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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

३७८ आनन्द मन्दिर
भीतरी मस्सा के सम्बन्ध में
चित्रो को देखने से पाठको की समझ मे भलीभांति आजावेगा
कि जहां पर योनि मार्ग लिखा है वही पुरुष की इन्द्री संभोग के
समय योनिमार्ग से गर्भाशय के मुख के पास पहुँचती है और
वीर्य स्खलित होने के समय गर्भाशय के मुख से लग जाती है
तव पुरुष का वीर्य गर्भाशय के मुख मे जाता है । जव गर्भाशय
के मुख पर मस्सा उत्पन्न हो गया तो गर्भाशय का मुख खुल ही
नहीं सकता । यदि खुले भी तो मस्से के कारण पुरुष की इन्द्री
का मुख गर्भाशय के मुख से मस्से के कारण मिल नही सकता ।
इस रोग वाली स्त्री को भी सभोग के समय प्रसन्नता नही
होती। इन्ही कारणों से स्त्री गर्भ धारण नहीं करती और जव तक
यह मस्सा दूर न हो तव तक वन्ध्या रहती है ।
गर्भाशय के भीतर उत्पन्न हुए मस्से का चित्र देखने से इस
मस्से के कारण पुरुष का वीर्य गर्भाशय मे पहुँच तो जाता है
परन्तु शीघ्र ही बाहर निकल आता है। जव यह मस्सा
अधिक बढ जाता है तव स्त्री को समोग के समय कष्ट होता है
और उसे संभोग मे प्रसन्नता भी नहीं होती ।
अनेक स्त्रियो के गर्भाशय की परीक्षा करने से गर्भाशय के
मुख पर मस्सा देखा गया और बवासीर के मस्से की समान
गर्भाशय के मस्से से रक्त निकलते हुए देखा गया है ।
ऐसी रोगी स्त्रियो का रक्त प्रदर समझ कर बड़े बड़े

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३७६
चिकित्सको ने वर्षों इलाज किया परन्तु कुछ भी फायदा नहीं
हुआ, रक्त बन्द नही हुआ क्योकि उन चिकित्सा करने वालो ने
रोग समझा ही नही। मेरे पास ऐसी कई स्त्रियां आई जो कई
लेडी डाक्टरो का वर्षों इलाज करा चुकी थी उन्होने भी रक्त
प्रदर ही समझकर इलाज किया, जब कुछ फायदा नही हुआ
जब वे स्त्रियां इधर उधर की औषधि करके सब ओर से निराश
होगई तो मेरे पास आईं। मैने अपने देशी इलाज से रोग दूर
कर दिया। जिस प्रकार बवासीर के मस्से से रक्त कभी दस
बीस दिन बाद निकला करता है इसी प्रकार गर्भाशय के मस्से
से भी निकला करता है। इसलिये प्रायः चिकित्सक उसे मासिक-
धर्म्म की ही खराबी समझते है। क्योकि मासिकधर्म्म हो जाने पर
फिर दस पांच अथवा दस पन्द्रह दिन बाद मस्से से रक्त आने
का समय आया तो यही समझा गया कि मासिकधर्म्म फिर
हुआ। ऐसी स्त्रियां मेरे पास अनेक आईं कि जिन्हे महीने मे दो
दो तीन तीन बार मासिकधर्म्म होता था। यही समझकर उनका
इलाज अनेक चिकित्सको ने किया परन्तु वे रोग को समझ
नही सके।
जब वे स्त्रियां मेरे पास आईं और उनके गर्भाशय की
परीक्षा की तो मस्से का पता लगा। गर्भाशय मे मस्सा होने से
मासिकधर्म मे भी खराबी मालूम होती है क्योकि मस्से के
कारण रक्त रुक रुक कर धीरे धीरे निकलता है। इसी लिये
मासिक धर्म का रक्त खूब तेज और साफ नही निकलता है।

३८० आनन्द मन्दिर
स्त्रियों की रोग परीक्षा
हमारे देश की स्त्रियो के गुम रोगों की परीक्षा बड़े बड़े
नामी चिकित्सक भी नही कर सकते क्योकि हमारे देश की लज्जा-
वती स्त्रियां पुरुष चिकित्सकों को लज्जा के कारण अपने गुम
रोग दिखला नही सकतीं और लेडी डाक्टर इसकी विशेष पर-
वाह नही करतीं। यदि परवाह की भी तो सिवाय आपरेशन के
और कुछ इलाज नही। आपरेशन से कभी कभी गर्भाशय में
अधिक खराबी आते देखी गई है। दूसरी बात यह भी है हमारे
देश की स्त्रियों का शरीर इसी देश की जलवायु (आबोहवा) से
बना है इस कारण इसी देश की चिकित्सा प्रणाली तथा यही
की उत्पन्न हुई देशी औषधियां पूर्ण फायदा पहुंचा सकती हैं।
गर्भाशय का टेढ़ा हो जाना

