उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
१९६ उपदेशसाहस्री
जो विज्ञानों की उत्पत्ति-विनाशों का द्रष्टा हो, ऐसा कोई नहीं है, यह सौगतों (बौद्धों) का कथन है। इन उक्त पक्षों में
वस्तुविषय की दृष्टि से तथा विरोध को दृष्टि से विकल्प और समुच्चय का असंभव रहने के कारण किसी एक पक्ष की
उपादेयता अथवा हमारे कथन के अनुसार अहंकारादिगत आभास का अविद्या के कारण विवेक न हो पाने से ब्रह्म ही
संसारी है, इन सब मतों में कौनसा न्याययुक्त है, इसका विचार करना चाहिए ॥ ३६ ॥
संसारिणां कथा त्वास्तां प्रकृतं त्वधुनोच्यते ।
मुखाभासो य आदर्शे धर्मो नान्यतरस्य सः ।
द्वयोरेकस्य चेद्धर्मो *वियुक्तोऽन्यतरे भवेत् ॥३७॥
संसारिणामिति — संसारियों की बात तो यहीं रहने दें। प्रस्तुत विषय को (आभास के सम्बन्ध में) बताते
हैं। दर्पण में मुख का जो प्रतिबिम्ब पड़ता है, वह 'दर्पण और मुख' इन दोनों में से किसी एक का धर्म नहीं है। यदि
(वह) दोनों में से किसी एक का धर्म होता तो अन्य के न रहने पर भी वह हो सकता था ॥ ३७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रसंगप्राप्त संसारियों की चिन्ता को यहीं पर त्यागकर प्रकृत आभासनिरूपण की प्रतिज्ञा कर रहे हैं—यहाँ से
प्रतिपक्षी के मत का खण्डन आरंभ कर रहे हैं—दर्पण में मुख का जो प्रतिबिम्ब (आभास) दिखाई देता है, क्या वह
मुख और आदर्श दोनों में से किसी एक का धर्म है, या मुख का ही धर्म है, अथवा दोनों का ही धर्म है, या दोनों से
भिन्न कोई वस्त्वन्तर है? इतने पक्ष (विकल्प) उपस्थित होने पर 'धर्मो नान्यतरस्य सः' से प्रथम पक्ष का खण्डन कर
रहे हैं—वह प्रतिबिम्ब, दर्पण और मुख इन दोनों में से किसी एक का धर्म नहीं है। यदि वह दोनों में से किसी एक का
(अन्यतर का) धर्म होता तो अन्यतर के अभाव में भी वह प्रतिबिम्ब पड़ सकता था, किन्तु ऐसा होता नहीं। दर्पण या
मुख दोनों में से किसी एक का भी अभाव रहने पर मुखाभास की प्रतीति नहीं होती। इस कारण वह मुखाभास
(प्रतिबिम्ब) अन्यतर (किसी एक का) धर्म नहीं है ॥ ३७ ॥
मुखेन व्यपदेशात्स मुखस्यैवेति चेन्मतम् ।
नादर्शानुविधानाच्च मुखे †सत्यविभावतः ॥३८॥
मुखेनेति—यदि यह कहें कि मुख के द्वारा उसका उल्लेख होने के कारण वह 'मुख' का ही धर्म है किन्तु
यह कहना उचित न होगा, क्योंकि वह दर्पण का अनुवर्ती है। दर्पण के न रहने पर मुख के रहते हुए भी वह (प्रतिबिम्ब)
नहीं दीखता ॥ ३८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'मुखेन व्यपदेशात् स मुखस्यैवेति चेन्मतम्' से द्वितीय पक्ष को उपस्थित कर 'नादर्शानुविधानाच्च' से उसका
खण्डन करते हैं। उसका (आभास-प्रतिबिम्ब का) मुख के द्वारा उल्लेख होता यदि माना जाता हो तो उसे (प्रतिबिम्ब
को) मुख का ही धर्म कहते, किन्तु वैसा कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि वह (प्रतिबिम्ब) दर्पण का अनुवर्ती है, और
दर्पण के अभाव में मुख के रहते हुए भी वह दृष्टिगत नहीं हो पाता है ॥ ३८ ॥
द्वयोरेवेति चेत्तन्न द्वयोरेवाप्यदर्शनात् ।
अदृश्यस्य सतो दृष्टिः स्याद्राहोरिन्दुसूर्ययोः ॥३९॥
द्वयोरिति—यदि उसे दोनों का धर्म कहें तो भी ठीक न होगा, क्योंकि दोनों के रहने अथवा न रहने पर
भी वह नहीं दिखाई देता। यदि उसे दोनों से भिन्न सत्य वस्तु कहें तो जिस प्रकार पूर्वसिद्ध राहु की प्रतीति, सूर्य और
चन्द्रमा के अस्तित्व में ही होती है, उसी प्रकार अदृश्य किन्तु विद्यमान प्रतिबिम्ब की प्रतीति मुख और दर्पण का संयोग
होने पर ही होती है ॥ ३९ ॥
- वियुक्तेऽन्य० —पाठान्तरम् । † सत्यप्यभावतः। सत्यप्यभासतः—पाठौ ।
तत्त्वमसिप्रकरणम् १९७
हृदयस्पर्शिनी
'द्वयोरेवेति चेत्'—यदि कहें कि वह (प्रतिबिम्ब) दोनों का धर्म है—इस तृतीय पक्ष का 'तन्न' से खण्डन
करते हैं। उसे दोनों का धर्म नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों के रहने अथवा न रहने में भी उसे देखा नहीं जाता।
मुख और दर्पण में से किसी भी एक के अभाव में तो मुखाभास की प्रतीति न होना स्पष्ट ही है, किन्तु यदि उसे उनके
संयोग का ही धर्म माना जाय तो भी उनका किसी प्रकार भी संयोग होने पर उसकी प्रतीति होनी चाहिये, किन्तु
होती नहीं है। इसलिये उसे उनके संयोग का भी धर्म नहीं कह सकते। अतः प्रतिबिम्ब को दोनों का धर्म नहीं कह
सकते। यदि यह कहें कि 'वह (आभास) इन दोनों से भिन्न सत्य वस्तु है' इस चतुर्थ पक्ष की आशंका को दृष्टान्त के
द्वारा उपस्थित करते हैं—'अदृश्यस्य सतो दृष्टिः'। जिस प्रकार पूर्वसिद्ध राहु की प्रतीति, सूर्य और चन्द्रमा की
विद्यमानता में ही होती है, उसी प्रकार अदृश्य किन्तु विद्यमान प्रतिबिम्ब की प्रतीति मुख और दर्पण का संयोग होने
पर ही होती है ॥ ३९ ॥
राहोः प्रागेव वस्तुत्वं सिद्धं शास्त्रप्रमाणतः ।
छायापक्षे त्ववस्तुत्वं तस्य स्यात्पूर्वयुक्तितः ॥४०॥
राहोरिति—उपर्युक्त आशंका उचित नहीं है, क्योंकि राहु की विद्यमानता तो चन्द्रग्रहणादि के पूर्व भी
शास्त्रप्रमाण से सिद्ध है, किन्तु जो लोग पृथिवी आदि की छाया को ही राहु कहते हैं, उनके अनुसार तो उसका (राहु
का) अवस्तुत्व उपर्युक्त युक्ति से ही सिद्ध हो जाता है ॥ ४० ॥
हृदयस्पर्शिनी
उक्त कथन उचित नहीं है, क्योंकि दृष्टान्त में वैषम्य है। क्योंकि सैंहिकेय राहु की वस्तुता तो चन्द्रग्रहण
के पूर्व से ही ज्योतिःशास्त्रप्रमाण से अथवा पुराणादि शास्त्र प्रमाण से निश्चित है, वैसा यहाँ पर किसी प्रमाण से
प्रतिबिम्ब की वस्तुता का निश्चय नहीं है। अर्थात् मुख-दर्पण के सम्बन्ध से पूर्व या अनन्तर मुखप्रतिबिम्ब की तद्व्य-
तिरिक्त वस्तुता किसी प्रमाण से कहीं पर भी संभावित नहीं हुई है। इस प्रकार राहु की वस्तुता को मानकर दाष्ट्रान्तिक
में अनुगुणता का अभाव (अननुगुणता) बताया गया है। किन्तु अब उस राहु में भी वस्तुता नहीं है अतः प्रतिबिम्ब
को वस्तुसिद्ध करने में उस अवस्तुभूत राहु का दृष्टान्त देना उचित नहीं है, यह बता रहे हैं। कुछ लोग पृथिवी की
छाया को ही राहु कहते हैं, उनके मतानुसार उस राहु का अवस्तुत्व ही निश्चित है। “मुखाभासो य आदर्श” इस
३७ वें श्लोक (पद्य) में उक्त युक्ति को यहाँ भी लगाया जा सकता है । ॥ ४० ॥
छायाक्रान्तेर्निषेधोऽयं न तु वस्तुत्वसाधकः ।
न ह्यर्थान्तरनिष्ठं सद्वाक्यमर्थान्तरं वदेत् ॥४१॥
छायेति—गुरु आदि पूज्य लोगों की छाया के अतिक्रमण का निषेध स्मृति ने किया है। वह निषेध भी
उसके वस्तुत्व को सिद्ध नहीं करता है, क्योंकि कोई भी वाक्य किसी एक अर्थ में स्थित होकर अन्य अर्थ को नहीं
बताता है ॥ ४१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कहें कि इसी प्रकरण के ३४ वें श्लोक 'वस्तुच्छाया स्मृतेः'—छाया की वस्तुतासिद्धि में स्मृति का प्रमाण
बताया है कि 'गुरु आदि की छाया का अतिक्रमण न करें'। किन्तु यह छायातिक्रमण का निषेध भी उसके वस्तुत्व का
साधक नहीं है। यदि उसे वस्तुत्व का साधक कहा जाय तो सोचना होगा कि वह साक्षात् उसका साधक है, या अर्थात्
साधक है। उक्त निषेधवाक्य को वस्तुत्वसाधक साक्षात् नहीं कह सकते, क्योंकि एक ही वाक्य को उभयार्थ मानने पर
वाक्यभेद होगा । 'एकस्य वाक्यस्य उभयार्थत्वे वाक्यभेदः'। अतः किसी एक अर्थ में स्थित हुआ वाक्य, अन्य अर्थ का
प्रतिपादन नहीं करता। अब उसे अर्थात् वस्तुत्वसाधक कहें तो यह द्वितीय पक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि निषेध तो
'प्राप्तिमात्रसापेक्ष' रहता है, अतः निषेध्यविषय में वस्तुत्व के न रहने से निषेध की अनुपपत्ति होने में कोई नियामक नहीं
है। अतः छायालंघनप्रतिषेधपरक वाक्य छाया की वस्तुता को नहीं बता रहा है ॥ ४१ ॥
१९८ उपदेशसाहस्री
माधुर्यादि च यत्कार्यमुष्णद्रव्याद्यसेवनात् ।
छायाया न त्वदृष्टत्वादपामेव च दर्शनात् ॥४२॥
माधुर्यति—उष्ण द्रव्य आदि का सेवन न करने के कारण छाया के माधुर्य आदि कार्य की प्रतीति हुआ
करती है, क्योंकि सन्तप्त शिला की छाया में माधुर्य की प्रतीति नहीं होती । माधुर्य की प्रतीति तो केवल जल में ही
होती है ॥ ४२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह जो कहा था कि छाया के माधुर्यादि कार्य को देखने से अर्थक्रियाकारिता के कारण छाया की वस्तुता
सिद्ध होती है, किन्तु वह भी अन्यथासिद्ध ही है। क्योंकि छाया में बैठे हुए व्यक्ति को छाया का जो माधुर्यादि कार्य
दिखाई देता है, वह भी उष्ण द्रव्यादि का सेवन न करने के कारण है। हेतुभूत छाया का वह माधुर्यादि कार्य नहीं है।
क्योंकि अत्यन्त प्रतप्त शिला की छाया में माधुर्य का अनुभव नहीं होता है, केवल जल में ही मधुरता की प्रतीति होती
है। उसमें कभी व्यभिचार नहीं होता है एवंच छाया में बैठे हुए व्यक्ति को आतप-संसर्ग न रहने के कारण और जल की
स्वाभाविक मधुरता की अभिव्यक्ति के कारण छाया में ही मधुरता का भ्रम होने लगता है ॥ ४२ ॥
आत्माभासाश्रयाश्चैवं मुखाभासाश्रया यथा ।
गम्यन्ते शास्त्रयुक्तिभ्यामाभासासत्त्वमेव च ॥४३॥
आत्मेति—जिस प्रकार मुख, उसका आभास और उसका आश्रय ये तीन विभक्त भासित होते हैं, उसी तरह
