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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पद्यभाग ९: सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम्

सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम्
सूक्ष्मताव्यापिते ज्ञेये गन्धादेरुत्तरोत्तरम् ।
प्रत्यगात्मावसानेषु पूर्वपूर्वप्रहाणतः ॥१॥
सूक्ष्मतेति—गन्धादि से लेकर पूर्व-पूर्व कार्य का त्याग करते हुए प्रत्यगात्मा तक उत्तरोत्तर कारणतत्त्व
की सूक्ष्मता और व्यापकता समझनी चाहिये ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिस ब्रह्मरूप प्रत्यगात्मा की मुक्ति, वेदान्तवाक्योत्पन्न ज्ञान से अज्ञाननिवृत्ति कराते हुए बताई गयी है, वह
सर्वान्तर (सबके भीतर) होने से उसकी निरतिशय सूक्ष्मता और व्यापिता इसी ग्रन्थ के अष्टम प्रकरण के तृतीय श्लोक
में 'यथा च खम्' आदि के द्वारा सूचित की गई है, उसी का उपपादन करने के लिए इस प्रकरण का आरंभ किया जा
रहा है। यहाँ 'गन्ध' का अर्थ पृथिवी है। गन्ध (पृथिवी) से लेकर प्रत्यगात्मा तक जितने पदार्थ हैं, उनमें से पूर्व-पूर्व का
त्याग करने से उत्तर-उत्तर भाग में सूक्ष्मता और व्यापिता होती है। एवं च सर्वान्तरभाग में स्थित प्रत्यगात्मा में
निरतिशय सूक्ष्मता सिद्ध होती है। कार्य में कारणस्वरूप के रहने पर भी वह कार्य के आकार से तिरोहित रहने से
स्वरूपतः उसका भान नहीं होता इसलिए उसे सूक्ष्म कहते हैं। कार्य के परिमाण से न्यूनपरिमाण होने के कारण 'सूक्ष्म'
नहीं कहा जाता। तथा समस्त स्वविकारों में जो अनुगत रहता है, उसी को उपादान कारण कहते हैं। एवं च कार्य की
अपेक्षा कारण अधिकदेशवृत्ति होने से उसे व्यापक कहा जाता है। और कार्य न्यूनदेशवृत्ति होने से उसे व्याप्य कहते
हैं। एवं च पृथिवी स्वकार्य की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। जल पृथिवी की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। तेज
जल की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। वायु तेज की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। वायु आकाश से ग्रस्त है, यह
प्रसिद्ध ही है। सत्ता और स्फूर्ति से व्याप्त हुए इन सब का अनुभव होता है, अतः सब का उपादान सच्चित् ही है।
उसका उपादान कोई नहीं है। अतः उसी की निरपेक्षव्यापकता और निरतिशयसूक्ष्मता है। यह समस्त दृश्यराशि
सच्चिन्मात्र से ग्रस्त रहने के कारण उससे पृथक् कोई भी वस्तु नहीं है। इसलिए उसी की परमसूक्ष्मता और व्यापिता
का निश्चय कर 'वह असङ्ग, कूटस्थ, अद्वय मैं हूँ' ऐसा चिन्तन सदा करते रहना चाहिए ॥ १ ॥
शारीरा पृथिवी तावद्यावद्वाह्या प्रमाणतः ।
१अम्ब्वादीनि च तत्त्वानि तावज्ज्ञेयानि कृत्स्नशः ॥२॥
शारीरेति—बाह्य पृथिवी का जितना प्रमाण है, उतना ही प्रमाण शरीरसम्बन्धिनी पृथिवी का भी है,
उसी प्रमाण में जलादि तत्त्वों को भी समझना चाहिये, अर्थात् वे भी बाह्य जलादि के अनुसार उत्तरोत्तर सूक्ष्मतर और
व्यापक हैं ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उपर्निर्दिष्ट आत्मस्वरूप का ज्ञान ऊपर किये गये वर्णन के अनुसार होना कठिन है, क्योंकि अध्यात्म
और अधिदैवत में भिन्न-भिन्न पृथिवी है। जितना परिमाण (प्रमाण) बाह्य पृथिवी का है, उतना ही शारीरा
(अध्यात्म) पृथिवी का परिमाण समझना चाहिये। उसी तरह जल आदि चारों भूतों का भी उतना-उतना ही परिमाण
जानना चाहिये, जितना शारीरा और बाह्या पृथिवी का हो। निष्कर्ष यह है कि अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव रूप
में विभक्त हुए पृथिवी आदि सब एक ही अज्ञान से विजृम्भित (उत्पन्न) हैं। अतः सब का प्रविलापन एक ही प्रयत्न से
हो सकता है। सबमें प्रत्यक्तत्त्व एक-सा अनुगत है, अतः सबका प्रत्यगात्मा में विलीन होना ही उनका अध्यात्मादिरूप