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३८१
गर्भाशय का टेढ़ा होजाना
विपरीत रतिक्रिया करने से और अनियम रति करने से
गर्भाशय कई प्रकार से टेढ़ा होजाता है जैसा कि चित्रो में दिख-
लाया गया है ।
स्त्रियो के गर्भाशय की परीक्षा करने से देखा गया है कि
गर्भाशय का मुख अनेक प्रकार से टेढ़ा होगया। आगे वाले चित्रो
से यह भलीभांति समझ मे आजावेगा ।
विपरीत रतिक्रिया अर्थात् विपरीत आसन से रति करने
वाले और चौरासी आसनो की खोज मे रहने वाले अज्ञानी
कामान्ध पतियो की अज्ञानता से गर्भाशय मे जो खराबियां देखी
गई हैं उनसे बन्ध्या हुई स्त्रियो की संख्या कम नही है ।

३८२ आनन्द मन्दिर
गर्भाशय का मुख टेढ़ा होना
[चित्र में शब्द: गर्भाशय, मलाशय, मूत्राशय, योनिमार्ग, मूत्रमार्ग, योनिमुख, गुदा द्वार]
गर्भ न रहने की स्थिति। इस दशा मे सभोग के समय स्त्री
को कष्ट होता है और गर्भ नही रहता । विपरीत आसन से यह
रोग उत्पन्न होता है।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३८३
गर्भाशय का टेढ़ा मुख
गर्भाशय
मूत्राशय
मलाशय
योनिमार्ग
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुह्यद्वार
गर्भ न रहने की स्थिति। इस दशा में पुरुष का वीर्य गर्भा-
शय में नहीं जा सकता इसलिये गर्भ नहीं रहता। विपरीत रति
के कारण यह रोग उत्पन्न होता है।

३८४ आनन्द मन्दिर
अनियम रतिक्रिया करने वालो सावधान !
मासिक धर्म के दिनों मे गर्भाशय निर्बल और अधिक
कोमल होजाता है क्योंकि ऋतु का रक्त निकलने के लिये गर्भा-
शय का मुख भलीभांति खुल जाता है रक्त प्रवाह से गर्भाशय
मे निर्बलता आजाती है । जो अज्ञानी कामान्ध पति ऐसी दशा
मे संभोग करते हैं तथा जो मासिक धर्म्म के बाद विपरीत
आसन से रति करते हैं उनकी स्त्रियों के गर्भाशय का मुख टेढ़ा
होजाता है जैसा ऊपर के चित्रों से स्पष्ट है ।
जो अज्ञानी विषयी पुरुष स्त्री को ऊपर बिठाकर संभोग
करते हैं उनकी स्त्री का गर्भाशय चित्र के अनुसार टेढ़ा होकर
योनि की दीवार से चिपक जाता है । अनेक स्त्रियों के गर्भाशय की
परीक्षा करने से ऐसा गर्भाशय देखा गया तब उनसे यह बात
पूछी गई । उन्होंने अपने पति की विपरीत आसन से लगातार
बीसो दिन तक रतिक्रिया करते रहने की बात कही । इस
अनुभव से मालूम हुआ है कि गर्भाशय का टेढ़ा होना विपरीत
आसन से रति करने का कारण है ।
जो अज्ञानी पति पशु की समान स्त्री की स्थिति करके
सभोग करते हैं उनकी स्त्रियो का गर्भाशय चित्र के अनुसार
योनि की दीवार मे पेडू की तरफ चिपक जाता है। यह भी परीक्षा
करने से और अनेक ऐसी रोगी स्त्रियो से जबानी हाल पूछने से
मालूम हुआ है । इस प्रकार टेढ़ा गर्भाशय मैंने स्वयं आंखो

र स्त्री और पर पुरुष के व्यभिचार का फल । पृ० ५० ; सर्वाधिकार सुरक्षित ।

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३८५
गर्भाशय का योनि की दीवार में चिपटा मुख
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
गुदा द्वार योनिमुख
ले देखा । मासिकधर्म के बाद गर्भाशय शुद्ध कोमल और
निर्बल रहता है तब विपरीत रति करने से गर्भाशय का मुख टेढ़ा
होकर योनि से चिपट जाता है इसलिये गर्भ नहीं रहता है।
२५