आत्मा, उसका आभास और उसका आश्रय भी हुआ करता है। किन्तु वस्तुतः आभास की असत्ता (अवास्तविकता) तो
शास्त्र और युक्ति से सिद्ध ही है ॥ ४३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिस प्रकार मुख, मुख का आभास, और मुखका आश्रय ये तीनों व्यवहार में पृथक्-पृथक् ज्ञात होते हैं,
उसी प्रकार आत्मा, आत्मा का आभास और आत्मा का आश्रय ये तीनों भी परस्पर विलक्षण प्रतीत होते हैं। किन्तु
परमार्थदृष्टि से नहीं, यह सब व्यावहारिक दृष्टि से है। वस्तुतः तो शास्त्र तथा युक्तियों के द्वारा तो आभास की असत्ता
(सत्ता का अभाव) ही सिद्ध होती है। 'आत्मा' तो त्वम् पद से लक्ष्य, चित् धातु है। वह अनादि अविद्या के कार्य में
प्रतिबिम्बित रहने से तदुपाधिस्थत्ववैशिष्ट्य जो जीवत्व है, वही 'आभास' है। अविद्या और उसकी कार्यरूप उपाधि ही
'आश्रय' है—यह 'त्वम्' पद का अर्थ बताया गया । "रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव"१, "इन्द्रोमायाभिः पुरुरूप ईयते"२,
"अनीशया शोचति मुह्यमानः३" तथा "एको वशी सर्वभूतान्तरात्मकं रूपं बहुधा यः करोति४" इत्यादि श्रुतियों से
और नित्य सिद्ध साक्षी आत्मा में बुद्ध्यादि एवं आगमापायी विषयान्तरस्वरूप दृश्य का अध्यास हुए विना उसका स्फुरण
और सत्ता ही उपपन्न नहीं हो पाती, इस युक्ति से एकमात्र प्रत्यगात्मा की ही सत्ता सिद्ध होती है। आभास आदि की
सत्ता नहीं सिद्ध हो रही है, वास्तव में आभास और उसके आश्रय की सत्ता का अभाव ही निश्चित होता है ॥ ४३ ॥
न दृशेरविकारित्वादाभासस्याप्यवस्तुतः ।
नाचित्त्वादहंकर्तुः कस्य संसारिता भवेत् ॥४४॥
नेति—अविकारी होने के कारण चैतन्यैकरस आत्मा में संसारित्व नहीं है, आभास तो अवस्तुरूप है,
इसलिए उसे भी संसारी नहीं कहा जा सकता उसी तरह अहङ्कर्ता, जड़ (अचेतन) होने के कारण उसे भी संसारी नहीं
कह सकते । ऐसी स्थिति में यह कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसारित्व किसका कहा जाय ? ॥ ४४ ॥
१. (बृ. उ. २।५।१९ तथा कठ. उ. ५।९।१०)
२. (बृ. उ. २।५।१९ तथा ऋ. सं. ६।४७।१७, जैमि० उ. ब्रा. १।४४।१)
३. (मुं. उ. ३।१।२, श्वे. उ. ४।७)
४. (कठ. उ. ५।१२)
तत्त्वमसिप्रकरणम् १९९
हृदयस्पर्शिनी
उपर्युक्त कथन के अनुसार तुम्हारे मत में संसार और मोक्ष का कोई आश्रय न रहने से उनकी अनुपपत्ति ही
रही। क्योंकि आत्मा या उसका आभास या उसका आश्रय, ये सम्मिलित होकर अथवा इनमें से कोई एक भी संसार
आदि का आश्रय नहीं कहा जा सकता। ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादिलक्षण विकाररूप उपचय को ही संसार कहते हैं।
और उसके आत्यन्तिक अपचय को मोक्ष कहते हैं। तथाच क्रमशः उन दोनों से संबन्ध रखने वाला विकारो कहा जायगा।
ऐसी स्थिति में चैतन्यैकरस दृशि में संसारिता नहीं बन सकेगी, क्योंकि वह तो अविकारी (कूटस्थ) है। उसी तरह आभास
में संसारिता नहीं बन सकेगी, क्योंकि पूर्वोक्त युक्ति से उसके अवस्तु होने का निश्चय हो चुका है, अतः जो वस्तु ही
नहीं है अर्थात् शून्य है, उसमें किसी प्रकार का अतिशय होना संभव ही नहीं है। आभास के आश्रयरूप अहंकर्ता अर्थात्
अहंकार में भी जडता (अचितित्व) होने से संसारिता नहीं बन सकेगी। ज्ञातृत्व-सुख-दुःखादि-भोक्तृत्वलक्षण संसार की
जडाश्रयता संभव नहीं है। अतः तुम्हारे मत में किसकी संसारिता होगी या मोक्ष होगा ? कहना होगा कि किसी का
नहीं, तब अनुभवविरोध होगा। अभिप्राय यह है कि अविकारी होने के कारण साक्षी का संसारित्व नहीं होगा, आभास
अवस्तुरूप होने के कारण संसारी नहीं होगा, और अहंकार जड़ होने से संसारी नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में
कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसारित्व किसका कहा जाय ? ॥ ४४ ॥
अविद्यामात्र एवातः संसारोऽस्त्वविवेकतः ।
कूटस्थेनात्मना नित्यमात्मवानात्मनोव सः ॥४५॥
अविद्येति—इसलिए केवल अविद्यामात्र (भ्रान्तिमात्र) ही संसार है। आत्मस्वरूप का विवेक न होने के
कारण वह अविद्या, कूटस्थ आत्मा की सत्ता से स्वयं अपने को ही सत्तावान् समझती रहती है, और यह समझती हुई
ही वह सर्वदा आत्मा में (उसके धर्मरूप में) अवभासित होती है। अर्थात् यह अविद्यारूप संसार, आत्मा में अवभासित
होता रहता है ॥ ४५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि संसार और मोक्ष का कोई आश्रय ही नहीं बन सकता तो वास्तविक संसार और मोक्ष किसी के
लिये भी नहीं है, ऐसा क्यों न कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि अविद्यामात्र ही संसार है, वह स्वप्न
के समान भ्रान्तिमात्र है। आत्मस्वरूप का ज्ञान न होने के कारण संसार उसमें अध्यस्त होता है। अतः कूटस्थ आत्मा की
सत्ता से सत्तावान् होकर सर्वदा आत्मा में उसके धर्मरूप से प्रतिभासित होता है। संसार अवस्तुभूत है तथापि आत्मा में
अपरोक्षतया (प्रत्यक्षतया) सत् रूप से भासित होता है, इसप्रकार भासित होने में निमित्त यही है कि वह आत्मा में
अध्यस्त है, अतः आत्मा की सत्ता से वह भी सत्तावान्-सा प्रतीत होता है ॥ ४५ ॥
रज्जुसर्पो यथा रज्ज्वा सात्मकः प्राग्विबेकतः ।
अवस्तुसन्नपि ह्येष कूटस्थेनात्मना तथा ॥४६॥
रज्जुसर्प इति—विवेक के पूर्व रज्जु में प्रतीयमान सर्प, रज्जु की सत्ता से जिस प्रकार सत्तावान् प्रतीत
होता है, उसी प्रकार यह संसार (अविद्या) अवस्तुरूप होने पर भी कूटस्थ आत्मा की सत्ता से सत्तावान् प्रतीत होता
रहता है ॥ ४६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उक्त कथन को दृष्टान्त से स्पष्ट कर रहे हैं। जिस प्रकार विवेक के पूर्व रज्जु में प्रतीत होनेवाला सर्प,
रज्जु की सत्ता से सत्तावान् होता है, उसी प्रकार संसार अवस्तुरूप रहने पर भी वह कूटस्थ आत्मा की सत्ता से
सत्तावान् प्रतीत होता है ॥ ४६ ॥
आत्माभासाश्रयश्चात्मा प्रत्ययैः स्वैर्विकारवान् ।
सुखी दुःखी च संसारी नित्य एवेति केचन ॥४७॥
२०० उपदेशसाहस्री
आत्मेति—आत्मा ही आत्माभास (जीवत्व) का आश्रय है। वही अपने धर्मभूत प्रत्ययों के कारण
विकारवान् (विकारी) तथा सुखी, दुःखी और संसारी प्रतीत होता है। तथापि कोई वादी उसे नित्य ही कहा करते
हैं ॥ ४७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
एक अन्य मत से कल्पनालाघव प्रदर्शित करते हुए शंका करते हैं—आत्मा ही आत्माभास (जीव) का
आश्रय है। अतः वही अपने धर्मभूत प्रत्ययों के कारण विकारी तथा सुखी, दुःखी और संसारी होता है। तथापि कतिपय
वादीगण उसे 'नित्य ही' कहते हैं। क्योंकि तरंगादिकों से समुद्र के विकारी होने पर भी उसमें स्थैर्य (स्थिरता) दृष्टिगत
होती ही है। अतः आभास और तदाश्रयात्मना भेदकल्पना करने में गौरव होता है। इसलिये आत्मा ही संसारी है, यह
कल्पना क्षुद्र होगी, ऐसा कुछ लोगों का कथन है ॥ ४७ ॥
आत्माभासापरिज्ञानाद्याथात्म्येन विमोहिताः ।
अहंकर्तारमात्मेति मन्यन्ते ते निरागमाः ॥४८॥
आत्मेति—आत्मा और आत्माभास का ठीक-ठीक ज्ञान न होने से जो लोग मोह से ग्रस्त रहते हैं, तथा
अहङ्कार को ही आत्मा मानते हैं, वे लोग शास्त्रबाह्य हैं अर्थात् उन्हें शास्त्र के रहस्य का ज्ञान नहीं है ॥ ४८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इसी प्रकरण के 'संभाव्यो गोचरे शब्दः' (१८।२४ वें) श्लोक से यह बताया था कि आत्मा को संसारी कहने
में कोई प्रमाण नहीं है, उसे नहीं भूलना चाहिये। अतः एकदेशियों की कल्पना केवल उत्प्रेक्षामूलक ही है, प्रमाणमूलक
नहीं है। जो लोग आत्मा और आत्माभास का यथार्थ ज्ञान न होने के कारण मोहग्रस्त हो रहे हैं और अहंकार को ही
आत्मा समझ रहे हैं, वे शास्त्रबाह्य हैं, अर्थात् आगमरहस्यपरिचयशून्य हैं। “निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं
निरञ्जनम्१”, “साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च२”, “कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव३, “अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः४”, इत्यादि
नित्यशुद्धत्वादिपरक श्रुतिसंदर्भ को तथा “अनीशया शोचति मुह्यमानः५”, “अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः६”, “अनृतेन हि
प्रत्यूढाः७” इत्यादि श्रुतिसन्दर्भ को जिन लोगों नहीं देखा है, वे आत्मा और आत्माभास में विवेक न कर पाने के कारण,
अविद्या से संसारी प्रतीत होनेवाले अहंकार को ही अपनी कल्पना से आत्मा समझते हैं ॥ ४८ ॥
संसारो वस्तुसंस्तेषां कर्तृत्वभोक्तृत्वलक्षणः ।
आत्माभासाश्रयाज्ञानात् संसरन्त्यविवेकतः ॥४९॥
संसार इति—उनकी दृष्टि में कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसार भी वस्तुतः सत् है। तथा आत्मा और आत्माभास
तथा आभास का आश्रय इनका ज्ञान न रहने से अविवेक के कारण वे जन्म-मृत्युरूप संसार को प्राप्त होते रहते
हैं ॥ ४९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उन मोहग्रस्त लोगों के मत में कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसार भी परमार्थतः सत् है, तथा च “नासतो विद्यते
भावो नाभावो विद्यते सतः८” इस स्मृति के अनुसार संसार अविनाशी है, अतः उनके मत में मोक्ष की असिद्धि है।
