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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पद्यभाग १९: तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् (मनःसंवाद)

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम्
प्रयुज्य तृष्णाज्वरनाशकारणं चिकित्सितं ज्ञानविरागभेषजम् ।
न याति कामज्वरसन्निपातजां शरीरमालां शतयोगदुःखिताम् ॥१॥
प्रयुज्येति—तृष्णा रूपी ज्वर को नष्ट करने वाली ज्ञान-वैराग्य रूपी औषधि को जिसमें दिया जाता है, उस
चिकित्सा का प्रयोग करने से मनुष्य को यह दुःखमयी शरीर-परम्परा प्राप्त नहीं होती¹, जो काम ज्वर की मूर्छा तथा
सैकड़ों विषयों के सम्बन्ध से हुआ करती है ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रकरण का नाम उसके प्रतिपाद्य विषय को ध्यान में रखकर दिया गया है । कुछ लोगों ने इस प्रकरण का
नाम ‘भेषजप्रयोग प्रकरण' तथा कुछ लोगों ने 'आत्म-मनःसंवाद प्रकरण' भी रखा है। 'तत्' और 'त्वं' पदार्थ का
शोधन संक्षिप्त तथा विस्तृत रूप से किया गया; और ब्रह्मात्मैक्यलक्षण वाक्यार्थज्ञान सफल है, समस्त वेदान्त वाक्यों से
उसकी प्रतीति होती है, यह प्रमाण और युक्ति से भी बता चुके । नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त, सत्य, ज्ञान, अनन्त आनन्द स्वरूप
प्रत्यगात्मा के सम्बन्ध में भेद-विपर्यासादि अनेक अनर्थों के होते रहने में अहंकार, मन, बुद्धि, एवं चित्त का
संघातारूप अन्तःकरण ही हेतुभूत है—यह भी बता चुके हैं। अब हम मुख्यतया यह बता रहे हैं कि आत्मा का संसार
मनोऽध्यासमूलक ही होता है, अतः उस मन का स्वरूप और उसकी चेष्टाओं का अनुसन्धान करते हुए उसका विलापन
करने में प्रयत्नशील होना चाहिये । इसी अभिप्राय से 'आत्म-मनःसंवादरूप प्रकरण' का प्रारंभ करने की इच्छा से
ग्रंथकार प्रथमतः प्रकरण के प्रयोजन को बता रहे हैं—यह मानव प्राणी तृष्णारूपी ज्वर की नाशक ज्ञान-वैराग्यरूपी
औषधि का प्रयोग करने से कामज्वरजनित मूर्छा तथा सैकड़ों विषयों के संबंध से प्राप्त होनेवाली दुःखमयी शरीर-
परम्परा को प्राप्त नहीं होता है ॥ १ ॥
अहं ममेति त्वमनर्थमीहसे परार्थमिच्छन्ति तवान्य ईहितम् ।
न तेऽर्थबोधो न हि मेऽस्ति चार्थिता ततश्च युक्तः शम एव ते मनः ॥२॥
अह्मिति—हे मन ! तू 'अहम्-मम'-मैं और मेरा इस आकार से व्यर्थ चेष्टा करता रहता है । सांख्यवादी
विद्वान् तेरी चेष्टा को परार्थ (पुरुष के भोगापवर्गार्थ) मानते हैं । तू मुझपर उपकार कर ही कैसे सकता है ? क्योंकि तू
अचेतन है, अतः तुझे अर्थज्ञान का होना संभव नहीं है, और मुझमें कोई किसी प्रकार की अर्थिता नहीं है । ऐसी स्थिति में
हे मन ! तेरा शान्त रहना ही समुचित है ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस औषधिप्रयोग प्रकरण का आत्ममनःसंवाद के रूप में विस्तार करते हुए बता रहे हैं—हे मन ! तू 'मैं,
मेरा' इस प्रकार की व्यर्थ चेष्टा कर रहा है । यदि कहो कि मैं तुम्हारे लिये ही चेष्टा कर रहा हूँ, अतः उस चेष्टा को
व्यर्थ क्यों कह रहे हो ? अन्य सांख्यवादी लोग तुम्हारी चेष्टा को परार्थ अर्थात् पुरुष के भोग और अपवर्ग के लिये
मानते हैं । किन्तु हम वेदान्त सिद्धान्तवादी यह नहीं मानते । तुझे मेरा प्रयोजनीय विषय ही ज्ञात नहीं है, क्योंकि
तू अचेतन है, और न मुझे तुझसे कुछ माँगना ही है । ऐसी स्थिति में, रे मन ! तेरा शान्त हो जाना ही उचित है ॥२॥
१. इस १९ वे प्रकरण को 'भेषज प्रकरण' भी कहते हैं, क्योंकि इसमें देहप्राप्ति रूप रोग को नष्ट करने वाली औषधि को
बताया जा रहा । उसी तरह यह औषधोपचार, 'आत्म-मनःसंवाद' के रूप में किया जा रहा है, इसलिये इस प्रकरण को
'आत्म-मनःसंवाद' प्रकरण भी कहते हैं ।

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६१
यतो न चान्यः परमात् सनातनात् सदैव तृप्तोऽहमतो न मेऽर्थिता ।
सदैव तृप्तश्च न कामये हितं यतस्व चेतः प्रशमाय *ते हितम् ॥३॥
यत इति—मैं (प्रत्यगात्मा) सनातन अर्थात् पूर्णानन्दस्वरूप ‘परमात्मा’ से भिन्न नहीं हूँ, और सर्वदा ही तृप्त हूँ
हूँ, अतः मुझे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है। सर्वदा ही तृप्त रहने के कारण स्वयं के लिये किसी प्रकार के हित की भी
इच्छा नहीं करता। अतः हे चित्त (मन) ! तू शान्त होने के लिये ही प्रयत्न (चेष्टा) कर, यही तेरे लिये हितकर होगा ॥ ३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा के अर्थित्वाभाव को सिद्ध कर रहे हैं—मैं (आत्मा) तो सनातन पूर्णानन्दस्वरूप परमात्मा से पृथक्
नहीं हूँ, मैं तो सदा-सर्वदा ही तृप्त हूँ। अतः मुझे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है। मैं सर्वदा तृप्त होने के कारण
अपने लिए किसी हित की कामना भी नहीं करता। इसलिए हे मन ! तू शान्त हो जाने का प्रयत्न कर। यही तेरे
हित में होगा ॥ ३ ॥
षडूर्मिमालाभ्यतिवृत्त एव यः स एव चात्मा जगतश्च नः श्रुतेः ।
प्रमाणतश्चापि मया प्रवेद्यते मुधैव तस्माच्च मनस्तवेहितम् ॥४॥
षडूर्मिमालेति—जो पुरुष 'क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्यु'—इन छह ऊर्मिमाला (ऊर्मियों) से
पार हो जाता है, वही पुरुष हमारा और जगत् का 'आत्मा' है। उसे हम 'यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म'—इस श्रुति से तथा
'य आत्मा सर्वान्तरः'—इस श्रुति से और 'अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः'—इस स्मृति प्रमाण से भी सम्यक्तया
(यथार्थरूप से) समझते हैं। अतः हे मन ! तेरी दौड़-धूप की चेष्टा करना व्यर्थ है ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
परमात्मा से अभिन्न होने के कारण अपने अर्थित्वाभाव को बताया। अब परमात्मा से अपनी अभिन्नता
का उपपादन कर रहे हैं—अशनाया (क्षुधा), पिपासा, शोक, मोह, जरा, मृत्यु ये छह ऊर्मियां कहलाती हैं। ये छह
ऊर्मियाँ प्राण, मन, और देह की धर्मरूप हैं। ये छहों धर्म, नदी की ऊर्मि (तरंग) की तरह आविर्भाव-तिरोभावरूप हैं।
यह आत्मा उक्त छह ऊर्मिमाला अर्थात् ऊर्मिपरम्परा को पार किये हुए है, वही हमारा और जगत् का आत्मा है।
अर्थात् वह आत्मा निष्प्रपञ्च है। उसे हम श्रुति¹-स्मृति² के प्रमाणों से अच्छी तरह जानते हैं। अतः हे मन ! तेरी
सब चेष्टाएँ व्यर्थ हैं ॥ ४ ॥
त्वयि प्रशान्ते नहि चास्ति भेदधीर्यतो जगन्मोहमुपैति मायया ।
ग्रहो हि मायाप्रभवस्य कारणं ग्रहाद्विमोके नहि साऽस्ति कस्यचित् ॥५॥
त्वयीति—तू जब शान्त हो जायगा, तब 'भेदबुद्धि' नहीं रह पायेगी। उस भेदबुद्धि से ही यह संसार, 'माया'
के अधीन होकर 'मोह' को प्राप्त हो रहा है, क्योंकि 'भेदबुद्धि' से ही 'माया' की उत्पत्ति होती है। उस 'भेदबुद्धि' के निवृत्त
होते ही वह 'माया' भी उसके लिये नहीं रह पाती ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
तेरे शान्त हो जाने पर भेदबुद्धि नहीं रहती। भेदबुद्धि से ही यह संसार, माया के कारण मोह को प्राप्त
होता है। क्योंकि अकृतार्थताभिमानलक्षणा माया की उत्पत्ति का कारण भेदज्ञान ही है। उस भेदज्ञान के निवृत्त
होते ही वह माया भी किसी के लिये नहीं रहती। मन के प्रशांत होने पर वह भेदबुद्धि नहीं रह पाती, क्योंकि
सुषुप्ति में मन का अभाव रहता है, तब भेदबुद्धि भी नहीं रहती, यह अन्वय-व्यतिरेक से सिद्ध है। सुषुप्ति में भेद-
बुद्धि के न रहने पर माया-मोह भी नहीं रहता ॥ ५ ॥
१. (बृ. उ. ३।४।१) ‘यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म’, ‘य आत्मा सर्वान्तरः’ ।
२. (भ. गी. १०।२०) ‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ॥’

