वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ९५
तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ९५
१५१-देवदत्तो गच्छतीत्युपचारादभिमा-
नात्तावच्छरीरप्रत्यक्षोऽहङ्कारः ॥१५॥
(देवदत्तः) देवदत्त (गच्छति) जाता है (इति) ऐसी (उपचारात्)
बोलचाल से (अभिमानात्) और अभिमान से (तावत्) प्रथम तो (अह-
ङ्कारः) “मैं” ऐसा कथन (शरीरप्रत्यक्षः) शरीरविषयक प्रत्यक्ष है ॥
अर्थात् देवदत्त जाता है, यज्ञदत्त आता है, विष्णुमित्र चलता है, चैत्रः
पढ़ता है, मैत्र पढ़ाता है, इत्यादिक बोलचाल से, और मैं गोरा हूं, तू काला-
है, वह मोटा है, मैं पतला हूं, इत्यादिक अभिमान से अहङ्कार का प्रत्यक्ष
शरीरविषयक ही जान पड़ता है, इस लिये हमारे पक्ष में संदिग्ध नहीं किन्तु
शरीरविषयक उपचार निश्चित है ॥१५॥ फिर शङ्का करते हैं कि-
१५२-संदिग्धस्तूपचारः ॥ १६ ॥
(उपचारः) बोलचाल वा लक्षणा का उपचार (तु) तो (संदिग्धः) सन्देह-
युक्त ही रहा ॥
अर्थात् देवदत्त जाता है, यज्ञदत्त आता है, इत्यादि प्रत्यक्ष में यह सन्देहः
तो ज्यों का त्यों ही रहा कि वक्ता को शरीर का जाना आना विवक्षित है
अथवा आत्मा का वा दोनों का ? ॥ १६ ॥
आगे उक्त शङ्का का परिहार करते हैं कि-
१५३-न तु, शरीरविशेषाद् यज्ञदत्तविष्णुमित्रयोर्ज्ञानं
विषयः ॥ १७ ॥
(शरीरविशेषाद्) शरीर के विशेष से (यज्ञदत्तविष्णुमित्रयोः) यज्ञदत्त
और विष्णुमित्र का पृथक् २ (ज्ञानम्) ज्ञान (विषयः) वक्ता का विषय है
(न तु) तब सन्देह नहीं रहता ॥
जब यज्ञदत्त को आता और विष्णुमित्र को जाता देखते हैं, तब यज्ञदत्त
से विष्णुमित्र का पृथक् जो ज्ञान होता है वह तो शरीरविशेष से ही होता
है, आत्मा तो दोनों का एक सा होगा, शरीर ही भिन्न २ प्रकार के देखकर एक
का दूसरे से विशेष ज्ञान होता है तब आत्मा जाता है वा आता है, यह तो
सन्देह नहीं हो सकता किन्तु शरीरविषयक ही अहङ्कार का विषय होजाता
है, फिर उपचार (बोलचाल) सन्देहयुक्त कहां रहा ? ॥ १७ ॥
१६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
जब कि शरीर का ही प्रत्यक्ष अभिमान और अहङ्कार है, आत्मा का
प्रत्यक्ष नहीं, तब सामान्यतोदृष्ट से विशेष सिद्ध न होने पर आत्मा केवल
शास्त्रसिद्ध है, और उस के अनुमान से सिद्ध करने का परिश्रम वृथा है ? तो
उत्तरः-
१५४-अहमिति मुख्ययोग्याभ्यां शब्दवद् व्यतिरेकाऽव्यभि-
चाराद्विशेषसिद्धेर्नागमिकः ॥ १८ ॥
( अहमिति ) 'मैं' ऐसे ( मुख्ययोग्याभ्याम् ) उपचाररहित और योग्य
प्रत्ययों से ( शब्दवत् ) शब्द के समान ( व्यतिरेकाऽव्यभिचारात् ) पृथक्ता
के अव्यभिचार से ( विशेषसिद्धेः ) विशेष सिद्ध होने से ( आगमिकः ) केवल
शास्त्रसिद्ध ( न ) नहीं है ॥
अर्थात् आत्मा केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं है किन्तु अनुमानसिद्ध भी है
क्योंकि 'मैं हूं' ऐसी प्रतीति न तो औपचारिक है किन्तु उपचाररहित है
और योग्य भी है क्योंकि केवल शरीर को कोई 'मैं' नहीं कहता, प्रत्युत
'मेरा शरीर' कहता है, तब आत्मा शरीर से नित्य भिन्न हुवा अर्थात् शरीर
कभी भी आत्मा नहीं हुवा, तब जैसे शब्द गुण, पृथिवी आदि आठ द्रव्यों
में से किसी द्रव्य का गुण न होने से किन्तु आठों से व्यतिरिक्त आकाश का
गुण होने से भिन्न है । ऐसे ही आत्मा भी पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से
व्यतिरिक्त विशेष सिद्ध होने से केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं, किन्तु अनुमान-
सिद्ध भी है । इस प्रकार आत्मा-शास्त्र और अनुमान दोनों से सिद्ध है ॥१८॥
आत्मा की परीक्षा हो चुकी । अब आत्मा के नाना अर्थात् अनेक होने
की परीक्षा करेंगे, इस लिये पहले पूर्व पक्ष करते हैं:-
१५५-सुखदुःखज्ञाननिष्पत्त्यविशेषादैकात्म्यम् ॥ १९ ॥
( सुखदुःख-ऽविशेषात् ) सुख दुःख और ज्ञान की सिद्धि में विशेष न होने
से ( ऐकात्म्यम् ) आत्मा एक ही जान पड़ता है ॥
जैसा सुख दुःख और ज्ञान एक शरीर में है, वैसा ही सब शरीरों में है,
कुछ विशेष नहीं । इस कारण देवदत्त, यज्ञदत्त, विष्णुमित्र, चैत्र, मैत्र इत्यादि
के अनेक शरीरों में एक ही आत्मा प्रतीत होता है क्योंकि जैसे शब्दलिङ्ग की
विशेषता न होने से आकाश एक है और जैसे शीघ्र विलम्ब एकसाथ इत्यादि
सामान्य से काल एक है और जैसे पूर्व, पश्चिम आदि प्रत्ययलिङ्ग के अविशेष
[Header] तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ९९
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से दिशा एक है, ऐसे ही सुख, दुःख, ज्ञानादि लिङ्गों के अविशेष (सामान्य)
से आत्मा भी अनेक शरीरों में एक ही है ॥ १९ ॥
आगे सिद्धान्त सूत्र से उत्तर देते हैंः-
१५६-व्यवस्थातोनाना ॥ २० ॥
( व्यवस्थातः ) व्यवस्था के भेद से ( नाना ) आत्मा अनेक हैं ॥
अर्थात् सुख दुःख ज्ञानादि लिङ्ग यद्यपि सब शरीरों में पाये जाते हैं
तथापि एक काल में एक ही प्रकार का सुख वा दुःख वा ज्ञान सब के शरीरों
में नहीं पाया जाता । जिस समय में देवदत्त सुख का अनुभव करता है उसी
