विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
६४ आनन्द मन्दिर
उस स्त्री की जबानी मालूम हुआ कि वह ठीक २८-या २९
वें दिन इसी कष्ट से ऋतुधर्म्म मे होती है और कई वर्ष से उसके
मासिकधर्म्म का यही हाल है। प्रतिपदा से पीडा आरम्भ होती थी
और चौदह पन्द्रह दिन में खूब बढ़ती थी। मासिकधर्म्म के एक
दिन पहले पीड़ा इतनी अधिक बढ़ती थी कि उसे नशीली औष-
धियों के इञ्जेक्शन लगवाने पड़ते थे जिससे पीड़ा मालूम न हो।
मेरे यहां वह दो तीन महीने रही। हर महीने उसे इसी प्रकार का
कष्ट होता था।
मैंने उससे पूछा तो मालूम हुआ उसे जब से मासिकधर्म्म
आरम्भ हुआ तब से ही वह ठीक २८ वें दिन मासिकधर्म्म से
होती रही है। विवाह के बाद अधिक प्रसग के कारण उसके
मासिकधर्म्म मे यह खराबी उत्पन्न होगई कि कष्ट से होने लगा और
बहुत अधिक होने लगा। मेरे यहां तीन महीने रहकर उसने इलाज
कराया। तब सब शिकायते दूर हुईं और वह अपने घर को गई।
इस प्रकार अनेक ऐसी स्त्रियों के रोगो से निश्चय होता है
कि स्त्रियो का आर्तव वास तिथि के हिसाब से होता है।
स्त्रियों के ये भेद और लक्षण कामशास्त्रो में ही बतलाये
गये हैं। अन्य धर्म ग्रन्थो तथा आयुर्वेद शास्त्रो में यह तो बतलाया
गया है कि किन चिन्हों वाली लड़की की कैसा स्वभाव होता है
और कैसी लड़की से विवाह करना चाहिये तथा विवाह के समय
किन बातो का ध्यान रखना चाहिये। सम्भव है उन्ही ग्रन्थो के
आधार पर कामशास्त्र में ये भेद किये गये हों।
विवाह-विज्ञान-कामशास्त्र ६५
अमृत और विष
वैद्यकशास्त्र मे अमृत और विष दोनों प्रकार की औषधियो
की विधि और सेवन बतलाया गया है। विष से जो औषधियां
विधि पूर्वक तैयार कर पथ्य से सेवन की जाती हैं वे विषों द्वारा
तैयार हुई औषधियां अमृत का काम कर दिखलाती हैं।
जो मूर्ख उन्हें बिना समझे ही तैयार कर अथवा अज्ञानी
चिकित्सकों की तैयार की हुई औषधियां सेवन करते हैं वे
अमृत की समान गुणकारी होने पर भी विष की समान प्राण
नाशक हैं।
इसी प्रकार अमृत की समान औषधियां बिना जरूरत के
सेवन की जावे तो वे भी विष की समान हानि कारक होती हैं।
इसका तात्पर्य यह है कि:—
सन्तान की इच्छा से संभोग के समय स्त्री को प्यार और
प्रेम से आलिंगन चुम्बनादि से प्रसन्न करके सीधे आसन से संभोग
करे, नोच खसोट आदि से नही। जब स्त्री पति के प्यार से प्रसन्न
होगी तब संभोग मे भी उसकी इच्छा पूरी होगी और वह
स्खलित होकर गर्भधारण करेगी।
इसका मूर्ख लोग यह आशय समझते हैं कि स्त्री को आलि-
गन चुम्बन आदि उपायो से पुरुष के साथ ही स्खलित होना
चाहिये उन मूर्खों को यह नही मालूम है कि स्त्री पुरुष एक साथ
स्खलित होने से यदि गर्भ रह गया तो नपुंसक सन्तान उत्पन्न होगी।
६६ आनन्द मन्दिर
चारों प्रकार के पुरुषों के लिक्षण
स्त्रियो की तरह पुरुषो के चार भेद है—
१—मृग २—वृषभ ३—शशक ४—अश्व ।
मृग पुरुष के लक्षण
