विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
४६२ आनन्द मन्दिर
चित्र नं० १२
कभी कभी अनियम से गर्भ के बालक का सिर टेढ़ा तिरछा
हो जाता है इससे गर्भवती को बड़ा कष्ट होता है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४६३
चित्र नं० १३
गर्भवती स्त्रियो को बडी सावधानी और पथ्य से रहना
चाहिए। प्रसंग से बहुत बचना चाहिये अनियम आहार विहार
तथा इस दशा मे रतिक्रिया होने से गर्भ को अनेक प्रकार से
हानि पहुँचती है।
१६१ आनन्द मन्दिर
चित्र नं० १४
गर्भ का बालक अनियम रतिक्रिया से दबाव पड़ने के
कारण उलटा सुलटा टेढा तिरछा होजाता है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४६५
चित्र नं० १५
४६६ आनन्द मन्दिर
चित्र नं० १६
धाय का कर्तव्य है, यदि वह चतुर हुई तो उलटे सुलटे तिरछे
गर्भ को ठीक कर सकती है। देखिये दूसरा भाग।
आनन्द
मन्दिर
उन्नीसवां अध्याय
— ० —
३२
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४६६
गर्भिणी और गर्भ को हानि
पहुंचने का कारण
जो गर्भवती स्त्रियां ऊ चे नीचे स्थान पर चढ़ती उतरती हैं
और बहुधा उकडू बैठा करती हैं जो धमक कर तेजी से चलती
हैं, जो सवारी पर बैठती हैं और जो बहुधा तख्त, चौकी अथवा
पृथ्वी आदि कठोर स्थान पर बैठी रहती है जो एक ही करवट
से बैठी रहती हैं और जो अधोवायु, दिशा, पेशाव आदि वेगों
को रोकती हैं जो कठिन परिश्रम करती है और जो अपनी शक्ति
से अधिक काम करती हैं जो बोझा उठाती हैं, जो गरम वस्तुएं
अधिक सेवन करती हैं, अथवा उपवास अधिक करती हैं ।
ऊपर के इन कारणों से और अधिक कलह चिंता और
शोक से उनका गर्भ पेट मे ही मरजाता है अथवा उलटा तिरछा
टेढ़ा होकर गर्भवती के प्राणों को नष्ट करता है और आप भी
नष्ट होता है ।
अधिक दिन का गर्भ होने से टेढ़ा हो जाने से गर्भिणी को
बड़ा कष्ट पहुंचता है जो गर्भवती स्त्री सदैव चित्त लेटा करती है
उसके गर्भ के बालक को बड़ी भारी हानि पहुंचती है इस कारण
गर्भवती को सब प्रकार से सावधान रहना चाहिये ।
यदि गर्भवती को ऊपर लिखे अनुसार किसी प्रकार का कष्ट
हो जावे तो किसी चतुर दाई को बुलाकर ठीक कराले । इस पुस्तक
के दूसरे भाग मे यह विषय भी विस्तार पूर्वक समझाया जावेगा ।
५७० आनन्द मन्दिर
पति पत्नी की प्रेम वार्ता
उत्तम सन्तान की इच्छा रखने वाले पतियों को चाहिये
केवल विषय वासना की तृप्ति के लिये ही स्त्री से प्रेम न करके
प्रतिदिन हृदय से प्रेम करे और स्त्री को अपने जीवन की साथिन
समझ कर गृहस्थी के कार्य और व्यवहार में सम्मति लिया करे ।
जिन दिनों स्त्री गर्भवती हो उन दिनों इस बात का नियम
करले कि प्रतिदिन कुछ देरी के लिये स्त्री के पास बैठकर स्त्री से प्रेम
वार्ता और धर्म चर्चा किया करे और इस बात का ध्यान रक्खे