पञ्चम खण्ड: गर्भसंस्कार, श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति एवं पारिवारिक आदर्श

३८६ आनन्द मन्दिर
दाम्पत्य जीवन को दुःखमय बनानेवाली
मनगढ़ंत पुस्तकों से सचेत रहिये
आजकल ऐसी अनेक पुस्तको के बड़े बड़े विज्ञापन देखे
जाते हैं और अनेक पुस्तके भी रोगी स्त्रियां मेरे पास लाईं जिनके
प्रयोगो और हानिकारी आसनों की विधियो से उनके कामान्ध
पतियों ने रतिक्रिया करके स्त्री को जीवन भर के लिये कष्ट
पहुँचाया।
कई स्त्रियां मेरे पास ऐसी पुस्तके लाईं जिनमे लिखी विपरीत
आसनों की विधि से रतिक्रिया करते ही स्त्रियो को कष्ट हो गया।
अनेक स्त्रियां ऐसी आईं जो विपरीत आसन से रतिक्रिया के
के कारण अनेक भयंकर रोगो मे ग्रसित थी उन सब ने मुझ से
कहा कि जबसे अमुक पुस्तक हमारे पति ने मंगाई है तब से इसी
विधि से संभोग करते हैं, जिससे हमे बड़ा कष्ट होता है, बहुत
समझाने पर भी नहीं मानते। अब हमे बहुत तकलीफ होगई है
इससे बड़ा कष्ट होता है तब हमारे पति हमको आपके पास
इलाज के लिये लाये हैं।
पाठक पाठिकाओ ! कैसे दुःख का विषय है कि विषयी
लोगो को इस बात का ध्यान नहीं है कि स्त्री रोगी हो जावेगी
और सुखमय दाम्पत्य जीवन नष्ट हो जायगा। बहुतेरे तो रोगी
स्त्री का भी पीछा नहीं छोड़ते।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३८७
गर्भाशय के मुख की सूजन
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
योनिमार्ग
मूत्रमार्ग
गुदाद्वार योनिमुख
गर्भाशय के मुख पर सूजन होने से 'गर्भाशय का मुख
रतिक्रिया। के समय वीर्य ग्रहण के लिये खुलता ही नहीं इसलिये
गर्भ भी नहीं रहता है। पढ़िए पृष्ठ ३८८

३८८ आनन्द मन्दिर
विपरीत रति से
सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियां रोगी हैं
जो विषयी पति स्तम्भन की औषधियां खाकर तथा मनगढ़त
कामशास्त्र कोकशास्त्र तथा अन्य इसी विषय की पुस्तको मे
अज्ञानियो की लिखी स्तम्भन की विधियां तथा औषधियों से
कोस लेते हैं और अपनी प्यारी पत्नियो पर अत्याचार करते हैं
उनकी इस अनियम रति से प्राकृतिक नियम से अधिक समय
तक रतिक्रिया होने से जनेन्द्री के बार बार दबाव पड़ने के कारण
स्त्रियो के गर्भाशय मे सूजन आ जाती है। जैसा कि चित्र पृष्ठ
३८७ मे दिखाया गया है इस प्रकार अधिक वार प्रसंग होते रहने
से वह सूजन बढ़ जाती है।
कुछ दिनो बाद उस स्त्री के गर्भाशय मे संभोग के समय
कष्ट होता है और गर्भाशय को विश्राम न मिलने के कारण वह
सूजन दूर नहीं होती । इस सूजन के कारण मासिक धर्म्म मे भी
खराबी हो जाती है क्योकि मासिक धर्म्म के समय गर्भाशय का
मुख सूजन के कारण भलीभांति नहीं खुलता इसलिये रक्त अच्छी
तरह नही निकलता रुक रुक कर निकलता है। कुछ दिनों मे
वह रक्त इकट्ठा होकर जम जाता है और गांठ पड़ जाती है।
मासिक धर्म्म के समय गर्भाशय का मुख इस प्रकार खुल
जाता है। जैसा कि पृष्ठ ३९० के चित्र मे दिखलाया
गया है। जो अज्ञानी पुरुष मासिक धर्म्म के दिनो मे रतिक्रिया