समय में यज्ञदत्त दुःख का अनुभव करता है, और विष्णुमित्र दोनों के सुख
और दुःख को जानता है, इसलिये सुख दुःख और ज्ञान सब में समान होने
पर भी एक काल में एक को सुख होने से सब को सुख नहीं होता और एक
को दुःख होने से सब को दुःख भी नहीं होता तथा एक को ज्ञान होने से
सब को ज्ञान भी नहीं होता, यदि होता तो एक पाठशाला के अनेक
विद्यार्थियों में से एक के पढ़कर ज्ञानी होने से सब विद्यार्थी ज्ञानी होजाते,
परन्तु ऐसा नहीं होता । इस लिये सुख दुःख और ज्ञान की व्यवस्था होने
से सब शरीरों में एक आत्मा नहीं है किन्तु अनेक हैं ॥ २० ॥
अब दूसरा हेतु देते हैं-यदि कोई कहे कि केवल युक्ति से आत्मा का
अनेक होना सिद्ध किया, शास्त्र से नहीं, तो उत्तरः-
१५७-शास्त्रसामर्थ्याच्च ॥ २१ ॥
( शास्त्रसामर्थ्यात् ) शास्त्र के सामर्थ्य से ( च ) भी ॥
शास्त्र के सामर्थ्य से भी आत्मा अनेक सिद्ध होते हैं । जैसा कि यजुर्वेद
अध्याय १६ मन्त्र ४६ में “जीवा जीवेषु सस्रकाः” और कठोपनिषद् वल्ली ५
कण्डिका १३ में “नित्यो नित्यानाम्, चेतनश्चेतनानाम्, एको बहूनाम्”
इत्यादि वेद और उपनिषदादि शास्त्रों के सहस्त्रों प्रमाणों से जीवात्मा का
अनेक होना पाया जाता है । वेदादि शास्त्रों के बहुत से प्रमाण इसी
वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद अध्याय ३ आह्निक १ सूत्र १९ के भाष्य में पृष्ठ ६३
से ६६ तक जीवों के अनेकत्व, अणुत्व और भिन्न भिन्नत्व में हम लिख आये
हैं, वहां देख लीजिये ॥ २१ ॥
तृतीयाध्याय के इस द्वितीय आह्निक में मन की परीक्षा करके फिर
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७८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
तृतीयाध्याय के इस द्वितीय आह्निक में मन की परीक्षा करके फिर
आत्मपरीक्षा भी पूर्ण रीति से की गई ॥
इति श्री तुलसीराम स्वामि कृते
वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे
तृतीयाऽध्यायस्य
द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥
इति तृतीयोध्यायः ॥ ३ ॥
ओ३म्
अथ चतुर्थोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
पृथिवी आदि ९ द्रव्यों की चतुर्थ सूत्रोक्त उद्देशक्रमानुसार उद्देश लक्षण
और परीक्षायें गत तीन अध्यायों में कर चुके। अब जीवात्मा और परमात्मा=
आत्मा द्रव्य को छोड़कर शेष पृथिवी आदि आठ द्रव्यों के मूल कारण प्रकृति
की परीक्षा करना चाहते हुये आचार्य कणाद मुनि चतुर्थाध्याय का आरम्भ
करते हुये मूल कारण प्रकृति का स्वरूप वर्णन करते हैं:—
१५५—सदकारणवन्नित्यम् ॥ १ ॥
( सत् ) जो हो ( अकारणवत् ) जिस का अन्य कारण न हो ( नित्यम् )
यह नित्य है ॥
जो पदार्थ सत्स्वरूप है, जिस का अन्य कोई कारण भी नहीं, वह नित्य
पदार्थ एक मूल प्रकृति है ॥ १ ॥ और—
१५६–तस्य कार्यं लिङ्गम् ॥ २ ॥
( तस्य ) उस का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग ( कार्यम् ) कार्य है ॥
अर्थात् उस प्रथम सूत्रोक्त कारणरहित सत्स्वरूप प्रकृति का लिङ्ग उस के
अनेक कार्य हैं जो पृथिवी आदि कार्यस्वरूप से प्रत्यक्ष हैं ॥ २ ॥
क्यों जी ! कार्य को कारण का लिङ्ग क्यों माना जावे ? उत्तर:—
१५७–कारणभावात् कार्यभावः ॥ ३ ॥
( कारणभावात् ) कारण के भाव से ( कार्यभावः ) कार्य का भी भाव
होता है ॥
अर्थात् कारण हो तब उस से कोई कार्य उत्पन्न होता है, न हो तो
नहीं। इस लिये कार्य को देखकर अनुमान से कारण की सिद्धि होती है तब
कार्य को कारण का लिङ्ग ( अनुमापक ) क्यों न माना जावे ॥
यह निश्चित नियम है कि जिस के होने से जो हो और न होने से न
हो, वह उस का लिङ्ग ( अनुमान कराने वाला ) होता है । अर्थात् कार्य
८७
वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
का भाव बिना कारणभाव के नहीं होता, यह अटूट नियम है। संसार में
हम स्थूल पदार्थों को देखते हैं और फिर उन स्थूलों की बनावट में सूक्ष्म
अवयवों के जोड़ देखते हैं और फिर उन सूक्ष्मोँ में भी सूक्ष्मतर अवयवों के
जोड़ देखते हैं तथा फिर सूक्ष्मतर पदार्थों में भी अन्य सूक्ष्मतम अवयवों का
जोड़ देखते हैं, इस प्रकार सूक्ष्म से सूक्ष्म, जिस से परे अन्य सूक्ष्म न हो उस
पदार्थ का नाम परमाणु है और वे परमाणु ऐसे अनन्त हैं कि मनुष्य उन
को किसी प्रकार गिन नहीं सकता इस लिये वे किसी प्रकार संख्या में नहीं
आसकते। यद्यपि वे परमाणु अनन्त हैं तथापि उन को सांख्य योग और
वेदान्त में सत्त्व रजस् तमस् भेद से तीन प्रकार का गुण बताया गया है और
न्याय, वैशेषिक और मीमांसा में परमाणु नाम से पुकारा गया है, इन्हीं
परमाणुओं को श्वेताश्वतर शाखा वाले श्वेत, रक्त और कृष्ण नाम से पुका-
रते हैं, इन्हीं को कहीं प्रकाश, क्रिया और आवरण शक्ति बताया गया है।
इन्हीं परमाणुओं की कोई दिव्य शक्ति है जिस को प्रमाणकुशल लोग भी
पहुंच नहीं सकते, जिस का योगी भी लक्षण नहीं कर सकते और मुमुक्षु
भी जिस का उल्लङ्घन नहीं कर सकते, वैज्ञानिक जिस का लक्षण नहीं कर
