विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३५६
गर्भधारण
पीछे बतलाया गया है कि शुद्ध रज वीर्य तथा आरोग्य
जननेन्द्री वाले दम्पति ही उत्तम सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं। यदि
रज वीर्य पत्नी अथवा पति किसी की जननेन्द्री मे खराबी
हुई हो तो गर्भधारण नही होता ।
मेरे पास लाखो स्त्रियां अपना इलाज कराने आईं इनमे
आधी से अधिक संख्या ऐसी स्त्रियो की पाई गई जो सन्तानहीन
थी। रोग की परीक्षा करने से बहुतों मे गर्भाशय की खराबी न थी
उनके पति का उन स्त्रियो की जबानी हाल मालूम हुआ कि पतियो
मे इन्द्री की सिथिलता शीघ्रपात और नपुंसकता आदि रोग
मौजूद हैं।
जब उनके पतियो से पत्र द्वारा पूछा गया तब मालूम हुआ
कि उन्होने अनियम वीर्य का सत्यानाश मारकर जननेन्द्री की शक्ति
को नष्ट कर डाला इस कारण वे सन्तान उत्पन्न करने के योग्य नही
रहे। उनके पत्र तथा स्त्रियों की जबानी मालूम हुआ कि वे उचित
रीति से रतिक्रिया नही कर सकते क्योकि वे शक्तिहीन होगये हैं।
इसलिये गर्भधारण नही होता ।
जिनकी स्त्रियों मे कुछ खराबी नही थी पति मे खराबी थी
उनके पति का इलाज कर दिया गया सन्तान होने लगी और अब
तक हो रही है। इन बातो से उत्तम गर्भ होने का अन्दाज लग
सकता है।
३६० आनन्द मन्दिर
स्त्रियों के जननेन्द्री दोष
लाखों स्त्रियो मे इलाज से उनके गुप्त रोगों की परीक्षा करके
जो रोग देखे गये और उन रोगो के उत्पन्न होने के कारणों की
खोज की गई तो स्त्रियो की जबानी तथा उनके पति के पत्रों से
मालूम हुआ कि स्त्रियो के गर्भाशय मे जितने रोग उत्पन्न होते हैं
वे सब प्रायः पतियों की अज्ञानता "अधिक विषय" और विपरीत
आसन से रतिक्रिया करने से उत्पन्न होते हैं।
पीछे स्त्री की जननेन्द्री सम्बन्धी अंगों का वर्णन किया गया
है यहा जननेन्द्री (गर्भाशय) का वर्णन किया जाता है। पुरुषों
की अज्ञानता से स्त्रियो के गर्भाशय मे नीचे लिखे रोग उत्पन्न
होते है जिनसे गर्भ नही रहता और जब तक ये रोग दूर न
हो स्त्रिया गर्भधारण नही कर सकती।
यदि गर्भ रहा भी तो निर्वल दुर्बल और कम आयु वाली
सन्तान उत्पन्न होती है तथा गर्भस्राव व गर्भपात की शिकायत हो
जाती है, इसी प्रकार के रोगो से स्त्रिया जीवन भर दुःखी रहा
करती हैं। मैने लाखो स्त्रियो का इलाज करके इस बात का
अनुभव प्राप्त किया है कि पतियों की अज्ञानता से ही स्त्रियो की
रोगी संख्या अधिक देखी जाती है।
अधिक और अनियम रतिक्रिया करने से गर्भाशय के वन्धन
ढीले होजाते हैं और नसो मे खराबी पहुँचने के कारण प्रदर,
मासिकधर्म्म की खराबी, गुल्म रोग उत्पन्न हो जाते है।
पत्नी की प्रेमवार्त्ता
( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६१
योनि और गर्भाशय
स्त्री की योनि शंख की नाभि की
समान तीन पर्तवाली होती है उसके
तीसरे पर्त मे गर्भाशय है और वह
बहुत पतली और कोमल नसो से
मिलकर बना हुआ है। जैसा रोहू
मछली का मुंह होता है, उसी आकृति
का गर्भाशय होता है, ऊपर से छोटा
और भीतर से फैला हुआ होता है
जैसा कि ऊपर चित्र मे दिखलाया
गया है।
गर्भाशय सफेद रग का बहुत
कोमल और सुन्न होता है जिससे
बच्चे के बोझ से और खिचाव से (जो गर्भ के बढ़ने मे होता है)
स्त्री को कष्ट न हो। गर्भाशय के दूसरे पर्त मे बहुत सी नसे और
चुन्नटे हैं इन्ही चुन्नटो और नसो के कारण गर्भ रुकता है।
गर्भाधान, क्रिया से अर्थात् सभोग से जब पुरुष का वीर्य
