रदर्शित करती
रहती हैं। ये रेखाएं स्थायी नहीं होती वरन् इनका क्षणिक प्रभाव
समाप्त हो जाता है तो ये रेखाएं मिट जाती हैं। ये रेखाएं
हथेली पर कहीं पर भी बन सकती हैं और बनकर मिट सकती
हैं।
१२. उच्च पद रेखा : यह रेखा मणिबन्ध से प्रारम्भ
होकर केतु क्षेत्र की ओर जाती दिखाई देती है। यदि यह रेखा
गहरी और स्पष्ट हो तो व्यक्ति निश्चय ही उच्च पद प्राप्त
करता है।
उच्च पद रेखा
ऊपर मैंने प्रधान तथा गौण रेखाओं का स्थान तथा उनका संक्षिप्त परिचय
दिया है। अब आगे के पृष्ठों में मैं इनसे सम्बन्धित कुछ और तथ्य स्पष्ट कर रहा हूं :
जीवन रेखा
जीवन रेखा ही हथेली में एक ऐसी रेखा है जो प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में
पाई जाती है। यदि किसी के हाथ में यह रेखा न देखने को मिले तो यह समझना
चाहिए कि ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व शून्यवत् है और उस व्यक्ति का जीवन शक्ति
का सर्वथा लोप हो गया है। ऐसे व्यक्ति का जीवन किसी भी समय समाप्त हो सकता
है, कई बार मंगल रेखा चल कर इस रेखा को बल देती है, कभी-कभी शनि रेखा भी
इस रेखा को बल देती हुई दिखाई दी है परन्तु फिर भी जो जीवन रेखा अपने आप
में निर्दोष और स्पष्ट होती है वास्तव में वही रेखा मानव के लिये कल्याणकारी मानी
जाती है।
इसी रेखा से व्यक्ति की आयु का पता चलता है तथा इस रेखा के माध्यम से
यह ज्ञात किया जा सकता है कि जीवन में कौन-कौन सी दुर्घटनाएं किस-किस समय
घटिया होंगी तथा मृत्यु का कारण और मृत्यु का समय भी इसी रेखा से ज्ञात होता
है।
यह रेखा बृहस्पति पर्वत के नीचे से निकलती है पर कई बार यह रेखा
बृहस्पति पर्वत के ऊपर से भी निकलती हुई दिखाई दी है। इस रेखा के बारे में यह
ध्यान रखना अत्यन्त जरूरी है कि यह रेखा शुक्र पर्वत को जितने ही बड़े रूप में
घेरती है उतनी ही यह रेखा ज्यादा श्रेष्ठ मानी जाती है। यद्यपि कई बार यह रेखा
शुक्र पर्वत को अत्यन्त संकीर्ण बना देती है जब ऐसा तथ्य हथेली में दिखाई दे तब यह
समझ लेना चाहिए कि इस व्यक्ति की प्रगति जीवन में कठिन ही होगी, साथ ही साथ
इस व्यक्ति को जीवन में प्रेम भोग सुख आदि सांसारिक गुणों की न्यूनता ही रहेगी ।
अंगूठे के पास में से होकर यदि यह रेखा निकले तो उस व्यक्ति की आयु बहुत कम
होती है।
जीवन रेखा जितनी ही ज्यादा गहरी स्पष्ट और बिना टूटी हुई होती है
उतनी ही वह ज्यादा अच्छी कहलाती है। ऐसे व्यक्ति का स्वास्थ्य उन्नत होगा,
उसके हृदय में प्रेम और सौन्दर्य की भावना विकसित रहेगी परन्तु जिसके हाथ में यह
रेखा कटी-फटी या टूटी हुई अथवा अस्पष्ट दिखाई दे तो उसका जीवन दुखमय
भावनाशून्य एवं दुर्घटनाओं से युक्त रहता है। ऐसे व्यक्ति तुनक मिजाज चिड़चिड़े
तथा बात-बात पर क्रोधित होने वाले होते हैं।
( १०४ )
यदि गुरु पर्वत के नीचे जीवन रेखा और मस्तिष्क रेखा का पूर्ण मिलन होता
है तो यह शुभ माना जाता है। ऐसा व्यक्ति परिश्रमी सतर्क और योजनाबद्ध तरीके
से काम करने वाला होता है। परन्तु यदि इन दोनों रेखाओं का उद्गम अलग-अलग
होता है तो व्यक्ति उन्मुख विचारों वाला तथा अपनी ही धुन से कार्य करने वाला
होता है। परन्तु यदि किसी के हाथ में जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा, और हृदय रेखा
तीनों ही एक ही स्थान से निकले तो यह एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रतीक होता है ऐसे व्यक्ति