सकते वह अप्रज्ञात, अलक्षण, अतर्क्य, अविज्ञेय, अव्यक्त कोई पदार्थ है जो
इन सत्त्वादि गुणों की वा परमाणुओं की साम्यावस्था है, उसी का नाम प्रकृति
है। अनेक ग्रन्थों में देवी, शक्ति, पराशक्ति, माया, महामाया, प्रकृति,
अव्यक्त, अव्याकृत, प्रधान इत्यादि इसी के अनेक नाम हैं। इसी मूल प्रकृति
में ब्राह्म मान से सौ वर्ष के अन्त में प्रलय अवस्था में सम्पूर्ण जगत् सोया
हुवा सा अन्धकार से छिपा हुवा सा लीन हुवा रहता है, उस समय में इस
प्रकृति का नाम 'स्वधा' होता है। जैसा कि वेद में लिखा हैः-
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास॥
ॠ० १०। १२९। २
अर्थात् (प्रलय काल में) न मृत्यु था, न जीवन था, न रात्रि और दिन
का चिह्न था (किन्तु) स्वधा=प्रकृति के सहित वह एक (ब्रह्म) चेतन था
जो निष्कम्प था और उस से परे कुछ न था ॥ २ ॥
इस में स्वधा का अर्थ यह है कि अपने धारण किये हुवे जीवग्रामसहित ॥
तथा इस से अगले मन्त्र ये हैं किः-
तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् ।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाऽजायतैकम् ॥३॥
कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥
अर्थ-(अग्रे तमः आसीत्) प्रलयकाल में अन्धियारा रहता है और (इदं
सर्वमप्रकेतं सलिलम् आ तमसा गूढम्) यह सब चिह्नहित अदृश्य जल सा
अन्धियारे से आच्छादित रहता है। जैसे जल बाष्परूप होकर फिर आकाश
में अदृश्य अप्रकेत हो जाता है, वैसे जगत् भी अव्यक्तभाव में होता है। (यत्
आभू तुच्छये न अपिहितमासीत्) जो जगत् तुच्छ अर्थात् सूक्ष्म अव्यक्तभावा-
पन्न तम से आच्छादित होता है (तत् एकं तपसः महिना अजायत) वह
एक अन्धकारावृत अवस्था के पश्चात् महत्तत्त्वरूप से उत्पन्न होता है अर्थात्
प्रकृति से महत्तत्त्व की उत्पत्ति सब से प्रथम हुवा करती है। इस मन्त्र में यह
कहा है कि प्रथम प्रकृति रहती है, उससे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है। अब इस
से अगले मन्त्र में यह कहा जाता है कि महत्तत्त्व से काम अर्थात् अहङ्कार
की उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥
इस से पूर्वमन्त्र ३ (महिनाऽजायतैकम्०) में महत्तत्त्व की उत्पत्ति
कह चुके हैं। (तदग्रे कामः समविवर्त्तत) उस महत्तत्त्व के पश्चात् काम=
अहङ्कार उत्पन्न होता है, उसी को मन कहते हैं (मनसः रेतः प्रथमं यत्
आसीत्) उस मन का बीज जो पूर्व था (कवयः मनीषा हृदि प्रतीष्य)
विद्वान् लोग बुद्धि से हृदय में विचार करके (असति सतो बन्धुं निरविन्दन्)
असत्-अप्रतीयमान अवस्था में सत्-प्रतीयमान जगत् के बन्धु=बान्धने वाले
कर्म को जानते हैं अर्थात् प्रकृति से जगदुत्पत्ति में पूर्वकल्पकृत कर्म हेतु
होते हैं । निष्प्रयोजन जगद्रचना नहीं होती। इस सब से जीव ब्रह्म
प्रकृति और जीवों के कर्म प्रवाह से अनादि सिद्ध होते हैं ॥ ४ ॥
इस प्रकार महत्तत्त्व और अहङ्कार इन दोनों को सांख्य और योग शास्त्र
में प्रकृति के परिणाम माना गया है तथा न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और
११
८२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
वेदान्त में शुद्ध प्रकृति के भाग विशेष माना गया है । इस प्रकार शास्त्रों में
कोई विरोध नहीं किन्तु संज्ञाभेद और प्रक्रियाभेद मात्र है । अहङ्कार के
सत्त्वगुणप्रधान भाग विशेष से ईश्वराज्ञानुकूल प्रत्येक जीव को एक आ-
भ्यन्तर इन्द्रिय मन दिया गया है । अहङ्कार के तमोगुणप्रधान भाग विशेष
से व्यापक दिशा और काल, व्यापक शब्द तन्मात्र, अणुस्पर्श तन्मात्र, रूप,
तन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र; यह चारों भी उत्पन्न होते हैं। इन चारों
को न्याय, वैशेषिक और मीमांसा में द्वयणुक कहते हैं । शब्दतन्मात्र से
आकाश, स्पर्शतन्मात्र से वायु, रूपतन्मात्र से तेज, रसतन्मात्र से जल और
गन्धतन्मात्र से पृथिवी; यह पांच महाभूत उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥
शङ्का-कार्यलिङ्ग से किसी कारण की सिद्धि तौ अवश्य होती है पर उस
कारण के नित्य होने में क्या लिङ्ग है ? समाधान-
१६१-अनित्य इति विशेषतः प्रतिषेधभावः ॥ ४ ॥
(अनित्यः इति) " अनित्य " इस शब्द में (विशेषतः) विशेष का
(प्रतिषेधभावः) निषेध होना पाया जाता है ॥
यदि नित्य कोई पदार्थ नहीं होता तौ " अनित्य " शब्द में नञ् का
अकार किस का निषेध करता ? बस अनित्य कहना भी किसी के नित्य होने
का लिङ्ग है ॥ ४ ॥
यदि कहो कि हम तौ नित्य की अपेक्षा से नित्य नहीं कहते, तौ उत्तर-
१६२-अविद्या ॥ ५ ॥
(अविद्या) तो आप की भ्रान्ति है । अर्थात् नित्य की अपेक्षा के विना
अनित्य मानना अविद्या वा भ्रान्ति है क्योंकि अनित्य शब्द में जो निषेधार्थक
अकार है वह नित्य का ही तौ निषेध कर सकता है ॥ ५ ॥
क्यों जी ! यदि पृथिवी आदि तत्त्वों का मूल कारण प्रकृति है, तौ फिर
वह आंख से क्यों नहीं दीखती ? उत्तर-
१६३-महत्यनेकद्रव्यवत्त्वाद्रूपाच्चोपलब्धिः ॥ ६ ॥