गर्भाशय मे जाता है तब वही चुन्नटे प्राकृतिक नियम से खिच
जाती है जिससे गर्भाशय मे वीर्य पहुचते ही गर्भाशय का मुख
अपने आप ही बन्द होजाता है।
मासिक धर्म्म के समय रक्त निकलने के लिये प्रकृति गर्भाशय
३६२ आनन्द मन्दिर
के मुख की उन चुन्नटो को फैला देती है जिससे गर्भाशय का
मुख फैल जाता और मासिक धर्म्म का रक्त निकल जाता है,
कोई कष्ट नही होता। यदि गर्भाशय मे किसी प्रकार की खराबी
न हुई तो मासिक धर्म्म के दिनो मे गर्भाशय की चुन्नटे ठीक ठीक
खुल जाती है और रक्त भलीभांति निकल जाता है।
आरोग्यता की दशा में
जिस गर्भाशय मे किसी प्रकार की खराबी नही होती उसका
मुख ठीक खुल जाता है।
आगे के चित्र मे गर्भाशय का चित्र जननेन्द्री के सब अंगो
सहित दिखलाया गया है। यदि गर्भाशय मे किसी प्रकार का
रोग न हो तो वह पुरुष के वीर्य को अपनी ओर आकर्षण करके
अर्थात् खींच कर अपने मुख मे लेकर मुख वन्द कर लेता है वही
पुरुष का वीर्य गर्भाशय के भीतर जाकर स्त्री के रज मे मिलकर
गर्भधारण करता है।
जिस संभोग में स्त्री पति से पहिले ही स्खलित हो जाती है
उसका रज गर्भाशय मे पहिले से ही मौजूद रहता है, उसी क्षण
पुरुष का भी वीर्य गर्भाशय में पहुचकर स्त्री के रज मे मिल जाता
है। इस प्रकार स्त्री के पहिले स्खलित होने से कन्या उत्पन्न
होती है।
यदि पुरुष का वीर्य गर्भाशय मे पहिले से पहुँच जावे और
स्त्री पुरुष से पीछे स्खलित हो तो पुत्र के गर्भ की स्थिति होती है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६३
मासिकधर्म्म के समय गर्भाशय का
खुला हुआ मुख
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
गुदाद्वार
योनिमुख
मूत्रमार्ग
मासिक धर्म के समय गर्भाशय का मुख खुला रहता है ऐसी
दशा मे रतिक्रिया करने से कभी २ स्त्री बन्ध्या हो जाती है।
३६४ आनन्द मन्दिर
पुत्र और कन्या की गर्भ स्थिति का कारण
आयुर्वेद मे गर्भाधान के लिये सम और विसम रात्रियो का
जो नियम वतलाया है उसका यह कारण है कि ऋतुधर्म्म के वाद
सम रात्रियों मे स्त्री रज कम होता है अर्थात् गर्भोत्पादक जीवो
की सम रात्रियो मे कमी रहती है और विसम रात्रियो मे अधिकता
रहती है। इसलिये विसम रात्रियो मे सभोग करने से जो गर्भ
रहता है उससे कन्या का जन्म होता है।
समरात्रि मे रज की कमी रहती है अर्थात् स्त्री के गर्भोत्पा-
दक जीव कम रहते हैं। पुरुप का वीर्य वलवान् पडता है अर्थात्
पुरुप के वीर्य के गर्भोत्पादक जीव अधिक रहने के कारण गर्भ मे
पुत्र होता हैं। इसीलिये सम विसम रात्रियो का विचार रक्खा
गया है। जैसा कि पृष्ठ ३६५ के चित्र से प्रकट होता है।
जो आयुर्वेद के नियमो से अज्ञान हैं वे अपनी पुस्तको मे
लोगो को शिक्षा देते हैं और स्त्री को पुरुप से पहिले स्खलित
होने के अनेक उपाय वतलाते हैं। कोई कोई मूर्ख लोग यहां तक
उपाय वतलाते हैं कि सभोग के समय पति पत्नी एक साथ ही
स्खलित हो तो वड़ा ही आनन्द आता है। मानो स्वर्ग का सीधा
रास्ता वतलाते हैं। आयुर्वेद वतलाता है पति पत्नी दोनो एक
साथ स्खलित हो और गर्भ रह जावे तो नपुंसक सन्तान उत्पन्न
होती है। इस विपय मे पीछे खुलासा लिखा जा चुका है। इसलिये
मूर्खों की पुस्तको पर विश्वास करके संभोग करने के ही कारण
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६५
गर्भाशय में कन्या व पुत्र का स्थान
गर्भाशय
कन्या
पुत्र
मलाशय
मूत्राशय
योनिमार्ग