  • तेऽधिकम्—पाठान्तरम् ।

२६२ उपदेशसाहस्री
न मेऽस्ति मोहस्तव चेष्टितेन हि प्रबुद्धतत्त्वस्ववसितो ह्यविक्रियः ।
न पूर्वतत्त्वोत्तरभेदता हि नो वृथैव तस्माच्च मनस्तवेहितम् ॥६॥
नेति—तेरी चेष्टा से मुझ पर मोह का कोई प्रभाव नहीं पड़ पाता क्योंकि मैं 'ज्ञाततत्त्व, बन्धनरहित तथा
अविकारी' हूँ, क्योंकि हमारी दृष्टि में तत्त्वज्ञान के पूर्व और उत्तर काल में कोई अन्तर नहीं है। अतः हे मन ! तेरी
सम्पूर्ण चेष्टा व्यर्थ ही है ॥ ६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अरे मन ! तेरी चेष्टा से मुझे मोह नहीं हो सकता, क्योंकि मैं बन्धरहित, प्रबुद्धतत्त्वस्वरूप, और विकार-
शून्य हूँ। मेरी दृष्टि में तत्त्वज्ञान होने के पूर्व और उसके उत्तर काल में कोई भी विशेष (भेद) लक्षित नहीं हो
रहा है। इसलिये हे मन ! तेरी चेष्टा व्यर्थ ही है, क्योंकि तुम्हारी चेष्टा से मुझमें कोई अतिशय नहीं हो
सकता ॥ ६ ॥
यतश्च नित्योऽहमतो न चान्यथा विकारयोगे हि भवेदनित्यता ।
सदा प्रभातोऽहमतो हि चाद्वयो विकल्पितं चाप्यसदित्यवस्थितम् ॥७॥
यत इति—'मैं नित्य हूँ', अतः मुझमें 'अनित्यता' नहीं है। 'विकार' का योग होने पर ही वह (अनित्यता)
हो पाती है (परन्तु मैं अविकारी होने से नित्य हूँ)। 'मैं सर्वदा प्रकाशस्वरूप हूँ', अतः 'अद्वय' हूँ। जो कुछ 'दृश्य' है, वह
सब 'असत्' है। यह बात निश्चित है ॥ ७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
समस्त दृश्यवर्ग से परे रहनेवाले इस आत्मा में आगन्तुक अतिशय का सम्बन्ध कभी नहीं हो सकता ।
अन्यथा आत्मा में अनित्यता प्राप्त होगी । अनित्यता की प्राप्ति किस कारण होगी, जो कि उसका निषेध किया जा रहा
है ? मैं तो नित्य हूँ, अतः मुझ में अनित्यता नहीं है। अनित्यता तो विकार का संबन्ध होनेपर ही होती है। यदि
कहो कि परिस्पन्द-परिणामादिरूप विकार के न रहने पर भी प्रकाशाप्रकाशसंसर्गरूप विकार हो सकता है, तो उसका
उत्तर यह है कि मैं सर्वदा ही प्रकाशस्वरूप हूँ। इस विषय में¹ श्रुति प्रमाण है। मैं अद्वय हूँ। यदि कहो कि दृश्यभेद के
विद्यमान रहते अद्वय कैसे हो सकते हो ? उत्तर यह है कि आगन्तुक रज्जु-सर्प की तरह जो कुछ भी दृश्य है, वह सब
असत् है, इसे निश्चित समझो ॥ ७ ॥
अभावरूपं त्वमसीह हे मनो निरीक्ष्यमाणे न हि युक्तितोऽस्तिता ।
सतो ह्यनाशादसतोऽप्यजन्मतो द्वयं च चेतस्तव नास्तितेष्यते ॥८॥
अभावरूपमिति—हे मन ! तू अभावरूप है। युक्तिपूर्वक विचार करने पर तेरा 'अस्तित्व' सिद्ध नहीं
होता। क्योंकि जो वस्तु 'सत्' होती है, उसका कभी 'नाश' नहीं होता, तथा जो वस्तु 'असत्' होती है, उसकी 'उत्पत्ति'
नहीं होती। किन्तु हे चित्त ! तुझमें ये दोनों (उत्पत्ति और नाश) हैं। अतः तेरी परमार्थसत्ता नहीं है। तुझे अभावरूप
मानना ही इष्ट है ॥ ८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
मन के होने से तो आत्मा की सद्वितीयता अवगत हो रही है, अतः उसे अद्वितीय कैसे मान लिया जाय ?
रे मन ! तू तो अभावरूप है, युक्तिपूर्वक विचार करने पर तुम्हारा अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। क्योंकि गीता में
भगवान कहते हैं²—'सत् वस्तु' का कभी नाश नहीं होता, और 'असत् वस्तु' की कभी उत्पत्ति नहीं होती। रे मन !
तुझ में तो उत्पत्ति और विनाश दोनों हैं। इस कारण तेरी पारमार्थिक (वास्तविक) सत्ता नहीं मानी जा
सकती ॥ ८ ॥
१. सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ।—(छां. उ. ८।४।२) तथा
पश्यन्वै तन्न पश्यति ।—(बृ. उ. ४।३।२३)
२. "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।"—(भ. गी. २।१६)