१. (श्वे. उ. ६।१९)
२. (श्वे. उ. ६।११)
३. (बृ. उ. ४।५।१३)
४. (बृ. उ. ४।३।९)
५. (मुं. उ. ३।१।२, श्वे. उ. ४।७)
६. (मुं. उ. १।२।८, कठ. उ. २।५)
७. (छां. उ. ८।३।२)
८. (भ. गी. २।१६)
तत्त्वमसिप्रकरणम् २०९
यदि मोक्ष की अप्राप्ति के भय से संसार को वे भी अवस्तुरूप कहें तो हमारे मत को ही उन्होंने मान लिया, यही कहना
होगा। किन्तु मोहग्रस्त होने के कारण आत्मा, आभास और आभास के आश्रय का ज्ञान न होने के कारण वे अविवेक के
अधीन होकर जन्म-मृत्यु रूप संसार को प्राप्त होते रहते हैं ॥ ४९ ॥
चैतन्याभासता बुद्धेरात्मनस्तत्स्वरूपता ।
स्याच्चेत्तं ज्ञानशब्दैश्च वेदः शास्तीति युज्यते ॥५०॥
चैतन्येति—बुद्धि में चैतन्य का आभास और आत्मा का चित्स्वरूपत्व माना जाता है। चैतन्य तो आत्मा
का स्वरूप है, धर्म नहीं है। अचेतन बुद्धि में आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ने से वह चैतन्यधर्मवती प्रतीत होती है। इसलिए
यह उचित ही कहा जाता है कि वेद ज्ञानमय शब्दों के द्वारा उसका (आत्मा का) उपदेश करते हैं। केवल आत्मा
अथवा बुद्धि में शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि आत्मा निर्धर्मक है और बुद्धि जड़ है। अतः बुद्धि में आत्मा
का आभास माना जाता है। अतः चिदाभासविशिष्ट बुद्धि ही वेद के उपदेश को ग्रहण करती है। उसी के द्वारा लक्षणा
से वेद आत्मा का बोध कराते हैं ॥ ५० ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व श्लोक के द्वारा यह बताया गया कि आत्मा, आभास, और आश्रय इनका विवेक न होने से बन्ध होता
है और उनका विवेक होनेपर मोक्ष होता है। अब यह बता रहे हैं कि आभास का स्वीकार करने पर एक अन्य लाभ
होगा : 'चैतन्य' आत्मा का धर्म नहीं है, वह तो उसका स्वरूप ही है। किन्तु 'बुद्धि' जड़ है। उसमें आत्मा का
प्रतिबिम्ब पड़ने से वह चैतन्यधर्मवती अवगत होती है। यदि बुद्धि में आत्मा का आभास न स्वीकार किया जाय,
तो केवल आत्मा या बुद्धि में शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि 'आत्मा' निर्धर्मक और 'बुद्धि' जड़ है। अतः
चिदाभासविशिष्ट बुद्धि ही वेद के उपदेश को ग्रहण करती है। और उसी के द्वारा लक्षणा से वेदवाक्य, आत्मा का ज्ञान
कराता है। अतः आभास का अपलाप नहीं किया जा सकता । इस कारण बुद्धि (अन्तःकरण) की चैतन्याभास्यता
और आत्मा की चैतन्यस्वरूपता मानने पर ही वेद, आत्मा को ज्ञान, सत्य, अनन्त, आनन्द आदि शब्दों से बता पाता है ।
प्रकाशस्वभाव वस्तु जहाँ प्रतिबिम्बित होती है, वहाँ उसके प्रतिबिम्बित होने में प्रकाशाभासोदय ही हेतु होता है।
जैसे जल में प्रतिबिम्बित सविता, उसी तरह बुद्धि में जब चैतन्य प्रतिबिम्बित होता है, तब उसमें चित्प्रकाशोदय ही
हेतु होता है । तभी तो साभास बुद्धि में गृहीत सम्बन्ध के कारण ज्ञानादि शब्दों के द्वारा वेद, आत्मा को लक्षणा की
सहायता से बोधन कर पाता है, अन्यथा निर्धर्मक आत्मा में शब्दप्रवृत्ति हो ही नहीं पायेगी, तब वह वेदान्तवेद्य भी
कैसे कहा जायगा ? अन्य कोई प्रमाण भी उसे नहीं बता पाता, उस स्थिति में आत्मा का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं
हो सकेगा। अतः आभास को स्वीकार करना ही होगा ॥ ५० ॥
प्रकृतिप्रत्ययार्थौ यौ भिन्नावेकाश्रयौ यथा ।
करोति गच्छतीत्यादौ दृष्टौ लोकप्रसिद्धितः ॥५१॥
प्रकृतीति—प्रकृति और प्रत्यय के अर्थ भिन्न-भिन्न होने पर भी उनका आश्रय एक ही रहता है, उसी प्रकार
लोकप्रसिद्धि के अनुसार करोति, गच्छति इत्यादि में भी भिन्न-भिन्न अर्थ हैं, किन्तु उनका आश्रय एक ही है ॥ ५१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आभास के स्वीकार करने पर यद्यपि आत्मा में वेद की प्रवृत्ति का होना उपपन्न हो जाता है, तथापि
उसमें 'जानाति' आदि शब्दों की प्रवृत्ति न हो पायेगी, तब व्यवहार ही नहीं चल सकेगा । अथवा 'ज्ञान' शब्द की
व्युत्पत्ति करने पर आत्मा में उसकी मुख्यवृत्तिता तो संभव हो ही जाती है, अतः उसे साभास बुद्धिवाचक बताकर
आत्मा में लक्षणा से उसकी वृत्ति की कल्पना क्यों की जा रही है ? ऐसी शंका उपस्थित कर, उसका समाधान दे
रहे हैं। जैसे—'देवदत्तो गच्छति' इस वाक्य के 'गच्छति' पद में दो अंश हैं, एक 'गम्' और दूसरा 'ति' । इनमें 'गम्'
धातु प्रकृति है, उसका अर्थ गमन क्रिया है। तथा 'ति' प्रत्यय कर्तृत्व को सूचित करता है। इस प्रकार प्रकृति और
प्रत्यय का अर्थ भिन्न रहने पर भी उन दोनों का आश्रय एकमात्र देवदत्त है । इसी प्रकार 'जानाति' 'करोति' आदि
में भी एकमात्र 'आत्मा' को ही आश्रय समझना चाहिये ॥ ५१ ॥
२६
२०२ उपदेशसाहस्री
नानयोद्व्यर्थाश्रयत्वं च लोके दृष्टं स्मृतौ तथा ।
जानात्यर्थेषु को हेतुर्द्वयाश्रयत्वे निगद्यताम् ॥५२॥
नानयोरिति—लोकव्यवहार और व्याकरणस्मृति में भी प्रकृति-प्रत्ययों का द्वयाश्रयत्व (दो आश्रय) नहीं
देखा गया, तब 'जानाति' पदार्थ के दो आश्रयवाला होने में ही क्या हेतु हो सकता है ? उसे बताओ ॥ ५२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रकृत्यर्थ और प्रत्ययार्थ दोनों का एकाश्रयत्व जैसे दृष्ट है, वैसे ही क्वचित् भिन्नाश्रयत्व भी क्यों नहीं
हो सकेगा ? उत्तर यही है कि लोकव्यवहार में तथा व्याकरण-स्मृति में भी प्रकृति-प्रत्ययों का द्वयाश्रयत्व (दो आश्रय)
नहीं दिखाई देते । अतः 'जानाति' पदार्थ के दो आश्रय मानने में ही कौन हेतु है ? उसे बताओ ॥ ५२ ॥
आत्माभासस्तु तिङ्वाच्यो धात्वर्थश्च धियः क्रिया ।
उभयं चाविवेकेन जानातीत्युच्यते मृषा ॥५३॥
आत्माभास इति—आत्मा का आभास 'तिङ्' प्रत्यय का वाच्य है तथा धातु का अर्थ 'बुद्धि की क्रिया' है ।
ये दोनों प्रकृति और प्रत्यय, आत्मा और आत्माभास के अविवेक के कारण 'जानाति' के रूप में एक आश्रयवाले कहे
जाते हैं, किन्तु वह मिथ्या है ॥ ५३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रश्नकर्ता पूछता है कि प्रकृति-प्रत्यय के एकाश्रयत्वमात्र का निषेध कर रहे हो या परमार्थतः उनका
एकाश्रयत्व नहीं है, यह बता रहे हो ? सिद्धान्ती उत्तर देता है कि 'जानाति' 'करोति' आदि पदों में बुद्धिगत आत्मा का
आभास, 'तिङ्' प्रत्यय का वाच्य है, तथा 'धातु' का अर्थ (प्रकृत्यर्थ), बुद्धि की वृत्तिरूपा क्रिया है । तथाच आत्माभास
और बुद्धि ये दोनों (प्रकृति-प्रत्यय) आत्मा और आत्माभास के अविवेक के कारण मिथ्या ही—'जानाति' इत्यादि रूप से
एक आश्रय वाले कहे जाते हैं। सिद्धान्ती के कहने का तात्पर्य यह है कि तुम जो एकमात्र आत्मा को 'जानाति, करोति'
आदि पदों के अर्थों का आश्रय बताते हो, वह अध्यास के कारण है, वास्तव में नहीं है। क्योंकि 'बुद्धिवृत्ति' क्रियारूप है
और 'बुद्धिगत चिदाभास' प्रत्ययरूप है, उन दोनों में अविवेकवशात् आत्मत्व का अध्यास होने से ही आत्मा को 'जानाति'
आदि का आश्रय कहा जाता है ॥ ५३ ॥
न बुद्धेरवबोधोऽस्ति नात्मनो विद्यते क्रिया ।
अतो नान्यतरस्यापि जानातीति च युज्यते ॥५४॥
न बुद्धेरिति—क्योंकि बुद्धि में 'बोध' (ज्ञान) नहीं है और आत्मा में क्रिया (कर्म) नहीं है। अतः दोनों में
से किसी के लिए भी 'जानाति' यह प्रयोग करना उचित नहीं कहा जा सकता ॥ ५४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
द्वितीय विकल्प का उत्तर यह है कि ठीक-ठीक विचार करने पर ज्ञात होता है कि क्रियावाली बुद्धि का
अवबोध (चित्प्रकाश) नहीं है, तथा अवबोधस्वभाव आत्मा की क्रिया नहीं है । अतः दोनों में से किसी के लिये भी
'जानाति, अवगच्छति' आदि कहना उचित नहीं है । तथाच लोकव्यवहार तो प्रतीति के बल पर चलता है, अतः
'जानाति' आदि में आरोपित ऐक्यविषयता समझ लेने से लोकविरोध भी नहीं और स्मृतिविरोध भी नहीं होता है ॥ ५४ ॥
नाऽप्यतो भावशब्देन ज्ञप्तिरित्यपि युज्यते ।
न ह्यात्मा विक्रियामात्रो* नित्य आत्मेति शासनात् ॥५५॥
- मात्रं—पाठान्तरम् ।
१. तुलना कीजिये—(तै. उ. वार्तिक २।१।९०-९४, गद्य प्र. वाक्य ७६-८५ ।)
तत्त्वमसिप्रकरणम् २०३
नापीति—इसीलिए 'ज्ञप्तिः ज्ञानम्' इस भावव्युत्पत्ति के द्वारा भी आत्मा के अर्थ में 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग
नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'आत्मा नित्य है'—यह उपदेश श्रुति ने दिया है। अतः आत्मा को विकारमात्र नहीं कहा
जा सकता ॥ ५५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'ज्ञ' की व्युत्पत्ति 'जानातीति ज्ञः' अर्थात् जो जानता है—ज्ञान का कर्ता है, वह 'ज्ञ' है—ऐसी कर्तृव्युत्पत्ति
(कर्तृवाच्य व्युत्पत्ति) करके 'आत्मा' के लिये 'जानाति' पद का प्रयोग नहीं कर सकते, क्योंकि 'आत्मा' निर्धर्मक है। तथा
'जानाति' पद का प्रयोग 'बुद्धि' के लिये भी नहीं कर सकते, क्योंकि 'बुद्धि' जड़ है। और बुद्धि तथा आत्मा मिलकर
भी 'जानाति' आदि क्रिया के कर्ता नहीं हो सकते, क्योंकि तम और आलोक (अंधकार और प्रकाश) के समान जड़ और
अजड़ (चेतन) का ऐक्य नहीं हो सकता। और न ही दोनों में से किसी एक की सन्निधि के कारण अन्यतर में
