वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 160 में से
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चतुर्थाध्याय १ आन्हिक ८५
वैसे ही परिमाणों ( लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई, नीचाई, मोटाई ) का
भी आंख से ग्रहण होता है क्योंकि लम्बाई चौड़ाई आदि परिमाण भी
रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं । तथा पृथक् होना गुण
भी आंख से ग्रहण किया जाता है और संयोग और विभाग भी आंख
से ग्रहण होते हैं क्योंकि पृथक्ता, संयोग और विभाग भी रूपवाले
द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं । ऐसे ही परे होना वा वरे होना
भी रूप वाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखने से चक्षु द्वारा ही उप-
लब्ध होता है। ऐसे ही कर्म भी चक्षु द्वारा उपलब्ध होता है क्योंकि कर्म
भी रूपवाले द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध रखता है। इस सूत्र में चकार से
( स्नेह ) चिकनाई, ( द्रवत्व ) गीलापन, और ( वेग ) धक्का; इन का ग्रहण
है क्योंकि चिकनाई, तरी और धक्का; ये सब भी रूपवाले द्रव्यों के साथ
समवाय सम्बन्ध रखते हैं ॥ ११ ॥
१६६-अरूपिष्वचाक्षुषाणि ॥ १२ ॥
( अरूपिषु ) रूपरहित द्रव्यों में ( अचाक्षुषाणि ) [ संख्या आदि गुण ]
आंख से ग्रहण नहीं किये जाते ॥
जो पदार्थ रूपरहित हैं अर्थात् चक्षु का विषय नहीं हैं उन में संख्या,
परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, वियोग, परत्व, अपरत्व, कर्म, स्नेह, द्रवत्व और
वेग; ये सब गुण भी चक्षु का विषय नहीं होते ॥ १२ ॥
१७०-एतेन गुणत्वे भावे च सर्वेन्द्रियं
ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ १३ ॥
( एतेन ) इसी से ( गुणत्वे ) गुणत्व जाति में ( च ) और ( भावे )
सत्ता में ( सर्वेन्द्रियम् ) सब इन्द्रियों से होने वाला ( ज्ञानम् ) ज्ञान ( व्याख्या-
तम् ) कहा गया समझना चाहिये ॥
जिस प्रकार चक्षुर्ग्राह्य द्रव्यों में संख्या आदि गुण आंख का विषय होते
हैं तथा रूपरहित द्रव्यों में आंख का विषय नहीं होते, इसी प्रकार गुणत्व
जाति और सत्ता में भी सर्वेन्द्रिय ज्ञान की व्याख्या होगई समझनी चाहिये ॥१३॥
इस आह्निक में पृथिवी आदि सब भावों का मूल कारण तथा उन की
परोक्षता और अपरोक्षता शङ्का समाधानपूर्वक परीक्षित की गई ॥
इति चतुर्थाध्याये प्रथममाह्निकम्
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