सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पद्यभाग ८: मतिविलापनप्रकरणम्

मतिविलापनप्रकरणम्
'चितिस्वरूपे स्वत एव मे मते रसादियोगस्तव मोहकारितः ।
अतो न किञ्चित्तव चेष्टितेन मे फलं भवेत्सर्वविशेषहानतः ॥१॥
चितीति—मेरे मत में आत्मा का स्वरूप 'ज्ञान' ही है। उसके साथ रस, रूप आदि विषयों का सम्बन्ध
अथवा रागादिनिबन्धन भोक्तृत्वादिसम्बन्ध (हे बुद्धे) तेरे मोह के कारण है। आत्मा में समस्त विशेष धर्मों का अभाव
होने से (हे बुद्धे !) तेरी चेष्टाओं का मुझपर कोई परिणाम नहीं हो सकता ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शानी
यदि विद्या (ज्ञान) एवं अविद्या (अज्ञान) को बुद्धिगत (बुद्धि के धर्म) माना जाय, तो सांख्यसिद्धान्त को
मान लेने का प्रसंग आवेगा; क्योंकि सांख्यवादी विद्वान्, 'पुरुष' (जीवात्मा) के भोग और मोक्ष के लिये ज्ञान-अज्ञान
को बुद्धिगत (बुद्धि के ही धर्म) ही मानते हैं। अतः उक्त सांख्यसिद्धान्त के खण्डनार्थ तथा आत्मा स्वतःसिद्ध ज्ञान-
स्वरूप है, यह बताने के लिये 'आत्मा' और 'बुद्धि' के संवादरूप प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है। पूर्व प्रकरण में
ब्रह्मात्मज्ञान की सिद्धि स्वानुभव के द्वारा बताई थी, उसी को पुनः आत्म-बुद्धिसंवाद के द्वारा बताया जा रहा है,
जिससे 'ब्रह्मात्मज्ञान' की दृढ़ता हो जाय ॥ १ ॥
विमुच्य मायामयकार्यतामिह प्रशान्तिमायाह्यसदीहितात् सदा ।
अहं परं ब्रह्म सदा विमुक्तवत् तथाऽजमेकं द्वयवर्जितं यतः ॥२॥
विमुच्येति—मैं (आत्मा) सदा ही 'विमुक्तवत्' अर्थात् विमुक्त के समान हूँ, तथा मैं 'एक' अर्थात् सजातीय-
भेदरहित और 'अद्वितीय' अर्थात् विजातीयभेदरहित, और अजन्मा अर्थात् जन्मादि समस्त विकाररहित 'ब्रह्म' ही
हूँ। अतः (हे बुद्धे !) अपनी समस्त मायामय चेष्टाओं का त्याग कर तू हमेशा के लिये मुझ में (आत्म स्वरूप में) शान्त
हो जा, व्यर्थ प्रयास न कर ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
हे बुद्धे ! जब कि तुझ में किसी प्रकार की कोई विशेषता नहीं है, तब तुम्हारी किसी भी चेष्टा से मुझ
निर्विशेष (अनाधेयातिशय) पर कोई फल (परिणाम) होना नहीं है। अतः तुम्हारा शांत हो जाना ही उचित है। हे
बुद्धे ! तुम्हारी जो चेष्टाएँ हैं, वे सब मिथ्या चेष्टाएँ हैं, क्योंकि वे सब अविद्या के कारण (अविद्यामूलक) हो रहीं हैं।
इसलिए उन मिथ्या चेष्टाओं का त्याग कर अपने निरर्थक प्रयास (असत् ईहित) से अब शांत हो जाओ और मुझ
प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) में आकर विलीन हो जाओ। मूल में प्रयुक्त 'मायामयकार्यता' (मायामयचेष्टित) और
'असदीहित' शब्दों से 'अविद्यानिबन्धनत्व' (अविद्यामूलकत्व) सूचित किया गया है, अतः सांख्यसिद्धांत के प्राप्त होने
का कोई प्रसंग नहीं है। बुद्धि (मन) का लय सत्य-ज्ञानस्वरूप ब्रह्म में न बताकर प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) में क्यों
बताया ? यह जिज्ञासा जाग उठती है, उसके समाधानार्थ मूल में ही 'अहं परं ब्रह्म सदा विमुक्तवत्' कहा गया है कि
