विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
किया और योग मे ध्यान न दिया उस मनुष्य का जीवन
व्यर्थ गया ।
रम्भा बोली—
चन्द्रानना सुन्दर गौर वर्णा,
व्यक्तस्तनी भोग विलास दक्षा ।
नान्दोलिता वैशयनेषु येन,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
हे मुने ! चन्द्रमा के समान मुख वाली, सुन्दर और गौर वर्ण
वाली, भोग विलास मे चतुर, प्यारी पत्नी का जिसने सेवन नही किया
उस मनुष्य का जीवन व्यर्थ गया ।
शुकदेव जी बोले—
स्वरूपं शरीरं नवीनं कलत्रं,
धनं मेरुतुल्यं वचश्चारुचित्रम् ।
हरेरंघ्रियुग्मे मनश्चेन्नलग्नं,
ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम् ॥
शुकदेव मुनि कहते है कि जिसने विष्णु भगवान के चरणो में
मन् नही लगाया उसके सुन्दर नवीन यौवनवती स्त्री तथा सुमेर
पर्वत के समान धन, सुन्दर विचित्र वाणी आदि सब प्रकार के
सुख भोग होने से क्या हुआ अर्थात् कुछ भी नही हुआ । ऐसा
मनुष्य जीवन व्यर्थ ही गया इस लिये यह सब निरर्थक है ।
विवाह विज्ञान-कालशास्त्र ७६
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रम्भा बोली—
आनन्द रूपा तरुणीलतांगी,
सद्धर्मसंसाधन सृष्टिरूपा ।
कामार्थदा यस्य गृहे न नारी,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
हे मुने ! स्त्री पुरुष को आनन्द देने वाली, मनको मोहित
करने वाली, युवावस्था से पूर्ण अंगवाली, पतिव्रता, सृष्टि की आदि
धर्म्म को साधने वाली, सन्तान उत्पन्न करने वाली पुरुषो की
सब कामनाओ को पूर्ण अर्थात् काम अर्थ को देने वाली सुन्दर
पत्नी जिसके घरमें नहीं है, उस नर का जीवन व्यर्थ है ।
शुकदेव जी बोले—
पत्न्यार्जितं सर्वं सुखं विनश्वरं,
दुःखप्रदं कामिनि भोग सेवितम् ।
एवं विदित्वा न धृतोहि योगो,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
पत्नी के विषय भोग से होने वाले सब सुखो को अनित्य
और दुखदाई जानकर जिसने योगाभ्यास धारण कर परमात्मा
का ध्यान नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया, उसने इस शरीर
को नष्ट कर दिया ।
जन्मनोपि)
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥"
It is definitely:
"श्रीवत्सलक्ष्मा" or "श्रीवत्सलक्ष्म्या"?
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A top bar, a little vertical, a loop that is very small or flattened against the stem, so it looks like a 'द' with a tail, or 'क्ष' where the top loop broke off!
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In Devanagari, 'द' + 'य' is ALWAYS written as the conjunct 'द्य' (like in विद्या, यद्यपि)!
Nobody writes 'द' with full body followed by 'य' in a conjunct, UNLESS they are two separate letters: 'द' and 'र्य'!