(महति) स्थूल वस्तु में अथवा महत्तत्त्व में (अनेकद्रव्यवत्त्वात्) अनेक
द्रव्यवाला होने से (च) और (रूपात्) रूप से (उपलब्धिः) उपलब्धि
होती है ॥
चतुर्थोऽध्याय १ आह्निक [८३]
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चतुर्थोऽध्याय १ आह्निक [८३]
जो पदार्थ महान् होते हैं वा स्थूल होते हैं, वे अनेक द्रव्यों के संयोग
के बने होते हैं और रूप वाले होते हैं इस लिये उन की आंख से उपलब्धि
होती है, परन्तु प्रकृति ऐसी नहीं । अर्थात् प्रकृति में न तो अनेक द्रव्यों का
संयोग है और न रूप है, इस लिये इस की उपलब्धि आंख से नहीं होती ॥ ६ ॥
प्रश्न-अच्छा तो प्रकृति की उपलब्धि तो आंख से इस लिये नहीं होती
कि वह अनेक द्रव्य वाली नहीं, परन्तु वायु तो अनेक द्रव्यों वाला है, फिर
वह आंख से क्यों नहीं दीखता, वह तो महान् है ? उत्तर-
१६४-सत्यपि द्रव्यत्वे महत्त्वे रूपसंस्काराभावाद्
वायोरनुपलब्धिः ॥ ७ ॥
(वायोः) वायु की (अनुपलब्धिः) उपलब्धि न होना (द्रव्यत्वे)
द्रव्य होने (महत्त्वे) महान् होने (सति) पर (अपि) भी (रूपसंस्कारा-
ऽभावात्) रूपसम्बन्ध के न होने से है ॥
यद्यपि वायु द्रव्य है और महान् है परन्तु उस में रूप का सम्बन्ध नहीं
है, इस कारण उस की उपलब्धि आंख से नहीं होती ॥ ७ ॥
प्रश्न-जिस रूप के सम्बन्ध से प्रत्येक द्रव्य आंख से उपलब्ध होने लगता
है, स्वयं उस रूप की उपलब्धि किस से होती है ? उत्तर-
१६५-अनेकद्रव्यसमवायाद् रूपविशेषाच्च रूपोपलब्धिः ॥८॥
(अनेकद्रव्यसमवायात्) अनेक द्रव्यों के साथ सम्बन्ध होने से (च)
और (रूपविशेषात्) रूप के विशेष से (रूपोपलब्धिः) रूप की उपलब्धि
होती है ॥
जो पदार्थ अनेक द्रव्यों के संयोग से बनता है और उन द्रव्यों के साथ
समवाय सम्बन्ध रखता है तथा अन्य रस गन्ध आदि से विशेष (भिन्नता)
रखता है वही रूप आंख से उपलब्ध होता है ॥ ८ ॥ इसी प्रकार-
१६६-तेन रसगन्धरूपर्शेषु ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ ६ ॥
(तेन) उसी प्रकार से (रसगन्धरूपर्शेषु) रस, गन्ध और स्पर्श, इन
तीनों में भी (ज्ञानम्) ज्ञान को (व्याख्यातम्) कहा गया समझना चाहिये ॥
जिस प्रकार अनेक द्रव्यों के संयोग से और रूप विशेष से रूप उपलब्ध
होता है इसी प्रकार समझना चाहिये कि अनेक द्रव्यों के संयोग और रस
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तब नवम सूत्र का व्याख्यान कैसे ठीक माना जाय ? उत्तर-
८४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
विशेष से रस उपलब्ध होता है, अनेक द्रव्यों के संयोग और गन्ध विशेष से
गन्ध उपलब्ध होता है और अनेक द्रव्यों के संयोग और गन्ध विशेष से
गन्ध उपलब्ध होता है ॥ ९ ॥
शङ्का-पाषाणादि में जो गन्ध है वह तो नासिका से उपलब्ध नहीं होता,
तब नवम सूत्र का व्याख्यान कैसे ठीक माना जाय ? उत्तर-
१६७-तस्याऽभावादव्यभिचारः ॥ १० ॥
( तस्य ) उस गन्ध विशेष के ( अभावात् ) उद्भूत न होने से ( अव्य-
भिचारः ) नियम का भङ्ग नहीं होता ॥
पाषाणादि में गन्ध है तो सही परन्तु छिपा हुवा है इस लिये उपलब्ध
नहीं होता, तब नवम सूत्र का व्याख्यान शङ्का के योग्य नहीं रहता । यदि
पाषाण में सर्वथा गन्ध न होता तो पाषाण के भस्म में गन्ध क्यों उपलब्ध
होता । भेद केवल इतना है कि वही गन्ध जो पाषाण में छिपा हुवा है,
पाषाण के भस्म में प्रकट वा उद्भूत होने से उपलब्ध होने लगता है ॥१०॥
क्यों जी ! जैसे रूप, रस, गन्ध और स्पर्श; इन सब गुणों की उपलब्धि
में एक एक इन्द्रिय से उपलब्ध होना कारण बताया गया, क्या इसी प्रकार
संख्या परिमाण आदि गुणों की उपलब्धि में भी कोई कारण कहा जा
सक्ता है ? उत्तर, हां-
१६८-संख्याः परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ
परत्वापरत्वे कर्म च रूपिद्रव्यसमवायाच्चाक्षु-
षाणि ॥ ११ ॥
( संख्याः ) संख्यायें, ( परिमाणानि ) परिमाण, ( पृथक्त्वं ) पृथक्
होना, ( संयोगविभागौ ) संयोग और विभाग, (परत्वापरत्वे) परला होना
और वरला होना, ( कर्म ) कर्म, ( च ) और स्नेह, द्रवता और वेग; ये
सब भी (रूपिद्रव्यसमवायात्) रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध होने
से (चाक्षुषाणि) आंख से उपलब्ध होने वाले हैं ॥
जिस प्रकार रूप गुण आंख से उपलब्ध होता है इसी प्रकार संख्यायें
भी आंख से उपलब्ध होती हैं क्योंकि संख्यायें भी रूपवाले द्रव्यों के साथ
समवाय सम्बन्ध रखती हैं, तथा जैसे रूप का आंख से ग्रहण होता है
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चतुर्थाध्याय १ आन्हिक ८५
वैसे ही परिमाणों ( लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई, नीचाई, मोटाई ) का
भी आंख से ग्रहण होता है क्योंकि लम्बाई चौड़ाई आदि परिमाण भी
रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं । तथा पृथक् होना गुण
भी आंख से ग्रहण किया जाता है और संयोग और विभाग भी आंख
से ग्रहण होते हैं क्योंकि पृथक्ता, संयोग और विभाग भी रूपवाले