हृष्ट पुष्ट, सुन्दर बलवान सुन्दर नेत्रो वाला हो और कमल जैसी
सुगन्धि शरीर मे आती हो, शरीर सुकोमल चिकना कान्ति वाला
हो और डील डौल मे न बहुत लम्बा बेडौल न ठिगना हो, प्रसन्न
चित्त रहने वाला पर उपकार करने मे उत्साही धैर्यवान् अतिथि
सेवक, धर्मकार्यों तथा ईश्वर मे भक्ति रखने वाला, सदैव सन्तोष
रखने वाला हो ऐसे पुरुष को मृग कहा है ।
जिस प्रकार मृग के नेत्र बड़े बड़े और सुन्दर होते हैं नेत्रो मे
चचलता और साथ ही सुन्दरता भी होती है उसी प्रकार ऐसे
ऐसे नेत्र वाले पुरुष को मृग कहा है ।
वृषभ पुरुष के लक्षण
अधिक सन्तान उत्पन्न करने वाला, मधुर भाषी, साहसी,
धैर्यवान्, कफ प्रकृति वाला, परिश्रमी, उद्योगी, चौड़ी छाती वाला,
और अधिक सोने वाला हो, सुन्दर स्त्रियो को प्यारा पाचन
शक्ति तीव्र हो, कुछ भारी शरीर वाला हो, शरीर के बाल कुछ
घने और कड़े हो, नाक के नथुने कुछ चौडे हो, सदा प्रसन्न,मुख
- B K Mitra
शङ्खिनी स्त्री ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ६७
रहने वाला और सन्तोषी हो ऐसे लक्षणो वाला पुरुष वृषभ कहा
गया है ।
शशक नामक पुरुष के लक्षण
शशक पुरुष का शरीर सुडौल सुन्दर हृदय कोमल,
धर्मात्मा, सत्य बोलने वाला, स्त्री भोग मे कम इच्छा रखने वाला,
अपनी ही स्त्री से प्रेम करने वाला, बुद्धिमान, विद्वान्, और भाग्य-
वान होता है । परोपकार मे उत्साही, मधुरभाषी, सुशील और
गम्भीर विचार वाला होता है ।
अश्व नामक पुरुष के लक्षण
अश्व नाम घोडे का है । अश्व पुरुष घोडे के समान चचल,
पुष्ट शरीर वाला, कुमार्गी, शरीर का रग सांवला, रतिक्रिया मे
अत्यन्त लिप्त रहने वाला, अधिक आहार करने वाला, लज्जाहीन,
कुल कलंकी, विषयी, व्यभिचारी, क्रोधी स्वभाववाला और घमंडी
होता है । वड़ों का अपमान करने वाला और पर सतापी होता है।
इसी प्रकार से स्त्री पुरुष अनेक लक्षणो वाले होते हैं यह
विषय यदि विस्तार से लिखा जावे तो एक बड़ा भारी ग्रन्थ बन
जावेगा इस लिये अधिक लिखना व्यर्थ है क्योकि जिस पुरुष
का जिस स्त्री के साथ विवाह हो चुका है वह तो जैसा है ठीक
ही है, जिनका विवाह नही हुआ है उनके विषय मे एक अलग
पुस्तक लिखी जारही है, इसलिये यहां इस विषय मे अधिक
लिखना अनावश्यक है।
७
६८ आनन्द मन्दिर
स्त्री पुरुष सम्बन्ध
पद्मिनी स्त्री और शशक पुरुष
पद्मिनी स्त्री का और शशक नामक पुरुष का सम्बन्ध उचित
सम्बन्ध है क्योंकि शशक नाम खरगोश का है। खरगोश कोमल
शरीर, सुन्दर, विषय भोग में कम इच्छा रखने वाला होता है।
पद्मिनी स्त्री भी भोग की कम इच्छुक होती है इस कारण
दोनो का स्वभाव एकसा होता है। इसलिये पद्मिनी स्त्री शशक
नामक पुरुष से सव प्रकार सन्तुष्ट रहती है।
पद्मिनी स्त्री और शशक पुरुष का सम्बन्ध सन्तान के लिये
भी अति उत्तम है। सन्तान भी योग्य बुद्धिमान धर्म्मात्मा सुशील
आज्ञाकारी होती है अर्थात् माता पिता के स्वभाव की समान