Wait, if it's two separate
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द्वितीय खण्ड: स्त्री एवं पुरुष का शारीरिक व मानसिक मनोविज्ञान
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ८१
रम्भा बोली—
समस्तशृंगार विनोद शीला,
लीलावती कोकिल कण्ठनाला ।
विलासिता नो नव यौवनाढ्या,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
सम्पूर्ण शृंगार करने मे चतुर और अपने हावभाव आदि
प्रसन्नता से पति को प्रसन्न करने तथा हास्य क्रीड़ा आदि मे पति
को मोहित करने वाली, कोयल के समान मधुर कण्ठवाली, युवा-
वस्था को प्राप्त हुई ऐसी अपनी प्यारी पत्नी के साथ आनन्द
पूर्वक जिस पति ने जीवन व्यतीत न किया उसका जीवन व्यर्थ है।
रम्भा और शुकदेव जी के इस प्रकार हुए वार्तालाप का
पूरा वर्णन करने मे पुस्तक बढ़ जावेगी इसलिये इतना ही
लिखना उचित समझा। इस रम्भा और शुकदेव जी के सम्वाद से
भी इस बात की पुष्टि होती है कि इस ससार मे मनुष्य के लिये
दाम्पत्य प्रेम स्वर्ग से भी बढ़कर है। जिन्हें अभाग्य वश दाम्पत्य
सुख का साधन नहीं है वे परमात्मा का भजन करे। मनुष्य के
लिये दोही साधन है, गृहस्थाश्रम अथवा ईश्वर भक्ति। इन्ही
दो मे सुख है रम्भा ने जो कुछ कहा है ठीक ही कहा है और
शुकदेव जी ने भी ठीक ही कहा है। सारांश यह कि जिसे दाम्पत्य
सुख का भोग प्राप्त नही, न जिसने ईश्वर भक्ति ही की है उसका
जीवन व्यर्थ है। कामदेव के विषय मे शिव जी की कथा पढिये।
६
८२ आनन्द मन्दिर
कामदेव और शिवजी
शिवजी की पहिली स्त्री सती का देहान्त होजाने पर शिवजी
को बड़ा दुःख हुआ। इनका विचार फिरसे विवाह करने का न
था इसलिये पत्नी की मृत्यु के बाद वे तपस्या करने लगे। शिवजी
सब देवो के देव महादेव कहलाते है। उनकी शक्ति भी महान
है, इसलिये वे घोर तपस्या करने में लगगये।
कामदेव बड़े ठाट बाट के साथ अपनी स्त्री रति को लेकर
शिवजी का तप भग करने गया। शिवजी तपस्या में थे, पार्वती के
पिता ने पार्वती जी को शिवजी की सेवा के लिये भेजा था। जब
पार्वती शिवजी के पास पहुँची तो अच्छा अवसर देखकर कामदेव
ने शिवजी पर अपना वाण चलाने की तैय्यारी की। शिवजी को
मालूम होगया, उन्हे कामदेव पर बड़ा क्रोध आया। शिवजी के
तीन नेत्र थे, तीसरा नेत्र महान क्रोध आने पर वे खोलते थे। शिव ने
क्रोध से उसी तीसरे नेत्र से कामदेव की ओर देखा। नेत्र खुलते
ही उसमें से बडी विकट अग्नि की लपट निकली। उस लपट के
निकलते ही कामदेव भस्म होने लगा। उसकी स्त्री रति वहीं खड़ी
थी। रति अपने पति कामदेव को जलते देखकर पति के जीवनदान
की शिवजी से प्रार्थना करने लगी परन्तु जब कामदेव भस्म हो गया
तो रति अचेत हो पृथ्वी पर गिर पड़ी। वहुत देर के बाद जब
उसको होश आया तब वह विलाप कर रोने लगी। उसका विलाप
पत्थर के हृदय को भी पिघला देने वाला था।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ८३
अपने प्राणप्यारे पति की मृत्यु का पतिप्राणा स्त्रियों को
जो दुःख होता है उसे देखने वालों का भी हृदय फटने लगता