मैं तो सर्वदा (नित्य) 'ब्रह्म' ही हूँ। जब कि मैं (प्रत्यगात्मा-जीव) ब्रह्म हूँ तब सदैव (हमेशा) ही विमुक्तवत् अर्थात्
मुक्त के समान हूँ, क्योंकि मुक्ति तो उसकी होगी, जिसको बन्ध हुआ हो। मुझे बन्ध न होने से मेरी मुक्ति कैसे ? मैं तो
बन्ध और मुक्ति दोनों से रहित हूँ। उसी प्रकार मूल में 'अजं एकं द्वयवर्जितं' ये तीन विशेषण 'आत्मा' (अहम्) के दिये
गये हैं। इन विशेषणों के उपयोग का विचार करें। 'अजम्' विशेषण तो जन्मादि समस्त विकारों का प्रतिषेध करने
के लिए है। 'एकम्' से सदा एकरूपता अथवा सजातीयभेदशून्यता को सूचित किया है। 'द्वयवर्जितम्' से विजातीय-
भेदराहित्य को बताया है। अतः मुझ प्रत्यगात्मा में एक होने, (समा जाने-विलीन होने) का तात्पर्य यही है कि 'ब्रह्म'
में ही समाजाना। इस प्रकार मन का लय प्रत्यगात्मा में बताने से कोई किसी प्रकार का 'परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति'
(मुं० उ० ३।२।७) श्रुतिविरोध भी नहीं है।
१. चितिः स्वरूपं०—पाठान्तरम् ।
५

३४ उपदेशसाहस्री
एक अन्य प्रकार से भी इस श्लोक को लगाया जा सकता है—
हे बुद्धे ! 'असदीहितात्' स्वतः स्वरूपशून्य होने के कारण देह, इन्द्रिय आदि असत् विषयों (असत्
विषयों की सहायता) से अभिलषित (ईहित) दृष्ट अथवा अदृष्ट फल प्राप्त करना चाहती हो तो उससे भी शांत हो
जाओ, अर्थात् जाग्रत् अवस्था में भी उसके लिए कोई व्यापार (प्रयत्न) न करो। दृष्टादृष्ट फलप्राप्ति के लिये प्रयत्न
करना छोड़कर चुपचाप बैठी रहो। इतना ही नहीं, बल्कि तुम अपने स्वरूप (अविद्याजनित बुद्धिरूपकार्यता) का भी त्याग
करो। और 'मायां अय'-अपनी कारण रूप 'माया' के प्रति जाओ अर्थात् अपने कारण में लीन हो जाओ। अपने कारण
(माया) में जब स्थित हो जाओगी तब पुनः तुम्हें उत्पन्न होने का भय नहीं रहेगा, क्योंकि तदनन्तर 'इह' मेरे स्वरूप में
ही प्रविष्ट हो जाओ अर्थात् प्रतप्त लोहे पर पतित उदकबिन्दु की तरह अपनी कार्य-कारणरूपता का त्याग कर मेरे रूप
में ग्रस्त हो जाओ। 'अपने मुख में समस्त ब्रह्माण्ड को एक कौर (ग्रास) बनाकर रखने वाली मैं (बुद्धि) जब तुम्हें
चलायमान कर दूँगी, तब मैं तुम्हारे द्वारा ग्रस्त कैसे हो पाऊँगी ?' यह शंका भी मत करना, क्योंकि तुम कभी भी
मुझे चलायमान नहीं कर सकती। मुझे चलायमान कर देने का तुम्हें केवल भ्रम है। क्योंकि मैं 'अयमात्मा ब्रह्म'—
(बृ० उ० २।५।२९) श्रुति के अनुसार सदा ही परं ब्रह्म हूँ। 'विमुक्तवत्' यह ब्रह्म का विशेषण है। यहां स्वार्थ में
तद्धित प्रत्यय है। तब अर्थ होगा कि 'मैं नित्य मुक्त ही हूँ' ॥ २ ॥
सदा च भूतेषु समोऽस्मि केवलो यथा च खं सर्वगमक्षरं शिवम् ।
निरन्तरं निष्कलमक्रियं परं ततो न मेऽस्तीह फलं तवेहितैः ॥३॥
सदेति—नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप मैं यच्चयावत् समस्त भूतों में सदा ही समान भाव से स्थित रहता
हूँ। तथा आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त, अविनाशी, कल्याणस्वरूप, निरन्तर, निष्कल, निष्क्रिय और परब्रह्मस्वरूप