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६३
द्रष्टा च दृश्यं च तथा च दर्शनं भ्रमस्तु सर्वस्तव कल्पितो हि सः ।
दृशेश्च भिन्नं न हि दृश्यमीक्ष्यते स्वपन् प्रबोधेन तथा न भिद्यते ॥९॥
द्रष्टेति—हे मन ! 'द्रष्टा' 'दृश्य' और 'दर्शन' इस प्रकार से लोगों को जो 'भ्रम' होता है, वह सब तेरी ही
कल्पना का खेल है। क्योंकि 'द्रष्टा' से भिन्न 'दृश्य' नहीं देखा गया है। तथा स्वप्नगत 'आत्मा', जाग्रत् अवस्था के द्वारा
भेद को प्राप्त नहीं होता है, अर्थात् दोनों अवस्थाओं में 'आत्मा' एक ही है, भिन्न-भिन्न नहीं। तथापि भिन्नवत् प्रतीति हुआ
करती है,—यह तेरा ही तो खेल है ॥९॥
हृदयस्पर्शिनी
'बीजाभावे कुतः फलम्'—बिना बीज के फल कहाँ ? इस न्याय से आत्मा की अद्वितीयता को स्पष्ट कर
रहे हैं—रे मन ! द्रष्टा, दृश्य, और दर्शनरूप जो भ्रम है, वह सब तुम्हारे द्वारा ही कल्पना किया हुआ है। क्योंकि
'दृश्य' को 'द्रष्टा' से भिन्न नहीं देखा जाता, तथा स्वप्नगत आत्मा जाग्रत् अवस्था के द्वारा भेद को प्राप्त नहीं होता।
अर्थात् स्वप्नकाल में भिन्नवत् प्रतीत होनेपर भी वह अभिन्न ही है, उसी प्रकार जाग्रत्काल में भी उसमें कोई भेद नहीं
होता है। स्वप्न में उसकी अद्वितीयता श्रुतिसिद्ध है¹॥ ९॥
विकल्पना वाऽपि तथाऽद्वया भवेदवस्तुयोगादललातचक्रवत् ।
न शक्तिभेदोऽस्ति यतो न चाऽऽत्मनां ततोऽद्वयत्वं श्रुतितोऽवसीयते ॥१०॥
विकल्पनेति—इसी प्रकार 'अवस्तु' से योग (सम्बन्ध) होने के कारण 'विकल्प' भी अलात चक्र के सदृश
'अद्वय' ही होता है। जो शब्द से होने वाले ज्ञान का तो अनुगमन करता है किन्तु वस्तुशून्य रहता है, उसे 'विकल्प' कहते
हैं। महर्षि पतञ्जलि ने कहा भी है—"शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः" । आत्माओं का परस्पर शक्तिभेद नहीं है,
इसलिये श्रुतिप्रमाण से उनका अभेद ही सिद्ध होता है ॥ १० ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कहो कि विकल्पाभाव रहने पर भी विकल्पना तो सत्य है ही, इसलिए अद्वैत की उपपत्ति नहीं हो
पा रही है। तो सुनो कि अवस्तु से सम्बन्धित होने के कारण विकल्प भी अलातचक्र के समान अद्वय ही है, क्योंकि
आत्माओं का परस्पर शक्तिभेद नहीं है। अतः श्रुति के द्वारा उनका अभेद सिद्ध होता है। जैसे दृश्य भिन्न नहीं, वैसे
ही विकल्पना भी भिन्न नहीं है। किन्तु अवस्तु के योग से अवस्तुविषयकत्वेन उसका निरूपण किया जाता है। जैसे
परिभ्रमणशील अलात की चक्राकारता अलात से पृथक् वस्तु नहीं, उसी तरह विकल्पना भी चिदात्मा के अतिरिक्त
कोई पृथक् वस्तु नहीं। इस रीति से उसकी अद्वयता का उपपादन करने पर भी पुनः शंका होती है कि दृष्टि, श्रुति,
मति आदि शक्तिरूप स्वगत भेद के विद्यमान होने से आत्मा की अद्वयता नहीं बन पा रही है, तथा प्रत्येक शरीर में
आत्मभेद (भिन्न-भिन्न आत्मा) के प्रसिद्ध रहने से सजातीय भेद भी है, तब उसे अद्वय कैसे कहा जाय ? तुम्हारी शंका के
अनुसार मानने में श्रुति का विरोध होता है। श्रुति कहती है—"अकृत्स्नो हि सः प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति वदन् वाक्
पश्यंश्चक्षुः शृण्वञ्छ्रोत्रं मन्वानो मनः तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव²"—यह श्रुति चिदात्मा के दृष्टत्वादि भेद को औपाधिक
बता रही है। अन्यान्य श्रुतियों ने सर्वत्र आत्मा की एकता को ही बताया है। जैसे—"एको देवो बहुधाः निविष्टः³",
"एकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति⁴", "एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा⁵" ये सभी श्रुतियाँ आत्मा की एकता को ही बता रही है।
१. "सलिल एको द्रष्टाऽद्वैत भवति" तथा (बृ. उ. ४।३।३२) "अथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक् सर्वैर्नामभिः
सहाप्येति ।" (कौ. ३।३)
२. (बृ. उ. १।४।७)
३. (तै. आ. ३।१४)
४. (ऋ. सं. १०।११४।५)
५. (कठ. उ. ५।९)

२६४ उपदेशसाहस्री
इसी प्रकार भेदनिषेधक अन्यान्य श्रुति-स्मृतियों को भी देखना चाहिये। विष्णुसहस्रनामस्तोत्र के १० वे मंत्र का
भाष्य, तथा सनत् सुजातीय के २० वे श्लोक का भाष्य अवलोकनाहँ है ॥ १०॥
मिथश्च भिन्ना यदि ते हि चेतनाः क्षयस्तु तेषां परिमाणयोगतः ।
ध्रुवो भवेद्वेनवतां हि दृष्टतो जगत्क्षयश्चापि समस्तमोक्षतः ॥११॥
मिथश्चेति—वे आत्मा यदि एक-दूसरे से परस्पर भिन्न हैं, तो वे ‘परिमित’ सिद्ध होते हैं, और ‘परिमित’ होने
के कारण उनका ‘क्षय’ (नाश) होना भी निश्चित रहेगा। क्योंकि जो पदार्थ ‘भेदयुक्त’ (भिन्न-भिन्न) होते हैं, उनका
‘क्षय’ होना देखा गया है, अर्थात् सर्वलोकप्रत्यक्ष है। तथा समस्त प्राणियों की मुक्ति होने पर ‘संसार’ का भी क्षय
हो जायगा ॥११॥
हृदयस्पर्शिनी
अब आगमबाह्यों की आत्मभेदकल्पना का युक्ति से निराकरण कर रहे हैं—यदि वे चेतनरूप आत्मा
परस्पर भिन्न हों तो वे मूलांकुरादिकों के समान परिमित होंगे। और जो परिमित होते हैं, वे विनाशी होते हैं—ऐसा
नियम है। इस नियम के अनुसार उनका (आत्माओं का) विनाश होने का प्रसंग प्राप्त होगा, क्योंकि भेदयुक्त पदार्थों
का क्षय देखा जाता है। और समस्त प्राणियों की मुक्ति हो जाने पर संसार का भी उच्छेद हो जायगा। भेद पक्ष में
एक-एक कल्प में एक-एक की मुक्ति होनेपर भी अनन्त गतकल्पों में अनन्त जीवों की मुक्ति होना संभव है, तब समस्त
जीवों का मोक्ष हो जाने से किसी भोक्ता के ही न रहनेपर तदर्थ जो भोग्य जगत् है, उसकी आवश्यकता ही न रहने से
उसका भी क्षय हो जायगा। अतः भेदपक्ष को स्वीकारना उचित नहीं है ॥ ११ ॥
न मेऽस्ति कश्चिन्न च सोऽस्मि कस्यचिद्यतोऽद्वयोऽहं न हि चास्ति कल्पितम् ।
अकल्पितश्चास्मि पुरा प्रसिद्धितो विकल्पनाया द्वयमेव कल्पितम् ॥१२॥
न मै इति—कोई भी वस्तु (पदार्थ) मेरी नहीं है, और न मैं ही किसी का हूँ, क्योंकि ‘मैं’ तो अद्वय हूँ।
दूसरी बात यह भी है कि ‘कल्पित पदार्थ’ की ‘सत्ता’ नहीं हुआ करती, किन्तु ‘मै’ तो कल्पना के पूर्व से ही सिद्ध हूँ। अतः
‘मैं’ अकल्पित हूँ। कल्पित तो ‘द्वैत’ ही है, मैं नहीं हूँ ॥ १२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
तब सिद्धान्ती से भेदवादी पूछता है कि तुम्हारे मत में भी जगत्-जीव-ईश्वर यह भेद तो विद्यमान है
ही, तब तुम्हारे मत में उक्त दोष का परिहार कैसे होगा? इस पर सिद्धान्ती कहता है—मेरे मत में दोष इसलिये
नहीं है, क्योंकि मैं अद्वय हूँ, वस्तुतः मेरा गुणभूत (अंगभूत) अथवा प्रधानभूत, अथवा मेरे जैसा दूसरा कोई नहीं है।
कोई भी पदार्थ मेरा नहीं है, और न ही मैं किसी का हूँ, क्योंकि मैं अद्वय हूँ। जो जगत् है, वह तो कल्पित है, कल्पित
पदार्थ की सत्ता नहीं होती। तथाच जीव-ईश्वर-जगत् का भेद बताने वाला कोई प्रमाण नहीं है। वह भेद प्रमाणाऽ-
सहिष्णु है, वह तो केवल अलंकारमात्र है। अतः हमारे मत में दोष का कोई प्रसंग ही नहीं है। इस पर पुनः प्रश्न
हो सकता है कि जैसे ‘द्वैत’ एक पदार्थ है, वैसे ही ‘अद्वैत’ भी एक पदार्थ है, अतः दोनों में कोई विशेष न होने से
कल्पितत्व तो पूर्व की तरह ही स्थित रहा। तब उत्तर देते हैं कि निरधिष्ठान कल्पना नहीं हुआ करती और निरवधिक
बाध भी नहीं हुआ करता। अतः समस्त कल्पनाओं के पहले से ही जो सिद्ध है, तथा कल्पितबाध की कोई-न-कोई
अवधि रहने के पश्चात् जो अवशिष्यमाण होगा, उसे कल्पित नहीं कहा जाता, अपितु वह स्वतःसिद्ध रहता है। उसी
स्वतःसिद्ध रहनेवाली वस्तु को ‘अद्वय’ शब्द से कहते हैं। तात्पर्य यह है कि विकल्पना के पूर्व भी मेरी प्रसिद्धि रहने
से मैं अकल्पित हूँ, और मूलगत ‘च’ शब्द से अवधिभूत होने से कल्पना के अनन्तर (पश्चात्) भी हूँ, और बीच में
उसका साक्षी होने से मैं अकल्पित ही हूँ। परिशेषात् सापेक्ष होने से जगत् और जीव ये दो ही कल्पित हैं। अतः द्वैत
ही कल्पित है, अद्वैत नहीं ॥ १२ ॥