है, उसी से वे सब व्याप्त हैं, उससे कोई पृथक् नहीं है, इस रीति से प्रत्यक्तत्त्व का अवधारण करने पर बाह्य, आध्या-
१. अनादी०—पाठान्तरम् ।

सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम् ३७
त्मिक आदि भेद के स्फुरण के लिए कोई अवसर ही नहीं रहता, केवल प्रत्यगात्म-ब्रह्म ही अवशिष्ट रहता है। अतः पूर्व
कही गई आत्मतत्त्वज्ञान की सिद्धि अवश्य ही होती है॥ २॥
वाय्वादीनां यथोत्पत्तेः पूर्वं खं सर्वगं तथा।
अहमेकः सदा १शुद्धश्चिन्मात्रः सर्वगोऽद्वयः ॥३॥
वाय्वादीनामिति—जिस प्रकार वायु आदि की उत्पत्ति से पूर्व सर्वगत आकाश ही था, उसी प्रकार 'मैं'
(आत्मा) एक, सर्वदा, शुद्ध, या सर्वस्वरूप, चिन्मात्र, सर्वत्र व्याप्त एवं अद्वितीय हूँ ॥ ३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व श्लोक में अध्यात्म-अधिदैवत ज्ञान की प्रत्यगात्मावसानता बताई किन्तु वह कैसे संभव हो सकेगी ?
क्योंकि पराचीन विकार (बाह्य पदार्थ) की अपेक्षा, प्रत्यक्त्व को रहती है। अर्थात् 'बाह्य और अन्तः' दोनों शब्द परस्पर-
साकांक्ष हैं। अतः परागर्थ (बाह्य पदार्थ) के अभाव में (न रहने पर) आत्मा से प्रत्यक्त्व (भीतरीपना) और सर्वगतत्व
का होना कैसे संभव होगा ? अर्थात् पराक् (बाह्य) पदार्थों की प्रत्यगात्मावसायिता कैसे कही जा रही है ? प्रत्यगादि
शब्द लक्षणा के द्वारा अपूर्वादिलक्षण चिन्मात्रस्वरूप को ही बताते हैं। लक्षणा करते समय आरोपित पराक् अर्थ की
अपेक्षा रहने पर भी चिन्मात्रस्वरूप को तो किसी की भी अपेक्षा नहीं रहती, अतः सबका प्रत्यगात्मा में अवसान
(पर्यवसान) होना जो बताया गया है, वह उचित ही है। इसी अभिप्राय को ग्रन्थकार ने वायु के दृष्टान्त से समझाया
है। एवंच अध्यात्मादि ज्ञान का प्रत्यगात्मा में अवसान होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३ ॥
ब्रह्माद्याः स्थावरान्ता ये प्राणिनो मम पूः स्मृताः।
कामक्रोधादयो दोषा जायेरन्मे कुतोऽन्यतः ॥४॥
ब्रह्माद्या इति—ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक जितने भी प्राणी हैं, वे सब मेरे ही शरीर कहे गये हैं। ऐसी
स्थिति में किसी अन्य के द्वारा मुझमें काम-क्रोधादि दोष कैसे उत्पन्न हो सकेंगे ? ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिज्ञासा यह होती है कि जब आकाश की तरह एक ही आत्मा है तब उसे सर्वात्मा कैसे कह सकते हैं ?
अर्थात् प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न आत्मा के होने का सभी को अनुभव है, इसलिए 'आत्मा' को एक कहना उचित
नहीं है। अपितु ब्रह्मादि भेद से 'आत्मा' को अनेक कहना ही उचित प्रतीत होता है। उसी तरह 'तुम (आत्मा)
चिन्मात्र हो' यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि राग-द्वेषादि दोषों के संसर्ग की उपलब्धि होती है। इस जिज्ञासा का
समाधान यह है कि समस्त भुवनों के सम्पूर्ण प्राणी मुझ चिदात्मा के ही शरीर (पूः) हैं, यह निर्णय कर दिया गया है।
उसी तरह काम-क्रोधादि दोष मेरे (आत्मा के) स्वाभाविक नहीं हैं, क्योंकि व्यभिचार दिखाई देता है। परतः (किसी
दूसरे से) मुझ आत्मा में वे प्राप्त होते हों, यह कहना भी ठीक न होगा, क्योंकि मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा
है ही नहीं ॥ ४ ॥
भूतदोषैः सदाऽस्पृष्टं सर्वभूतस्थमीश्वरम् ।
नीलं व्योम यथा बालो दुष्टं मां वोक्षते जनः ॥५॥
भूतदोषैरिति—जो भूतों के दोषों से हमेशा अस्पृष्ट है, उस समस्त भूतों के अन्तर्यामी मुझ ईश्वर को लोग
उसी प्रकार दोषयुक्त देखते हैं—जैसे बालक आकाश को नीलवर्ण से युक्त देखते हैं ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जबकि प्रत्यगात्मा में संसार के दोष प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं तब उसकी निर्दोषता कैसे कही जा सकती है ?