की निःसंदेह हत्या हो जाती है।
जीवन रेखा पर यदि आड़ी-तिरछी लकीरें दिखाई दें तो उस व्यक्ति का
स्वास्थ्य कमजोर समझना चाहिए। यदि हृदय रेखा और जीवन रेखा के बीच में
त्रिभुज बन जाय तो ऐसा व्यक्ति दमे का रोगी होता है।
यदि जीवन रेखा से कोई पतली रेखा निकल कर गुरु पर्वत की ओर जाती
दिखाई दे तो उस व्यक्ति में इच्छाएं, भावनाएं और महत्त्वाकांक्षाएं जरूरत से ज्यादा
होती हैं और वह उन इच्छाओं को पूरी करने का भगीरथ प्रयत्न करता है। यदि इस
रेखा पर कोई रेखाएं उठती हुई दिखाई दें तो वह व्यक्ति परिश्रमी और कर्मष्ठ होता
है तथा अपने प्रयत्नों से भाग्य का निर्माण करता है।
यदि जीवन रेखा के प्रारम्भ से ही उसके साथ-साथ सहायक रेखा चल रही हो
तो ऐसा व्यक्ति सोच-समझ कर कार्य करने वाला विवेकपूर्ण योजनाएं बनाने वाला
चतुर तथा महत्त्वाकांक्षी होता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में कुछ भी असम्भव नहीं
होता।
यदि जीवन रेखा चलती-चलती अचानक बीच में समाप्त हो जाती है तो यह
आकस्मिक मृत्यु की ओर संकेत करती है। यदि जीवन रेखा से कोई सहायक रेखा
निकल कर चन्द्र पर्वत की ओर जाती हुई दिखाई दे तो वह व्यक्ति वृद्धावस्था में
पागल होता है, यदि इस रेखा में शनि रेखा आकर मिल जाए तो वह व्यक्ति प्रति-
भावान और तेजस्वी होता है।
जीवन रेखा के अंत में यदि किसी प्रकार का कोई बिंदु या क्रॉस दिखाई दे
तो उस व्यक्ति की मृत्यु अचानक होती है। यदि जीवन रेखा अन्त में जाकर कई
भागों में बंट जाए तो ऐसे व्यक्ति को बुढ़ापे में निश्चय ही क्षय रोग होगा।
इससे सम्बन्धित कुछ अन्य तथ्य भी नीचे स्पष्ट किये जा रहे हैं :—
१. छोटी रेखा—कम आयु।
२. पीली और चौड़ी रेखा—बीमारी और विवादास्पद चरित्र।
३. लाल रेखा—हिंसा की भावना।
४. पतली रेखा—आकस्मिक मृत्यु।
( १०५ )
५. जंजीरदार रेखा—शारीरिक कोमलता ।
६. टूटी हुई रेखा—बीमारी ।
७. सीढ़ी के समान रेखा—जीवन-भर रुग्णता ।
८. बृहस्पति पर्वत के नीचे से प्रारम्भ—उच्च सफलता ।
६. मस्तिष्क रेखा से मिली हुई—विवेकपूर्ण जीवन ।
१०. जीवन मस्तिष्क तथा हृदय रेखा का मिलन—दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्ति ।
११. बंसी हुई गहरी रेखा—अशिष्टतापूर्ण व्यवहार ।
१२. स्वास्थ्य तथा मस्तिष्क रेखाओं के पास नक्षत्र—सन्तानहीनता ।
१३. स्पष्ट रेखा—न्यायपूर्ण जीवन ।
१४. प्रारम्भ स्थल पर शाखा पुंज—अस्थिर जीवन ।
१५. रेखा के मध्य में शाखाएं—क्षयपूर्ण जीवन ।
१६. अन्तिम सिरे पर शाखाएं—दुखदायी बुढ़ापा ।
१७. अन्त में दो भागों में विभक्त—निर्धनतापूर्ण मृत्यु ।
१८. अन्त में जाल—धनहानि के बाद मृत्यु ।
१६. रेखा से ऊपर की ओर उठती हुई सहायक रेखा—आकस्मिक धन-प्राप्ति ।
२०. रेखा पर काला धब्बा—रोग का प्रारम्भ ।
२१. नीचे की ओर जाती हुई सहायक रेखाएं—स्वास्थ्य तथा धन की हानि ।
२२. मार्ग में रेखा का टूटना—आर्थिक हानि ।
२३. कई जगह पर काटती हुई रेखाएं—स्थायी रोग ।
२४. रेखा पर वृत्त का निशान—हत्या ।
२५. प्रारम्भ में क्रॉस—दुर्घटना से अंग-भंग ।
२६. रेखा के अन्त में क्रॉस—असफलत बुढ़ापा ।
२७. क्रॉस से कटती हुई जीवन रेखा—मानसिक कमजोरी ।
२८. रेखा के प्रारम्भ में द्वीप—तंत्र-विद्या में रुचि ।
२६. रेखा के मध्यम में द्वीप—शारीरिक कमजोरी ।
