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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 160 में से

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पृष्ठ 93

चतुर्थोध्याय २ आन्हिक ८९
यदि पृथिवी में गन्ध गुण के समान अन्य द्रव्यों के गुण रस और प्रकाश
आदि नहीं होते तो पृथिवी में गीलापन जल का, पकना अग्नि का, उड़ना
वायु का और अवकाश आकाश का गुण क्यों देखा जाता है ? उत्तर-
१७५-अणुसंयोगस्त्वऽप्रतिषिद्धः ॥ ५ ॥
( अणुसंयोगः ) अणुओं का संयोग ( तु ) तो ( अप्रतिषिद्धः ) निषिद्ध
नहीं किया गया ॥
हमने पहले दोनों सूत्रों में जो एक २ के पञ्चात्मक होने का निषेध किया
है उस से हमारा तात्पर्य अणुसंयोग के निषेध का नहीं है अर्थात् पृथिवी
आदि एक एक द्रव्य से बने हुए पार्थिव शरीरादि एक एक कार्य में अन्य
द्रव्यों को उन कार्यों का बनाने वाला न मानने से यह तात्पर्य है कि अस-
मवायीकारण रूप संयोग हम नहीं मानते, इतने से यह नहीं समझना
चाहिये कि हम निमित्त कारण रूप संयोग को भी न मानते हों । इस लिये
पार्थिव शरीर आदि कार्य द्रव्यों में यदि जल का गीलापन, अग्नि की गर्मी,
वायु की क्रिया और आकाश का अवकाश पाया भी जाता है तो भी हमारे
मत में कोई दोष नहीं क्योंकि हम अणुओं के संयोग का निषेध नहीं करते ॥ ५ ॥
आगे शरीरों का विभाग करते हैं कि शरीर कै प्रकार के होते हैं-
१७६-तत्र शरीरं द्विविधं योनिजमऽयोनिजं च ॥ ६ ॥
( तत्र ) उन में ( शरीरं ) शरीर ( योनिजं ) योनि से उत्पन्न होने वाला
( च ) और ( अयोनिजं ) बिना योनि के उत्पन्न होने वाला ( द्विविधं )
दो प्रकार का है ॥
पिछले पाञ्च सूत्रों में जो पृथिवी आदि द्रव्यों को १-शरीर २-इन्द्रिय
और ३-विषय नाम से तीन प्रकार का बताया गया है, उन तीनों में से
१-शरीर दो प्रकार का होता है-१-योनिज, २-अयोनिज ॥
जल अग्नि और वायु से उत्पन्न शरीर अयोनिज होते हैं तथा पृथिवी से
उत्पन्न शरीर योनिज तथा अयोनिज भी होते हैं, यह प्रशस्तपाद आचार्य्य का
मत है। फिर योनिज भी दो प्रकार के होते हैं-१-जरायुज और २-अण्डज ।
गर्भ के लपेटने वाली झिल्ली जरायु कहाती है, उस से जन्म लेने वाले
मनुष्य पशु और मृगों का शरीर जरायुज कहाता है । एक प्रकार को गोड़े
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