है क्योंकि संसार में स्त्रियों के लिये पति से बढ़कर कोई दूसरा
प्यारा नहीं है। विलाप करते करते रति सती होने को तैयार हो
गईं, कामदेव तो जलकर भस्म होगया था, शरीर का वहां नाम
निशान तक नहीं रहा था केवल राख रह गई थी, उसी को शरीर
में लगाकर वे सती होने को तैयार हुई। तब आकाश वाणी हुई
हे कामदेव की प्यारी स्त्री ! तुम अपने प्राणों को नष्ट मत करो
तुम्हारा पति कुछ दिन में फिर मिलेगा, सन्तोष रखो। पति के
विछोह का दुःख तुमको अधिक दिन नहीं भोगना पड़ेगा।
हे सुन्दरी ! शीघ्रही वह दिन आने वाला है जब
शिवजी पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके साथ विवाह
करेंगे और विवाह करके प्रसन्न होंगे तब तुम्हारे पति कामदेव
को फिर से जीवित करदेंगे। तुम सन्तोष रखो। शिवजी देवों के
भी महादेव हैं, उन्हें मारने और जिलादेने की पूरी सामर्थ्य है।
इस समय तुम्हारा पति ब्रह्मा के शाप से शिवजी के क्रोध से
भस्म हुआ है वह फिर जीवित होगा। इस प्रकार आकाश वाणी
को सुनकर कामदेव की स्त्री रति को धैर्य हुआ। उसने सती
होने का विचार छोड़ दिया परन्तु पति के ध्यान मे शोकाग्नि से
दिन प्रतिदिन शरीर को क्षीण करती हुई उस दिन की प्रतीक्षा
करने लगी।
पार्वती की तपस्या पूरी हुई और शिवजी ने पार्वती से
८४ आनन्द मन्दिर
विवाह कर लिया। तब तक कामदेव को जो ब्रह्मा ने शाप दिया
था उसका समय भी पूरा होगया इसलिये सब देवताओ ने शिवजी
से प्रार्थना की हे शिव ! कामदेव को फिर से जीवनदान देकर
अपनी सेवा के लिये जीवित कीजिये नही तो ससार का काम
कैसे चलेगा, कामदेव मे ही मृष्टि की रचना संभव है इसलिये
इसका जीवित होना अत्यन्त आवश्यक है। शिवजी ने देवताओ
की प्रार्थना स्वीकर करके कामदेव को जीवित करदिया। कामदेव
की स्त्री रति पति को पाकर प्रसन्न हुई। इस प्रकार कामदेव
जीवित होकर सबको सताने लगा ऋषि मुनि तपस्वी योगी
यती देवता और मनुष्य तथा सभी जीवधारी कामदेव के वश
मे है।
जो मनुष्य कामदेव को अपने वश मे करके ईश्वर में ध्यान
लगाते है वे देवताओ की ईर्षा के कारण तप नही करने पाते।
जो अपनी इन्द्रियो को वश मे करके परमात्मा का ध्यान करते है
वे धन्य है। जो मूर्ख पुरुष स्त्री को दुःख देकर गृहस्थाश्रम से
निकल भागते है वे किसी ओर के नहीं रहते।
जो गृहस्थाश्रम मे रहते हुए परमात्मा का भजन करते है
वे इस लोक और परलोक दोनो मे आनन्द भोग करते हैं ऐसा
धर्मशास्त्रो मे ऋषियो ने कहा है। इसलिये किसी से भी घृणा
या विरक्ति का भाव दिखाना ठीक नही है। आजकल बहुतेरे
इसी तरह के संयमी ब्रह्मचारी, साधू दिखलाई पड़ते है जो-नारि
मुई घर संपति नासी, मूड मुड़ाये हुए सन्यासी।
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आनन्द
मन्दिर
दूसरा अध्याय
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ८५
कामशास्त्र और वैद्यकशास्त्र से
रतिक्रिया विज्ञान और गर्भ विधान
स्त्री पुरुष पर पड़ने वाली कामदेव की भिन्न २ अवस्थाओं
और दशाओं का जिसमे वर्णन है उसी का नाम कामशास्त्र है।
कामशास्त्र भी वैद्यक शास्त्र का महत्व पूर्ण अङ्ग है परन्तु विषयी