द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं । ऐसे ही परे होना वा वरे होना
भी रूप वाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखने से चक्षु द्वारा ही उप-
लब्ध होता है। ऐसे ही कर्म भी चक्षु द्वारा उपलब्ध होता है क्योंकि कर्म
भी रूपवाले द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध रखता है। इस सूत्र में चकार से
( स्नेह ) चिकनाई, ( द्रवत्व ) गीलापन, और ( वेग ) धक्का; इन का ग्रहण
है क्योंकि चिकनाई, तरी और धक्का; ये सब भी रूपवाले द्रव्यों के साथ
समवाय सम्बन्ध रखते हैं ॥ ११ ॥
१६६-अरूपिष्वचाक्षुषाणि ॥ १२ ॥
( अरूपिषु ) रूपरहित द्रव्यों में ( अचाक्षुषाणि ) [ संख्या आदि गुण ]
आंख से ग्रहण नहीं किये जाते ॥
जो पदार्थ रूपरहित हैं अर्थात् चक्षु का विषय नहीं हैं उन में संख्या,
परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, वियोग, परत्व, अपरत्व, कर्म, स्नेह, द्रवत्व और
वेग; ये सब गुण भी चक्षु का विषय नहीं होते ॥ १२ ॥
१७०-एतेन गुणत्वे भावे च सर्वेन्द्रियं
ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ १३ ॥
( एतेन ) इसी से ( गुणत्वे ) गुणत्व जाति में ( च ) और ( भावे )
सत्ता में ( सर्वेन्द्रियम् ) सब इन्द्रियों से होने वाला ( ज्ञानम् ) ज्ञान ( व्याख्या-
तम् ) कहा गया समझना चाहिये ॥
जिस प्रकार चक्षुर्ग्राह्य द्रव्यों में संख्या आदि गुण आंख का विषय होते
हैं तथा रूपरहित द्रव्यों में आंख का विषय नहीं होते, इसी प्रकार गुणत्व
जाति और सत्ता में भी सर्वेन्द्रिय ज्ञान की व्याख्या होगई समझनी चाहिये ॥१३॥
इस आह्निक में पृथिवी आदि सब भावों का मूल कारण तथा उन की
परोक्षता और अपरोक्षता शङ्का समाधानपूर्वक परीक्षित की गई ॥
इति चतुर्थाध्याये प्रथममाह्निकम्
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
८६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
अथ द्वितीयमान्हिकम्
प्रश्न-प्रकृति के होने में जो पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों को लिङ्ग बताया
गया वह, कै प्रकार का होता है ? उत्तर-
१७१-तत्पुनः पृथिव्यादि कार्यद्रव्यं त्रिविधं
शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ॥ १ ॥
( तत् ) वह ( पृथिव्यादि कार्यद्रव्यं ) पृथिवी आदि कार्यद्रव्य ( पुनः )
फिर ( शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ) शरीर, इन्द्रिय और विषय नाम वाला
( त्रिविधम् ) तीन प्रकार का है ॥
पृथिवी आदि कार्य पदार्थ, जो प्रकृति के होने में लिङ्ग हैं, तीन ३
प्रकार के होते हैं:-१-शरीररूप २-इन्द्रियरूप ३-विषयरूप ॥
इस दर्शन में जो पृथिवी आदि कार्य द्रव्य कहे गये हैं वे शरीर, इन्द्रिय
और विषय भेद से तीन ३ प्रकार के होते हैं, उन में से शरीर = भोक्ता के
भोग का स्थान कहाता है, इन्द्रिय = शरीर के आश्रय से रहता हुवा अपने
से छूने वाले विषय में प्रत्यक्ष प्रतीति का साधन कहाता है और विषय =
इन्द्रियों से भिन्न, आत्मा के उपभोग का साधन द्रव्य विषय कहाता है । इस
प्रकार पृथिवी तीन प्रकार की है, जल तीन प्रकार का, तेज तीन प्रकार का,
वायु तीन प्रकार का और आकाश दो प्रकार का होता है (क्योंकि आकाश
शरीर रूप नहीं होता ) । काल एक प्रकार का होता है ( क्योंकि काल न
शरीर रूप होता, न इन्द्रिय रूप होता, केवल विषय रूप होता है) । दिशा
भी एक प्रकार की होती है ॥
हम लोगों के शरीर = देह, नाक इन्द्रिय, मिट्टी पत्थर आदि विषय; यह
तीन प्रकार की पृथिवी है । जलस्थ प्राणियों के शरीर, रसना इन्द्रिय,
नदी समुद्र हिमालय इत्यादि विषय, इस रीति से तीन प्रकार का जल है ।
तेजोमण्डल में रहने वाले प्राणियों का शरीर, आंख इन्द्रिय, पृथिवी आकाश
उदर और खानि में उत्पन्न अग्नि विषय, इस रीति से तीन प्रकार का तेज
है । वायुमण्डलस्थ प्राणियों का शरीर, सब शरीर में रहने वाली त्वक्
इन्द्रिय, वृक्षादि को हिलाने वाला तथा शरीर के भीतर घूमने वाला वायु
चतुर्थाध्याय २ आह्निक ८९
चतुर्थाध्याय २ आह्निक ८९
प्राण विषय, इस रीति से तीन प्रकार का वायु है । यद्यपि प्राण एक है
तथापि हृदय आदि भिन्न २ स्थानों में रहने से और मुख तथा नासिका
आदि द्वारों में होकर निकलने से प्राण दश प्रकार का कहाता है-
१-प्राण, २-अपान ३-समान ४-उदान ५-व्यान ६-नाग ७-कूर्म ८-कृकल
९-देवदत्त और १०-धनञ्जय, ये सब १० प्राण के भेद हैं जैसा कि एक श्लोक
में कहा गया है-
हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिसंस्थितः ।
उदानः कण्ठदेशस्थो व्यानः सर्वशरीरगः ॥ १ ॥
हृदय में प्राण, गुदा में अपान, नाभि में समान, कण्ठ में उदान और
समस्त शरीर में व्यान नाम से प्राण रहता है तथा उगलने का काम करने
वाला वायु नाग कहाता है, पलक मारने का कूर्म, भूख लगाने का कृकल,
जम्भाई लेने का देवदत्त और पुष्टि करने वाला प्राण वायु धनञ्जय कहाता है ॥
आकाश के दो भेद ये हैं-१ कर्णपुट में रहनेवाला आकाश श्रोत्रेन्द्रिय