आकाश की कृष्णता का प्रत्यक्ष जैसे भ्रम है वैसे ही आत्मा में दोषदर्शन भी भ्रम है। समस्त भूतों में मैं स्थित हूँ,
१. सर्व०—पाठान्तरम् ।

३८ उपदेशसाहस्री
तथापि उनके दोषों का मुझे स्पर्श तक नहीं है, क्योंकि मैं ईश्वर हूँ। मूल में (सर्वभूतस्थमीश्वरम्) 'ईश्वर' शब्द का
विशेषण के रूप में प्रयोग किया है, इस विशेषण को हेत्वर्थक समझना चाहिए। अर्थात् यह (आत्मा) सबका ईशिता
(कारण) है, एवंच कार्य के धर्मों से कारण हमेशा अस्पृष्ट रहता है ॥ ५ ॥
मच्चैतन्यावभास्यत्वात्सर्वप्राणिधियां सदा।
वपुर्मम प्राणिनः सर्वे सर्वज्ञस्य विपाप्मनः ॥६॥
मच्चैतन्येति—समस्त प्राणियों की बुद्धियाँ मेरे चैतन्य भाव (चित्स्वरूप) से ही प्रकाशित होती हैं। अतः
सम्पूर्ण प्राणी मुझ पापरहित सर्वज्ञ के ही शरीर हैं ॥ ६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह जो कहा गया था कि ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक समस्त प्राणी एक आत्मा के ही शरीर हैं; परन्तु
आत्मा, जबकि समस्त दोषों से रहित है, तो उसे पुण्य-पापरहित कहना होगा, अर्थात् वह (आत्मा) तो सर्वावभासक
(सर्वज्ञ) है, अतएव वह दृश्य-दोषसंसर्गरहित (विपाप्मा) भी है। उस स्थिति में सब प्राणियों को उस आत्मा का
शरीर कैसे समझा जाय ?
उक्त शङ्का का समाधान श्रुति ने कर दिया है कि सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों का अन्तःसाक्षी होकर
प्रकाशमान जो चैतन्य (ज्योति) है, वही सम्पूर्ण प्राणियों की 'आत्मा' है१। उस (आत्मा) का निरूपण अनेक बुद्धियों
और उसमें स्थित आभासों के बिना हो नहीं सकता, क्योंकि आत्मा का स्वरूपतः भेद कहीं नहीं कहा गया है। जैसे
जलपात्र और तद्गत आभास के बिना सूर्य का निरूपण नहीं किया जा सकता। इससे यह निश्चित होता है कि ये संपूर्ण
भूत एक ही आत्मा के शरीर हैं। बृहदारण्यक श्रुति ने भी उक्त अभिप्राय का समर्थन किया है२ ॥ ६ ॥
जनिमज्ज्ञानविज्ञेयं स्वप्नज्ञानवदिष्यते ।
नित्यं निर्विषयं ज्ञानं तस्माद्वैतं न विद्यते ॥७॥
जनिमदिति—जो वस्तु उत्पन्न होती है और ज्ञान का विषय बनती है, उसे स्वप्नज्ञान के तुल्य मिथ्या
जानना चाहिये, क्योंकि वास्तविक (पारमार्थिक) ज्ञान तो नित्य और निर्विषय होता है। अतः द्वैत नहीं है ॥ ७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मचैतन्य से प्रकाशित होनेवाले प्राणी तथा उनकी बुद्धियों की सत्ता रहने के कारण 'आत्मा' का
अद्वितीयत्व (अद्वैत) कैसे कह सकते हैं ? अर्थात् भास्य और भासक का भेद स्पष्ट प्रतीत होने से अद्वैत की सिद्धि नहीं
हो सकती। जो उत्पत्तिमान् और जो ज्ञान से जाना जाता है अर्थात् ज्ञान से विज्ञेय होता है, अर्थात् जो कार्य हो और
जड़ हो, वह मिथ्या होता है, जैसे स्वप्नज्ञान। वैसे ही जाग्रत वस्तु भी कार्य है और दृश्य भी है, इसलिए वह मिथ्या है।
क्योंकि द्वैत की वस्तुतः सत्ता नहीं है। जबकि द्वैत की वास्तविक सत्ता ही नहीं है, तब किसी ज्ञेय के न रहने से ज्ञान
ही नित्य है और सदा निर्विषय है अर्थात् वह (ज्ञान) विषय से निरूप्य नहीं होता। अध्यारोपित द्वैत से पारमार्थिक
