वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
अथ द्वितीयमान्हिकम्
प्रश्न-प्रकृति के होने में जो पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों को लिङ्ग बताया
गया वह, कै प्रकार का होता है ? उत्तर-
१७१-तत्पुनः पृथिव्यादि कार्यद्रव्यं त्रिविधं
शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ॥ १ ॥
( तत् ) वह ( पृथिव्यादि कार्यद्रव्यं ) पृथिवी आदि कार्यद्रव्य ( पुनः )
फिर ( शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ) शरीर, इन्द्रिय और विषय नाम वाला
( त्रिविधम् ) तीन प्रकार का है ॥
पृथिवी आदि कार्य पदार्थ, जो प्रकृति के होने में लिङ्ग हैं, तीन ३
प्रकार के होते हैं:-१-शरीररूप २-इन्द्रियरूप ३-विषयरूप ॥
इस दर्शन में जो पृथिवी आदि कार्य द्रव्य कहे गये हैं वे शरीर, इन्द्रिय
और विषय भेद से तीन ३ प्रकार के होते हैं, उन में से शरीर = भोक्ता के
भोग का स्थान कहाता है, इन्द्रिय = शरीर के आश्रय से रहता हुवा अपने
से छूने वाले विषय में प्रत्यक्ष प्रतीति का साधन कहाता है और विषय =
इन्द्रियों से भिन्न, आत्मा के उपभोग का साधन द्रव्य विषय कहाता है । इस
प्रकार पृथिवी तीन प्रकार की है, जल तीन प्रकार का, तेज तीन प्रकार का,
वायु तीन प्रकार का और आकाश दो प्रकार का होता है (क्योंकि आकाश
शरीर रूप नहीं होता ) । काल एक प्रकार का होता है ( क्योंकि काल न
शरीर रूप होता, न इन्द्रिय रूप होता, केवल विषय रूप होता है) । दिशा
भी एक प्रकार की होती है ॥
हम लोगों के शरीर = देह, नाक इन्द्रिय, मिट्टी पत्थर आदि विषय; यह
तीन प्रकार की पृथिवी है । जलस्थ प्राणियों के शरीर, रसना इन्द्रिय,
नदी समुद्र हिमालय इत्यादि विषय, इस रीति से तीन प्रकार का जल है ।
तेजोमण्डल में रहने वाले प्राणियों का शरीर, आंख इन्द्रिय, पृथिवी आकाश
उदर और खानि में उत्पन्न अग्नि विषय, इस रीति से तीन प्रकार का तेज
है । वायुमण्डलस्थ प्राणियों का शरीर, सब शरीर में रहने वाली त्वक्
इन्द्रिय, वृक्षादि को हिलाने वाला तथा शरीर के भीतर घूमने वाला वायु