है, तथा २-बाहर का समस्त आकाश विषय है । काल एक प्रकार का है
परन्तु उस के भेद क्षण, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, रात्रि, सप्ताह,
पक्ष, मास, वर्ष, युग और कल्पभेद से अनेक प्रकार के हैं, सो सब विषयरूप
हैं, इस लिये काल एक प्रकार का है ॥
दिशा भी पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैर्ऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और
ईशान भेद से यद्यपि आठ प्रकार की हैं और किन्हीं के मत में ऊपर और
नीचे की दो मिलाकर १० प्रकार की हैं परन्तु वे सब केवल एक विषय रूप
हैं, शरीररूप वा इन्द्रियरूप नहीं होतीं ॥
मन केवल एक प्रकार का इन्द्रियरूप है, शरीररूप और विषयरूप नहीं ॥१॥
प्रश्न-पूर्व सूत्र में जो पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों को शरीर इन्द्रिय विषय
भेद से तीन प्रकार का कहा गया है, वह वह पृथिवी आदि कार्य द्रव्य पाञ्च
महाभूतों से एक एक बनता है अथवा केवल एकला एकला ही है ? उत्तर-
१७२-प्रत्यक्षाऽप्रत्यक्षाणां संयोगस्याऽप्रत्य-
क्षत्वात् पञ्चात्मकं न विद्यते ॥ २ ॥
८८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(प्रत्यक्षाऽप्रत्यक्षाणाम्) प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष द्रव्यों का (संयोगस्य)
संयोग (अप्रत्यक्षत्वात्) प्रत्यक्ष न होने से (पञ्चात्मकम्) एक एक में
पाञ्च पाञ्च का संयोग (न) नहीं (विद्यते) है ॥
पृथिवी आदि एक एक कार्य द्रव्य में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अन्य चार
द्रव्यों का संयोग होता तौ पृथिवी प्रत्यक्ष न होती, प्रत्यक्ष होती है इस
लिये पृथिवी को पञ्चभूतात्मक नहीं कह सकते । इसी प्रकार जल और
तेज को समझो । वायु और आकाश, ये दोनों अप्रत्यक्ष हैं तब इन का
संयोग प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है और जब संयोग प्रत्यक्ष नहीं तब किसी
कार्य द्रव्य को पञ्चभूतात्मक कहना नहीं बनता ॥ २ ॥
क्योंजी ! पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों को संयोगस्वरूप न जानकर संयोग
से बना हुवा मानलें तब तौ उन को एक २ में पाञ्च पाञ्च के संयोग वाला
मान सकते हैं, इस में क्या दोष है ? उत्तर-
१७३-गुणान्तराऽभावाच्च ॥ ३ ॥
(गुणान्तराभावात्) अन्य गुणों के अभाव से (च) भी पृथिवी आदि
कार्य द्रव्य को पञ्चात्मक नहीं मान सकते ॥
यदि पृथिवी आदि कार्य द्रव्य संयोग से बने होते तौ अवश्य उन में
अन्य नये गुण पाये जाते जैसा कि हलदी और चूने के मिलाने से हलदी में
रक्तवर्ण पाया जाता है, परन्तु हम नहीं देखते कि पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों
में कोई नया गुण पाया जाता हो, इस लिये पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों को
पञ्चात्मक नहीं मान सकते ॥ ३ ॥
अच्छा पञ्चात्मक न सही, त्र्यात्मक तौ मान सकते हो ? उत्तर नहीं,
१७४-न त्र्यात्मकम् ॥ ४ ॥
(त्र्यात्मकम्) तीन तीन के संयोग से बनाहुवा भी (न) नहीं मान
सक्ते, क्योंकि अन्य गुणों को नहीं पाते ॥
जैसे पृथिवी आदि कार्य द्रव्य को अन्य नये गुणों के न पाये जाने से
एक एक में पाञ्च पाञ्च का संयोग नहीं मानाजासकता ऐसे ही अन्य गुणों के
न पायेजाने से एक एक को तीन तीन के संयोग वाला भी नहीं मान सक्ते
क्योंकि १-पृथिवी २-जल और ३-अग्नि, इन तीनों के गुण भी पृथिवी
आदि किसी एक द्रव्य में नहीं पाये जाते, इस लिये त्र्यात्मक मानना भी
ठीक नहीं ॥ ४ ॥
चतुर्थोध्याय २ आन्हिक ८९
यदि पृथिवी में गन्ध गुण के समान अन्य द्रव्यों के गुण रस और प्रकाश
आदि नहीं होते तो पृथिवी में गीलापन जल का, पकना अग्नि का, उड़ना
वायु का और अवकाश आकाश का गुण क्यों देखा जाता है ? उत्तर-
१७५-अणुसंयोगस्त्वऽप्रतिषिद्धः ॥ ५ ॥
( अणुसंयोगः ) अणुओं का संयोग ( तु ) तो ( अप्रतिषिद्धः ) निषिद्ध
नहीं किया गया ॥
हमने पहले दोनों सूत्रों में जो एक २ के पञ्चात्मक होने का निषेध किया
है उस से हमारा तात्पर्य अणुसंयोग के निषेध का नहीं है अर्थात् पृथिवी
आदि एक एक द्रव्य से बने हुए पार्थिव शरीरादि एक एक कार्य में अन्य
द्रव्यों को उन कार्यों का बनाने वाला न मानने से यह तात्पर्य है कि अस-
मवायीकारण रूप संयोग हम नहीं मानते, इतने से यह नहीं समझना
चाहिये कि हम निमित्त कारण रूप संयोग को भी न मानते हों । इस लिये
पार्थिव शरीर आदि कार्य द्रव्यों में यदि जल का गीलापन, अग्नि की गर्मी,
वायु की क्रिया और आकाश का अवकाश पाया भी जाता है तो भी हमारे
मत में कोई दोष नहीं क्योंकि हम अणुओं के संयोग का निषेध नहीं करते ॥ ५ ॥
आगे शरीरों का विभाग करते हैं कि शरीर कै प्रकार के होते हैं-
१७६-तत्र शरीरं द्विविधं योनिजमऽयोनिजं च ॥ ६ ॥
( तत्र ) उन में ( शरीरं ) शरीर ( योनिजं ) योनि से उत्पन्न होने वाला
( च ) और ( अयोनिजं ) बिना योनि के उत्पन्न होने वाला ( द्विविधं )
दो प्रकार का है ॥
पिछले पाञ्च सूत्रों में जो पृथिवी आदि द्रव्यों को १-शरीर २-इन्द्रिय