उभयाश्रयता संगत हो पाती है, क्योंकि अध्यास के बिना सन्निधि नहीं देखी जाती। उसी प्रकार 'ज्ञप्तिः ज्ञानम्' इस
भावव्युत्पत्ति (भाववाच्यव्युत्पत्ति) के द्वारा भी 'आत्मा' के लिये 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता। क्योंकि
'भाव' शब्द धात्वर्थमात्र का वाचक होता है। अतः यदि आत्मा को भाववाचक शब्द का वाच्य कहा जाय तो निश्चय ही
उसे क्रियात्मक मानना होगा, क्रियात्मक होने से उसे विकारी कहना होगा, और विकारी होने पर वह 'अनित्य' होगा।
किन्तु 'आत्मा' को तो नित्य माना जाता है, इसीलिये उसे निर्विकार कहा जाता है। अतः उसे भाव शब्द का वाच्य नहीं
कह सकते। एवं च 'भाव' शब्द धात्वर्थसामान्य का वाचक होने से 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस व्युत्पत्ति से भी 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग
आत्मा में संगत नहीं होता। क्योंकि क्रियामात्र रहने पर पारतन्त्र्य होने से अनित्यता का प्रसंग प्राप्त होगा, वह तो ठीक
न होगा, क्योंकि १श्रुति ने 'आत्मा' को नित्य बताया है, वह विकारमात्र नहीं है ॥ ५५ ॥
न बुद्धेर्बुद्धिवाच्यत्वं करणं न ह्यकर्तृकम् ।
नापि ज्ञायत इत्येवं कर्मशब्देनिरुच्यते* ॥५६॥
नेति—'बुध्यते अनया इति बुद्धिः'—ऐसी करणवाच्य व्युत्पत्ति के द्वारा भी 'आत्मा' के अर्थ में बुद्धि (ज्ञान)
शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते, क्योंकि 'करण' कभी भी कर्ता के बिना नहीं होता। अतः 'बुद्धि' शब्द का वाच्य 'बुद्धि'
ही है, 'आत्मा' नहीं। उसी तरह 'ज्ञायते इति ज्ञानम्'—इस कर्मवाच्य व्युत्पत्ति के द्वारा भी 'आत्मा' को नहीं बताया
जा सकता, क्योंकि वह स्वयं अपना 'कर्म' बने, यह सम्भव नहीं है ॥ ५६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जैसे 'जानातीति ज्ञः' इस कर्तृव्युत्पत्ति से और 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस भावव्युत्पत्ति से भी ज्ञान शब्द का वाच्य
आत्मा नहीं होता, वैसे ही 'ज्ञायते अनेन' इस करणव्युत्पत्ति से और 'ज्ञायते इति ज्ञानम्' इस कर्मव्युत्पत्ति से भी ज्ञान
शब्द का वाच्य आत्मा नहीं हो सकता। 'बुध्यते अनया इति बुद्धिः' इस करण व्युत्पत्ति से बुद्धि शब्द का वाच्य आत्मा
नहीं है। किन्तु बुद्धि ही वाच्य है। क्योंकि कर्ता के बिना करण नहीं होता। तथा 'ज्ञायते इति ज्ञानम्' इस कर्मव्युत्पत्ति
के द्वारा भी आत्मा का निरूपण नहीं किया जा सकता। बुद्धि शब्द, ज्ञान का पर्याय है। अतः 'बुध्यते अनया' अथवा
'ज्ञायते अनया'—इसके द्वारा जाना जाता है इसलिये वह ज्ञान है—ऐसी करणव्युत्पत्ति करें तो उसका कोई कर्ता होना
चाहिये। किन्तु ऐसा कोई पदार्थ नहीं है, जिसका करण आत्मा हो सके। अतः करणवाच्य 'बुद्धि' या 'ज्ञान' शब्द का
प्रयोग भी केवल अन्तःकरण के लिये ही हो सकता है। यदि 'ज्ञायते इति ज्ञानम्'—जाना जाता है, इसलिये ज्ञान है—ऐसी
कर्मव्युत्पत्ति करें तो स्वयं ही अपना कर्म बने—ऐसा संभव नहीं है। इसलिये 'आत्मा' कर्मव्युत्पत्ति का भी विषय नहीं
हो सकता। यदि 'ज्ञायते अस्मिन् इति ज्ञानम्'—इसमें जाना जाता है, इसलिये वह ज्ञान है—ऐसी अधिकरण व्युत्पत्ति
करें तो ज्ञात घटादि के अधिकरण भूतलादि में भी 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग होगा। यदि कहें कि ज्ञातृत्व होते हुए ज्ञेयाधार
होने पर ही 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग हो सकता है तो जिस प्रकार भूतलादि में जड़ होने के कारण ज्ञातृत्व नहीं है, उसी
प्रकार आत्मा में कोई धर्म न होने के कारण ज्ञातृत्व का अभाव है ॥ ५६ ॥
- निरुप्यते०—पाठान्तरम् । १. (कठ. उ. २।१८, ३।१३, मुं. उ. १।६, नृ. उ. ९)
२०४ उपदेशसाहस्री
न येषामेक एवात्मा निर्दुःखोऽविक्रियः सदा ।
तेषां स्याच्छब्दवाच्यत्वं ज्ञेयत्वं चात्मनः सदा ॥५७॥
नेति—जिनके मत में 'आत्मा' एक है, सर्वदा ही निर्दुःख और निर्विकार है, उनके अनुसार आत्मा का
शब्दवाच्यत्व और ज्ञेयत्व होना कदापि सम्भव नहीं है ॥ ५७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकार मुख्यवृत्ति से 'आत्मा' जानादि शब्दों का वाच्य नहीं है, यह कहने पर यदि कहें कि यह तो
तुम्हारे मत में भी होगा, तो उसका इष्टापत्ति के द्वारा परिहार करते हैं। जिनके मत में सर्वदा एक ही निर्दुःख और
निर्विकार आत्मा है, उनके सिद्धान्त के अनुसार आत्मा का शब्दवाच्य होना और ज्ञेय होना कभी संभव नहीं है। अथवा
आत्मा में बताये गये मुख्य शब्दप्रवृत्ति के अभाव को ही व्यतिरेक के द्वारा बता रहे हैं—जिनके मत में एक ही अर्थात्
यथानिर्दिष्ट आत्मा नहीं है, उनके मत में वह शब्द से वाच्य और ज्ञेय सर्वदा हो सकता है। क्योंकि वहाँ कर्त्रादि
व्युत्पत्तियों का संभव है। किन्तु श्रौत एकात्मवाद में उसका संभव नहीं है ॥ ५७ ॥
यदाऽहंकर्तुरात्मत्वं तदा शब्दार्थमुख्यता ।
नाशनायादिमत्त्वात्तु श्रुतौ तस्यात्मतेष्यते ॥५८॥
यदेति—जब अहङ्कार को 'आत्मा' माना जाय, तभी शब्दार्थ की मुख्यता हो सकती है। किन्तु वह भूख-
प्यास से युक्त है। इसलिए श्रुति के द्वारा उसका आत्मत्व नहीं माना जाता ॥ ५८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कहें कि शब्दार्थ की मुख्यता के लिये आत्मा को सविकार ही मान लिया जाय, इस आशंका का
उत्तर दे रहे हैं कि शब्दार्थ की मुख्यता तो तभी हो सकती है, जब अहंकार को आत्मा माना जाय। वह अहंकार तो
क्षुधा-पिपासादि से युक्त है। अतः उसे श्रुति ने 'आत्मा' शब्द से नहीं कहा। 'अहं कर्ता' इस प्रकार अभिमन्यमान आकार
को आत्मा कहा ही नहीं जा सकता। क्योंकि श्रुति¹ ने तो उसे अशनाया आदि से परे बताया है। अतः ज्ञान आदि
शब्दों की आत्मा में साक्षात् प्रवृत्ति नहीं होती, इसीलिये आभास द्वारा उनकी प्रवृत्ति बताई गई है ॥ ५८ ॥
हन्त तर्हि न मुख्यार्थो नापि गौणः कथंचन ।
जानातीत्यादिशब्दस्य गतिर्वाच्या तथापि तु ॥५९॥
हन्तेति—हे भगवन् ! तब तो 'जानाति' आदि शब्द का मुख्यार्थ या गौणार्थ कुछ भी सम्भव नहीं है,
तथापि उसकी कोई न कोई गति तो बतानी ही होगी ॥ ५९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शब्द के मुख्यार्थ के अभाव में गौण अर्थ भी नहीं हो सकेगा। अर्थात् जानाति आदि शब्दों की आत्मा में
और अन्यत्र भी मुख्यता यदि संभव नहीं है तो अन्य वृत्ति से भी आत्मा में उसकी प्रवृत्ति अनुपपन्न ही होगी। क्योंकि
जो अमुख्य है उसका अन्यत्र उपचार भी संभव नहीं होता है। अतः जानाति आदि शब्द का मुख्यार्थ या गौणार्थ कुछ
भी संभव नहीं है, तथापि उसकी कोई गति तो बतानी ही चाहिये ॥ ५९ ॥
शब्दानामयथार्थत्वे वेदस्याप्यप्रमाणता ।
सा च नेष्टा ततो ग्राह्या गतिरस्य प्रसिद्धितः ॥६०॥
शब्दानामिति—इस प्रकार शब्दों की अयथार्थता स्वीकार करने पर वेद को अप्रामाण्य प्राप्त होगा, किन्तु
वह अभीष्ट नहीं है। अतः लोकप्रसिद्धि के माध्यम से ही उनकी गति समझनी चाहिए। अर्थात् लोकव्यवहार में जो शब्द
जिस अर्थ में प्रसिद्ध हो, वही उस शब्द का वाच्य समझना चाहिए ॥ ६० ॥
१. (बृ. उ. ३।५।१)
तत्त्वमसिप्रकरणम् २०५
हृदयस्पशिनी
यदि जानाति आदि लौकिक शब्दों की कोई गति नहीं बताई जायगी तो केवल लौकिक शब्दों की ही
अप्रमाणता नहीं होगी अपितु वेद की भी अप्रमाणता सिद्ध होगी। वैदिक शब्द भी लोकसिद्ध व्युत्पत्ति की ही अपेक्षा
रखते हैं। इस प्रकार वेद का अप्रामाण्य तो किसी को अभीष्ट नहीं है। आत्मा के विषय में तो वेद का ही प्रामाण्य सभी
को अभीष्ट है। अतः वेदप्रामाण्यांगीकार के लोभ से ही इन लौकिक शब्दों की गति बतानी ही होगी। एवं च लोक-
प्रसिद्धि से ही उन शब्दों की गति स्वीकार करनी चाहिये। अर्थात् लोकव्यवहार में जो शब्द जिस अर्थ में प्रसिद्ध है, उसी
को उसका अर्थ मानना चाहिये ॥ ६० ॥
प्रसिद्धिमूढलोकस्य यदि ग्राह्या निरात्मता।
लोकायतिकसिद्धान्तः *स चानिष्टः प्रसज्यते ॥६१॥
प्रसिद्धिरिति-यदि मूर्ख लोगों को प्रसिद्धि का स्वीकार करते हैं, तो लोकायतिक (नास्तिक) के देहात्मवाद
का सिद्धान्त प्रसक्त होगा, जो किसी को अभीष्ट नहीं है ॥ ६१ ॥
हृदयस्पशिनी
पूर्वपक्षवादी ने जो ऊपर कहा कि 'जानाति' आदि शब्दों की गति को लोकप्रसिद्धि से ही समझनी चाहिये ।
किन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि लौकिक शब्दों की गति जानने के लिये प्राकृत पुरुषों की प्रसिद्धि का स्वीकार
किया जाय, या पाणिनि आदि अभियुक्त (विद्वान्) को प्रसिद्धि को माना जाय ? उनमें प्रथम प्रसिद्धि का खण्डन
करते हैं-यदि प्राकृत (मूर्ख) पुरुषों की प्रसिद्धि को मानते हैं तो देहात्मप्रसिद्धि का भी अभ्युपगम हो जाने से नास्तिकों
के अनात्मवाद का सिद्धान्त प्रसक्त होता है। किन्तु वह किसी को अभीष्ट नहीं है। क्योंकि अज्ञानी लोग तो देहादि को ही
आत्मा मानते हैं ॥ ६१ ॥
अभियुक्तप्रसिद्धिश्चेत्पूर्ववद्दुर्विवेsingle।
गतिशून्यं न वेदोऽयं प्रमाणं संवदत्युत ॥६२॥
अभियुक्तति-यदि अभियुक्तों (पण्डितों) के प्रसिद्ध व्यवहार का ग्रहण करते हैं, तो आत्मा और बुद्धि में