पुरुषों ने उसे विषय वासना की तृप्ति का ही मुख्य शास्त्र समझ
रक्खा है और उसकी खोज में फिरते हैं। विषयी पुरुषों की यह
दशा देख कर कुछ स्वार्थियों की बन आई है।
दो एक को छोड़कर बाकी कामशास्त्र तथा कोकशास्त्र
नाम की पुस्तकों को सज्जन पुरुष घृणा की दृष्टि से देखते
हैं। विषयी लोग सचित्र आसनों के नाम पर मर रहे हैं जहां
सचित्र चौरासी आसन वाला कोकशास्त्र नाम देखा कि खुश
हो गये और मंगाकर देखा तो रोने लगे क्योंकि जितने सचित्र
चौरासी आसनों सहित कोकशास्त्रों के नोटिस हैं किसी में
विलायती वेश्याओ स्त्री पुरुषों के अनेक प्रकार के चित्र हैं किसी
मे देशी वेश्याओं के चित्र हैं किसी मे दो चार इधर उधर के व्यर्थ
के चित्र हैं इस प्रकार की आजकल बहुतेरी पुस्तकें देखी जाती हैं।
जिन्होंने कामशास्त्र के उपयोगी विषयों को नही देखा है वे उन्हीं
पुस्तको को कामशास्त्र समझकर उनसे हानि उठा रहे हैं। कामशास्त्र
भी वैद्यक शास्त्र का ही अंग है। उसमे भी नियम पूर्वक रतिक्रिया
कर उत्तम सन्तान उत्पन्न करने की ही विधि बतलाई गई है।
८६ आनन्द मन्दिर
कामशास्त्र के ही अन्तर्गत विवाह विज्ञान है। हमारे देश में
ऋषियों ने बड़े विचार के साथ विवाह करना वतलाया है क्योंकि
विवाह बन्धन मनुष्य की आयु पर्यन्त ही नहीं कई पीढ़ियों से
सम्बन्ध रखता है इस कारण बहुत विचार करने की आज्ञा है।
विवाह का नियम जो भारतवर्ष मे है वह ससार में कहीं नहीं है।
विवाह बन्धन अन्य देशो मे बन्धन नहीं समझा जाता, न वहा
इतनी देख रेख ओर विचार ही किया जाता है। विवाह हो जाने
पर भी जब स्री चाहे पति को छोड़ सकती है विवाह होने के
पहिले जिन गुणो के कारण पुरुष को पसन्द करके स्री ने उसे
अपना जोड़ा मिलाया था विवाह होने के बाद यदि उसमें कुछ
कमी आगई तो स्री पति को छोड़ देती या छोड़ सकती है। पति
भी इसी प्रकार छोड़ सकता है परन्तु पति के लिये कुछ कठिनाई
होती है।
जिन देशो अथवा जिन जातियो मे विवाह का कोई शास्त्र
सम्मत नियम नहीं है वहां तथा उन जातियो मे पत्नी जब चाहे पति
को छोड़ सकती है परन्तु भारतवर्ष की उच्च जातियो में विवाह का
बड़ा भारी महत्व है इसलिये यहां पति को पत्नी छोड़ नहीं सकती।
जिन जातियो मे छोड़ने का रिवाज है उन मे भी बिरादरी का दंड
आदि बड़ी कठिनाई पड़ती है। भारतवर्ष के प्राचीन पुरुषों ने
विवाह के विषय में पहिले ही इतना विचार रक्खा है कि विवाह
बन्धन टूट न सके। इसीलिये जन्मपत्र के अनुसार अनेक बाते
मिलाई जाती हैं।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ८७
वर और कन्या की प्रकृति नाड़ी वर्ग और शुभाशुभ लक्षण
मिलाकर विवाह होता है परन्तु फिर भी कुछ न कुछ मिलान रह
जाता है जिसका परिणाम आगे चलकर बुरा होता है। प्रकृति आदि
न मिलने से स्त्री पुरुष मे कलह रहती है। प्राचीन समय मे जन्म
पत्र का ठीक ठीक मिलान करके विवाह होता था। कुछ समय से
धर्म्म सम्बन्धी सभी बातो मे कमी और असावधानी होने लगी है
इसी प्रकार विवाह आदि मे भी होती है इसलिये ठीक मिलान