अद्वैत का बाध नहीं होता है, जैसे आरोपित जल आदि से उसकी आधारभूत भूमि को सद्वितीय नहीं कहा
जाता ॥ ७ ॥
ज्ञातुर्ज्ञप्तिर्हि नित्योक्ता सुषुप्ते त्वन्यशून्यतः ।
जाग्रज्ज्ञप्तिस्त्वविद्यातस्तद्ग्राह्यं चासदिष्यताम् ॥८॥
ज्ञातुरिति—ज्ञाता (द्रष्टा आत्मा) का ज्ञान (दृष्टि) तो नित्य बताया गया है। क्योंकि सुषुप्ति में द्रष्टा (ज्ञाता)
से भिन्न दृश्य (ज्ञेय) का अभाव रहता है, किन्तु उस समय भी ज्ञाता (द्रष्टा) का अभाव नहीं होता। जाग्रत् अवस्था
का विषयविशिष्ट ज्ञान तो अविद्या के कारण है। अतः उसके विषयभूत पदार्थों को असत् समझो ॥ ८ ॥
१. 'योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः'—(बृ. उ. ४।३।७)
२. 'यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः'—(बृ. उ. ३।७।१५)

सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम् ३९
हृदयस्पर्शिनी
स्वरूपज्ञान भी तो 'ज्ञान' ही है, अतः उसका 'ज्ञेय'सापेक्ष रहना स्वाभाविक है, तब उसे निर्विषय कैसे
कहा है ? स्वरूपज्ञान की निर्विषयता और नित्यता को श्रुति ने बताया है। अर्थात् सुषुप्ति अवस्था में विविध करणों
का उपरम होने पर भी (किसी अन्य ज्ञेय के न रहने पर भी) तत्साक्षीभूत चैतन्य (ज्ञाता आत्मा) के विद्यमान
रहने से उसका (आत्मा का) स्वरूपभूत ज्ञान (ज्ञप्ति) तो रहता ही है, अतएव श्रुति ने भी उसे नित्य कहा है१।
तथापि पुनः शंका हो सकती है कि सुषुप्ति में विषय के न होने से ज्ञान यद्यपि निर्विषय है और स्वरूपतः उसका
नाश न होने के कारण वह नित्य भी है, तथापि सुषुप्ति के अतिरिक्त अन्य अवस्थाओं में ज्ञाता का ज्ञान सविषय
उपलब्ध होता है, अतः उसे अनित्य कहा जा सकता है। इस आशंका का समाधान ग्रन्थकार करते हैं कि जब
भगवती श्रुति स्वयं कह रही है कि 'ज्ञान' निर्विषय और नित्य है, तब कहना होगा कि जाग्रत्कालीन विषय-
दर्शनात्मक ज्ञान, अविद्या (भ्रान्ति) ही है, क्योंकि आत्मा, निर्विकार (विकार-रहित) है, अतः उसे ज्ञान का
कर्ता नहीं कह सकते, और 'अन्तःकरण' जड़ होने से वह ज्ञान का आश्रय नहीं बन सकता । अतः सविषय
ज्ञान को अध्यस्त ही मानना होगा, और उसके द्वारा ग्राह्य जितना भी विषय है, उसे भी असत् (अपरमार्थ)
ही मानना होगा। अर्थात् जागरित अवस्था में उत्पत्तिशील जो ज्ञान और ज्ञेय हैं (ज्ञान-ज्ञेय विभाग है),
वे दोनों ही अविद्या के कार्य होने से मिथ्या ही हैं। जागरितादि अवस्थाओं में भी बुद्धि की जो विषयाकार वृत्तियाँ
हुआ करती हैं, वे स्फुरण से अवगुण्ठित रहती हैं। समस्त वृत्तियों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के साक्षी रूप में
किसी एक नित्य स्फुरण को भी अवश्य मानना ही होगा। अतः कहना होगा कि जाग्रत् अवस्था में भी आत्मचैतन्य
नित्य ही है। तथा विषयों का स्फुरण, वृत्तिसमकाल में ही होने से, प्रतीत होता है कि विषय का व्यभिचार (अभाव)
रहने पर भी स्फुरण का अव्यभिचार रहता है, अर्थात् उसका व्यभिचार (अभाव) नहीं होता, इसीलिए वह (स्फुरण)
विषय के द्वारा अनिरूप्य (निरूप्य नहीं) कहा जाता है। इस रीति से 'ज्ञान' की निर्विषयता स्पष्ट हो जाती है। तथा