कि स्त्री पति के प्यार और प्रेमवार्ता से अधिक प्रसन्न रहती है किसी
स्त्री का पति चाहे जितना धनवान और सुन्दर हो स्त्री को चाहे
जितना वस्त्राभूषणों से प्रसन्न रक्खे परन्तु प्रेम न करता हो तो
स्त्री सब व्यर्थ समझती है ।
पति का प्यार संसार के बहुमूल्य
आभूषणों से भी बढ़कर है
याज्ञवल्क्य ऋषि के दो स्त्रियां थी कात्यायनी और मैत्रेयी
इन दोनों पत्नियो से में मैत्रेयी में पति का प्यार कुछ अधिक था
जब याज्ञवल्क्य सन्यास लेकर तपस्या करने के लिये घर से जाने
लगे तब उन्होंने अपना कुल गृहस्थी का सामान वस्त्राभूषण
आदि दोनों स्त्रियों को दो हिस्से बराबर बराबर करके बांट दिया
और आप तपस्या के लिये वन को चल दिये ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ५०१
एक पत्नी कात्यायनी तो अपने हिस्से के वस्त्राभूषण सम्हालने
मे लगी, आभूषणो की देख रेख मे मग्न हुई पत्नी को पति के
वन जाने का अर्थात् विछोह का कुछ भी ख्याल न रहा, परन्तु
दूसरी पत्नी मैत्रेयी जो पति के प्यार का मूल्य समझती थी उसने
उन बहुमूल्य आभूषणों की ओर देखा भी नही और हाथ जोड
कर पति के सामने खडी होकर प्रार्थना करने लगी कि हे प्राण-
नाथ ! प्राणधन !! इस झूठे धन को लेकर मैं क्या करूंगी क्या
इस धन से मुझे शान्ति मिल जायगी ? क्या आप तत्वदर्शी
विद्वान होकर भी यह नहीं जानते कि स्त्री के लिये पति से बढ़-
कर ससार मे दूसरा कोई धन नहीं है जब पत्नी के प्राणो का
धन पति ही छूट रहा है तो यह ससार के बहुमूल्य आभूषणो
को लेकर ही मै क्या करूंगी मेरे लिये अब संसार का कोई
अधिक से अधिक बहुमूल्य पदार्थ प्रसन्न नहीं कर सकता यह
सब व्यर्थ है मै भी आपके साथ चलूंगी ।
पति पत्नी मे सच्चा प्रेम हो तो उत्तम सुन्दर सुशील माता
पिता की आज्ञा कारिणी सन्तान उत्पन्न होती है इस विषय को
आनन्द मन्दिर के दूसरे भाग मे विस्तार से पढ़िये ।
जवानी और बुढ़ापा
स्त्री हो या पुरुष जवानी की अवस्था मे मदान्ध होकर
बुढापे को भूल न जाना चाहिये बुढ़ापा बुरा होता है इस लिये
ऐसे उपाय और साधन काम मे लाने चाहिये जिससे बुढ़ापा शीघ्र
न आघेरे क्योंकि जो मनुष्य नियम पूर्वक नहीं रहते मदान्धता
५०२ आनन्द मन्दिर
से समय कुसमय न देखकर विषयाग्नि की शान्ति मे ही लीन
रहते हैं वे अपनी अमूल्य जवानी को विषयाग्नि मे शीघ्र ही
भस्म करदेते हैं और समय के पहिले ही बुढ़ापे के चंगुल मे फस-
कर कष्ट और दुःखमय जीवन व्यतीत करते हैं ।
याद रखिये बुढ़ापा आकर फिर नही जाता और जवानी
जाकर फिर नही आती ।
"जवानी आनही सकती, बुढ़ापा जा नही सकता"
भर्तृहरि जी ने ठीक कहा है:—
व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती,
रोगाश्च शत्रु इव प्रहरन्ति देहम् ।
आयुःपरिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो,
लोकस्तथाप्यहितमा च रतीति चित्रम् ॥
अर्थात—वृद्धावस्था वाघिनी की समान जवानी को खालेने
के लिये सामने खड़ी है, सब रोग शत्रुओं की समान देहपर
दण्ड प्रहार कर रहे हैं, आयु (उम्र) प्रति दिन इस प्रकार
निकलती जाती है, जैसे कच्चे घडे से पानी निकलताजाय, तिस
पर भी मनुष्य जिसमे बुरा हो वही काम करते जाते हैं ।
प्रेस की प्रार्थना
पुस्तक का यह प्रथम भाग "आनन्द मन्दिर" अब समाप्त
होरहा है इसका दूसरा भाग शीघ्रही तैय्यार होगा । यहां हम
विवाह विज्ञ-कामशास्त्र ५०३
दाम्पत्य प्रेम के विषय मे कुछ लाइने और लिखकर पुस्तक
समाप्त करते हैं ।
पीछे बतलाया गया है इस बात को बड़े बड़े महर्षियो ने
भी माना है श्रीरामचन्द्र, श्रीकृष्णचन्द्र, शिव, ब्रह्मा इत्यादि देव-
ताओ ने भी पति पत्नी के प्रेम की महिमा गाई है वेदो से भी
दाम्पत्य प्रेम दृढ़ और जीवन पर्यन्त बने रखने के लिये बहुत
कुछ आज्ञा दी है इस विषय मे अब अधिक लिखना व्यर्थ हैः-
दाम्पत्य प्रेम स्वर्ग का भी दुर्लभ पदार्थ है वे ही पति पत्नी
स्वर्ग सुख भोगते है उन्ही को मनुष्य जीवन का सच्चा आनन्द
और सुख मिलता है जो एक दूसरे के प्रेम बन्धन मे रहकर उत्तम
सन्तान उत्पन्न करते हैंः—
एक साहसी वीर युवक भयकर वनो मे जाकर बड़े बड़े
बलवान् हाथी और सिहो को मारता है जिसके सामने बड़े बड़े
बली और भयकर जीव घबड़ा कर भागने का मार्ग तक भूल
जाते हैं परन्तु जब वह अपनी प्यारी पत्नी के पास घर पर आता
है और उसे किसी कारण से उदास मलिन मुख देखता है तो
[L18
५०४ आनन्द मन्दिर
देश की सैकड़ा पीछे निन्नानवे स्त्रिया रोगी पाई जाती हैं और
यही कारण सन्तान के रोगी निर्बल दुर्बल और अकालमृत्यु होने
की अधिकता का है। इसी कारण सन्तान माता पिता का निरा-
दर करने वाली बुरे स्वभाव वाली साहस हीन और कुमार्गी
होती है। इस विषय मे प्रमाण देने की जरूरत नहीं क्योकि पता
लगाइये तो बहुत कम ऐसे घर मिलेंगे जिनमे स्त्री पुरुष या
बालक कोई रोगी न हो।
अनुभव की बात
मुझे इस बात का अनुभव है क्योकि मेरे पास २५ पच्चीस
वर्षों मे लाखो स्त्रियां इलाज के लिये आई उनकी जबानी
उनके पति और सन्तान के रोगी होने का हाल मालूम कर
उन स्त्रियो द्वारा उनके पति तथा सन्तान की भी चिकित्सा
की गई।
मेरे इलाज से अब तक लाखों स्त्रियां और इतने ही पुरुष
आराम होचुके है और हजारो सन्तान हीन स्त्रियां सन्तानवती
होगई हैं। इसी प्रकार अनुभव प्राप्त हुआ है कि स्त्रियो और
बालकों के रोगो का कारण पुरुष ही हैं।
आनन्द मन्दिर
बीसवां अध्याय
—०—
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ५०७
यमराज की कचहरी
अत्याचारी और व्यभिचारी पतियों का न्याय