होती है।
पद्मिनी स्त्री की प्राचीन ग्रन्थो मे वड़ी प्रशंसा की है। इसी
प्रकार शशक पुरुष को भी माना है, इस कारण जिस घर मे
पद्मिनी पत्नी और शशक पुरुष पति है उस घर मे ही दाम्पत्य सुख
का सच्चा आनन्द मिल सकता है ऐसा ग्रन्थकारो का मत है।
चित्रणी स्त्री और मृग पुरुष
चित्रणी और मृग नामक स्त्री पुरुष का सम्बन्ध होने से
दाम्पत्य प्रेम का आनन्द और योग्य सन्तान का सुख मिलता है
क्योकि चित्रणी स्त्री और मृग पुरुष का जोड़ा ठीक है। चित्रणी
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ६६
स्त्री का स्वभाव और मृग पुरुष का स्वभाव एकसा होता है।
उनकी सन्तान भी योग्य होती है।
प्राचीन ग्रन्थों में चित्रणी स्त्री के लिये मृग पुरुष ही योग्य
बतलाया है जिस गृह में ये दोनों दम्पति हैं वह घर उन्नति
शील होता है।
शंखिनी स्त्री और वृषभ पुरुष
वृषभ पुरुष के लिये शंखिनी स्त्री का सम्बन्ध योग्य
बतलाया है क्योंकि इन दोनों का स्वभाव एक सा होता है।
शंखिनी स्त्री भोग विलास में अधिक इच्छा रखने वाली होती
है और पुरुष भी ऐसे ही स्वभाव वाला होता है इसलिये शंखिनी
स्त्री वृषभ नामक पुरुष को ही पाकर सन्तुष्ट रहती है।
हस्तिनी स्त्री और अश्व पुरुष
हस्तिनी स्त्री का सम्बन्ध अश्व जाति के पुरुष से उचित
सम्बन्ध है क्योंकि हस्तिनी स्त्री अश्व जाति के पुरुष से सन्तुष्ट
रहती है।
हस्तिनी जाति की स्त्री और अश्व जाति के पुरुष का स्वभाव
एकसा होता है। दोनों विषय वासना की बराबर ही इच्छा रखते हैं
इसलिये हस्तिनी का जोड़ा अश्व पुरुष ही उत्तम माना गया है।
इस प्रकार के सम्बन्धों के साथ साथ ऋतु, आहार तथा परिस्थिति
आदि का भी दाम्पत्य प्रेम पर बहुत प्रभाव पड़ता है। आगे
ऋतुचर्या नामक प्रकरण मे इसविषय पर लिखा गया है।
१०० आनन्द मन्दिर
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क्योकि ऋतुओ से समय समय पर शरीर की प्रकृति बद-
लती रहती है और उसी के अनुसार शरीर पर भोजन का भी
प्रभाव पड़ता है। हानिकारक भोजन से शरीर पर हानिकर प्रभाव
पडेगा और स्वास्थ्य कर भोजन से शरीर पर स्वास्थ्यकर असर
पडेगा। अच्छा बुरा भोजन स्वास्थ्य और शरीर पर तथा चित्त से
उत्पन्न होने वाले विचारों पर अपना पूरा प्रभाव जमाता है इस
लिये सुन्दर स्वास्थ्य और दाम्पत्य जीवन का सच्चा सुख चाहने
वाले पुरुष दम्पति को सदैव ऋतुचर्या का पूरा ध्यान रखना
चाहिये और उसी के अनुकूल अपना जीवन बनाना चाहिये।
इसलिये आगे के अध्याय मे ऋतुचर्या विषय पर प्रकाश डाला
गया है।
हस्तिनी स्त्री ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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आनन्द
मन्दिर
तीसरा अध्याय
—:०:—
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १०३
ऋतुचर्या
हेमन्त ऋतु का आहार विहार
( अगहन और पौष हेमन्त ऋतु )