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६५
विकल्पना चाप्यभवे न विद्यते सदन्त्यदित्येवमतो न नास्तिता ।
यतः प्रवृत्ता तव चापि कल्पना पुरा प्रसिद्धेर्न च तद्धि कल्पितम् ॥१३॥
विकल्पनेति—आत्मा 'नित्य' है, उसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुआ करती । उस नित्य आत्मा में 'सत्' एवं
'असत्' की कल्पना भी नहीं की जा सकती । इसलिये पूर्व सिद्ध होने के कारण उस रे मन ! आत्मा में तुम्हारी कल्पना की
जाने मात्र से उसको ( आत्मा को ) कल्पित नहीं कहा जा सकता ॥ १३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा तो कल्पना का विषय ही नहीं है। जिसकी कभी उत्पत्ति ही नहीं होती, ऐसे नित्य आत्मा में सत्
और असत् की कल्पना भी नहीं है । इसलिये उसका अभाव भी नहीं है। तुम्हारी कल्पना जिससे प्रवृत्त हुई है, वह
आत्मा पूर्वसिद्ध होने के कारण उसे कल्पित नहीं कहा जा सकता ॥ १३ ॥
असद्द्वयं तेऽपि हि यद्यदीक्ष्यते न दृष्टमित्येव न चैव नास्तिता ।
यतः प्रवृत्ता सदसद्विकल्पना विचारवद्वाऽपि तथाऽद्वयं च सत् ॥१४॥
असदिति—हे मन ! तेरे द्वारा जो भी देखा जाता है, वह सभी द्वैत समुदाय 'असत्' ही है। दिखाई नहीं देता,
इस कारण किसी पदार्थ का अभाव सिद्ध नहीं होता । विचार का पर्यवसान जैसे निर्णय में होता है, वैसे ही जिससे 'सत्'
और 'असत्' की कल्पना प्रवृत्त हुई है, वह 'अद्वय' एवं 'सत्' ही है, वह कल्पना की अधिष्ठानभूत 'वस्तु' है ॥ १४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस पर पूर्वपक्षवादी कहता है कि जो उपलब्ध होता है उसकी सत्ता मानी जाती है, और जो उपलब्ध
नहीं होता उसकी सत्ता नहीं मानी जाती । द्वैत की तो उपलब्धि होती है, अद्वैत की नहीं, तब अद्वैत की सत्ता कैसी
मानी जाय ? इस शंका के समाधान में सिद्धान्ती कहता है कि किसी वस्तु की सत्ता या असत्ता में उसका दीखना
या न दीखना कारण नहीं है । किन्तु वस्तु की सत्ता या असत्ता में निश्चायक कोई अन्य ही हेतु है। इसलिये रे मन !
तुम्हारे द्वारा जो-जो देखा जाता है, वह द्वैत ही देखा जाता है, वह तो स्वप्नदृष्ट वस्तु की तरह विनष्टस्वरूपवाला
होने से असत् ही है । उसी तरह दिखाई नहीं देती, इसलिये वह वस्तु है ही, नहीं ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि
नीरूप वायु का चाक्षुष प्रत्यक्ष न होने पर भी उसकी (वायु की) असत्ता नहीं कही जाती । अपितु उसकी सत्ता ही
मानी जाती है । वस्तु के विद्यमान रहने पर भी द्रष्टा के असामर्थ्य से, अथवा दर्शनयोग्यता के न रहने से उसका
दर्शन होना असंभव हो जाता है । अतः किसी वस्तु के दर्शन या अदर्शन मात्र से उसकी सत्ता या असत्ता का निर्णय
नहीं किया जा सकता । जिस प्रकार विचार का पर्यवसान निर्णय में होता है, उसी तरह जिससे सत् और असत् की
कल्पना प्रवृत्त हुई है, वह कल्पना की अधिष्ठानभूत वस्तु अद्वय है और वही सत् है ॥ १४ ॥
सदभ्युपेतं भवतोपकल्पितं विचारहेतोर्यदि तस्य नास्तिता ।
विचारहानाच्च तथैव संस्थितं न चेत्तदिष्टं नितरां सदिष्यते ॥१५॥
सदिति—यदि तुम यह कहते हो कि 'सद्' वस्तु कोई है ही नहीं किन्तु इसका निर्णय करने के लिये तुम्हें
विचार करना पड़ता है या नहीं ? यदि तुम्हें विचार करना पड़ता है, तो तुमने 'सत् वस्तु' की सत्ता को स्वीकार कर ही
लिया है, यह मानना होगा, क्योंकि विचार करने के लिये किसी आधारभूत पदार्थ की सत्ता को स्वीकार किया जाता है ।
यदि आधार को स्वीकार न किया जाय तो विचार की प्रवृत्ति ही नहीं होगी। तब 'तत्त्व' का निर्णय ही नहीं हो पायगा ।
इस प्रकार 'तत्त्व' का अनिर्णय यदि अभीष्ट नहीं है- तो यह निश्चित ही है कि 'सद्वस्तु' तुम्हें स्वीकार्य है ॥ १५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
विचार करने के लिए वादी और प्रतिवादी को अपने विवाद की आश्रयभूत किसी वस्तु का अवलंब
(स्वीकार) करना ही पड़ता है; नहीं तो विवाद हो ही नहीं सकता । जैसे—आत्मा की सगुणता अथवा निर्गुणता का
३४