और ३-विषय नाम से तीन प्रकार का बताया गया है, उन तीनों में से
१-शरीर दो प्रकार का होता है-१-योनिज, २-अयोनिज ॥
जल अग्नि और वायु से उत्पन्न शरीर अयोनिज होते हैं तथा पृथिवी से
उत्पन्न शरीर योनिज तथा अयोनिज भी होते हैं, यह प्रशस्तपाद आचार्य्य का
मत है। फिर योनिज भी दो प्रकार के होते हैं-१-जरायुज और २-अण्डज ।
गर्भ के लपेटने वाली झिल्ली जरायु कहाती है, उस से जन्म लेने वाले
मनुष्य पशु और मृगों का शरीर जरायुज कहाता है । एक प्रकार को गोड़े
१२
९० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
को अण्डहा कहते हैं जो भीतर से पोला होता है और उसी के भीतर शरीर
बनता है, उस के टूटने से जिन के शरीरों का जन्म होता है, उन पक्षियों
और सांपों का शरीर अण्डज कहाता है । फिर अयोनिज शरीर भी चार
प्रकार के होते हैं-१-साङ्कल्पिक, २-सांसिद्धिक, ३-स्वेदज और ४-उद्भिज्ज ।
१-परमात्मा के सङ्कल्प से प्रत्येक सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न होने वाले ऋषि
मुनि महर्षि और साधारण मनुष्यों के और पशु आदि के शरीर साङ्कल्पिक कहाते
हैं । २-योगियों को जो योग द्वारा सिद्धियें प्राप्त होती हैं, उन सिद्धियों के बल
से योगी लोग जिस चाहे उस शरीर को धारण करते हैं, वे उन के शरीर
सांसिद्धिक कहाते हैं । ३-डांस, मच्छर, यूँत और अनेक प्रकार के जन्तु जो
सील Dempness से उत्पन्न होते हैं, उन के शरीर स्वेदज कहाते हैं । ४-वृक्ष,
वनस्पति, गुल्म, वीरुध, लता, घास, फूस आदि जो पृथिवी को फोड़कर
उपजते हैं, उन के शरीर उद्भिज्ज कहाते हैं ॥ ६ ॥
शङ्का-सृष्टि के आदि में उत्पन्न होने वाले जीवों के शरीर परमात्मा
के सङ्कल्प मात्र से अयोनिज उत्पन्न हो जाते हैं, यह बात समझ में नहीं
आई, क्योंकि उस का कारण नहीं बताया गया ? अब समाधान समझिये-
१७७-अनियतदिग्देशपूर्वकत्वात् ॥ ७ ॥
[ सर्गारम्भ के शरीर जिस कारण से उत्पन्न होवें, उस कारण की ]
(अनियतदिग्देशपूर्वकत्वात्) दिशा और देश पूर्व नियत न होने से [उन को
अयोनिज ही मान सकते हैं] ॥
सृष्टि के आरम्भ में किसी दिशा वा देश में किसी जीव की कोई योनि
शेष नहीं थी और प्रकृति जड़ होने से इस चमत्कारचातुरीयुक्त सृष्टि को
उत्पन्न करले, यह सम्भव नहीं, इस लिये चेतन परमात्मा के सङ्कल्प से उपादान
कारण प्रकृति में से इस आश्चर्य्यरूप जगत् का उत्पन्न होना माना जा सकता
है, इस लिये सर्गारम्भ में उत्पन्न होने वाले मनुष्य पशु पक्षी कीट पतङ्ग आदि
सब प्राणियों के देहों को परमात्मा के सङ्कल्प से उत्पन्न होने से साङ्कल्पिक
कहा गया ॥ १ ॥
प्रश्न-यदि ऐसा है तो समान कारण से उत्पन्न हुवे समस्त शरीर एक से
होते ? भिन्न २ और विलक्षण सृष्टि की उत्पत्ति का क्या कारण है ? उत्तर-
१७८-धर्मविशेषाच्च ॥ ८ ॥
चतुर्थाध्याय २ आन्हिक २९
( धर्मविशेषात् ) विशेष धर्म से ( च ) और विशेष अधर्म से ॥
सृष्टि के आरम्भ में जो जीव भिन्न २ देहों को धारण करते हैं, उन्हों ने
पूर्व कल्प में भिन्न २ प्रकार के धर्म विशेष और अधर्म विशेष किये थे, बस
उन्हीं धर्माऽधर्मों के विशेष ( भिन्न २ ) होने से मनुष्य पशु पक्षी आदि एक
दूसरे से विलक्षण शरीर उत्पन्न हुये ॥
अर्थात् सातवें सूत्र में कहा हुवा ही एक हेतु नहीं है; जिस से दिशा
और देश का पूर्व कारण में भेद न होने से सब के एकसे देह उत्पन्न होने
की शङ्का बन सकती, किन्तु दूसरा हेतु भी जो इस आठवें सूत्र में कहा गया
है, वह धर्म और अधर्म विशेष है, क्योंकि सब जीवों के धर्म अधर्म आपस
में समान नहीं होते, इस लिये धर्माऽधर्म के फल भोगने के लिये जो देह
उन को दिये जाते हैं, वे सब भी एकसे नहीं होते किन्तु अपने २ किये हुए
धर्मविशेष और अधर्मविशेष से सब को भिन्न २ प्रकार के देह मिलते हैं ॥ ८ ॥
सर्गारम्भ के शरीरों के अयोनिज होने में अन्य भी हेतु है । यथा-
१७९-समाख्याभावाच्च ॥ ९ ॥
( समाख्याभावात् ) प्रसिद्ध नाम पाये जाने से ( च ) भी ॥
अग्नि, वायु, रवि, भृगु, वशिष्ठ, गौतम, भरद्वाज, अङ्गिरा, जमदग्नि
आदि कितने ही ऋषियों के नाम सदा से प्रसिद्ध हैं कि जिन का कोई पिता
वा माता परमात्मा के अतिरिक्त नहीं था, इस ऐतिहासिक प्रमाण से भी
साङ्कल्पिक अयोनिज शरीर सिद्ध होते हैं ॥ ९ ॥ क्योंकि-
१८०-संज्ञाया आदित्वात् ॥ १० ॥
( संज्ञायाः ) संज्ञा के ( आदित्वात् ) सब से प्रथम होने से ॥
अग्नि, वायु, रवि आदि की संज्ञा ( नाम ) सब से प्रथम पाये जाते हैं,
उन से पूर्व उन के पिता आदि का नाम नहीं पाया जाता, इस से उन को
अयोनिज मानना बनता है ॥ १० ॥
१८१-सन्त्यऽयोनिजाः ॥ ११ ॥
( अयौनिजाः ) बिना योनि से उत्पन्न हुवे ( सन्ति ) सिद्ध हैं ॥
छठे सूत्र से दशवें पर्यन्त सूत्रों में वर्णित और प्रमाणित अयोनिज शरीर
अवश्य होते हैं, यह सिद्ध हुवा ॥ ११ ॥
गये, अगले सूत्र में वेद की साक्षी भी देते हैं-
९२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
