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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 160 में से

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पृष्ठ 94

९० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
को अण्डहा कहते हैं जो भीतर से पोला होता है और उसी के भीतर शरीर
बनता है, उस के टूटने से जिन के शरीरों का जन्म होता है, उन पक्षियों
और सांपों का शरीर अण्डज कहाता है । फिर अयोनिज शरीर भी चार
प्रकार के होते हैं-१-साङ्कल्पिक, २-सांसिद्धिक, ३-स्वेदज और ४-उद्भिज्ज ।
१-परमात्मा के सङ्कल्प से प्रत्येक सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न होने वाले ऋषि
मुनि महर्षि और साधारण मनुष्यों के और पशु आदि के शरीर साङ्कल्पिक कहाते
हैं । २-योगियों को जो योग द्वारा सिद्धियें प्राप्त होती हैं, उन सिद्धियों के बल
से योगी लोग जिस चाहे उस शरीर को धारण करते हैं, वे उन के शरीर
सांसिद्धिक कहाते हैं । ३-डांस, मच्छर, यूँत और अनेक प्रकार के जन्तु जो
सील Dempness से उत्पन्न होते हैं, उन के शरीर स्वेदज कहाते हैं । ४-वृक्ष,
वनस्पति, गुल्म, वीरुध, लता, घास, फूस आदि जो पृथिवी को फोड़कर
उपजते हैं, उन के शरीर उद्भिज्ज कहाते हैं ॥ ६ ॥
शङ्का-सृष्टि के आदि में उत्पन्न होने वाले जीवों के शरीर परमात्मा
के सङ्कल्प मात्र से अयोनिज उत्पन्न हो जाते हैं, यह बात समझ में नहीं
आई, क्योंकि उस का कारण नहीं बताया गया ? अब समाधान समझिये-
१७७-अनियतदिग्देशपूर्वकत्वात् ॥ ७ ॥
[ सर्गारम्भ के शरीर जिस कारण से उत्पन्न होवें, उस कारण की ]
(अनियतदिग्देशपूर्वकत्वात्) दिशा और देश पूर्व नियत न होने से [उन को
अयोनिज ही मान सकते हैं] ॥
सृष्टि के आरम्भ में किसी दिशा वा देश में किसी जीव की कोई योनि
शेष नहीं थी और प्रकृति जड़ होने से इस चमत्कारचातुरीयुक्त सृष्टि को
उत्पन्न करले, यह सम्भव नहीं, इस लिये चेतन परमात्मा के सङ्कल्प से उपादान
कारण प्रकृति में से इस आश्चर्य्यरूप जगत् का उत्पन्न होना माना जा सकता
है, इस लिये सर्गारम्भ में उत्पन्न होने वाले मनुष्य पशु पक्षी कीट पतङ्ग आदि
सब प्राणियों के देहों को परमात्मा के सङ्कल्प से उत्पन्न होने से साङ्कल्पिक
कहा गया ॥ १ ॥
प्रश्न-यदि ऐसा है तो समान कारण से उत्पन्न हुवे समस्त शरीर एक से
होते ? भिन्न २ और विलक्षण सृष्टि की उत्पत्ति का क्या कारण है ? उत्तर-
१७८-धर्मविशेषाच्च ॥ ८ ॥