बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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इन रेखाओं की जानकारी के साथ-ही-साथ निम्न प्रकार की जानकारी भी
पाठकों के लिए आवश्यक कही जाती है ।
१. रेखाएं स्पष्ट सुन्दर लालिमा लिये हुए तथा साफ-सुथरी होनी चाहिए ।
इनके मार्ग में न तो किसी प्रकार का चिह्न होना चाहिए, और न किसी प्रकार का
द्वीप होना चाहिए । साथ ही ये रेखाएं टूटी हुई भी नहीं होनी चाहिए ।
२. यदि हथेली में रेखाएं किंचित् पीलापन लिये हुए हों तो ऐसी रेखाएं
स्वास्थ्य में कमी और रक्त दूषितता को स्पष्ट करती है । ऐसी रेखाएं निराशावादी
भावना को भी बताती हैं ।
३. रक्तिम रेखाएं व्यक्ति की प्रसन्नता और स्वस्थ मनोवृत्ति को स्पष्ट करती
है । इससे ऐसा ज्ञात होता है कि व्यक्ति प्रसन्नचित्त स्वस्थ और स्पष्ट वक्ता है ।
४. हथेली पर काली रेखाएं पाया जाना निराशा तथा कमजोरी को सूचित
करती हैं ।
५. मुर्झाई हुई या कमजोर रेखाएं : भविष्य में आने वाली बाधाओ की सूचक
कही जाती हैं ।
६. यदि किसी रेखा के साथ-साथ कोई और रेखा आगे बढ़ती हो तो उस रेखा
को विशेष बल मिलता है और उस रेखा का प्रभाव विशेष समझना चाहिए ।
७. यदि किसी टूटी हुई रेखा के साथ साथ सहायक रेखा चलती हुई दिखाई
दे तो उस भग्न रेखा का विपरीत फल न्यूनतम होता है ।
८. जीवन रेखा के अलावा यदि कोई रेखा अपने अन्तिम सिरे पर जाकर दो
भागों में विभक्त हो जाती है तो ऐसी रेखा अत्यन्त श्रेष्ठ एवं प्रभावपूर्ण मानी जाती
है परन्तु यदि हृदय रेखा अन्त में जाकर दो भागों में विभक्त होती है तो ऐसे व्यक्ति
की मृत्यु कम आयु में ही हार्ट एटेक से हो जाती है ।
६. यदि कोई रेखा अपने अन्तिम सिरे पर जाकर कई भागों में बंट जाय
तो उस रेखा का फल विपरीत समझना चाहिए ।
१०. यदि किसी रेखा में से कोई नई रेखा निकल कर ऊपर की ओर बढ़ती
हो तो उस रेखा के फल में वृद्धि होती है ।
११. यदि किसी रेखा में से कोई रेखा निकल कर नीचे की ओर झुक रही हो
या नीचे के माग की ओर गतिशील हो तो उसका विपरीत फल मिलता है ।
१२. भोग रेखा या प्रणय रेखा में से कोई रेखा निकल कर ऊपर की ओर बढ़
रही हो तो सुन्दर पति मिलने का योग बनता है इसके विपरीत यदि उसमें से कोई
रेखा निकलकर नीचे की ओर बढ़ रही हो तो उस व्यक्ति की पत्नी की मृत्यु शीघ्र
ही हो जाती है ।