इसी अर्थ की पुष्टि में अनुमान प्रमाण और ऐतिहासिक प्रमाण तो कहे
गये, अगले सूत्र में वेद की साक्षी भी देते हैं-
१८४-वेदलिङ्गाच्च ॥ १२ ॥
(वेदलिङ्गात्) वेदों में चिन्ह पाये जाने से (च) भी ॥
ऋग्वेद अष्टक ८ अध्याय ४ वर्ग १८ ऋचा ५ "विश्वाञ् देवान् जगत्या विवेश।
तेन चाक्लृपे ऋषयो मनुष्याः" तथा ऋग्वेद अष्टक ८ अध्याय ४ वर्ग १८ ऋचा १०
"तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता
अजावयः" तथा यजुर्वेद अध्याय ३१ मन्त्र ८ भी अक्षरशः इसी ऋचा के
समान है तथा अथर्व काण्ड १० अनुवाक ४ मन्त्र ८ " प्रजापतिः ससृजे
विश्वरूपम्। इत्यादि अनेक वेदमन्त्रों में पाया जाता है कि परमात्मा ने
उपादान कारण से बिना योनिविशेष के अनेक ऋषि मुनि आदि मनुष्यों,
पशुओं और पक्षी आदि की सृष्टि को अयोनिज उत्पन्न किया । जैसा कि
सूत्र संख्या १६० में भी कुछ विस्तार से निरूपण किया गया है। वे वेदमन्त्र
भी अयोनिज सृष्टि में प्रमाण हैं ॥ १२ ॥
इस चतुर्थाध्याय के द्वितीय आह्निक में पृथिवी आदि का शरीर इन्द्रिय
विषयभेद से त्रिविध होना तथा फिर योनिज अयोनिज भेद से शरीर का
द्विविध होना कहा गया ॥
इति चतुर्थाध्याये द्वितीयमाह्निकम्
—**—
इति श्री तुलसीराम स्वामि कृते
वैशेषिक दर्शन भाषानुवादे
चतुर्थोऽध्यायः
॥ ४ ॥
ओ३म्
अथ पञ्चमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
द्रव्यों की परीक्षा हो चुकी, आगे गुणों की परीक्षा करनी है, उस में
गुणों की परीक्षा से पहले कर्मों की परीक्षा करना चाहते हुए पञ्चमाध्याय
का आरम्भ करते हुवे वैशेषिकाचार्य मुनिवर कणाद ग्रन्थ पढ़नेवालों के
उपकारार्थ प्रथम उत्क्षेपण नाम कर्म के विषय में कहते हैं कि-
१८३-आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म ॥ १ ॥
( आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्याम् ) मन सहित आत्मा के संयोग और प्रयत्न से
( हस्ते ) हाथ में ( कर्म ) उठाने वा उछलने की क्रिया होती है ॥
जब कि कोई पुरुष यज्ञ वा वेदपाठ आदि कर्मों में हाथ उठाना चाहता
है तब उस के आत्मा में एक प्रकार का प्रयत्न उत्पन्न होता है, उस प्रयत्न से
मन और आत्मा हाथ से संयोग करते हैं और तब हाथ में उठाने वा
उछलने का कर्म प्रकट होता है ॥
आशय यह है कि यद्यपि आत्मा अणु और सूक्ष्म है तथा हृदय में
रहता है इस लिये आत्मा का संयोग हाथ के साथ साक्षात् नहीं हो सक्ता
तथापि मन जो कि आत्मा और हाथ के बीच में है, वह एक ओर से आत्मा
के प्रयत्न को ग्रहण करलेता है और दूसरी ओर हाथ से छूकर आत्मा से
लिये हुए प्रयत्न को हाथ से लगा देता है तब उस प्रयत्न से प्रेरा हुवा हाथ
उठने वा उछलने का काम करने लगता है ॥ १ ॥
हाथ का उठना कहकर आगे मूसल का उठना कहते हैं-
१८४-तथा हस्तसंयोगाच्च मुशले कर्म ॥ २ ॥
( तथा ) इसी प्रकार ( हस्तसंयोगात् ) हाथ के संयोग से ( च ) और
भारी होने से ( मुशले ) मूसल में ( कर्म ) क्रिया होती है ॥
जिस प्रकार आत्मा की प्रेरणा से मन में प्रयत्न होता है और मन के संयोग
से हाथ में, इसी प्रकार मूसल के बोझ से मूसल में उत्क्षेपणकर्म होता है ॥ २ ॥
९४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
क्यों जी ! जब मूसल ओखली में चोट खाकर फिर ऊपर को उछलता है,
तब उस के ऊपर उठने में कारण क्या है ? क्या हाथ का संयोग ही उस का
कारण है ? उत्तर, नहीं-
१८५-अभिघातजे मुशलादौ कर्मणि व्यतिरेका-
दऽकारणं हस्तसंयोगः ॥ ३ ॥
(अभिघातजे) चोट देने से उत्पन्न हुए (मुशलादौ) मूसल आदि में
(कर्मणि) जो क्रिया उत्पन्न होती है उस में (हस्तसंयोगः) हाथ का संयोग
(अकारणम्) कारण नहीं है (व्यतिरेकात्) तद्भिन्न होने से ॥
हाथ से पकड़ कर जब मूसल को ओखली में मारते हैं तब मूसल फिर
ऊपर को उठता है उस के उठने में केवल हाथ का संयोग कारण नहीं है क्यों
कि चोट खाया हुवा मूसल आदि विना हाथ लगाये अपने आप भी ऊपर को
उछलता है इस लिये हाथ का संयोग मूसल के उठने में कारण नहीं है
किन्तु वेग कारण है ॥ ३ ॥ और भी-
१८६-तथात्मसंयोगो हस्तकर्मणि ॥ ४ ॥
(तथा) इसी प्रकार (आत्मसंयोगः) आत्मा का संयोग (हस्तकर्मणि)
हाथ के उठने रूप कर्म में [कारण नहीं है ] ॥ ४ ॥
प्रश्न-तौ फिर हाथ के उठने में कारण क्या है ? उत्तर-
१८७-अभिघातान्मुशलसंयोगाद्धस्ते कर्म ॥ ५ ॥
(अभिघातात्) चोट मारने से (मुशलसंयोगात्) मूसल को पकड़े रहने
से (हस्ते) हाथ में (कर्म) उठने की क्रिया होती है ॥
मूसल को ओखली में मारने से मूसल में वेग उत्पन्न होता है और वेग-
वान् मूसल के संयोग से हाथ में ऊपर को उठना रूप कर्म होता है, उस कर्म
में आत्मा का संयोग वा मन का संयोग कारण नहीं, किन्तु मूसल में उत्पन्न
हुवा वेग ही हाथ लगने से हाथ के उठने में कारण है ॥ ५ ॥
क्यों जी ! हाथ के उठने में तौ मूसल का वेग कारण है परन्तु हाथ के
साथ २ अन्य शरीर के उभार में क्या कारण है ? उत्तर-
१८८-आत्मकर्म हस्तसंयोगाच्च ॥ ६ ॥
(हस्तसंयोगात्) हाथ के संयोग से (च) और वेग से (आत्मकर्म)
आपे [देह] में कर्म होता है ॥