३०. लहरदार जीवन रेखा और उस पर द्वीप—रोगी जीवन ।
३१. जीवन रेखा से हाथ के पार जाती हुई रेखाएं—चिन्ताएं और कष्ट ।
३२. जीवन रेखा से गुरु पर्वत को जाती हुई रेखाएं-कदम-कदम पर सफलता ।
३३. शनि पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—पशु से दुर्घटना एवं मृत्यु ।
३४. सूर्य पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—प्रसिद्धि और सम्मान ।
३५. बुध पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में विशेष
सफलता ।
३६. चन्द्र पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—जरूरत से ज्यादा निर्धनता तथा
रोगमय जीवन ।
( १०६ )
३७. निम्न मंगल की ओर जाती हुई रेखाएं—क्रोध में आत्महत्या ।
३८. मंगल पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—प्रेम के कारण युवावस्था में
बदनामी ।
३६. शुक्र पर्वत की ओर अंदर की ओर जाती हुई रेखाएं—प्रेम-भंग ।
४०. जीवन रेखा को कई स्थानों पर काटती हुई रेखाएं—पारिवारिक जीवन
में पूर्ण असफलता ।
४१. जीवन रेखा को काटकर भाग्य रेखा तक जाने वाली रेखा—व्यापार में
पूर्ण असफलता ।
४२. जीवन रेखा को काटकर मस्तिष्क रेखा की ओर जाती हुई रेखा—
पागलपन ।
४३. जीवन रेखा को काटकर हृदय रेखा की ओर जाती हुई रेखा—हृदयरोग
से पीड़ित ।
४४. जीवन रेखा तथा हृदय रेखा को काटती हुई रेखा—प्रेम कार्यों में
असफलता ।
४५. हृदय रेखा की ओर जाने वाली रेखा के अन्त में द्वीप—दुखपूर्ण वैवाहिक
जीवन ।
४६. जीवन रेखा और सूर्य रेखा को काटती हुई रेखा—सामाजिक पतन ।
४७. शुक्र पर्वत तथा जीवन रेखा पर नक्षत्र का चिह्न—घरेलू झगड़े ।
४८. सूर्य रेखा तथा जीवन रेखा पर नक्षत्र—दुखमय घरेलू जीवन ।
४६. मस्तिष्क हृदय रेखा तथा जीवन रेखा पर चिह्न—रोगपूर्ण जीवन ।
५०. भाग्य रेखा तथा जीवन रेखा पर त्रिकोण—आर्थिक हानि ।
५१. सूर्य रेखा तथा जीवन रेखा पर त्रिकोण—अपराधपूर्ण जीवन ।
मस्तिष्क रेखा
जीवन और मस्तिष्क का आपस में गहरा सम्बन्ध है क्योंकि बिना बुद्धि के या
मस्तिष्क के जीवन व्यर्थ-सा हो जाता है। जीवन में यश, मान, प्रतिष्ठा आदि बुद्धि के
द्वारा ही प्राप्त होती है अतः जीवन रेखा का जितना महत्त्व हथेली में है, लगभग
उतना ही महत्त्व मस्तिष्क रेखा का भी है ।
विद्वानों के अनुसार हथेली में मस्तिष्क रेखा का पुष्ट सुदृढ़ एवं स्पष्ट
होना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि यदि मस्तिष्क रेखा जरा-सी भी विकृत होती है तो
उसका पूरा जीवन लगभग बरबाद-सा हो जाता है ।
मस्तिष्क रेखा का कोई एक उद्गम नहीं है । यह अलग-अलग स्थानों से निक-
लती है । प्रधानतः इनका उद्गम निम्न प्रकार से देखा गया है :
१. जीवन की रेखा के उद्गम स्थान से निकल कर यह जीवन रेखा को ही
काटती हुई हथेली के दूसरे छोर पर पहुंच जाती है ।
२. जीवन रेखा के उद्गम स्थान के पास से निकल कर हथेली के मध्य में
समाप्त हो जाती है ।
३. जीवन रेखा के बराबर चलती हुई काफी आगे चलकर यह अपना रास्ता
बदल लेती है ।
४. जीवन रेखा के पास से चलकर हथेली को दो भागों में बांटती हुई दूसरे
छोर पर पहुंच जाती है ।
५. मस्तिष्क रेखा और हृदय रेखा आपस में मिलती हुई-सी चलती है इस
प्रकार ये पांच उद्गम स्थान देखे जा सकते हैं । परन्तु इसके अलावा भी मस्तिष्क रेखा
के अन्य उद्गम स्थान होते हैं ।
जिस व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा पहले प्रकार के अनुसार दिखाई देती है