२६६ उपदेशसाहस्री
निर्णय करना हो तो दोनों पक्षों को धर्मिस्वरूप आत्मा की सत्ता का स्वीकार तो करना ही पड़ेगा, अन्यथा उसके
सगुणत्व या निर्गुणत्व धर्म का विचार ही कैसे प्रवृत्त हो सकेगा ? तुम्हारा कहना है कि कोई सत् वस्तु नहीं है, किन्तु
उसके निर्णयार्थ तुम्हें विचार करना होगा कि नहीं ? निर्णयार्थ यदि तुम विचार करना आवश्यक समझते हो तो तुमने
'सत्' वस्तु की सत्ता को पहले स्वीकार कर ही लिया। क्योंकि उसके बिना विचार का आरंभ ही नहीं हो सकेगा।
यदि उसका अस्तित्व न माना जाय तो विचार की प्रवृत्ति न होने के कारण निर्णय न हो पाने से वह तत्त्व अनिर्णीत ही
रह जाता है। यदि ऐसा होना इष्ट नहीं है तो 'सत्' को निश्चित रूप से स्वीकार करना ही होगा ॥ १५ ॥

असत्समं चैव सदित्यपीति चेदनर्थवत्त्वान्नग्शृङ्गतुल्यतः ।
अनर्थवत्त्वं त्वसति ह्यकारणं न चैव तस्मान्न विपर्ययेऽन्यथा ॥१६॥

असत्सममिति—इस पर पूर्व पक्षी का कहना है कि 'सत्' वस्तु का स्वीकार करनेपर भी वह (सद्वस्तु) अर्थक्रिया-
शून्य होने के कारण नरशृङ्ग के समान उसको 'अलीक' ही कहना होगा। तब सिद्धान्ती कहता है कि वस्तु की अर्थक्रिया-
शून्यता उसकी 'असत्ता' में कारण नहीं है, तथा अर्थक्रियाकारित्व से 'वस्तु' की 'सत्ता' सिद्ध नहीं हुआ करती। अतः
इससे विपरीत अवस्था में 'वस्तु' का अभाव रहना भी संभव नहीं है ॥ १६ ॥

हृदयस्पर्शिनी
पूर्वपक्षी बौद्ध का कथन है कि जो वस्तु सत् होती है, वह सक्रिय होने से दीपशिखा के तुल्य क्षणिक होती
है। और जो सक्रिय नहीं होती, वह असत् होती है। अतः परमार्थ वस्तु सत् नहीं हो सकती। यदि 'सत्' है ऐसा
स्वीकार किया भी जाय तो अर्थक्रियाशून्य होने के कारण नरशृंग के तुल्य होने से वह अलीक (मिथ्या) ही होगी।
इसपर सिद्धान्ती का कहना है कि वस्तु की असत्ता में 'अर्थक्रियाशून्यत्व' को कारण नहीं कहा जा सकता। 'अर्थक्रिया-
कारित्व' से 'वस्तु की सत्ता' सिद्ध नहीं होती। क्योंकि कण्टकादि के अभाव में भी पादन्यासरूप क्रिया हो सकती है
तथा क्रिया की उत्पत्ति से पूर्व भी वस्तु की सत्ता देखी जाती है। अतः अर्थक्रियाकारित्व से रहित होनेपर भी वस्तु
'सत्' हो सकती है। उसका अभाव संभव नहीं है ॥ १६ ॥

असिद्धतश्चापि विचारकारणाद्द्वयं च तस्मात्प्रसृतं च मायया ।
श्रुतेः स्मृतेश्चापि तथा हि युक्तितः प्रसिद्धयतीत्थं न तु युज्यतेऽन्यथा ॥१७॥

असिद्धतश्चेति—इसके अतिरिक्त तुम्हारे द्वारा किये गये अनुमान— 'श्रोतं सत् असत्समं अर्थक्रियाशून्यत्वात्,
नरशृङ्गवत्' में 'असिद्धि' दोष के कारण उक्त हेतु हेत्वाभासरूप है। विचार के कारणभूत 'आत्मा' से ही मायावश 'द्वैत'
का विस्तार हुआ है। श्रुति, स्मृति और युक्ति से भी यही सिद्ध हो रहा है। और कोई अन्य प्रकार बताना युक्तिविरुद्ध
है ॥ १७ ॥

हृदयस्पर्शिनी
इसके पूर्व के श्लोक में व्यभिचार-दोष का प्रदर्शन करते हुए बौद्धमत का खण्डन किया है। अब इस श्लोक
में पक्षासिद्धिरूप दोष को बता रहे हैं। तुम्हारा अनुमान असिद्धिदोष से दूषित होने के कारण भी ठीक नहीं है।
विचार के हेतुभूत आत्मा से ही मायावश द्वैत का विस्तार हुआ है। क्योंकि "मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु
महेश्वरम्"१ तथा 'मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्'२ इत्यादि श्रुति-स्मृति तथा कार्य का वाचारंभणत्व भी
किसी सद्रूप अधिष्ठान के रहने पर ही संभव हो सकता है, इस युक्ति३ से भी सर्वाधिष्ठानभूत परमार्थतत्व सत् ही हो
सकता है, असत् नहीं। अतः 'अर्थक्रियाकारित्व का अभाव वस्तु की असत्ता का कारण है'-यह हेतु असिद्ध है। यदि

१. (श्वे. उ. ४।१०)
२. (भ. गी. ९।१०)
३. (ब्र. सू. २।१।१४)