किसका ज्ञातृत्व है ? यह विवेक करना कठिन है। प्रमाणभूत वेद भी गतिशून्य के समान आत्मा के ज्ञातृत्व का अनुवाद
नहीं कर सकता ॥ ६२ ॥
हृदयस्पशिनी
द्वितीय पक्ष का अनुवाद करके उसका भी उत्तर दे रहे हैं-यदि पाणिनि आदि विद्वानों की प्रसिद्धि का
स्वीकार करते हैं तो पूर्ववत् (आत्मा और बुद्धि इनमें से किसका ज्ञातृत्व है इस बात का) विवेक करना कठिन है, क्योंकि
पूर्वोक्त दोषों की प्रसक्ति होगी। यदि कहें कि गतिशून्य के समान आत्मा के ज्ञातृत्व का अनुवाद वेद करेगा, तो वह भी
ठीक नहीं है। क्योंकि वेद प्रमाण हैं, अतः प्रमाणभूत वेद आत्मा के ज्ञातृत्व का गतिशून्य के समान अनुवाद नहीं
कर सकता ॥ ६२ ॥
†आदर्शमुखसामान्यं मुखस्येष्टं हि मानवैः।
मुखस्य प्रतिबिम्बो हि मुखाकारेण दृश्यते ॥६३॥
आदर्श इति-शीशे में प्रतिफलित हुए मुख के साथ अपने ग्रीवास्थ मुख की समानता समझते हैं। मुख के
प्रतिबिम्ब को ही अपने मुख के रूप में देखते हैं ॥ ६३ ॥
हृदयस्पशिनी
लौकिक 'जानाति' आदि शब्दों की गति लगाने की पद्धति को बता रहे हैं। चिदात्मा में ही 'जानाति'
आदि शब्दों का औपाधिक प्रयोग संभव हो सकता है, उसे दृष्टान्त देकर समझाते हैं। लोग दर्पण में प्रतिबिम्बित मुख
के साथ ग्रीवास्थ मुखबिम्ब की समानता (एकता) समझते हैं, किन्तु वहाँ मुख का प्रतिबिम्ब ही मुख के रूप में देखा
- सा चानिष्टा० - पाठान्तरम् । † आदर्श० - पाठान्तरम् ।
२०६ उपदेशसाहस्री
जाता है। तात्पर्य यह है कि आदर्श में जो मुख का प्रतिबिम्ब देखते हैं, वह औपाधिक है और वह ग्रीवास्थ मुख से सर्वथा
भिन्न है। तथापि उससे एकता (समानता) होने के कारण लोगों को 'यह मेरा मुख है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। उसी
प्रकार यद्यपि आत्मा और आत्माभास परस्पर भिन्न हैं, तथापि उनका विवेक न होने के कारण साधारण लोगों को
'आत्माभास' में ही आत्मत्व का भ्रम होता है, जिससे वे लोग आत्मा में उसके कर्तृत्वादि का आरोप करते
रहते हैं ॥ ६३ ॥
यत्र यस्यावभासस्तु तयोरेवाविवेकतः ।
जानातीति क्रियां सर्वो लोको वक्ति स्वभावतः ॥ ६४॥
यत्रेति—जिसमें जिसका अवभास होता है, उन दोनों पदार्थों के अविवेक से ही सब लोग स्वाभाविक रूप
से 'जानाति' आदि क्रिया का प्रयोग किया करते हैं ॥ ६४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जैसे कल्पित मुख और वास्तविक मुख दोनों के परस्पर अविवेक से 'मलिनं मुखं, अल्पं मुखं, वक्रं मुखं' आदि
औपाधिक व्यवहार होते हैं, उसी तरह आत्मा में भी ज्ञातृत्वादि व्यपदेश (व्यवहार) उपाधि-निबन्धन ही है। अर्थात्
चिदाभास की उपाधिरूप बुद्धि के कर्तृत्वादि धर्मों का आत्मा में आरोप किया जाता है ॥ ६४ ॥
बुद्धेः कर्तृत्वमध्यक्ष्य जानातीति ज्ञ उच्यते ।
तथा चैतन्यमध्यक्ष्य ज्ञातृत्वं बुद्धेरिहोच्यते ॥६५॥
बुद्धेरिति—बुद्धि के कर्तृत्व का आत्मा में अध्यास (आरोप) करके ही 'आत्मा जानता है'—यह कहा जाता
है, और बुद्धि में चैतन्य का अध्यास (आरोप) करके उसका 'ज्ञत्व' (ज्ञानवत्त्व) कहा जाता है ॥ ६५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अवभास, आभास, प्रतिबिम्बभाव ये सभी समानार्थक हैं। इनके द्वारा आत्मा-अनात्मा के अन्योन्य
धर्माध्यास से 'जानाति' आदि शब्दों का व्यवहार होता रहता है। बुद्धि और आत्मा का परस्पर तादात्म्याध्यास
होने पर अन्योन्य धर्मों का संकर होने से 'आत्मा जानाति', 'अहं जानामि' आदि व्यवहार होते हैं। आत्मा तो चेतन है
और बुद्धि जड़ है। आत्मा में जड़ बुद्धि के कर्तृत्वादि धर्म का आरोप करके उसे 'जानाति' शब्द द्वारा 'ज्ञ' कहा जाता है।
उसी तरह बुद्धि में आत्मचैतन्य का अध्यास (आरोप) होता है, इस कारण उसे भी 'ज्ञ' कहा जाता है ॥ ६५ ॥
स्वरूपं चात्मनो ज्ञानं नित्यं ज्योतिःश्रुतेर्यतः ।
न बुद्ध्या क्रियते तस्मान्नात्मनान्येन वा सदा ॥६६॥
स्वरूपमिति—'ज्ञान' आत्मा का स्वरूप है। इसलिये वह नित्य है। क्योंकि श्रुति ने उसे (आत्मा को)
स्वयंज्योति कहा है। अतः बुद्धि के द्वारा आत्मा में 'ज्ञान' को उत्पन्न नहीं किया जाता, और उसी तरह आत्माके द्वारा
अथवा अन्य किसी इन्द्रिय आदि के द्वारा भी उसको उत्पन्न नहीं किया जाता ॥ ६६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कहें कि बुद्धि आदि के द्वारा तो आत्मा में ज्ञान उत्पन्न किया जाता है, तब यह कैसे कह रहे हैं कि
आत्मचैतन्य का बुद्धि में आरोप (अध्यास) किया जाता है ? इसका समाधान यह है कि बृहदारण्यक श्रुति १ ने बताया
है—'ज्ञान' आत्मा का स्वरूप है। इसी को बताने वाली अन्यान्य श्रुतियाँ २ भी हैं। अतः ज्ञान नित्य है। इससे यह
प्रतीत होता है कि बुद्धि के द्वारा ज्ञान उत्पन्न नहीं किया जाता। तथा आत्मा या अन्य किसी चक्षुरादि के द्वारा भी
उसकी कभी उत्पत्ति नहीं होती है ॥ ६६ ॥
१. "तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।४।१६)
२. "आत्मैवास्य ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।३।६), "अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।३।९), “साक्षी चेता—
(श्वे. उ. ६।११)
तत्त्वमसिप्रकरणम् २०७
देहेऽहंप्रत्ययो यद्वज्जानातीति च लौकिकाः।
वदन्ति ज्ञानकर्तृत्वं तद्वद्बुद्धेस्तथात्मनः॥६७॥
देह इति—बुद्धि और आत्मा दोनों में दोनों का परस्पर अध्यास होता है, उस कारण ज्ञातृत्वादि व्यवहार
होता रहता है। एक दृष्टान्त से यह समझ में आ सकता है—जिस प्रकार प्राकृत पुरुषों को देह (शरीर) में 'अहम्'
प्रत्यय होता है, उसके होने से ही वे पुरुष अपने को मोटा, दुबला, गोरा, साँवला, काला, रोगी, स्वस्थ आदि समझते
रहते हैं। उसी प्रकार लौकिक पुरुष 'बुद्धि' में आत्मत्व का अध्यास करके 'जानाति' शब्द से बुद्धि में ज्ञानकर्तृत्व का
प्रदर्शन करते हैं और बुद्धि के कर्तृत्व का 'आत्मा' में आरोप करके उसे ज्ञानाश्रय कहा करते हैं ॥ ६७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
बुद्धि और आत्मा के अन्योन्यधर्माध्यास से ही ज्ञातृत्व, कर्तृत्वादि व्यवहार होता है, यह बता चुके हैं।
उसी में दृष्टान्त दे रहे हैं—जैसे घट आदि का रूपादिमत्त्वेन व्यवहार होता है, वैसे ही यह देह अहम्प्रत्यय के योग्य न
होते हुए भी उसमें चेतना का अध्यास करके साधारण लोग देह में ही अहम्प्रत्यय करते हैं, और उसी के कारण वे
अपने को कृश, स्थूल, गौर, श्याम, रोगी, निरोग आदि समझते हैं। उसी प्रकार बुद्धि जड़ होने से उसमें ज्ञातृत्व की
योग्यता न रहने पर भी, चिदाभास की व्याप्ति के कारण ज्ञातृत्व का आरोप किया जाता है और 'जानामि' कहकर
ज्ञानकर्तृत्व प्रदर्शित करते हैं। उसी प्रकार बुद्धि के कर्तृत्व का आत्मा में आरोप कर आत्मा को भी ज्ञानाश्रय कह
देते हैं। वस्तुतः आत्मा तो अविकारी (विकाररहित) है और चित्त (बुद्धि) विकारी (विकार सहित) है, किन्तु साधारण
लोगों को उन दोनों में विवेक न हो पाने से वे लोग आत्मा को ही विकारी समझते हैं और कहते भी हैं। तात्पर्य यह
है कि शास्त्रसंस्कार से रहित लोग 'देवदत्तो जानाति मनुते' इस प्रकार देह को ही ज्ञाता समझते हैं। वैसे ही बुद्धि में
ज्ञानकर्तृत्व (बुद्धि ज्ञान की कर्त्री है, ऐसा) कहते हैं और आत्मा को ज्ञान का आश्रय तथा विकारवान् (विकारी)
कहते हैं ॥ ६७ ॥
बौद्धैस्तु प्रत्ययैरेवं क्रियमाणैश्च चिन्निभैः ।
मोहिताः क्रियते ज्ञानमित्याहुस्तार्किका जनाः ॥६८॥
बौद्धैरिति—चेतन के समान प्रतीत होने वाली बुद्धि से प्रत्यय (वृत्तिविशेष) उत्पन्न होते रहते हैं। उन
उत्पद्यमान प्रत्ययों से मोहित हुए तार्किक (नैयायिक) लोग आत्मा से 'ज्ञान' का उत्पन्न होना समझने लगते हैं।
आत्मा तो नित्य ज्ञानस्वरूप ही है। चिदाभासविशिष्ट बुद्धि से वृत्तिज्ञानों की उत्पत्ति होती है। किन्तु तार्किक लोग
इस रहस्य को नहीं समझ पाते ॥ ६८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पुनरपि शंका होती है कि तार्किक लोग ज्ञान की उत्पत्ति और विनाश को देखकर आत्मा के द्वारा ज्ञान
का किया जाना (उत्पन्न होना) बताते हैं, तब ज्ञान को नित्य समझकर उसे आत्मस्वरूप कैसे कहा जाय ? समाधान
यह है कि चेतन के तुल्य प्रतीयमान बुद्धि के उत्पद्यमान प्रत्ययों से मोहित हुए तार्किक लोग 'ज्ञान उत्पन्न होता है'
ऐसा कहते हैं। आत्मा तो नित्यज्ञानस्वरूप है। जब बुद्धि में आत्मा का प्रकाश पड़ता है, तब वह चेतन के समान
प्रतीत होने लगती है और उसी से घटाकार-पटाकार ज्ञान जैसे वृत्तियों (ज्ञानों) की उत्पत्ति होती रहती है। बुद्धि
और आत्मा के परस्पराध्यास से ही यह सब खेल होता है। किन्तु तार्किक लोग (नैयायिक गण) ऐसा न मानकर उस
वृत्तिज्ञान को आत्मकतृत्व ही समझते हैं। वे यह नहीं सोच पाते कि यदि आत्मा में कर्तृत्वादि विकार माना जायगा
तो आत्मा को अनित्य कहना पड़ेगा। अतः इन तार्किकों को अध्यास से मोहित हुए ही समझना चाहिये। कर्तृत्वादि धर्म
तो चिदाभासविशिष्ट बुद्धि के ही हैं। जिस प्रकार एक ही अखण्ड आकाश घटादि से नाना प्रतीत होता है, उसी
प्रकार बुद्धिरूप उपाधि के कारण (अनेकविध वृत्तिज्ञान के कारण) एक ही नित्यज्ञानस्वरूप आत्मा विभिन्न-सा
जान पड़ता है ॥ ६८ ॥
