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सर्वकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 350 में से

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पृष्ठ 108

मस्तिष्क रेखा

जीवन और मस्तिष्क का आपस में गहरा सम्बन्ध है क्योंकि बिना बुद्धि के या
मस्तिष्क के जीवन व्यर्थ-सा हो जाता है। जीवन में यश, मान, प्रतिष्ठा आदि बुद्धि के
द्वारा ही प्राप्त होती है अतः जीवन रेखा का जितना महत्त्व हथेली में है, लगभग
उतना ही महत्त्व मस्तिष्क रेखा का भी है ।
विद्वानों के अनुसार हथेली में मस्तिष्क रेखा का पुष्ट सुदृढ़ एवं स्पष्ट
होना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि यदि मस्तिष्क रेखा जरा-सी भी विकृत होती है तो
उसका पूरा जीवन लगभग बरबाद-सा हो जाता है ।
मस्तिष्क रेखा का कोई एक उद्गम नहीं है । यह अलग-अलग स्थानों से निक-
लती है । प्रधानतः इनका उद्गम निम्न प्रकार से देखा गया है :
१. जीवन की रेखा के उद्गम स्थान से निकल कर यह जीवन रेखा को ही
काटती हुई हथेली के दूसरे छोर पर पहुंच जाती है ।
२. जीवन रेखा के उद्गम स्थान के पास से निकल कर हथेली के मध्य में
समाप्त हो जाती है ।
३. जीवन रेखा के बराबर चलती हुई काफी आगे चलकर यह अपना रास्ता
बदल लेती है ।
४. जीवन रेखा के पास से चलकर हथेली को दो भागों में बांटती हुई दूसरे
छोर पर पहुंच जाती है ।
५. मस्तिष्क रेखा और हृदय रेखा आपस में मिलती हुई-सी चलती है इस
प्रकार ये पांच उद्गम स्थान देखे जा सकते हैं । परन्तु इसके अलावा भी मस्तिष्क रेखा
के अन्य उद्गम स्थान होते हैं ।
जिस व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा पहले प्रकार के अनुसार दिखाई देती है
वह अनुकूल नहीं मानी जाती । क्योंकि ऐसी रेखा जीवन रेखा को काट कर चलती है
और इस प्रकार का चिह्न मानव जीवन में दुर्घटना का संकेत देता है । ऐसा व्यक्ति
जीवन में दुर्बल, कमजोर तथा रुग्ण रहता है । जरा-जरा सी बात पर वह क्रोधित हो
जाता है तथा दूरदर्शी न होने के कारण जीवन में अपना ही अहित कर बैठता है । ऐसे
व्यक्ति के जीवन में मित्रों की संख्या कम ही होती है और समय पड़ने पर मित्र भी
धोखा दे देते हैं ।