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६७
केवल 'अर्थक्रियाकारित्वाभाव' को हेतु न कहकर उसमें 'परमार्थ' विशेषण जोडकर 'परमार्थतः अर्थक्रियाकारित्वाभाव'
को हेतु कहें, तो भी ठीक नहीं है, क्योंकि परमार्थतः अर्थक्रियाकारित्व में कोई दृष्टान्त नहीं है। अन्यथा स्थिर या
क्षणिक वस्तु में परमार्थतः अर्थक्रियाकारित्व संगत नहीं है, क्योंकि अक्रिय कभी कारक नहीं हो सकता। क्रियाकार्य
के प्रति भी क्रियावत्त्व यदि माना जाय तो अनवस्था दोष होगा। अतः तुम्हारे अनुमान में हेतु के दूषित रहने से उससे
साध्यसिद्धि नहीं हो सकती ॥ १७ ॥
विकल्पनात्त्वाच्चापि विधर्मकं श्रुतेः पुरा प्रसिद्धेश्च विकल्पतोऽद्वयम् ।
न चेति नेतीति यथा विकल्पितं निषिद्धयतेऽत्राप्यविशेषसिद्धये ॥१८॥
विकल्पनादिति- यदि यह कहो कि 'आत्मा' सर्वविकल्पविशिष्ट है, क्योंकि वह समस्त विकल्पों का कारण
है। किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि श्रुति प्रमाण से तथा विकल्प से पूर्व भी उसके विद्यमान रहने के कारण
यह अद्वितीय आत्मा, विकल्प से भिन्न स्वभाव का है। जिस प्रकार अवशिष्ट वस्तु को बताने के लिये 'नेति-नेति' कह कर
विकल्प का निषेध किया जाता है, उस तरह 'आत्मा' का निषेध नहीं किया जाता ॥ १८ ॥
हृदयस्पशिनी
इस पर पूर्वपक्षी पुनः शंका कर रहा है कि जब अद्वय, समस्त विकल्पों का हेतु है, तो वह सर्व विकल्पों से
युक्त हो ही जायगा। किन्तु ऐसी शंका करना उचित नहीं। क्योंकि “निष्कलं निष्क्रियम्” इस श्रुति से तथा विकल्प
से पूर्व भी विद्यमान रहने के कारण अद्वितीय आत्मा विकल्प के स्वभाव से भिन्न स्वभाव का है। जिस प्रकार अवशिष्ट
वस्तु की सिद्धि के लिए “नेति-नेति” वाक्य से विकल्प का निषेध किया जाता है, उस तरह अद्वय आत्मा का निषेध
नहीं किया जाता। शुक्ति पर आरोपित रजत के समान प्रत्येक आरोपित वस्तु असत् होती है, तथापि उसका अधि-
ष्ठान सत्य (सत्) होता है। आत्मा समस्त विकल्पों का अधिष्ठान है। अतः विकल्पमात्र मिथ्या है, अधिष्ठानस्वरूप
आत्मा मिथ्या नहीं है। इसीलिए 'नेति-नेति' वाक्य से केवल आरोपित विकल्प का ही बाध किया जाता है, उसके
अधिष्ठानभूत परमार्थसत्य आत्मा का नहीं ॥ १८ ॥
अकल्पितेऽप्येवमजेऽद्वयेऽक्षरे विकल्पयन्तः सदसच्च जन्मभिः ।
स्वचित्तमायाप्रभवं च ते भवं जरां च मृत्युं च नियान्ति संततम् ॥१९॥
अकल्पितेऽपीति- यद्यपि 'आत्मा' अकल्पित, अजन्म, अद्वय और अविनाशी है, तथापि जो मनुष्य उसमें
(आत्मा में) 'सत्-असत्' कर्तृत्व की कल्पना करते हैं, वे सर्वदा स्व-बुद्धिभ्रम से कल्पित जन्म, जरा, मृत्यु को प्राप्त होते
रहते हैं ॥ १९ ॥
हृदयस्पशिनी
यथोक्त श्रुत्यर्थ में जो विकल्प करते हैं, वे अनर्थ को प्राप्त होते हैं। अर्थात् जो लोग अविकल्पित (कूटस्थ)
अर्थात् भेदविकारसंसर्गशून्य अजन्म, अद्वय और अविनाशी आत्मा में सत्, असत् तथा कर्तृत्वादि की कल्पना करते हैं,
वे निरन्तर तिर्यक्-मनुष्यादि योनियों के द्वारा अपने बुद्धिभ्रम से ही कल्पित जन्म, जरा एवं मृत्यु को प्राप्त होते
हैं ॥ १९ ॥
भवाभवत्वं तु न चेदवस्थितिर्न चास्य चान्यस्थिति जन्म नान्यथा ।
सतो ह्यसत्त्वादसतश्च सत्त्वतो न च क्रियाकारकमित्यतोऽप्यजम् ॥२०॥
भवाभवत्वमिति- कोई भी सद्वस्तु उत्पत्ति और अनुत्पत्ति दोनों से ही विलक्षण स्वभाव की नहीं हुआ
करती। क्योंकि 'उत्पत्तिमत्त्व' और 'अनुत्पत्तिमत्त्व'-दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध हैं। उस कारण 'द्वैत' के उत्पत्तिस्वरूप
को यदि स्वीकार नहीं करते तो उसकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होगी। यदि उसकी उत्पत्ति मानते हैं तो उसकी उत्पत्ति किसी
अन्य 'सत्' वस्तु से नहीं हो सकती, और न 'असत्' से ही हो सकती है, क्योंकि 'सत्' को विकारी होने के कारण 'असत्'

कहना होगा, और उपादान होने के कारण 'असत्' को 'सत्' कहना होगा। इसलिये क्रियाकारक कुछ भी नहीं है। अतः
एक निर्विशेष, अजन्मा 'आत्मा' ही है ॥ २० ॥
हृदयस्पर्शिनी
सद्बस्तु की कूटस्थता, अद्वितीयता, जो श्रुत्यादि प्रमाणों से सिद्ध है, उसकी स्व-बुद्धिभ्रम से अन्यथा कल्पना
मनुष्य किया करता है, अर्थात् वह अन्यथा कल्पना पुरुषापराधनिबन्धन है। उसी को सुदृढ़ करने के लिये अब
युक्ति बताते हैं। द्वैतवादी से हम पूछते हैं कि पहले यह बताओ, तुम्हारा अभिमत 'द्वैत' - उत्पद्यमान स्वभाववाला
है, या अनुत्पद्यमान स्वभाववाला है अथवा उभयस्वभाववाला है ? प्रथम पक्ष का स्वीकार करना उचित नहीं होगा,
क्योंकि उत्पत्ति (जन्म) तो किसी अन्य वस्तु से ही हो सकती है, अतः वह सापेक्ष है, उस कारण शुक्ति-रजतादि के
समान उसमें मिथ्यात्व आ जायगा। उसी तरह द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि तब उसे नित्य मानना
होगा, परिणाम यह होगा कि उसके अभाव का व्यवहार ही कभी नहीं हो सकेगा। उसी तरह तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं
है, क्योंकि एक ही वस्तु परस्परविरुद्धस्वभाव वाली नहीं होती। इसी अभिप्राय को मन में रखकर चतुर्थ पक्ष को
बताकर उसे भी दूषित कर रहे हैं। भवश्च अभावश्च भावाभवौ, तयोर्भावः भवाऽभवत्वम्। परस्पर विरुद्ध होने के कारण
'द्वैत' के भवाऽभवत्व (उत्पत्ति-अनुत्पत्ति) को विरोध के कारण यदि स्वीकार नहीं करते हो तो उसकी अवस्थिति
अर्थात् सत्ता ही सिद्ध न हो सकेगी। उभयस्वभावविलक्षण कोई भी वस्तु नहीं हुआ करती। यदि द्वैत की उत्पत्ति
कहें तो स्वतः ही जन्म होना संभव न रहने से, किसी दूसरे से ही कहना होगा। तब भी पुनः प्रश्न हो सकता है कि
उस द्वैत का जन्म 'सत्' वस्तु से है, या 'असत्' वस्तु से है ? किन्तु दोनों पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि उत्पत्तिशील होने
से 'सत्' विकारी होने के कारण 'असत्' सिद्ध होगा और उपादान होने के कारण असत् 'सत्' हो जायगा। अतः
क्रिया-कारक कुछ भी नहीं है। तात्पर्य यह है कि एक आत्मतत्त्व ही निर्विशेष, अजन्मा है ॥ २० ॥
अकुर्वदिष्टं यदि वाऽस्य कारकं न किञ्चिदन्यन्ननु नास्त्यकारकम् ।
सतोऽविशेषादसत्तश्च सच्युतौ *तुलान्तयोर्यद्वदनिश्श्यान्न हि ॥२१॥
अकुर्वदिति - इस द्वैत वर्ग के कारक को यदि निष्क्रिय माना जाय तो सभी वस्तुओं को कारक कहा जा सकेगा
और यदि उसे सक्रिय माना जाय तो उसका कारकत्व सिद्ध नहीं हो सकेगा, क्योंकि वह 'सत्' और 'असत्' दोनों ही अवस्था-
ओं में समान रहेगा। यदि 'सत्' के सत्त्व की तथा 'असत्' के असत्त्व की च्युति होने पर उनका कारकत्व कहा जाय तो जिस
प्रकार तराजू की डण्डी के उठने और झुकने में कौन किसका कारण है, यह निश्चय नहीं है, उसी प्रकार उनके कार्य-कारण
भाव का निश्चय नहीं किया जा सकता ॥ २१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि इस द्वैतवर्ग के कारक को निष्क्रिय माना जाय तो ऐसी कोई वस्तु नहीं रहती जो उसका कारक न
हो सके। उस अवस्था में सभी इसके कारक हो सकते हैं, क्योंकि क्रियाहीन तो सभी वस्तु हो सकती हैं। अतः उसे
यदि अन्यथा (सक्रिय) कहा जाय तो उसकी कारकता सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि वह सत् और असत् दोनों ही
अवस्थाओं में समान रहेगा। यदि उस 'सत्' या 'असत्' के सत्त्व या असत्त्व की च्युति होने पर उनका कारकत्व माना
जाय तो जिस प्रकार तुलादण्ड के उठने और झुकने में कौन किसका कारण है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता,
उसी प्रकार उनके कार्य-कारण भाव का निश्चय नहीं किया जा सकता। यदि सक्रिय वस्तु को द्वैत का कारण माना
जाय तो प्रश्न यह हो सकता है कि वह स्वभाव से सक्रिय है या किसी अन्य की अपेक्षा से ? यदि स्वभाव से सक्रिय
है तो उसकी क्रिया नित्य होने के कारण उससे सर्वदा कार्य की उत्पत्ति होती रहेगी, और यदि अन्य किसी की
अपेक्षा से उसे सक्रिय कहें तो उसके विषय में भी यही विकल्प होने के कारण अनवस्था आदि दोषों की प्राप्ति होगी।
अतः वह 'सत्' हो अथवा 'असत्' दोनों ही प्रकार से उसका कारकत्व सिद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि सत् होने पर
तो वह सर्वदा 'सत्' ही रहेगी, और 'असत्', होने पर वह सर्वदा 'असत्' ही रहेगी। यदि कार्य की उत्पत्ति के लिये
उसके सत्त्व या असत्त्व की प्रच्युति स्वीकार की जाय तो उसके स्वरूप में विरूपता आ जाती है। और उस अवस्था