२०८ | उपदेशसाहस्री
तस्माज्ज्ञाभासबुद्धीनामविवेकात्प्रवर्तितः ।
जानातीत्यादिशब्दश्च प्रत्ययो या च तत्स्मृतिः ॥६९॥
तस्मादिति-अतः यह निश्चित रूप से समझना होगा कि 'चेतन' (ज्ञ), चिदाभास, और बुद्धि इन तीनों का
विवेक न हो पाने से ही 'जानाति' इत्यादि शब्द, तद्विषयक ज्ञान, और उसकी स्मृति हुआ करती हैं ॥ ६९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इसलिये चेतन, चिदाभास, बुद्धि इन तीनों के अविवेक के कारण ही 'जानाति' आदि शब्द, तद्विषयक ज्ञान,
और उसकी स्मृति की प्रवृत्ति हुई है। आत्मा की जो कूटस्थता है, वह प्रमाण से सिद्ध है। किन्तु उसका विकारित्व
प्रमाण से सिद्ध नहीं है। जब कि ज्ञान में आत्मस्वरूपता का श्रवण होता है, अतः वह तो नित्य ही है। उसे किसी के
द्वारा उत्पन्न नहीं किया जाता । बुद्धिसंसर्ग हुए बिना आत्मा में ज्ञातृत्व की उपलब्धि नहीं हो पाती, क्योंकि सुषुप्ति
में ज्ञातृत्व की उपलब्धि नहीं होती है। बुद्धि की उपलब्धि भी आत्मा से भिन्न आकार में नहीं होतो। इस कारण आत्मा,
बुद्धि, तत्स्थ आभास इन तीनों का विवेकग्रह न होने से यथाप्रसिद्ध बुद्धि और आत्मा के व्यावहारिक एकत्व का ग्रहण
कर 'जानाति' आदि शब्दों का व्यवहार उपपन्न होता है । कोई भी अन्य आलम्बन परमार्थतः मुख्य नहीं है ॥ ६९ ॥
आदर्शानुविधायित्वं छायाया अस्यते मुखे ।
बुद्धिधर्मानुकारित्वं ज्ञभासस्य तथेष्यते ॥७०॥
आदर्शोति - मुखाभास में दर्पण का अनुविधायित्व रहता है और उसका मुख में आरोप करते हैं, वैसे ही
बुद्धि के धर्मों का अनुकरण करने वाला जो चिदाभास है, उसका चेतन में आरोप किया जाता है ॥ ७० ॥
हृदयस्पर्शिनी
ज्ञ, आभास और बुद्धि के अविवेक से जो समस्त व्यवहार चलता है, वह पारमार्थिक नहीं है, इसे दृष्टान्त के
द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं- जिस प्रकार छाया में (मुखाभास अर्थात् प्रतिबिम्ब में) दर्पण का अनुवर्तन रहता है, उसी का मुख
में आरोप किया जाता है। उसी प्रकार बुद्धि के धर्मों का अनुकरण करने वाले अध्यस्त चिदाभास को भी चेतन में अध्यस्त
मानकर व्यवहार किया जाता है ॥ ७० ॥
बुद्धेस्तु प्रत्ययास्तस्मादात्माभासेन दीपिताः ।
ग्राहका इव भान्ते दहन्तीवोल्मुकादयः ॥७१॥
बुद्धेरिति-अग्नि से व्याप्त हुआ अंगार, दाहक के रूप में प्रतीत होता है, उसी प्रकार चिदाभास से
प्रकाशित होने वाले बुद्धि के प्रत्यय, प्रकाशकर्ता के रूप में जान पड़ते हैं ॥ ७१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिस प्रकार उल्मुक (जलती हुई लकड़ी, अंगार) आदि अग्नि से व्याप्त होने के कारण जलाते हुए से
प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार चिदाभास के द्वारा प्रकाशित हुए बुद्धि के परिणामरूप प्रत्यय प्रकाशकर्ता की तरह प्रतीत
होते हैं ॥ ७१ ॥
स्वयमेवावभास्यन्ते ग्राहकाः स्वयमेव च ।
इत्येवं ग्राहकास्तित्वं प्रतिषेधन्ति सौगताः ॥७२॥
स्वयमिति-ग्राहक (ज्ञान) स्वयं ही प्रकाशित होते हैं और वे स्वयं ही प्रकाशरूप हैं-यह कहनेवाले
बौद्ध विद्वान् प्रत्यय (ज्ञान) के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकाशक के अस्तित्व (सत्ता) का निषेध करते हैं ॥ ७२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आभास से विविक्त (पृथक्) पदार्थ के स्वरूप का ज्ञान न होने से जैसे तार्किकों को व्यामोह होकर वे 'ज्ञानं
क्रियते' कहते हैं, उसी प्रकार बौद्धों को भी 'बुद्धि से व्यतिरिक्त (पृथक्) अन्य कोई ग्राहक नहीं है', इस प्रकार का व्यामोह
तत्त्वमसिप्रकरणम् २०९
ही है। ग्राहक (प्रत्यय = ज्ञान) स्वयंप्रकाश होता हैं अर्थात् ज्ञानमात्र स्वयं प्रकाशित होते हैं और वे स्वयं भी प्रकाशरूप
हैं, ऐसा बौद्ध कहते हैं और वे प्रत्यय (विज्ञान) से भिन्न किसी अन्य प्रकाशक (ग्राहक) की सत्ता का निषेध
करते हैं।। ७२ ॥
यद्येवं नान्यदृश्यास्ते किं तद्धारणमुच्यताम् ।
भावाभावौ हि तेषां यौ नान्यग्राह्यौ सता यदि ॥७३॥
यदीति—बौद्ध विद्वान् यदि ऐसा कहते हैं कि वे प्रत्यय (विज्ञान) समूह किसी अन्य के दृश्य नहीं हैं, तो यह
बताओ कि उसका निवारण कैसे किया जाय ? उसके उत्तर में कहते हैं कि उन प्रत्ययों के उत्पत्ति और विनाश यदि किसी
अन्य स्वतःसिद्ध साक्षी से ग्राह्य नहीं हैं तो भी उन्हें चिदाभास से ग्राह्य समझने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ७३ ॥
हृदयस्पर्शनी
प्रत्ययों (ज्ञानों) के ग्राहक के रूपमें किसी अन्य स्थिर पदार्थ को न मानकर प्रत्यय (ज्ञान) को ही ग्राह्य और
ग्राहक के आकार में बौद्ध मानते हैं, तो उनका मत अनुभवानुसारी होने से आभास का अभ्युपगम न करने में उनका
निराकरण किस प्रकार करना चाहिये ? इस आशय से अपने यूथ से पूछते हैं—यदि बौद्ध लोग यह कहते हैं कि प्रत्यय
(ज्ञान) किसी अन्य के दृश्य नहीं हैं, तो उनके इस कथन का किस प्रकार से निषेध किया जाय ? ऐसा पूछने पर यूथ्य ने उत्तर
दिया कि उन प्रत्ययों के जो भाव और अभाव (उत्पत्ति और विनाश) हैं, वे यद्यपि किसी अन्य स्वतःसिद्ध साक्षी से सर्वदा
ग्राह्य नहीं होते, तथापि जिसमें प्रत्ययों के भावाभाव होते हैं, उनका ग्राहक 'सोऽहम्' इस प्रत्यभिज्ञान के बल से अन्वयी
स्थायी आत्मा सिद्ध हो जाता है, तो आभासकी कल्पना करने की क्या आवश्यकता ? अर्थात् उन्हें चिदाभास से ग्राह्य
मानने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ७३ ॥
अन्वयी ग्राहकस्तेषामित्येतदपि तत्समम् ।
*अचित्तित्वस्य तुल्यत्वादन्यस्मिन् ग्राहके सति ॥७४॥
अन्वयीति—उन ग्राह्यों का ग्राहक यदि किसी स्थायी को माना जाय तो वह भी उन ग्राह्य प्रत्ययों के
समान जड़ ही होगा, क्योंकि उस स्थायी ग्राहक का कोई अन्य ग्राहक रहने पर उसका जड़त्व (अचेतनत्व) भी उन
प्रत्ययों के समान ही है ॥ ७४ ॥
हृदयस्पर्शनी
इस प्रकार स्वयूथ्य के द्वारा कहे जानेपर सिद्धान्ती सोचता है कि इतने मात्र उत्तर से बौद्धमत का निवारण
होना शक्य नहीं है, अतः पूर्वोक्त उत्तर में दोषप्रदर्शन कर रहे हैं। प्रत्यभिज्ञा के बलपर किसी स्थायी ग्राहक को सिद्ध करने
पर भी उन प्रत्ययों के तुल्य वह भी जड़ ही कहा जायगा, क्योंकि उसका कोई अन्य ग्राहक होनेपर उसका अचेतनत्व भी
प्रत्ययों के समान ही होगा। बौद्धलोग विषय और उसके ग्राहक दोनों को ही विज्ञानरूप मानते हैं। उनके इस मतका
खण्डन करते हुए यह बताया जा रहा है कि जो लोग केवल बुद्धि और कूटस्थ चेतन की ही सत्ता स्वीकार करते हैं,
उनका मत भी समीचीन नहीं है। बुद्धि के प्रत्ययों को ग्रहण करनेवाली वस्तु या तो स्वयंप्रकाश होगी या परप्रकाश्य
होगी। यदि वह परप्रकाश्य है तो जड़ होने के कारण वह प्रत्ययों का प्रकाशन नहीं कर सकती, और यदि किसी प्रकार
उसमें ऐसा सामर्थ्य माना भी जाय, तो यह प्रश्न होगा कि जिससे वह प्रकाशित होती है, वह वस्तु परप्रकाश्य है या
स्वयंप्रकाश ? यदि उसे भी परप्रकाश्य कहें तो अनवस्था दोष उपस्थित होता है। और यदि स्वयंप्रकाश कहते हैं तो
साक्षी चेतन की सत्ता सिद्ध होती है। इस श्लोक में परप्रकाश्य वस्तु के प्रकाशक का खण्डन करने के बाद उन लोगों के
मत का खण्डन करते हैं, जो साक्षी चेतन की सत्ता तो स्वीकार करते हैं, किन्तु चिदाभास को मानने की आवश्यकता
नहीं समझते ॥ ७४ ॥
अध्यक्षस्य समीपे तु सिद्धिः स्यादिति चेन्मतम् ।
नाध्यक्षेऽनुपकारित्वादन्यत्रापि प्रसङ्गतः ॥७५॥
- अचित्त्वस्यापि तु० — पाठान्तरम् ।
२७
२१० उपदेशसाहस्री
अध्यक्षस्येति—यदि यह कहें कि साक्षी चेतन के सन्निध रहने मात्र से प्रत्ययों का प्रकाशन हो जायगा,
चिदाभास की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं होगी । किन्तु यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि अध्यक्ष में अर्थात्
निर्विकार कूटस्थ साक्षी में उपकारित्व की सम्भावना नहीं कर सकते, क्योंकि उसमें उपकारित्व को मानने पर अन्यत्र
लोष्ठकाष्ठादि में भी प्रत्ययप्रकाशकत्व मानना होगा, क्योंकि साक्षी की सन्निधि तो सर्वत्र समान ही है ॥ ७५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि यह कहें कि स्वप्रकाश साक्षी के न रहने पर प्रत्ययों का भावाभाव (उत्पत्ति-विनाश) नहीं हो पायेगा,
तो साक्षी के सान्निध्यमात्र से ही प्रत्ययों का भावाभाव (प्रकाशनादि) का होना उपपन्न हो जायगा, तब आभास
(चिदाभास) को मानने की क्या आवश्यकता ? किन्तु यह शंका उचित नहीं प्रतीत हो रही है। क्योंकि निर्विकार कूटस्थ
साक्षी में किसी प्रकार के उपकारकत्व की संभावना नहीं हो सकती। यदि हठात् उसमें उपकारकत्व धर्म को स्वीकार
करें तो उसकी सन्निधि सभी के साथ समान रहने से काष्ठ-लोष्ठादि में भी प्रत्ययप्रकाशन का सामर्थ्य मानना होगा ॥ ७५ ॥
अर्थी दुःखी च यः श्रोता स त्वध्यक्षोऽथवेतरः ।
अध्यक्षस्य च दुःखित्वमर्थित्वं च न ते मतम् ॥७६॥
अर्थीति—इसी प्रसंग में एक प्रश्न यह भी हो सकता है कि मुमुक्षु, जो अर्थी कहलाता है, वह संसार के
दुःखों से दुःखी हुआ जो गुरुपदेश का श्रोता है, वह कौन है ? क्या वह बुद्धि है ? साक्षी है ? अथवा कोई अन्य है ?