न कर पति पत्नी की प्रकृति और स्वभाव आदि न मिलने से नाना
प्रकार के कष्ट होते हैं और दाम्पत्य प्रेम का जैसा चाहिये
आनन्द नहीं मिलता।
आजकल प्रथम तो जन्म पत्र ही ठीक नही वनते। वच्चे
वाले पंडित को बच्चे के पैदा होने का समय अन्दाज से वतलाते
हैं क्योंकि प्रायः घड़ी बहुत कम घरों मे होती है। इसलिये बहुत
कम घर ऐसे होते हैं जिनमे जन्म समय का वक्त बिलकुल ठीक
देखकर जन्म पत्री बनाई जाती होगी। दूसरे जन्म पत्री बनाने
मे जितने पाण्डित्य की आवश्यकता होती है उतनी विद्वत्ता पण्डित
मे होती नहीं। वे अट संट जो समझते हैं, वना देते हैं। इसके
बाद जन्म पत्री के मिलाने वाले भी बहुत कम मिलान करते हैं
वे केवल अपने मतलब साधन की बात सोचते हैं। यही कारण
है कि आजकल जन्म पत्री का मिलान करके भी व्याह होने पर
अधिकतर उसका परिणाम विपरीत होता है। जिस दाम्पत्य प्रेम के
लिये जन्म पत्री मिलाई जाती है वह दाम्पत्य प्रेम नष्ट होजाता है।
८८ आनन्द मन्दिर
स्त्री के भेद
स्त्रियां चार प्रकार की मानी गई हैं ।
१-पद्मिनी २-चित्रणी ३-शंखनी ४-हस्तिनी
पद्मिनी स्त्री के लक्षण
रूपवती, सुन्दर, चन्द्रमुखी और नेत्रो मे मृगी की समान
सुन्दर जिसे मृगनयनी कहते है, पुष्ट स्तन वाली, सुशील, स्वभाव
वाली, कोमलाङ्गी (शरीर के अंग कोमल हो सांवला या गोरा कैसा
ही शरीर हो, ) आहार न बहुत कम न अधिक करने वाली, मीठी
बोली वाली, मधुर चाल वाली, मानवती, विलास दक्षा, लज्जावती,
धर्म कार्यों मे रुचिवाली, कमल के समान शरीर की गन्ध-
वाली, बुद्धिमती, कभी अपमान की बात न सह सकने वाली जो
स्त्री हो ऐसी स्त्री पद्मिनी कही जाती है ।
चित्रणी स्त्री के लक्षण
मृगनयनी अर्थात् जिसके नेत्र मृगी की समान सुन्दर और
बड़े हो, चन्द्रमुखी, सुन्दर मुखाकृति वाली, पतिप्राणा, प्रेम के
महत्व को समझने वाली, प्रसन्न मुख, सगीत प्रेमी, शिल्पकला मे
रुचि रखनेवाली, विद्या प्रेमी, मधुर भाषण करने वाली, सुन्दर,
सुडौल, शरीर वाली और सांवले वर्णवाली, जिसका उदर छोटा, स्तन
ऊंचे और हथिनी के समान मन्द चाल वाली, ऐसी स्त्री को
चित्रणी कहा है ।
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ८६
शंखिनी स्त्री के लक्षण
भूरे नेत्रो वाली, दुबलं शरीर वाली, तिरछी चितवन औग
लम्बे केशों वाली, छोटे स्तन, चंचल चालवाली, नशीली वस्तुओ
की रुचि रखने वाली, भांग आदि पीने की इच्छा वाली, कर्कस
बोली वाली. दुष्ट स्वभाव वाली हो क्रोधी हो सांवली या गोरी
वर्ण वाली हो तथा विषय भोग मे अधिक इच्छा रखने वाली हो
तो ऐसी स्त्री शंखिनी कही जाती है ।
हस्तिनी स्त्री के लक्षण
जिसके पसीने मे हाथी कैसी गन्ध आती हो, ठिगने शरीर
वाली, मोटी, दुष्ट स्वभाववाली, हथनी की समान चाल वाली, स्तन-
भार से ऊपर का शरीर झुका हुआ सा कुछ कुछ प्रतीत हो,
घुंघराले बालवाली, लज्जाहीन, लाल बड़े चंडे होठो वाली, खूब
खाने वाली, गोरे शरीर वाली और जिसके मासिकधर्म के रक्त
मे भी हाथी कैसी गन्ध आती हो ऐसी स्त्री को हस्तिनी कहा है।
और भी अनेक प्रकार की स्त्रियां कही हैं परन्तु मुख्य चार ही है।
जिनके आर्त्त