स्त्री पुरुषो की आरोग्यता और दीर्घ जीवन, संभोग और
सौन्दर्य तथा दाम्पत्य प्रेम के लिये यहां आयुर्वेद के अनुसार
आहार विहार की ऋतुचर्या विधि लिखी जाती है ।
दीर्घप्रचार सुरता किल यत्र रात्रिः,
सुशीतलं वारि विना च यत्नात् ।
यः प्रेयसीकुचयुगं परिरभ्य शेते,
स्वर्गोऽपि तस्य हृदये तृणवद्विभाति ॥
जिस हेमन्तऋतु मे बहुत काल पर्यन्त संभोग करने योग्य
रात्रि और बिना यत्न के ठढा पानी रहता है ( बर्फ की जरूरत
नही ) ऐसे समय मे जो अपनी प्राण प्यारी पत्नी को आलिंगन
कर शयन कर रात्रि व्यतीत करता है वह पुरुष धन्य है। उस
पुरुष को स्वर्ग सुख भी तृण के समान प्रतीत होता है ।
इसके विरुद्ध जो पुरुष अपनी प्यारी पत्नी को छोड़ पर स्त्री
अथवा वेश्या से प्रेम करता है वह मूर्ख इस लोक और परलोक
दोनो में अपना जीवन नष्ट करता है। उसे कुछ दिन में इस कुकर्म
के फल निर्धनता, प्रमेह, गर्मी, सुजाक आदि के रूप मे अवश्य
१०४ आनन्द मन्दिर
मिलते है जिसके कारण वह इस जन्म में नर्क भोग से अधिक
कष्ट और दुःख भोगता है तथा परलोक मे इससे अधिक बुरी
गति को प्राप्त होता है।
पृथुजघनकुचाभिर्यौवनोन्मादिनीभि-
र्नवमृगमदमिश्रैः कुंकुमैश्चर्चिताभिः ।
भवति शिशिरशान्तिः स्त्रीभिरालिङ्गिताभि-
र्निशि निशि पुरुषाणां जन्मसाफल्यभाजाम् ॥
सौन्दर्य और रूप की मदमाती युवती पत्नी, जिसने कस्तूरी
मिली केशर शरीर मे लगा रक्खी है ऐसी अपनी प्यारी स्त्री को
इस शीतकाल मे आलिगन कर दाम्पत्य प्रेम का अनुभव करते है
अर्थात् सुख भोग करते हैं, आनन्द मे रात्रियों को व्यतीत करते
हैं उन्ही मनुष्यो का जन्म सफल होता है । वे पति पत्नी धन्य
हैं ऐसा आयुर्वेद कहता है।
जो अपनी प्यारी पत्नी से विरुद्ध पर स्त्री गमन अथवा
वेश्या-गमन करते हैं वे मूर्ख अपना बहुमूल्य जीवन नष्ट करते
हैं। जो पुरुष अपनी सुन्दर रूप वाली अथवा कुरूप पत्नी जो
विधाता ने अपने भाग्य से दे रक्खी है वह कैसी ही हो उसका
निरादर करके, उसको दु खी करके, उसके आत्मा को कष्ट देकर
आप पर स्त्री अथवा वेश्याओ से प्रेम करते हैं वे अपने पैरो मे
आप कुठाराघात करते हैं। उनका मनुष्य जन्म व्यर्थ है। उन्हें
परकाल में भी यम यातना का कष्ट भोगना पड़ता है।
१—प्रतिपदा को पैर के पँजे में
( काम विकार मूर्च्छित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १०५
हेमन्ते दधिदुग्धसर्पिरशनामाजिष्ठवासोभृतः,
काश्मीरद्रवलिप्त चारुवपुषः खिन्ना विचित्रै रतैः।
वृत्तोरुस्तन कामिनी जनकृताश्लेषा गृहाभ्यन्तरे,
ताम्बूलीदलपूग पूरितमुखाधन्याः सुखंशेरते ॥
दही दूध तथा घी के नाना प्रकार के भोजन कर लाल रग
के वस्त्र धारण कर, केशर का लेप शरीर मे लगाए हुए, दाम्पत्य
प्रेम के आनन्द भोग और सभोग से थकित, युवती पत्नियो के
हाथ का बीडा और पान सुपारी आदि से जिनका मुख शोभाय-
मान है ऐसे वड भागी पुरुष इस हेमन्तऋतु मे सुख पूर्वक शयन
करते हैं ।
हेमन्त ऋतु का स्नान