सुषुप्ति में भी करणों (इन्द्रियों) की उपरति की तरह विषय का भी “न तु तद् द्वितीयमस्ति" कहकर श्रुति ने निषेध
किया है। अतः सुषुप्ति अवस्था में भी किसी भी विषय का ज्ञान न होने से केवल कूटस्थ ज्ञान ही एकमात्र सिद्ध
होता है ॥८॥
रूपवत्त्वाद्यसत्त्वाच्च दृष्ट्यादेः कर्मता यथा ।
एवं विज्ञानकर्मत्वं भूम्नो नास्तीति गम्यते ॥९॥
रूपवत्त्वादीति—भूमा (आत्मा) में रूप आदि नहीं हैं (आत्मा रूपवान् न होने से उसमें रूपवत्त्व नहीं है)।
रूप के न होने से वह नेत्र आदि का कर्म (विषय) नहीं हो सकता, उसी प्रकार वह (आत्मा) ज्ञान (विज्ञान) का भी
कर्म नहीं हो सकता ॥९॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कोई कहे कि आत्मा में श्रवण-मनन आदि की विषयता को तो श्रुति स्वयं कह रही है२। तब दर्शन-
श्रवण-मनन आदि क्रियाओं का कर्म होने से उसे दृश्य मानना होगा। ऐसी स्थिति में उसे रज्जु-सर्प या शुक्ति-रजत के
समान 'असत्' कहना होगा। किन्तु ऐसी शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि उसे दर्शनादि क्रियाओं का कर्म मानने पर३
अन्य श्रुति से विरोध होगा। जो रूप आदि से हीन (रहित) होता है, वह दर्शन आदि का विषय नहीं हुआ करता।
'द्रष्टव्यः' इत्यादि में अहार्थिक 'तव्य' प्रत्यय है, अतएव भगवती श्रुति ने आत्मा में दर्शनादि की अर्हता (योग्यता) को
बताते हुए मनुष्य को उनकी अपनी अनात्मप्रवणता को त्यागने के लिए कहा है। द्रष्टव्यादि श्रुति का तात्पर्य आत्मा की
१. 'यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्-
विभक्तं यत् पश्येत् ।'—(बृ. उ. ४।३।२३) ।
२. आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः'—(बृ. उ. २४।५ )
३. 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्'—(क. उ. ३।१५), तथा 'न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्त-
पसा कर्मणा वा'—(मुं. उ. ३।१।८)

४० उपदेशसाहस्री
ज्ञानकर्मता (ज्ञान का कर्म आत्मा है) बताने में नहीं है। तथापि 'यत्र नान्यत् पश्यति' इत्यादि श्रुति के द्वारा आत्मा के
लिए अन्य दर्शनादि का निषेध होने से 'द्रष्टव्यः' श्रुति, आत्मा को दर्शन आदि की अभ्यनुज्ञा दे रही है, यह प्रतीत
होता है। अतः आत्मा में दृश्यता प्राप्त होने से अन्य दृश्य विषयों के समान उसका असत्त्व ही क्यों न माना जाय ?
किन्तु यह शंका ठीक नहीं है। 'यत्र नान्यत् पश्यति' इस श्रुतिवाक्य का तात्पर्य चक्षुरादि के द्वारा भ्रम से होनेवाले
अन्यदर्शन आदि की निवृत्ति में है, आत्मा में दर्शनादि की कर्मता के बताने में नहीं है। एवं च 'द्रष्टव्यः' इस श्रुति से
जिस प्रकार ज्ञानकर्मता नहीं बन पाई, उसी प्रकार, 'यत्र नान्यत् पश्यति' श्रुति¹ का पूर्व उपन्यस्त श्रुति के साथ
विरोध होने के भय से तथा श्रुति का तात्पर्य आत्मदर्शन विधि में होने के कारण भूमा (ब्रह्म) में ज्ञान की कर्मता तो है
ही नहीं, यह निश्चय किया गया है। एवं च अविषय, नित्य, भूमा, प्रत्यगात्मा सर्वान्तर सिद्ध हो जाता है ॥ ९ ॥
॥ इति नवमं सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणं समाप्तम् ॥
१. ३'यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा'—( छां. उ. ७।२४।१ )