अत्याचारी और व्यभिचारी पति अपनी निरपराध पतियो
पर जो अत्याचार करते हैं उन्हे अपनी कामाग्नि शान्ति की
मशीन समझकर उनके साथ अन्याय करते हैं अनेक प्रकार
के विपरीत आसन और अनियम रति करके उन्हे रोगी
बना देते हैं और फिर कुछ परवाह नहीं करते वे रोगो मे ग्रसित
हो दुःखमय जीवन व्यतीत करती हैं तथा सन्तान हीन ( वन्ध्या )
हो रोरो कर मृत्यु के दिन गिना करती हैं इन्ही कष्टो मे ही जब
जीवन लीला समाप्त कर जाती हैं तब वे शक्तिहीन होने पर भी
अपनी विषय लोलुपता के कारण दूसरा विवाह कर लेते हैं।
बहुतेरे अपनी विवाहित स्त्री के रहते हुए भी उससे तृप्त न
होकर उसका निरादर कर वेश्यागामी होजाते हैं तथा पर स्त्री
को बहका कर धमका कर लालच दिखाकर व्यभिचार करते हैं
उनको इस अत्याचार और व्यभिचार का फल स्वरूप अनेक
प्रकार के रोगों में ग्रसित हो कष्ट से जीवन व्यतीत करना पड़ता
है और उन्हें गरमी सुजाक प्रमेह नपुंसकता आदि रोग घेर लेते हैं
जिससे वे रोरो कर मौत के दिन गिना करते हैं इस प्रकार इस
मनुष्य शरीर में उन्हें पत्नी पर अत्याचार अन्याय और पर स्त्री
गमन वेश्यागमन की सजा रोग रूप में मिलती है ।
५०८ आनन्द मन्दिर
इस अत्याचार की सजा इस लोक की तो सब देखते ही हैं।
मरने पर उन्हें यमराज के यहां से जो सजा मिलती है वह भी कम
नहीं है ऐसे अत्याचारी और व्यभिचारी पतियों को सावधान करने के
लिये प्राचीन ग्रन्थो के अनुसार यमराज की कचहरी में यमराज
द्वारा न्याय होकर जो सजा मिलती है और उन दुष्ट पतियों की
आत्माओं को जो कष्ट होता है वह चित्रों में देखिये ।
अत्याचारी पति को यमराज का दण्ड
जिस प्रकार अत्याचार और व्यभिचार का दण्ड इस लोक
मे अनेक प्रकार के रोग और अधिक अत्याचारी को सरकार से
दण्ड मिलता है उसी प्रकार यमराज की अदालत में भी मरने पर
अत्याचारी की आत्मा को दण्ड मिलता है देखिये चित्र अत्याचारी
पति को पत्नी के दुःख देने का फल ।
पर स्त्री गमन का फल
पर स्त्री गमन करने वाले दुष्ट पुरुष भोली भाली मूर्खा स्त्रियों
को बहकाकर फुसला कर और लालच दिखाकर उनका धर्म नष्ट
करते हैं जो मूर्खा स्त्रिया पर पुरुष के धमकाने बहकाने और
लालच दिखाने से पर पुरुष की धमकी या लोभ मे आजाती हैं
उनको इस लोक मे तो निन्दा और कष्ट सहने ही पड़ते हैं
किन्तु मरने पर भी यमराज की कचहरी मे उनको कठोर दण्ड
मिलते हैं देखिये चित्र पर स्त्री गमन का फल ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ५०६
दुष्ट पुरुषों से ठगी गई पर पुरुषरता
स्त्री को यमराज का दंड
जो स्त्रियां अपने पति का निगदर कर अपने धर्म्म का
त्याग करती है उन्हे इस जन्म मे अनेक प्रकार के कष्ट और दुःख
मिलते हैं उनकी ससार में निन्दा होती है मरने पर यमराज के