तुम्हें अध्यक्ष का यानी साक्षी का दुःखित्व और मुमुक्षुत्व तो मान्य नहीं है ॥ ७६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आभास के न मानने पर बौद्ध मत की समानता के दोष का परिहार नहीं हो सकेगा, यह कहने पर शास्त्रीय
बन्ध-मोक्ष व्यवहार भी नहीं हो पायगा। मोक्ष की इच्छा करने वाला और सांसारिक दुःखों से दुःखी हुआ जो गुरुपदेश
का श्रोता है, वह कौन है ? जो श्रोता है, वही अध्यक्ष है या उससे अन्य और कोई है ? प्रथम कल्प (पक्ष) में तुम्हारे
निरनुग्राह्याध्यक्षवादी सिद्धान्त का भंग हो जायगा, अर्थात् तुम्हें साक्षी का दुःखित्व और मुमुक्षत्व तो स्वीकार है नहीं।
आत्माभास का अंगीकार न करने वाले तुम्हारे मत में द्वार न होने से अविद्यातत्कार्य सम्बन्ध की सिद्धि नहीं होगी, उसके
बिना मोक्षार्थित्व भी सिद्ध नहीं होगा, अर्थात् आभास के स्वीकार करने का प्रसंग प्राप्त होगा ॥ ७६ ॥
कर्ताध्यक्षः सदस्मीति नैव सद्ग्रहमर्हति ।
सदेवासीति मिथ्योक्तिः श्रुतेरपि न युज्यते ॥७७॥
कर्तेति—'मैं कर्ता और साक्षी सत् हूँ'—यह कहने से 'आत्मा' का, 'सत्' शब्द से निर्दिष्ट जो 'ब्रह्म' है,
उस रूप से ग्रहण नहीं हो सकता, और 'तू सत् ही है'—इस वेदवचन को तो मिथ्या कहना भी उचित नहीं है। इसलिये
शुद्ध चेतन में कर्तृत्व, दुःखित्व तथा अर्थित्वादि विकारी धर्मों का होना संभव नहीं हो सकता ॥ ७७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
द्वितीय कल्प को दूषित करते हैं—'मैं कर्ता और साक्षी सत् हूँ' ऐसा स्वीकार करने से आत्मा का 'सत्'
शब्द से निर्दिष्ट हुए ब्रह्मरूप से ग्रहण नहीं किया जा सकता। और 'तू सत् ही है' यह श्रुतिवाक्य भी मिथ्या नहीं माना
जा सकता। अतः शुद्ध चेतन में कर्तृत्व, दुःखित्व एवं अर्थित्वादि विकारी धर्मों का होना असंभव है। क्योंकि एक
ही वस्तु एक साथ 'कर्ता' और 'साक्षी' नहीं होती है। ये दोनों धर्म परस्परविरुद्ध हैं। एक ही वस्तु में दो
विरोधी धर्मों का एक साथ रहना संभव नहीं है। कर्ता कर्तृत्वधर्म से युक्त होने से विकारी होता है, किन्तु साक्षी
कर्तृत्वादि धर्म से रहित होता है ॥ ७७ ॥
अविविच्योभयं वक्ति श्रुतिश्चेत्स्याद्ग्रहस्तथा ।
अस्मदस्त्व विविच्यैव त्वमेवेति वदेद्यदि ।
प्रत्ययान्वयिनिष्ठत्वमुक्तदोषः प्रसज्यते ॥७८॥
तत्त्वमसिप्रकरणम् २११
अविविच्येति—आत्मा और अहङ्कार दोनों का विवेक न करके यदि श्रुति ऐसा कहती है तो उक्त वाक्य
के अर्थ का ग्रहण हो सकता है, और यदि अहमर्थ (शुद्ध चेतन) से अहंकार का विवेक करके उसके विषय में 'तत् त्वमसि
तू वह (ब्रह्म) है, इस प्रकार श्रुति, यदि ब्रह्म का अहङ्कारनिष्ठत्व बताती है तो उक्त दोष (मिथ्याभाषण का दोष) का
प्रसङ्ग प्राप्त होता है ॥ ७८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
चिदाभास के अनभ्युपगमपक्ष में बन्ध-मोक्ष की अनुपपत्ति बताकर अपने पक्ष में उसकी उपपत्ति बताते हैं।
यदि श्रुति, आत्मा और अहंकार दोनों का विवेक न करके ऐसा कहती है, तब तो इस वाक्य के अर्थ का ग्रहण हो
सकता है। 'तत्त्वमसि' तू ब्रह्म है—इस प्रकार का श्रुति का कथन चिदाभास के द्वारा आत्मा और अहंकार का अविवेक
होने पर ही सार्थक हो सकता है। क्योंकि संसारदुःख से दुःखी हुआ अहंकार ही मोक्ष की इच्छा कर सकता है और
आत्मज्ञान द्वारा उसी का मोक्ष होना संभव हो सकता है। यदि अहमर्थ (शुद्ध चेतन) से अहंकार का विवेक कर
उसके विषय में 'तू वह (ब्रह्म) है' इस प्रकार ब्रह्म का अहंकारनिष्ठत्व श्रुति ने बताया हो तो उपर्युक्त मिथ्या भाषण
का दोष आता है। तात्पर्य यह है कि यदि 'आत्मा' शब्द से अहंकार को मानकर उसे ब्रह्मरूप कहते हैं तो श्रुति को मिथ्या
कहना पड़ेगा। अतः श्रुति का यह 'तत्त्वमसि' उपदेश उसी के लिये है, जिसने अध्यास के द्वारा अविवेकवशात् अहंकार
के दुःखित्वादि का आत्मा में आरोप किया है। अर्थात् सांख्य का कहना है कि अहंकार को ही श्रोता मान लिया जाय तो
आत्माभास के स्वीकार करने की क्या आवश्यकता है ? उसपर कहते हैं कि यदि श्रुतिवाक्य प्रत्यक्चैतन्य से अहंकार को,
पाते से गन्ने के समान पृथक् करके केवल अहंकार को 'तू ही ब्रह्म है' इस प्रकार श्रुतिद्वारा आचार्य यदि कहें, तब
तो 'तत्त्वमसि' श्रुति के अहंकारनिष्ठ होने से मिथ्यावादित्व का दोष प्रसक्त हो सकेगा, अन्यथा नहीं ॥ ७८ ॥
त्वमित्यध्यक्षनिष्ठश्चेदहमध्यक्षयोः कथम्।
सम्बन्धो वाच्य एवात्र येन त्वमिति लक्ष्येत् ॥७९॥
त्वमिति—'त्वम्' पद अहङ्कार का वाचक होने पर भी उसे साक्षोपरक भी यदि स्वीकार कर लिया जाय
तो यह बताना होगा कि साक्षी और अहङ्कार का सम्बन्ध किस प्रकार का है, जिससे कि 'त्वम्' पद 'साक्षी' को
लक्षित कर सकेगा ॥ ७९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अहङ्कर्तृविषयक 'त्वं' शब्द से अध्यक्ष (साक्षी) लक्ष्यमाण होने से यह अहङ्कर्तृविषयक उपदेश तो अध्यक्ष
(साक्षी) में ही पर्यवसित होगा, आभास को मानने की क्या आवश्यकता है ? इस शंका का समाधान कर रहे हैं—यदि यह
कहें कि 'त्वं' यह पद अहंकारवाचक होकर अध्यक्ष को बोधित करता है, तथापि अहंकार और अध्यक्ष दोनों के सम्बन्धग्रह
के बिना वाक्यार्थबोध का होना संभव नहीं। अहं और अध्यक्ष का सम्बन्ध तो बताना ही होगा। जिस संबंध से त्वं-पद
अध्यक्ष को लक्षित कर सके, वह सम्बन्ध कैसे उपपन्न होगा ? अतः सम्बन्ध बताना आवश्यक है ॥ ७९ ॥
द्रष्टृदृश्यत्वसम्बन्धो यद्यध्यक्षेऽक्रिये कथम् ॥८०॥
द्रष्ट्रीति—यदि दोनों का 'द्रष्टृ-दृश्यत्व' सम्बन्ध कहा जाय तो साक्षी में उस सम्बन्ध का ग्रहण कैसे होगा ?
क्योंकि वह अक्रिय है ॥ ८० ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस पर यदि पूर्वपक्षी कहे कि 'हाँ, सम्बन्ध है', तो उसकी शंका को दूर करते हैं। यदि अहंकार और
अध्यक्ष (साक्षी) का द्रष्टृ-दृश्यत्वरूप सम्बन्ध कहें तो वह भी संभव नहीं है। क्योंकि साक्षी (अध्यक्ष) तो विकाररहित
(निर्विकार) है, उस कारण उसमें सम्बन्धग्रहणकर्तृत्वरूप धर्म (विकार) नहीं रह सकता। तथा अहंकार जड़ हैं, उस कारण
वह भी उस सम्बन्ध का ग्रहण नहीं कर सकता। अतः उक्त सम्बन्ध अनुपपन्न है ॥ ८० ॥
२१२ उपदेशसाहस्री
*अविक्रियत्वेऽपि तादात्म्यमध्यक्षस्य भवेद्यदि ।
आत्माध्यक्षो ममास्तीति सम्बन्धाग्रहणे न धीः ॥८१॥
अक्रियत्वे इति—यदि यह कहें कि साक्षी चेतन (अध्यक्ष) के अक्रिय होने पर भी उसका अहङ्कार के साथ
तादात्म्य का उपदेश श्रुति करती है, तो सम्बन्ध का ग्रहण न होने पर ‘मेरा आत्मा साक्षी है’—यह बुद्धि भी नहीं
होगी ॥ ८१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्वोक्त रीति के अनुसार सम्बन्धग्रहण भले ही न हो, अर्थात् सम्बन्धग्रहण का कर्तृत्वरूप विकार साक्षी में न
रहने पर भी अहंकार के साथ साक्षी के तादात्म्यसम्बन्ध का उपदेश तो श्रुति ने किया ही है। अतः सम्बन्ध का ग्रहण
यदि नहीं मानेंगे तो 'मेरा आत्मा साक्षी है, यह बुद्धि कैसे उत्पन्न हो सकेगी ? जैसे लोकव्यवहार में ‘घटस्य शौक्ल्यम्’-
घट की शुक्लता कहने पर घट और शुक्लता का सम्बन्ध यदि न जाना जाय तो दोनों के तादात्म्य का ज्ञान होना
संभव नहीं, वैसे ही 'ममात्मा अध्यक्षः अस्ति'—मेरा आत्मा साक्षी है, यहाँ पर भी अपना और आत्मा दोनों के सम्बन्ध
का ज्ञान हुए बिना दोनों में तादात्म्य बुद्धि कैसे हो पायेगी ॥ ८१ ॥
सम्बन्धग्रहणं शास्त्रादिति चेन्मन्यसे न हि ।
पूर्वोक्ताः †स्युस्त्रिधा दोषा ग्रहो वा स्यान्ममेति च ॥८२॥
सम्बन्धेति—यदि यह कहें कि उनके सम्बन्ध का ज्ञान तो शास्त्र से ही हो जायगा, तो पूर्वोक्त तीन दोष
( १-अहंकार जड़ है, २-साक्षी निर्विकार है, ३-जड़ के प्रति श्रुति का बोधकत्व सिद्ध नहीं होना ) प्राप्त होंगे। तथा उसका
ग्रहण भी 'मेरा आत्मा साक्षी है' इस प्रकार से ही हो सकेगा, यानी 'मैं साक्षी हूँ' ऐसा नहीं हो सकता ॥ ८२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कहें कि दोनों के (अहंकार और साक्षी) के सम्बन्ध का ज्ञान “एष म आत्मान्तर्हृदये अणीयान्”१,
“एष म आत्मान्तर्हृदये एतद्ब्रह्म”२ इस शास्त्र से ही हो जायगा, तो पूर्वोक्त तीन दोष उपस्थित होंगे। (१) अहंकार
तो जड़ है, अतः उससे सम्बन्ध का ग्रहण नहीं किया जा सकता। (२) आत्मा (साक्षी) निर्विकार है, इस कारण वह भी
सम्बन्ध का ग्रहण नहीं कर सकता। (३) जड़ (अहंकार) के प्रति श्रुति का बोधन करना (बोधक होना) संभव नहीं।
यदि कथंचित् सम्बन्धग्रहण की कल्पना कर भी लें तो भी तादात्म्याध्यास को न मानने के कारण ‘एष म आत्मान्तर्हृदये
अणीयान्.........एतद् ब्रह्म”—यह मेरा सूक्ष्म आत्मा हृदय के अन्तर्गत है, यह ब्रह्म है, —इस श्रुति वाक्य में ‘मेरा
आत्मा' ऐसा पद होने के कारण 'मैं साक्षी हूँ' यह ग्रहण नहीं हो सकता, किन्तु 'मेरा आत्मा साक्षी है' इस प्रकार ही
हो सकता है। श्लोक गत 'च' से प्रतीत होता है कि ‘ममाध्यक्षः अस्ति’ यह ग्रहण भी नहीं हो सकता है, क्योंकि
अहंकार तो जड़ है ॥ ८२ ॥
अदृशिर्दृशिरूपेण भाति बुद्धैर्यदा तदा ।
प्रत्यया अपि तस्याः स्युस्तप्तायोविस्फुलिङ्गवत् ॥८३॥
अदृशिरिति—चेतन का प्रतिबिम्ब पड़ने से जब अचेतन बुद्धि भी चेतन के समान प्रकाशयुक्त होती है, तो
तप्त हुए लोहे के विस्फुलिङ्गों के समान उसकी वृत्तियाँ भी चेतनरूप हो जाती हैं ॥ ८३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकार आत्मा और अनात्मा का परपक्ष में सम्बन्ध ही नहीं बन सकता, यह बताकर अब अपने पक्ष
में मिथ्या तादात्म्यसम्बन्ध की उपपत्ति को बनाते हैं, क्योंकि जड़ (अचेतन) बुद्धि, चेतन का प्रतिबिम्ब पड़ने से उसके
१. ( छा. उ. ३।१४।३ )
२. ( छा. उ. ३।१४।४ )
* अक्रियस्वेऽपि०—पाठान्तरम् । † स्युस्त्रयो ०—पाठान्तरम् ।
तत्त्वमसिप्रकरणम् २१३
(चेतन के) समान दृशिरूप से (प्रकाशयुक्त) भासित होती है। अतः अति सन्तप्त हुए लोहे के स्फुलिंगों के (चिनगारियों
के) समान उसकी (बुद्धि की) वृत्तियाँ भी चेतनरूप हो जाती हैं। तात्पर्य यह है कि दाह करना अग्नि का कार्य है,
किन्तु जिस समय अयःपिण्ड में अग्नि का तादात्म्य हो जाता है, तब 'अयो दहति'—लोहा जलाता है, ऐसा कहते हैं।
उसी प्रकार चिदाभास से व्याप्त हुई बुद्धि की जो वृत्तियाँ हैं, उनमें जो ज्ञानकर्तृत्व है, वह चिदाभास का ही धर्म