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३८६
करते हैं उनकी स्त्रियों के गर्भाशय का मुख अधिक दबाव पड़ने
से खुला ही रह जाता है यदि इस गर्भाशय को दो तीन महीने
विश्राम देदिया जावे प्रसंग न किया जावे तो ठीक भी होजाता
है। यदि ऐसी दशा में अनेक बार प्रसंग हुआ तो गर्भाशय का
मुख इसी प्रकार खुला रह जाता है उस स्त्री के मासिकधर्म्म के
समय रक्त अधिक और अधिक दिनों तक जाता रहता है।
इस रोग वाली स्त्री के गर्भ नहीं रहता। इस रोग वाली
अनेक सन्तान हीन स्त्रियां मेरे पास इलाज के लिये आईं उनकी
जबानी मालूम हुआ कि उनके पति देव मासिक धर्म्म की दशा
में भी अपनी कामाग्नि शान्ति करते रहे।
इसी कारण हमारे आयुर्वेद में ऋषियों ने ऋतुमती
स्त्री को पति से अलग रहना लिखा है और ऋतुमती स्त्री को
बड़े आचार विचार से ऋतु समय के दिनों को व्यतीत करना
बतलाया है। ताकि स्त्री के गर्भाशय में किसी तरह की खराबी
न हो।
बतलाया है कि रजस्वला स्त्री प्रथम दिन से तीन दिन
पर्यन्त कुश की शैया पर सोवे और हाथों में या मिट्टी के बरतन
में अथवा पत्तल में सादा भोजन करे और तीन रात्रि पर्यन्त
पति को भी न देखे तदनंतर चौथे दिन शुद्ध स्नान कर उत्तम
वस्त्रों को पहिन तथा आभूषणों को पहिन श्रृंगार कर सुगन्धित
द्रव्यों से देह, वस्त्र सुवासित करके प्रसन्न मुख होकर पति का
दर्शन करे।

३६० आनन्द मन्दिर
गर्भाशय का खुला मुंह

[चित्र में अंकित शब्द:
गर्भाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुदाद्वार]

ऋतुस्नान से १६ रात्रि पर्यन्त गर्भाशय का मुख गर्भधारण
लिये खुला रहता है नियम पूर्वक रतिक्रिया करने से गर्भ
रहता है।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६१
ऋतुस्नाता स्त्री के पति दर्शन का कारण
पूर्वं पश्येदृतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना ।
तादृशं जनयेत्पुत्रं भर्तारं दर्शयेदतः ॥
ऋतुस्नाता स्त्री के प्रथम पति का दर्शन करने का कारण
यह है कि ऋतुस्नान के बाद स्त्री जैसे मनुष्य को देखेगी वैसा ही
पुत्र उत्पन्न होगा इसलिये पहिले पति का ही दर्शन करे ।
इस विषय मे आयुर्वेद मे यहां तक बताया गया है कि यदि
पति उस समय न हो तो पति का चित्र देखे और पति का
ध्यान करे ।
देखिए अन्यत्र चित्र मे ऋतुस्नाता स्त्री पति का चित्र देख
रही है। यदि पति उसी नगर में हो कार्य वश घर मे उस समय
न हो, कचेहरी दफ्तर अथवा दूकान पर गया हो कही भी गया
हो तो ऋतुस्नाता एकान्त में उसके आने तक पति का ध्यान करे ।
(देखिये अन्यत्र चित्र मे ऋतुस्नान के बाद पत्नी लेटी हुई
अपने पति के ध्यान में पति के आने की राह देख रही है ) जब
पति बाहर से आजावे तब उसका प्रसन्न मुख से जैसा ऊपर
बतलाया गया है दर्शन करे । देखिये इसी विषय का तीसरा चित्र
जहां पति पत्नी खड़े हुए एक दूसरे को देख रहे हैं, किस प्रकार
स्नेह की दृष्टि से देखते हैं इस चित्र में चित्रकार ने यही भाव
दर्शाया है ।
आज कल के पाश्चात्य शिक्षा के विद्वान इन बातो को ढोंग