  • तुलां तयोः - पाठान्तरम् ।

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६९
में यह प्रश्न भी किया जा सकता है कि वह अवस्थाच्युति और कार्य की उत्पत्ति, एक काल में होती है या क्रम से
होती है ? इसमें भी प्रथम पक्ष उचित नहीं है, क्योंकि तराजू के पलड़ों के झुकने-उठने में जैसे यह नहीं कहा जा
सकता कि कौन किसका कारण है, उसी प्रकार उनके कार्य-कारणभाव का निश्चय नहीं हो सकता, और यदि द्वितीय
पक्ष माना जाय तो अनवस्था दोष होगा, क्योंकि अवस्थाच्युति भी एक कार्य ही है, अतः उसे भी पहले ऐसी ही
अवस्थाच्युति की आवश्यकता होगी ॥ २१ ॥
न चेत्स इष्टः सदसद्विपर्ययः कथं भवः स्यात्सदसद्द्वयस्थितौ ।
विभक्तमेतद्द्वयमप्यवस्थितं न जन्म तस्माच्च मनो हि कस्यचित् ॥२२॥
न चेदिति—यदि ‘सत्’ और ‘असत्’ का विपर्यय ( वैपरीत्य ) अभीष्ट नहीं है, तो उनके स्वरूप निश्चित
रहने के कारण 'द्वैत' की उत्पत्ति कैसे होगी ? क्योंकि 'सत्' और 'असत्' दोनों ही परस्परसंसर्गरहित होकर ही स्थित हैं।
इसलिये हे मन ! किसी की भी उत्पत्ति का होना संभव नहीं है ॥ २२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
वस्तु की अवस्थान्तरापत्ति को स्वीकार करके हमने यह कहा था, वास्तव में तो सत् या असत् का
अवस्थान्तर होना उपपन्न नहीं है, इस कारण किसी में भी कार्यता-कारणता नहीं है। यदि सत् और असत् का इस
प्रकार विपरीतभाव को प्राप्त होना अभिष्ट नहीं है, तो सत् और असत् का स्वरूप निश्चित रहते हुए द्वैत की उत्पत्ति
कैसे हो सकती है ? क्योंकि ये सत् और असत् दोनों ही परस्परसंसर्गशून्य रहते हुए स्थित हैं। इसलिये हे मन !
किसी की भी उत्पत्ति संभव नहीं है ॥ २२ ॥
अथाऽभ्युपेत्याऽपि भवं तवेच्छतो ब्रवीमि नार्थस्तव चेष्टितेन मे ।
न हानवृद्धी न यतः स्वतोऽसतो भवोऽन्यतो वा यदि वाऽस्तिता तयोः ॥२३.।
अथेति—हे मन ! यद्यपि तेरे जन्म ( उत्पत्ति ) को मान भी ले तो भी मैं यह बता रहा हूँ कि जन्म की इच्छा
करने वाले तेरी चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन (हानि-लाभ) नहीं है, क्योंकि 'आत्मा' में जिनकी स्वयं सत्ता नहीं है, उन
हानि-लाभों ( प्रयोजनों ) का होना, किसी अन्य कारण से संभव नहीं है। यदि आत्मा में उनकी सत्ता हो तो भी तेरी
चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यद्यपि जिस किसी का जन्म (उत्पत्ति) हो भी, तथापि ब्रह्मभूत हुए मेरी कोई क्षति या वृद्धि नहीं है।
अरे मन ! तेरी उत्पत्ति (जन्म) स्वीकार करके भी मैं यह कह सकता हूँ कि जन्म (उत्पत्ति) की इच्छा रखनेवाले तेरी
चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन (हानि-लाभ) नहीं है। क्योंकि आत्मा में अविद्यमान हानि या वृद्धि (लाभ) का उद्भव
(उत्पत्ति) होना स्वतः या अन्य किसी हेतु से भी संभव नहीं है। और यदि आत्मा में उनकी सत्ता हो भी, तथापि
तेरी चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २३ ॥
ध्रुवा ह्यनित्याश्च न चान्ययोगिनो मिथश्च कार्यं न च तेषु युज्यते ।
अतो न कस्यापि हि किञ्चिदिष्यते स्वयं च तत्त्वं न निरुक्तिगोचरम् ॥२४॥
ध्रुवेति—स्थिर और अस्थिर ( क्षणिक ) वस्तुओं ( पदार्थों ) का न तो किसी अन्य से सम्बन्ध होता है, और
न परस्पर ही सम्बन्ध रहता है। तथा उनमें किसी कार्य का होना भी संभव नहीं है। अतः कोई किसी का सम्बन्धी नहीं
है। अधिक क्या कहें, स्वयं 'आत्मा' भी वाक्य का विषय नहीं है ॥ २४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
हीयमान और उपचीयमान वस्तुओं का आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है, इस कारण भी हानि-वृद्धि
का आत्मा में होना संभव नहीं है।