है, बुद्धि में तो अविवेक के कारण उसका आरोप मात्र किया जाता है ॥ ८३ ॥
आभासस्तदभावश्च दृशेः सीम्नो न चान्यथा ।
लोकस्य युक्तितः स्यातां तद्ग्रहश्च तथा सति ॥८४॥
आभास इति—समस्त वस्तुओं की अवधि 'आत्मा' ही है। उस अवधिभूत आत्मा के प्रति लोक का आभास
तथा अभाव का होना युक्ति से सिद्ध हो सकता है, उसकी सिद्धि अन्य किसी प्रकार से नहीं हो सकती। ऐसी स्थिति में ही
'मैं हूँ' इस प्रकार 'आत्मा' का ग्रहण हो सकता है ॥ ८४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस पक्ष में लौकिक-वैदिक व्यवहार की सिद्धि भी सहज उपपन्न हो पाती है। सबके अवधिभूत चिदात्मा
(दृशि) से ही लोक का आभास तथा उसका अभाव (प्रत्यय और उसका अभाव) युक्ति से सिद्ध हो सकता है, उसे
सिद्ध करने का अन्य कोई प्रकार नहीं है। तथा इस अवस्था में ही 'मैं हूँ' इस प्रकार आत्मा का ग्रहण हो सकता है।
निष्कर्ष यह है कि 'आत्मा' समस्त वस्तुओं की परमावधि है, क्योंकि समस्त वस्तुओं का निषेध कर देने पर एकमात्र
आत्मा ही शेष रह जाता है। और उसका निषेध भी नहीं किया जा सकता। लोक का आभास तथा उसका अभाव
बुद्धिवृत्तिरूप है, किन्तु वे बुद्धिवृत्तियाँ न तो जड़ बुद्धि की ही विषय हो सकती हैं और न निर्विकार आत्मा की ही
विषय हो सकती हैं। अतः उनकी सिद्धि के लिये चिदाभास को स्वीकार करना ही होगा। उसीके द्वारा आत्मा, बुद्धि-
वृत्तियों का साक्षी होता है, और उसी से 'अहमस्मि'—मैं हूँ—इस प्रकार विशेषरूप से आत्मसत्ता का ग्रहण
होता है ॥ ८४ ॥
नन्वेवं दृशिसंक्रान्तिरयःपिण्डेऽग्निवद्भवेत् ।
मुखाभासवदित्येतदादर्शं तन्निराकृतम् ॥८५॥
नन्विति—पूर्वपक्षो का कहना है कि इस प्रकार लोहे के गोले में अग्नि के समान बुद्धि में आत्मा का प्रवेश
(संक्रमण) सिद्ध होता है। उस पर सिद्धान्ती का कहना है कि ऐसी बात नहीं है। शीशे में मुख के प्रतिबिम्ब के समान
अर्थात् बुद्धि में आत्मा का जो आभास पड़ता है उसके समान—यह दृष्टान्त बताया है। इस दृष्टान्त के द्वारा पूर्वपक्षी के
कथन का निराकरण कर दिया गया है ॥ ८५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'प्रतप्त लोहपिण्ड में अग्नस्फुलिङ्ग के समान' इस दृष्टान्त के बताने से आत्मा के विकारी होने की शंका
होती है कि बुद्धि (अहंकार) में आत्मा का प्रवेश (सङ्क्रमण) सिद्ध होता है। अर्थात् तप्त लोहपिण्ड में अग्नि का जैसे
प्रवेश होता है, वैसे ही बुद्धि में दृशिसङ्क्रान्तिरूप विकार (आत्मा का संक्रमण = प्रवेशरूप विकार) होगा। तब
सिद्धान्ती ने उत्तरार्ध के द्वारा उत्तर दिया कि आदर्श (दर्पण) में मुखाभास (मुखप्रतिबिम्ब) के समान बुद्धि में आत्मा
का आभास (प्रतिबिम्ब) पड़ता है। अर्थात् आदर्श में प्रतिबिम्बित मुख, आदर्शस्थत्वेन रूपेण मिथ्या है, उसी प्रकार
बुद्धि में प्रतिबिम्बित हुआ आत्मा का प्रतिबिम्ब, बुद्धिधर्मत्वेन रूपेण मिथ्या है, इस तरह शंका का निराकरण हो जाता
है। अतः आत्मा के विकारी होने की शंका नहीं करनी चाहिये ॥ ८५ ॥
कृष्णायो लोहिताभासमित्येतद्दृष्टमुच्यते ।
दृष्टदृष्टान्ततुल्यत्वं न तु सर्वात्मना क्वचित् ॥८६॥
कृष्णेति—काले लोहे में लाल वर्ण का आभास होता है। इसलिये वह केवल दृष्टान्त मात्र है। दृष्टान्त और
दाष्ट्रान्त की सर्वथा (पूर्ण रूप से) समानता नहीं हुआ करती ॥ ८६ ॥
२१४ उपदेशसाहस्री
हृदयस्पर्शिनी
यदि सिद्धान्ती के कथनानुसार आत्मा विकारी नहीं है, तो सन्तप्त लोहपिण्ड के विस्फुलिंग का दृष्टान्त
क्यों बताया गया है ? वे तो विकार के रूप में प्रसिद्ध हैं, अतः यह दृष्टान्त तो दाष्ट्रान्तिक के अनुरूप नहीं हुआ ।
उत्तर में यह कहा जा रहा है कि कृष्णवर्ण के लोहे का लोहितवर्ण (लाल रंग) आभास मात्र है, अतः यह केवल
दृष्टान्तमात्र है। जड़ बुद्धि में भी चैतन्य का आभास मात्र है। दृष्टान्त और दाष्ट्रान्त की सर्वथा (पूर्णरूप में) समानता
कभी नहीं हुआ करती। अन्यथा अप्रकाशरूप मुख के लिये चन्द्र का दृष्टान्त ही नहीं दिया जायगा, किन्तु दिया जाता
है, अतः आंशिक समानता ही विवक्षित होती है ॥ ८६ '।
तथैव चेतनाभासं चित्तं चैतन्यवद्द्भवेत् ।
मुखाभासो यथाऽऽदर्शे आभासश्चोदितो मृषा ॥८७॥
तथैवेति—उसी प्रकार चिदाभासविशिष्ट चित्त चैतन्यवत् प्रतीत होता है तथा जिस प्रकार शीशे में मुख का
प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार उस चिदाभास को मिथ्या (असत्य) ही बताया गया है ॥ ८७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
दृष्टान्त में विवक्षित अंश बताकर दाष्ट्रान्तिक में भी उस प्रकार के अंश का प्रदर्शन करते हैं। जिसमें
चेतना का आभासमात्र है, ऐसा जो चेतनाभास चित्त (बुद्धि) है, वह चैतन्य की तरह अर्थात् चेतन के तुल्य हो जाता है।
निष्कर्ष यह है कि चिदाभासविशिष्ट चित्त चैतन्यवत् प्रतीत होने लगता है। जिस प्रकार दर्पण में मुखाभास विकृत है,
उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये। उपाधिस्थ के रूप में आभास दिखाई देता है, अतः वह मृषा ( मिथ्या ) है।
चिदाभास को मिथ्या बता ही चुके हैं ॥ ८७ ॥
चित्तं चेतनमित्येतच्छास्त्रयुक्तिविवर्जितम् ।
देहस्यापि प्रसङ्गः स्याच्चक्षुरादेस्तथैव च ॥८८॥
चित्तमिति—'चित्त' को चेतन बताना शास्त्र और युक्ति के विरुद्ध है। चित्त को चेतन कहने पर तो देह
और चक्षुरादि इन्द्रियों को भी चेतन कहा जा सकेगा, किन्तु वह अभीष्ट नहीं है ॥ ८८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कोई कहे कि चिदाभास की व्याप्ति से चित्त को चेतन के तुल्य क्यों माना जाता है ? उसे (चित्त
को) ही स्वतः चेतन मानने में क्या आपत्ति है। इसका उत्तर यह कि है उसे स्वतः (स्वयं) चेतन मानने में न कोई प्रमाण
है, और न कोई न्याय ही है। अर्थात् चित्त को ही चेतन कहना शास्त्र और युक्ति के विरुद्ध है। क्योंकि चित्त तो अन्य-
दृश्य होने से उत्पत्ति-विनाशशील है। चेतनता को चित्त का ही स्वभाव माना जाय तो चक्षुरादि इन्द्रियों को भी चेतन
कहना पड़ेगा। इस प्रकार अतिप्रसंग होगा, जो दुष्परिहर होगा ॥ ८८ ॥
तदप्यस्त्विति चेत्तन्न लोकायतिकसङ्गतेः ।
न च धीर्दृशिरस्मीति यद्याभासो न चेतसि ॥८९॥
तदिति—देहेन्द्रियादि को चेतन समझना तो अनुचित होगा। अन्यथा चार्वाक मत का अंगीकार किया समझा
जायगा। यदि चित्त में चिदाभास का अस्तित्व स्वीकार न किया जाय तो 'मैं चेतन हूँ'—यह बुद्धि (प्रतीति) न हो
सकेगी ॥ ८९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि इष्टापत्ति कहे तो वह उचित न होगी। क्योंकि जड़ चित्त को ही चेतन कहने पर चार्वाक के अवैदिक
सिद्धान्त को मान लिया-सा होगा। चित्त में चिदाभास को यदि न माने तो किसी द्वार (माध्यम) के न होने से 'अहं
तत्त्वमसिप्रकरणम् २१५
ब्रह्मास्मि' - मैं चेतन (ब्रह्म) हूँ, यह आगन्तुकवाक्यजन्य ऐक्यज्ञान नहीं हो सकेगा। अर्थात् चित्त में चिदाभास की
सत्ता यदि न हो तो 'मैं दृशि (आत्मा) ब्रह्म हूँ', यह बुद्धि (ज्ञान) नहीं होगी। केवल चित्त तो जड़ है और चिन्मात्र
(आत्मा) कूटस्थ है ॥ ८९ ॥
सदस्मीति धियोऽभावे व्यर्थं स्यात्तत्त्वमस्यपि ।
युष्मदस्मद्विभागज्ञे स्यादर्थवदिदं वचः ॥९०॥
सदिति—'मैं सत्स्वरूप हूँ' इस प्रकार की बुद्धि के अभाव में 'तत्त्वमसि' यह महावाक्य भी व्यर्थ हो जायगा ।
यह महावाक्य तो युष्मत्पदवाच्य 'जड़ वस्तु' और अस्मत्पदलक्ष्य 'आत्मा' का विभाग (विवेक, भेद) समझने वाले पुरुष
के लिये ही सार्थक हो सकता है ॥ ९० ॥
हृदयस्पर्शिनी
'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान यदि न हो तो क्या हानि है ? इस प्रश्न के होनेपर यह उत्तर दिया है कि 'अहं
ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान नहीं हुआ तो ऐक्यग्राहक 'तत्त्वमसि' यह महावाक्य ही व्यर्थ (अप्रमाण) हो जायगा। यदि कहें कि
वह वाक्य व्यर्थ हो जाय तो क्या क्षति है ? क्योंकि उस वाक्य के सभी श्रोताओं को तत्काल 'ब्रह्मास्मि' इस प्रकार की
बुद्धि उत्पन्न होती दिखाई भी तो नहीं देती। इसका उत्तर यह है कि 'अधिकारिणः प्रमितिजनको वेदः' अधिकारियों
को ज्ञान करानेवाला 'वेद' होता है' इस न्याय से सम्यक्पदार्थविज्ञान वाले का ही वाक्यार्थ बोध (वाक्यार्थ ज्ञान) में
अधिकार होता है। अतः अनात्म पदवाच्य (युष्मत्पदवाच्य) जड़ वस्तु और आत्मा के भेद का ज्ञान रखने वाले पुरुष
के प्रति ही यह वाक्य अर्थवत् (सार्थक) होता है, सभी के लिये (अनधिकारियों के लिये) यह वाक्य झटिति बोधक
नहीं है ॥ ९० ॥
ममेदंप्रत्ययौ ज्ञेयौ युष्मद्येव न संशयः ।
अहमित्यस्मदोष्ठः स्यादयमस्मीति चोभयोः ॥९१॥
ममेति—जिन वस्तुओं के विषय में 'मम' (मेरा) और 'इदम्' (यह) ज्ञान होता है, उन्हें युष्मत्पदवाच्य
ही समझना चाहिये, इसमें सन्देह नहीं है। तथा 'अहम्' (मैं) यह ज्ञान, अस्मत्पदवाच्य 'व्यावहारिक आत्मा' में होता है।
उसी तरह 'यह' (देहादि) में हूँ'-यह ज्ञान, आत्मा और अनात्मा दोनों ही में हो सकता है ॥ ९१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उसी युष्मद्-अस्मत् के विवेक को बताते हैं। जिन पुत्रादि अनात्म पदार्थों में 'इदम्' 'मम' (यह-मेरा)
यह ज्ञान (प्रत्यय) होता है, निःसन्देह उन्हें 'युष्मत्' पदवाच्य ही समझना चाहिये । पुत्रादि बाह्य पदार्थों का देहाध्यास-
परंपरा से ही अस्मदर्थ में प्रवेश होता है। अतः बाह्यार्थ सम्बन्ध भी अनात्मधर्म ही है, यह उचित ही कहा गया है।
'अहम्' (मैं) यह ज्ञान, अस्मत्पदवाच्य व्यावहारिक आत्मा में (अहंकार में) माना जाता है। तथा 'यह (देहादि) मैं
हूँ' ऐसा ज्ञान, आत्मा और अनात्मा दोनों में ही हो सकता है ॥ ९१ ॥
अन्योन्यापेक्षया तेषां प्रधानगुणतेष्यते ।
विशेषणविशेष्यत्वं तथा ग्राह्यं हि युक्तितः ॥९२॥
अन्योन्येति- इन आत्मविषयक और अनात्मविषयक ज्ञानों (प्रत्ययों) में एक-दूसरे की अपेक्षा से प्रधानता
और अप्रधानता मानी जाती है। उसी प्रकार इनके विशेषण-विशेष्य भाव को भी युक्तिसहित समझना चाहिये ॥ ९२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मानात्मविषयक प्रत्ययों के संकीर्ण और असंकीर्णरूप विषयों को बताकर उक्त विवेक के लिये
गुण-प्रधान भाव से विशेषण-विशेष्यभाव को स्पष्ट करते हैं । इन आत्मविषयक और अनात्मविषयक प्रत्ययों