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुदद्वार
गर्भाशय में दो भाग होते हैं एक कन्या का एक पुत्र का।
वर्णन पढ़िये पृष्ठ ३६४ मे—
३६६ आनन्द मन्दिर
देखने मे आता है कि नपुसको की सख्या कम नही है। मेरे पास
नपुसक पुरुषो की स्त्रियां अपने पतियो की चिकित्सा के लिये
आती हैं उनसे मुझे यह अनुभव हुआ ।
गर्भ में दो बच्चे होने का कारण
गर्भाशय मे दो थैली होती हैं एक मे कन्या और एक मे पुत्र ।
सम रात्रियो मे पुत्र का गर्भस्थित होने के लिये पुत्र वाली थैली
का मुख खुला रहता है और विसम रात्रियो मे कन्या के गर्भ की
स्थिति के लिये कन्या वाली थैली का मुख खुला रहता है।
जैसा कि आगे चित्र मे दिया गया है। कभी कभी जब संभोग
के समय वीर्यपात होते वक्त वायु से वीर्य के दो हिस्से हो जाते हैं
और अनियम गर्भाधान क्रिया के कारण दोनो थैलियों का मुह
खुल जाता है तब वीर्य के दो भाग होकर दोनो थैलियो मे गर्भ की
स्थिति होती है और दो बालक एक साथ ही उत्पन्न होते हैं।
गर्भ मे दो बालक होने से माता को कष्ट होता है और कभी
जच्चा और बच्चा दोनो के प्राण सकट मे पड़जाया करते हैं।
यह कारण अनियम रतिक्रिया का ही है।
कभी कभी एक ही मे दो बालक एक जुडे हुए भी होते हैं
दो बालक एक साथ उत्पन्न होने वाले तो सौ मे दस जीवित भी
रहते हैं परन्तु एक साथ जुडे हुए मे एक भी जीवित नही रहता
जो दो बालक एक साथ उत्पन्न होते हैं वे जो जीवित रहे तो एक
साथ दोनो बीमार होते हैं और एक साथ दोनो रोगी होते है।
जवानी (सर्वाधिकार सुरक्षित)
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६६
पड़े और पीछे के हिस्से में जोरका झटका लगजावे तो गर्भ गिर
जाता है। पीछे के हिस्से में कुछ खराबी उत्पन्न होजावे तो भी गर्भ
नहीं रहता। इसलिये शास्त्रकारों ने गर्भवती को नियम पूर्वक
बड़ी सावधानी से रहना बतलाया है।
विपरीत आसन से रतिक्रिया करने से स्त्री का पीछे का हिस्सा
विपरीत स्थिति में होजाता है तो गर्भ नहीं रहता यदि रह भी जावे
तो गर्भस्राव हो जाता है और मूढ़गर्भोकी उत्पत्ति होती है।
गर्भाशय का पीछे का हिस्सा
ऊपर का चित्र गर्भाशय का पीछे का हिस्सा है। पाठक
पाठिकाओं की समझ में यह विषय भलीभांति आजावे इसलिये
गर्भाशय के हिस्से अलग अलग और एक साथ भी दिखलाये गये
हैं। पाठको को सब चित्र अच्छीतरह देखकर समझना चाहिये।
२४
३७० आनन्द मन्दिर
गर्भाशय के बन्धन
यह चित्र गर्भाशय के बन्धन ( नसे जिनसे गर्भाशय बधा रहता है ) का है । अनि-
यम रतिक्रिया से तथा विपरीत आसन से सम्भोग करने से गर्भाशय के बन्धन ढीले हो
जाते हैं अर्थात नसे कमजोर हो जाती हैं इस लिये स्त्री अनेक प्रकार के रोगों मे
ग्रसित रहती है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३७१
गर्भाशय के रोग
विपरीत आसन और अनियम संभोग से वन्ध्या दोष उत्पन्न
हो जाते हैं। २५ पचीस वर्षों तक लाखो स्त्रियो की रोग परीक्षा
तथा चिकित्सा, से इस वात का मुझे अनुभव हुआ है। स्त्रियो के
गर्भाशय के मुख पर तथा गर्भाशय के भीतर और योनि मुख पर
तथा योनि के भीतर अनेक रोग उत्पन्न होते देखे गये हैं।
गर्भाशय के भीतर तथा मुख पर गांठ मस्सा होने और गर्भा-
शय के अनेक प्रकार से टेढ़ा हो जाने से रोग उत्पन्न हो जाते है।
गर्भाशय की गांठ
चित्र मे गर्भाशय के मुख पर गांठ
दिखलाई गई है जो अनेक बार रोगी
स्त्रियो की गुप्त रोग परीक्षा करने से
देखी गई है। यह स्त्री के मासिकधर्म्म