वह अनुकूल नहीं मानी जाती । क्योंकि ऐसी रेखा जीवन रेखा को काट कर चलती है
और इस प्रकार का चिह्न मानव जीवन में दुर्घटना का संकेत देता है । ऐसा व्यक्ति
जीवन में दुर्बल, कमजोर तथा रुग्ण रहता है । जरा-जरा सी बात पर वह क्रोधित हो
जाता है तथा दूरदर्शी न होने के कारण जीवन में अपना ही अहित कर बैठता है । ऐसे
व्यक्ति के जीवन में मित्रों की संख्या कम ही होती है और समय पड़ने पर मित्र भी
धोखा दे देते हैं ।
( १०८ )
दूसरे प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम जिस हथेली में दिखाई देता है ऐसा
व्यक्ति निश्चय ही जीवन में महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त करता है । ऐसे व्यक्ति के जीवन के
कार्य और विचार में परस्पर पूर्ण सामंजस्य रहता है, और वह समय पड़ने पर शीघ्र
निर्णय लेने वाला एवं अवसर को भली प्रकार से पहिचानने वाला होता है । ऐसा
व्यक्ति कुशाग्र बुद्धि वाला होता है तथा बात के मर्म तक शीघ्र ही पहुंचने में सक्षम होता
है । यात्राओं के माध्यम से यह व्यक्ति जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है ।
जिसके हाथ में तीसरे प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम होता है ऐसा व्यक्ति
प्रबल आत्मविश्वासी होता है, तथा अपना कार्य निकालने में वह बहुत अधिक चतुर
एवं योग्य होता है । जीवन में आय के स्रोत एक से अधिक होते हैं । यद्यपि कई बार
इनके मन में हीनभावना आ जाती है परन्तु फिर भी यह अपने पुरुषार्थ के माध्यम
से जीवन में सफल हो जाता है ।
चौथे प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम जिन व्यक्तियों के हाथों में होता है
उनके जीवन में कई बार विदेश यात्राओं के योग बनते हैं साथ ही वह विदेश में
व्यापार कर विशेष धन लाभ करता है। ऐसे व्यक्ति भौतिक दृष्टि से पूर्ण सफल होते
देखे गये हैं ।
जिन व्यक्तियों के हाथों में पांचवें प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम होता
है वे व्यक्ति कठोर, निर्दयी एवं भावनाशून्य होते हैं। एक प्रकार से इन व्यक्तियों
के पास हृदय नाम की कोई वस्तु नहीं होती । अधिकतर अपराधियों के हाथ में इस
प्रकार का उद्गम सहज ही देखने को मिल जाता है । यदि इस प्रकार के हाथों में
मात्र मस्तिष्क रेखा ही हो और हृदय रेखा दिखाई न दे या हाथ में मस्तिष्क रेखा
तथा हृदय रेखा परस्पर मिल गई हो या एक दूसरे से लिपट गई हो तो ऐसा व्यक्ति
जीवन में कई हत्याएं करता है तथा भयंकर डाकू बनता है ।
वस्तुतः हस्तरेखा विशेषज्ञ को हाथ देखते समय मस्तिष्क रेखा के उद्गम पर
विशेष विचार करना चाहिए, और उस उद्गम को देखकर उसके अनुसार अपनी
धारणा बनानी चाहिए । क्योंकि मस्तिष्क रेखा का प्रारम्भ कई नए तथ्यों को स्पष्ट
करता है ।
आगे की पंक्तियों में मस्तिष्क रेखा से सम्बन्धित अन्य तथ्य स्पष्ट कर रहा हूं :
१. यदि मस्तिष्क रेखा से कोई पतली रेखा गुरु पर्वत की ओर जा रही हो,
तो वह व्यक्ति योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने वाला तथा बुद्धिमान होता है ।
२. यदि यह रेखा सीधी, स्पष्ट, और निर्दोष हो तो वह व्यक्ति तुरन्त निर्णय
लेने वाला, क्रियाशील मस्तिष्क का धनी तथा बुद्धिमान व्यक्ति होता है ।
३. यदि मस्तिष्क रेखा तथा जीवन रेखा का उद्गम अलग-अलग हो तो ऐसा