३६२ आनन्द मन्दिर

बतलाते हैं । शहरो मे रहने वाली प्रायः पढ़ी लिखी स्त्रियां ऊपर
लिखे नियमो को ढकोसला बतलाती हैं। बड़ी लड़कियां और
अध्यापिकाए इसको बिल्कुल नही मानतीं मासिक धर्म के दिनो
मे भी पाठशाला जाया ही करती हैं ऋतुस्नान के बाद प्रथम पति
के दर्शनों की तो बात ही दूर है इक्केवाले, गाड़ीवाले, कोरी,
चमार सईसो तथा मोटर ड्राइवरो के दर्शन करती हैं ।
वे ऋतुधर्म के दिनो का कुछ भी विचार नही करती । यहां
तक देखा गया है कि शहरो की स्त्रियां भोजन बनाने इत्यादि का
भी कुछ विचार नही करती । धीरे धीरे इस विषय को लोग भूलते
ही जाते है । दो चार नही पचासो ऐसी स्त्रियो से मुझसे इस विषय
मे बातचीत हुई तो उन्होंने कहा कि अगर हम चार दिन
मासिकधर्म के दिनो मे भोजन न बनावे तो घर वालो को रोटी
का बड़ा कष्ट हो ।
शहरो मे जिनके घरो मे रोटी बनाने वाली नौकरानियां हैं
वे नौकरानियो को ऐसी दशा मे भी चार दिन की छुट्टी नही देती
अतएव नौकरानी मासिकधर्म होने पर भी बाबू जी के यहां
रोटी बनाने जाया करती है ।
जब यह दशा है तो सन्तान और सन्तानवाली दोनो
आरोग्य कैसे रह सकते हैं । इस प्रकार के विषयो पर बातचीत
होने पर स्त्रिया प्रायः विलायत की स्त्रियो का उदाहरण देती हैं ।
परन्तु उनके आरोग्यता सम्बन्धी अन्य नियमो का उन्हे पता ही
नहीं है । उनके यहां जिस विषय पर जो नियम हैं उनके विरुद्ध

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६३
वे कदापि नहीं चलतीं । उनके यहां के नियम यहां बतलाये
जावे तो पुस्तक बहुत बढ़ जायगी और विषय भी दूसरा हो
जायगा इस कारण इतना ही बतला देना बहुत है कि जिसके
देश और कुल परम्परा के जो नियम हो उसे उसी नियम पर
चलना चाहिये ।
पाश्चात्य देशो की स्त्रियां अपने रहन सहन, खान पान
आदि का अपने देश काल के अनुसार पूरा विचार रखती हैं ।
उन्हें अपनी आरोग्यता स्वस्थता और सुन्दरता का पूरा ध्यान
रहता है। इसके विपरीत भारतवर्ष की स्त्रियो की दशा बहुत
शोचनीय है । मुझे तो मालूम होता है कि यहाँ का पचानवे
प्रतिशत नारीसमाज आरोग्यता और स्वस्थता की आवश्यकता
ही नहीं समझता है । खान पान रहन सहन के नियमो के सम्बन्ध
मे पुरुष समाज ही बिलकुल बेखबर है फिर भला स्त्रियो का क्या
कहना मानो उनके लिये ईश्वर ने कोई नियम बनाए ही नही है।
हमारे देश की स्त्रियां और पुरुष अपने नियमों पर नही चलते
इसी कारण सैकड़ा पीछे निन्नानवे स्त्रियां और इतने ही पुरुष रोगी
होरहे हैं हमारे देश के बालको की भी रोगी संख्या अधिक है ।
विपरीत आसन से गर्भाशय भ्रंश
स्त्री निर्बल हो अथवा विपरीत और अनियम रतिक्रिया से
गर्भाशय निर्बल पड़गया हों तो उस निर्बलता की दशा मे विपरीत
रति से स्त्री का गर्भाशय बाहर निकल आता है। कुछ दिनो तक

३६४ आनन्द मन्दिर
गर्भाशय का बाहर निकल आना

गर्भाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
गुदाद्वार

अनियम आहार विहार और विपरीत आसनों से रतिक्रिया
करने से निर्बल स्त्री का गर्भाशय प्रायः बाहर निकलने लगता है,
वह अपनी जगह से हट जाता है।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६५

तो मालूम नहीं होता। योनि में कुछ भारीपन या आलस्य सा मालूम
होता है। ऐसी हालत में भी सम्भोग बराबर होता ही रहे अथवा
-- के दिनों में गर्भाशय भ्रंश वाली स्त्री से सम्भोग हो तो गर्भा-
शय गिरकर बाहर निकल आता है जैसा पीछे के चित्र में है।
मेरे पास अनेक स्त्रियां ऐसी आईं और राय चाहा करती
हैं। उनकी ज़बानी मालूम होता है कि विपरीत आसन में रति
क्रिया करने से यह रोग हुआ। कई स्त्रियों ने मुझसे बतलाया कि
उनके पति ने उन्हें दिया औंधे-मुँह सुला और उन्होंने उल्टे
किसी चित्र के अनुसार पशु की समान सम्भोग किया जिससे
कि मेरे हाथ पैर कांपने लगे, मैं गिर पड़ी तभी से पेड़ू में पीड़ा होने
गर्भाशय का बाहर निकल आना
लगी और जनेन्द्री में भारीपन मालूम होने लगा। अब न जाने
क्या गुह्य स्थान में कुछ लटका हुआ सा मालूम होता है।