के समय अनियम आहार विहार
तथा रतिक्रिया करने से प्रायः उत्पन्न
हो जाती है। इस प्रकार की रोगी
स्त्रियो की जवानी मालूम हुआ है
कि मासिकधर्म के दिनो में भी उनके
मूर्ख पति ने विपरीत आसन से संभोग
किया तभी से मासिकधर्म्म की
शिकायत भी होगई और संभोग के समय कष्ट भी होने लगा।
३७२ आनन्द मन्दिर
इस गांठ की उत्पत्ति का दूसरा कारण यह भी है कि
मासिकधर्म्म के दिनों मे अपथ्य से रहने से आहार के अनियम से
भी प्रायः यह गांठ पड़ जाती है। किसी कारण से भी मासिकधर्म्म
के दिनो मे आहार अथवा संभोग सम्बन्धी अनियम होजाने से
भी यह गांठ उत्पन्न होती है । यह गांठ गर्भाशय के बाहर मुख
पर और भीतर भी होती हैं ।
गर्भाशय की भीतरी गांठ
गर्भाशय के भीतर जो गांठ उत्पन्न हो जाती है । इसी को
वैद्यक मे गुल्म रोग कहा है । इसके उत्पन्न होने से गर्भ नहीं रहता
क्योंकि पुरुष का वीर्य गर्भाशय मे ठहरता नहीं। यह गांठ धीरे
धीरे बड़ी होजाती है तब स्त्री की दशा दिन दिन बिगड़ती जाती
है, ज्वर रहने लगता है, भूख कम होजाती है, प्रसंग के समय
पीड़ा होती है और स्त्री सदैव के लिये वन्ध्या हो जाती है। केवल
वन्ध्या ही नही हो जाती वल्कि सदैव उसे एक न एक रोग घेरे
रहता है ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३७३
गर्भाशय में गांठ ( योनिकंद रोग )
गर्भाशय की इस गांठ के कारण गर्भ नही रहता है।
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
योनि मार्ग
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुदाद्वार
गर्भाशय के भीतर गांठ पड़ जाने से गर्भाशय में वीर्य नहीं
ठहर सकता इसी कारण से गर्भ नहीं रहता है।
३७४ आनन्द मन्दिर
गर्भाशय के मुंह पर गांठ
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
योनिमार्ग
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुद्दाद्वार
गांठ के कारण गर्भाशय का मुख भलीभांति नही खुलता
और स्त्री को गर्भाधान क्रिया के समय कष्ट होता है इस कारण
गर्भ नही रहता है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३७५
पूर्व के दोनो चित्रो से भलीभांति मालूम होता है कि
गर्भाशय का मुख वीर्य ग्रहण करने के लिये खुल नही सकता
इसलिये पुरुष का वीर्य गर्भाशय मे नही जा सकता और भीतरी
गांठ के कारण वीर्य गर्भाशय मे जाकर भी ठहर नहीं सकता ।
दूसरा कारण यह है कि गर्भाशय के भीतर गाठ हो अथवा
मुंह पर हो, कहीं भी हो, इस गांठ के कारण संभोग के समय
गर्भाशय पर दबाव पड़ने से स्त्री को कष्ट होता है इसलिये उसे
सभोग मे प्रसन्नता नही होती और वह सभोग की इच्छा भी
नही करती ।
गर्भाशय का मस्सा
गर्भाशय के मुख पर अथवा भीतर अनियम आहार विहार
से मस्सा उत्पन्न होता है इसके कारण स्त्री वन्ध्या होजाती है ।
गर्भाशय के मुख पर मस्सा
गर्भाशय की परीक्षा करने से अनेक स्त्रियो के गर्भाशय के
मुख पर इस प्रकार का मस्सा देखा गया है ।
३७६ आनन्द मन्दिर
भीतरी मस्सा
उलटे सुलटे आसनों से रतिक्रिया करने, आहार विहार पर
उचित ध्यान न देने, बद परहेजी करने, तथा कभी कभी अन्य
कारणो से गर्भाशय के मुख पर मस्सा हो जाता है । इसका
प्रभाव गर्भाशय पर बहुत बुरा पड़ता है ।
जब गर्भाशय के मुख पर मस्सा होजाता है तब संभोग के
समय मस्से पर दबाव पड़ने से स्री को कष्ट।होता है और पुरुष
का वीर्य गर्भाशय मे नही जा सकता । यह बात आगे के चित्र
से भलीभांति समझ मे आजाती है ।