बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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५. जंजीरदार रेखा—शारीरिक कोमलता ।
६. टूटी हुई रेखा—बीमारी ।
७. सीढ़ी के समान रेखा—जीवन-भर रुग्णता ।
८. बृहस्पति पर्वत के नीचे से प्रारम्भ—उच्च सफलता ।
६. मस्तिष्क रेखा से मिली हुई—विवेकपूर्ण जीवन ।
१०. जीवन मस्तिष्क तथा हृदय रेखा का मिलन—दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्ति ।
११. बंसी हुई गहरी रेखा—अशिष्टतापूर्ण व्यवहार ।
१२. स्वास्थ्य तथा मस्तिष्क रेखाओं के पास नक्षत्र—सन्तानहीनता ।
१३. स्पष्ट रेखा—न्यायपूर्ण जीवन ।
१४. प्रारम्भ स्थल पर शाखा पुंज—अस्थिर जीवन ।
१५. रेखा के मध्य में शाखाएं—क्षयपूर्ण जीवन ।
१६. अन्तिम सिरे पर शाखाएं—दुखदायी बुढ़ापा ।
१७. अन्त में दो भागों में विभक्त—निर्धनतापूर्ण मृत्यु ।
१८. अन्त में जाल—धनहानि के बाद मृत्यु ।
१६. रेखा से ऊपर की ओर उठती हुई सहायक रेखा—आकस्मिक धन-प्राप्ति ।
२०. रेखा पर काला धब्बा—रोग का प्रारम्भ ।
२१. नीचे की ओर जाती हुई सहायक रेखाएं—स्वास्थ्य तथा धन की हानि ।
२२. मार्ग में रेखा का टूटना—आर्थिक हानि ।
२३. कई जगह पर काटती हुई रेखाएं—स्थायी रोग ।
२४. रेखा पर वृत्त का निशान—हत्या ।
२५. प्रारम्भ में क्रॉस—दुर्घटना से अंग-भंग ।
२६. रेखा के अन्त में क्रॉस—असफलत बुढ़ापा ।
२७. क्रॉस से कटती हुई जीवन रेखा—मानसिक कमजोरी ।
२८. रेखा के प्रारम्भ में द्वीप—तंत्र-विद्या में रुचि ।
२६. रेखा के मध्यम में द्वीप—शारीरिक कमजोरी ।
३०. लहरदार जीवन रेखा और उस पर द्वीप—रोगी जीवन ।
३१. जीवन रेखा से हाथ के पार जाती हुई रेखाएं—चिन्ताएं और कष्ट ।
३२. जीवन रेखा से गुरु पर्वत को जाती हुई रेखाएं-कदम-कदम पर सफलता ।
३३. शनि पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—पशु से दुर्घटना एवं मृत्यु ।
३४. सूर्य पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—प्रसिद्धि और सम्मान ।
३५. बुध पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में विशेष
सफलता ।
३६. चन्द्र पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—जरूरत से ज्यादा निर्धनता तथा
रोगमय जीवन ।