यहां अनेक दुख दिये जाते है। देखिये चित्र पर पुरुषरता स्त्री
को दण्ड।
अपने सुख और आराम के लिये सौतेली
सन्तान को कष्ट देने का फल
जो स्त्रिया सौतेली सन्तान को दुख देती हैं उन बच्चो की
आत्मा दुःखी होकर उन स्त्रियों को शाप देती है उसके प्रभाव से
उन स्त्रियो को मरने पर यमराज के यहां जो दण्ड मिलता है
वह चित्र सौत के लड़के को दुःख देने का फल मे दिखलाया गया है।
पति का निरादर
जो स्त्रिया अपने रोगी निर्बल शक्ति हीन और नपुसक पति
का निरादर करती हैं और दूसरो के बहकाने तथा लालच दिलाने
से अथवा जो स्त्रिया अपने निर्धन पति का निरादर करके सुख
भोग की इच्छा से पर पुरुष के लालच देने पर और जो सन्तान
हीन स्त्रियां सन्तान की इच्छा से पर पुरुष से गर्भधारण करती है।
५१० आनन्द मन्दिर
जो स्त्रियां अपने कुरूप तथा अगभंग पति का निरादर करके
स्वरूपवान पर पुरुप की मन में भी इच्छा करती हैं। जो स्त्रिया
किसी कारण से भी पर पुरुप गासिनी होती है अथवा पर पुरुप
की इच्छा करती हैं ऐसी सब स्त्रियो को मरने पर यमराज के यहाँ
बड़ा कठोर दण्ड मिलता है।
जिस पुरुप के साथ उनकी बुद्धि भ्रष्ट होती है उसी पुरुप
के साथ उन्हे दण्ड मिलता है इसी लिये धर्म्म शात्रों में महा-
त्माओं ने पर स्त्री गमन तथा पर पुरुप प्रसंग से इस लोक और
परलोक दोनों का कर्म्म फल बतलाया है।
अपनी ही स्त्री से प्रेम अपने ही पति से स्नेह और सुख
तथा आनन्द भोग की इच्छा पति पत्नियो को रखनी चाहिये।
॥ समाप्त ॥
आनन्द मन्दिर का दूसरा भाग
सचित्र चिकित्सा खण्ड
आनन्द मन्दिर का दूसरा भाग भी तय्यार होरहा है इसके
दूसरे भाग मे स्त्री पुरुष और बालको के रोगों के उत्पन्न होने के
कारण रोगो की पहिचान और रोग दूर होने के अनेक उपाय
तथा अनेक परीक्षा किये हुए नुस्खे लिखे गये हैं।
दूसरे भाग की पृष्ठ संख्या लगभग ८५० सौ है
आनन्द मन्दिर का दूसरा भाग
बड़ा ही उपयोगी हर समय काम आने वाला:-
स्त्री रोगो का निदान और चिकित्सा स्त्री रोगों के हर एक
रोग पर मेरे २५ पच्चीस वर्ष के हजारो बार परीक्षा किये हुए
बहुमूल्य नुस्खे है और इसी प्रकार पुरुषो के अनेक रोग उत्पन्न
होने के कारण रोगो की पहिचान और रोगो के दूर करने के
हर एक रोग के बहुमूल्य अनेक नुस्खे हैं। इसके सिवाय.-
रतिक्रिया रहस्य की गुप्त से गुप्त और गूढ़ से गूढ़ विषय
बड़ी सरलता से समझाये गये हैं, रतिक्रिया रहस्य के जो उपयोगी
और अत्यन्त आवश्यक विषय इस प्रथम भाग मे नही आसके
वे दूसरे भाग में लिखे गये हैं।
रतिक्रिय रहस्य के छै सौ ६०० से भी अधिक विषय तथा
स्त्री पुरुषो के रोगो पर हजारो बार परीक्षा किये हुए नुस्खे बत-
लाये गये हैं जिनको अपने हाथो ही स्त्रियां घर पर तय्यार करके
अपने तथा अपने पति के रोगो को आप ही आराम करलेगी।