उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 223, कुल 364 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वमसिप्रकरणम् १९७
हृदयस्पर्शिनी
'द्वयोरेवेति चेत्'—यदि कहें कि वह (प्रतिबिम्ब) दोनों का धर्म है—इस तृतीय पक्ष का 'तन्न' से खण्डन
करते हैं। उसे दोनों का धर्म नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों के रहने अथवा न रहने में भी उसे देखा नहीं जाता।
मुख और दर्पण में से किसी भी एक के अभाव में तो मुखाभास की प्रतीति न होना स्पष्ट ही है, किन्तु यदि उसे उनके
संयोग का ही धर्म माना जाय तो भी उनका किसी प्रकार भी संयोग होने पर उसकी प्रतीति होनी चाहिये, किन्तु
होती नहीं है। इसलिये उसे उनके संयोग का भी धर्म नहीं कह सकते। अतः प्रतिबिम्ब को दोनों का धर्म नहीं कह
सकते। यदि यह कहें कि 'वह (आभास) इन दोनों से भिन्न सत्य वस्तु है' इस चतुर्थ पक्ष की आशंका को दृष्टान्त के
द्वारा उपस्थित करते हैं—'अदृश्यस्य सतो दृष्टिः'। जिस प्रकार पूर्वसिद्ध राहु की प्रतीति, सूर्य और चन्द्रमा की
विद्यमानता में ही होती है, उसी प्रकार अदृश्य किन्तु विद्यमान प्रतिबिम्ब की प्रतीति मुख और दर्पण का संयोग होने
पर ही होती है ॥ ३९ ॥
राहोः प्रागेव वस्तुत्वं सिद्धं शास्त्रप्रमाणतः ।
छायापक्षे त्ववस्तुत्वं तस्य स्यात्पूर्वयुक्तितः ॥४०॥
राहोरिति—उपर्युक्त आशंका उचित नहीं है, क्योंकि राहु की विद्यमानता तो चन्द्रग्रहणादि के पूर्व भी
शास्त्रप्रमाण से सिद्ध है, किन्तु जो लोग पृथिवी आदि की छाया को ही राहु कहते हैं, उनके अनुसार तो उसका (राहु
का) अवस्तुत्व उपर्युक्त युक्ति से ही सिद्ध हो जाता है ॥ ४० ॥
हृदयस्पर्शिनी
उक्त कथन उचित नहीं है, क्योंकि दृष्टान्त में वैषम्य है। क्योंकि सैंहिकेय राहु की वस्तुता तो चन्द्रग्रहण
के पूर्व से ही ज्योतिःशास्त्रप्रमाण से अथवा पुराणादि शास्त्र प्रमाण से निश्चित है, वैसा यहाँ पर किसी प्रमाण से
प्रतिबिम्ब की वस्तुता का निश्चय नहीं है। अर्थात् मुख-दर्पण के सम्बन्ध से पूर्व या अनन्तर मुखप्रतिबिम्ब की तद्व्य-
तिरिक्त वस्तुता किसी प्रमाण से कहीं पर भी संभावित नहीं हुई है। इस प्रकार राहु की वस्तुता को मानकर दाष्ट्रान्तिक
में अनुगुणता का अभाव (अननुगुणता) बताया गया है। किन्तु अब उस राहु में भी वस्तुता नहीं है अतः प्रतिबिम्ब
को वस्तुसिद्ध करने में उस अवस्तुभूत राहु का दृष्टान्त देना उचित नहीं है, यह बता रहे हैं। कुछ लोग पृथिवी की
छाया को ही राहु कहते हैं, उनके मतानुसार उस राहु का अवस्तुत्व ही निश्चित है। “मुखाभासो य आदर्श” इस
३७ वें श्लोक (पद्य) में उक्त युक्ति को यहाँ भी लगाया जा सकता है । ॥ ४० ॥
छायाक्रान्तेर्निषेधोऽयं न तु वस्तुत्वसाधकः ।
न ह्यर्थान्तरनिष्ठं सद्वाक्यमर्थान्तरं वदेत् ॥४१॥
छायेति—गुरु आदि पूज्य लोगों की छाया के अतिक्रमण का निषेध स्मृति ने किया है। वह निषेध भी
उसके वस्तुत्व को सिद्ध नहीं करता है, क्योंकि कोई भी वाक्य किसी एक अर्थ में स्थित होकर अन्य अर्थ को नहीं
बताता है ॥ ४१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कहें कि इसी प्रकरण के ३४ वें श्लोक 'वस्तुच्छाया स्मृतेः'—छाया की वस्तुतासिद्धि में स्मृति का प्रमाण
बताया है कि 'गुरु आदि की छाया का अतिक्रमण न करें'। किन्तु यह छायातिक्रमण का निषेध भी उसके वस्तुत्व का
साधक नहीं है। यदि उसे वस्तुत्व का साधक कहा जाय तो सोचना होगा कि वह साक्षात् उसका साधक है, या अर्थात्
साधक है। उक्त निषेधवाक्य को वस्तुत्वसाधक साक्षात् नहीं कह सकते, क्योंकि एक ही वाक्य को उभयार्थ मानने पर
वाक्यभेद होगा । 'एकस्य वाक्यस्य उभयार्थत्वे वाक्यभेदः'। अतः किसी एक अर्थ में स्थित हुआ वाक्य, अन्य अर्थ का
प्रतिपादन नहीं करता। अब उसे अर्थात् वस्तुत्वसाधक कहें तो यह द्वितीय पक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि निषेध तो
'प्राप्तिमात्रसापेक्ष' रहता है, अतः निषेध्यविषय में वस्तुत्व के न रहने से निषेध की अनुपपत्ति होने में कोई नियामक नहीं
है। अतः छायालंघनप्रतिषेधपरक वाक्य छाया की वस्तुता को नहीं बता रहा है ॥ ४१ ॥