इस ऋतु मे तैल की मालिस समस्त शरीर में कराकर गरम
जल से स्नान करना चाहिये, तैल की तमाम शरीर मे मालिस
करके स्नान करना शरीर को पुष्ट करता है और धातु न्योज तथा
तेज की वृद्धि करता है। कान और आँख की शक्ति को बढाता
है। परमात्मा
१०६ आनन्द मन्दिर
हेमन्त ऋतु का आहार
हेमन्त ऋतु मे शीत के कारण उपरी शरीर की गरमी
भीतर रहती है इस कारण जठराग्नि ( पेट की गरमी पाचन शक्ति )
प्रबल रहती है। यदि इस ऋतु मे समय पर भोजन रूपी ईंधन
न मिले तो यह प्रबल होकर रस रक्त आदि धातुओ को पचाने
लगती है जिससे मनुष्य शीघ्र ही निर्बल दुर्बल और शक्ति
हीन होजाता है। हेमन्त मे समय पर जिस समय भूख लगी हो
अवश्य भोजन करना चाहिये और भोजनों मे स्वादिष्ट खट्टे और
नमकीन पदार्थ अवश्य होने चाहिये।
हेमन्त मे जठराग्नि के प्रबल होने से तथा रात्रि बड़ी होने
से प्रात.काल ही भूख लगती है अतएव प्रात.काल शौच आदि
कुल्ला दातौन से अवकाश पाकर कुछ खाकर तब अपने प्रति दिन
के काम में लगना चाहिये।
वैद्यकशास्त्र बतलाता है कि भूखा मनुष्य यदि समय पर
भोजन, न करे और भूख लगी रहने पर भी परिश्रम मे लगजावे
तो उसकी जठराग्नि ( पेट की पाचन शक्ति ) नष्ट हो जाती है
जैसे विना ईंधन के आग वुझजाती है वैसे ही विना भोजन के
परिश्रम करने से अथवा भूखे रहने से पेट की अग्नि वुझजाती है।
इसलिये सामर्थ्य के अनुसार प्रातःकाल कुछ खा लेना चाहिये।
हेमन्त से आरोग्य रहने के लिये गुड़ मे मिला हुआ हर्ड का
३ से ६ मासे तक चूर्ण प्रति दिन सेवन करना चाहिये।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १०७
बड़ी हर्र कूट पीस कपड़ छानकर तीन तीन या छै छै मासा
की पुड़िया बना रक्खे। प्रतिदिन रात को सोते समय एक एक
तोला गुड़ मिलाकर खालेवे ऊपर से पानी या गाय का दूध
पीलेवे। इससे प्रति दिन पाखाना साफ होता है और भूख खूब
लगती है शरीर आरोग्य और फुर्तीला रहता है।
अदरख, लौंग, सोंठ, कच्चे आम, अथवा आमला या कैथा
की चटनी, पीपर, सौंफ, मेथी, कमलगट्टा, चौलाई का शाक, धनियां,
कालीमिर्च, हींग, घी, दूध की खीर, परवल की तरकारी, अरहर
मूंग की दाल अथवा खड़ी मूंग, पुराने चावल, पुराने गेहूँ की
रोटी ये सब पदार्थ प्रति दिन हेर फेर कर सेवन करने चाहिये।
चीते की छाल, सेंधा नमक, इलायची, जायफल, चूके का
शाक, दही, मट्ठा, जिमीकंद, मुनक्का, जलेबी, हलुवा, आदि पदार्थों
का सेवन इस ऋतु मे अत्यन्त हितकारी है।
मूली की तरकारी, जभीरी, अनार, अंगूर, सेव, बादाम,
अखरोट आदि हेमन्त ऋतु मे हितकारी हैं। गेहूं का दलिया, सांठी
के पुराने चावल तथा लाल चावलों का भात नदी या कुए का
पानी यह सब हेमन्त ऋतु मे हितकारी है।
हेमन्त ऋतु के हानिकारक पदार्थ
सिंघाड़े, कसेरू, नाड़ी का शाक, केला की फली, उड़द,
आलू, घिया तोरई, भैंस का दूध, मट्ठा, दहीवड़ा ये सब हेमन्त
ऋतु में हानि कारक हैं। इस ऋतु मे इनका सेवन न करे।