२७० उपदेशसाहस्री
ध्रुव (स्थिर, कूटस्थ) और अनित्य (क्षणिक) वस्तुओं का न तो किसी अन्य से सम्बन्ध होता है और न
ही परस्पर-सम्बन्ध होता है। उसी तरह उनमें किसी कार्य का होना भी संभव नहीं है। इसलिये परमार्थतः कोई किसी
का सम्बन्धी अभीष्ट नहीं है। तात्पर्य यह है कि स्थिर पदार्थ में विकार न हो सकने के कारण और क्षणिक पदार्थों
का अन्य पदार्थ के साथ सम्बन्ध होने के काल तक रहना असंभव होने के कारण स्थिर-अस्थिर पदार्थों के परस्पर
सम्बन्धित्व का होना संभव नहीं है, क्योंकि सम्बन्धि-सम्बद्धत्व और असंबद्धत्व इत्यादि विकल्प उपस्थित होंगे। अतएव
उनमें कार्य का होना उपपन्न नहीं है। इस पर भी यह शंका होती है कि आत्मा का अन्य किसी के साथ सम्बन्ध नहीं
है, यह कैसे कहा जा रहा है ? क्योंकि आत्मा को वेदान्तवाक्यरूप प्रमाण का प्रमेय मानते हैं। उक्त शंका का समाधान
इस प्रकार किया गया है कि यह आत्मतत्त्व (आत्मस्वरूप) स्वयं निरुपाधिक है। वह निरुक्ति (वेदान्तवाक्य) का
मुख्यवृत्ति से विषय नहीं है। क्योंकि शब्द के प्रवृत्त होने में निमित्तभूत कोई धर्म उसमें नहीं है। किन्तु उसमें शब्द
का पर्यवसान लक्षणा के द्वारा मानकर उसे वेदान्तवाक्यरूप प्रमाण का प्रमेय कहा जाता है। वस्तुतः वह आत्मतत्त्व
वेदान्तवाक्य का भी विषय नहीं है ॥२४॥
समं तु तस्मात्सततं विभातवद्द्वयाद्विमुक्तं सदसद्विकल्पितात् ।
निरीक्ष्य युक्त्या श्रुतितस्तु बुद्धिमानशेषनिर्वाणमुपैति दीपवत् ॥२५॥
सममिति—यही कारण है कि समस्वरूप, नित्य प्रकाशमय तथा 'सत्-असत्-विकल्पमय द्वैत' से शून्य जो
'आत्मा' है, उसका श्रुति और युक्ति से साक्षात्कार करके बुद्धिमान् पुरुष 'दीपक' के निर्वाण के समान सम्पूर्ण बन्धनों से
मुक्त होकर निर्वाण को प्राप्त हो जाता है ॥ २५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
सत्-असत् विकल्परूप द्वैत से रहित समस्वरूप, नित्यप्रकाशमय उस आत्मतत्त्व का श्रुति और युक्ति से
साक्षात्कार करके बुद्धिमान् पुरुष, दीपक के समान सहसैव समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है। अर्थात् निरीक्षण
और निर्वाण दोनों के बीच कोई व्यवधान नहीं रहता है ॥ २५ ॥
अवेद्यमेकं यदनन्यवेदिनां कुतार्किकाणां च सुवेद्यमन्यथा ।
निरीक्ष्य चेत्थं त्वगुणग्रहोऽगुणं न याति मोहं ग्रहदोषमुक्तितः ॥२६॥
अवेद्यमिति—किसी अन्य पदार्थ को जो लोग 'आत्मा' से भिन्न नहीं देखते, ऐसा वह अद्वितीय आत्मतत्त्व
उनके ज्ञान का विषय नहीं है। अन्यथा वह कुतार्किकों के लिये भी सुवेद्य हो जायगा। शरीर आदि में अभिनिवेश न रखने
वाला पुरुष निर्विशेष आत्मा का साक्षात्कार करके मिथ्याज्ञान रूप दोष से मुक्त हो जाता है, अतएव वह मोहित नहीं
होता है ॥ २६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उक्त लक्षण वाले आत्मतत्त्व का निरीक्षण विषयत्वेन होता है या अविषयत्वेन ?—ऐसी जिज्ञासा
होनेपर 'अविषयत्वेनैव' होता है, यह बताया जा रहा है। सर्वसाक्षीभूत प्रत्यगात्मा से भिन्न अद्वय ब्रह्म नहीं है, ऐसा
जो जानते हैं, उन अनन्यवेदियों के ज्ञान का वह विषय नहीं है। अन्यथा वह आत्मतत्त्व कुतार्किकों के लिये भी
परिच्छिन्नतया सुज्ञेय हो जायेगा। अर्थात् शास्त्र, युक्तिविचार आदि के प्रयास के बिना ही अपनी बुद्धि के अनुसार
सुखबोध्य हो जायगा। शरीर (देह) आदि के अभिमान से रहित हुआ पुरुष इस प्रकार निर्विशेष आत्मतत्त्व का
अपरोक्षतया अनुभव कर (साक्षात्कार कर) मिथ्याज्ञानरूप दोष से मुक्त होने के कारण पुनः मोह को प्राप्त नहीं
होता है ॥ २६ ॥
अतोऽन्यथा न ग्रहनाश इष्यते विमोहबुद्धेर्ग्रह एव कारणम् ।
ग्रहोऽप्यहेतुस्त्वनलस्त्वनिन्धनो यथा प्रशान्ति परमां तथा व्रजेत् ॥२७॥

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २७१
अत इति—मिथ्या ज्ञान (अज्ञान) का नाश 'आत्मज्ञान' से ही होता है, तदतिरिक्त किसी अन्य के ज्ञान से
नहीं होता। 'मोह' का कारण एकमात्र मिथ्या ज्ञान (अज्ञान) ही है। जिस प्रकार ईंधन (काष्ठ-तृण आदि) से रहित
अग्नि स्वयं शान्त हो जाता है, उसी प्रकार अपनी उत्पत्ति के कारण से रहित हो जाने पर मिथ्या ज्ञान (अज्ञान) की भी
आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है॥ २७॥
हृदयस्पर्शिनी
इतने महान् प्रयत्न से अविषयतया ब्रह्मात्मज्ञान का होना क्यों अभीष्ट है ? इसका समाधान यह है कि
आत्मज्ञान से भिन्न किसी अन्य हेतु से मिथ्याज्ञान की निवृत्ति नहीं होती है। श्रुति ने भी इसी को बताया है¹। मिथ्या-
ज्ञान ही मोहबुद्धि (देह, गृह आदि में मैं-मेरा इस प्रकार की अभिनिवेशबुद्धि) का कारण है। जिस प्रकार ईंधन
रहित अग्नि शान्त हो जाता है, उसी प्रकार अपने कारण से रहित हुआ मिथ्या ज्ञान भी आत्यन्तिक रूप से निवृत्त हो
जाता है ॥ २७ ॥
विमथ्य वेदोदधितः समुद्धृतं सुरैर्महाब्धेस्तु यथा महात्मभिः ।
तथाऽमृतं ज्ञानमिदं हि यैः पुरा नमो गुरुभ्यः परमीक्षितं च यैः ॥२८॥
विमथ्येति—पहिले किसी समय उदारचरित्र देवताओं ने समुद्र का मन्थन करके जिस प्रकार अमृत प्राप्त
किया था, उसी प्रकार वेदसमुद्र का मन्थन कर उससे इस ज्ञानामृत को जिन्होंने निकाला तथा परमात्मा का भी साक्षा-
त्कार किया, उन गुरुचरणों में हमारा प्रणाम है ॥ २८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रकरण समाप्ति पर पुनः गुरुनमस्काररूप मङ्गलाचरण किया जा रहा है। जिस प्रकार सुदूर पूर्वकाल में
महात्मा देवताओं ने क्षीरसागर का मन्थन करके अमृत प्राप्त किया था, उसी प्रकार जिस गुरुदेव ने वेदरूप महान्
सागर का मन्थन करके इस ज्ञानामृत का उद्धार किया, और परमात्मा का साक्षात्कार किया, उस गुरुदेव को प्रणाम हैं।
अथवा निमित्तभूत जिस गुरुदेव के कारण मैं परब्रह्म का साक्षात्कार कर पाया, उस गुरुदेव को प्रणाम हैं। श्रुति भी
कह रही है कि “तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः²” तथा भागवतकार ने भी कहा है—
“निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम् ।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयमङ्घ्रिरेणुभिः³ ॥” २८ ॥
॥ इति एकोनविशंणतृष्णाज्वरनाशकप्रकर समाप्तम् ॥
॥ इति श्रीमदाद्यशंकराचार्यविरचितोपदेशसाहस्र्याः पद्यप्रबन्धस्य वैद्य-मुसलगाँवकरोपनामकेन श्रीगजानन-
शास्त्रिणा विरचिता 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दीव्याख्या पूर्णताङ्गता ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
१. “नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।”—( श्वे. उ. ३।८।६, १५ )
२. ( मुं. उ. ३।१ )
३. ( श्रीमद्भागवद्-११।१४।१६ )

कर्मबन्धनमिदं भवेत्कथं
मायया च जनितं तमः कुतः ।
आत्मभानमिदमेकमङ्गलं
भासते यदि मनःस्वराज्यके ॥