हूँ। अतः हे बुद्धे ! तेरी चेष्टाओं से मुझे कोई फल नहीं होना है ॥ ३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अजातवादिप्रतिपादक शास्त्र से यह बताया गया है कि परब्रह्म निर्विशेष (विशेषरहित) होने के कारण
नित्य मुक्त (सदा विमुक्त) है, किन्तु प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) तो देहादिकों में अन्वित होने से उसमें विशेषता प्रतीत
होती है, ब्रह्म की तरह उसमें निर्विशेषता नहीं है। अतः उस प्रत्यगात्मा में ब्रह्मरूपता का होना कैसे संभव हो सकता
है? निर्विशेष ब्रह्म की तरह यह सविशेष प्रत्यगात्मा नित्य मुक्त कैसे कहा जा सकता है? अतः ब्रह्म और आत्मा की
एकता का होना कभी संभव ही नहीं। किन्तु इस प्रकार शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि मैं (प्रत्यगात्मा) तो 'केवल'
हूँ, अर्थात् अविद्या और उसके कार्यरूप विशेषणों से रहित हूँ। समस्त भूतों में समभाव से (एक-सा) ही रहता हूँ,
अर्थात् उपाधिपरामर्श (उपाधिनिर्देश) किये बिना मुझमें विशेषता का उल्लेख नहीं किया जाता। उपाधि के द्वारा
ही मुझे सविशेष कहा जाता है, वास्तव में तो मैं निर्विशेष ही हूँ। अपनी निर्विशेषता में दृष्टान्त 'ख' (आकाश) का
दे रहे हैं। आकाश का असंगत्व आदि तो प्रसिद्ध ही है, उसमें किसी को भी सन्देह नहीं है। 'सर्वगम्' आदि का निर्देश
ब्रह्म और आकाश दोनों के लिये समान है। जब कि आकाश के समान मैं 'केवल' और समस्त भूतों में समभाव से हूँ,
अतः आकाश के स्वभाव से उपमित हुआ और सर्वगम् आदि विशेषणों वाला परब्रह्म ही मैं हूँ। इस प्रकार ब्रह्मात्मैक्य
का उपपादन करने का परिणाम यह है कि बुद्धि की चेष्टाओं का मुझपर कोई प्रभाव नहीं है ॥ ३ ॥
अहं ममैको न मदन्यदिष्यते तथा न कस्याप्यहमस्म्यसङ्गतः ।
असङ्गरूपोऽहमतो न¹ मे त्वया कृतेन कार्यं तव चाद्वयत्वतः ॥४॥
अहमिति—मैं एक हूँ, अपने से भिन्न कुछ भी मुझे इष्ट नहीं है, तथा असंग होने के कारण मैं किसी के भी
अधीन नहीं हूँ, मैं असङ्गरूप हूँ, अतः हे बुद्धे ! तेरे किये हुए व्यापारों से मुझे कोई प्रयोजन नहीं है और तू भी तो अद्वय
ब्रह्मरूप ही है ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
बुद्धि कहने लगी कि हे आत्मन् ! तुम ब्रह्मरूप हो इसलिए मेरी चेष्टाओं का तुम्हें कोई उपयोग न होनेपर
भी, तुम्हारे प्रति गुणभूत (अंगभूत) या प्रधानभूत बने हुए किसी तुम्हारे संबंधी को ही मेरी चेष्टा से कदाचित्
१. तदन्य०—पाठान्तरम् ।

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

(कथञ्चित्) कोई उपयोग हो जाय ? इसप्रकार बुद्धि के कहनेपर प्रत्यगात्मा ने उत्तर दिया कि हे बुद्धे ! इस रीति से
भी तुम्हारी चेष्टाओं का उपयोग होना संभव नहीं है । क्योंकि मैं एकाकी ही हूँ, वास्तव में मुझ चित्स्वरूप का कोई
सजातीत, विजातीय, स्वगतभेद भी नहीं है । अतः न मेरा कोई गुणभूत (अंग) है और न ही कोई प्रधानभूत (अंशी)
है, जिसका मैं अंग बनूँ, अर्थात् न मेरा कोई अंग है और न मैं किसी का अंग हूँ। क्योंकि मैं असंगरूप हूँ, इसलिये
मुझे तेरी चेष्टाओं से कोई प्रयोजन नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि तुम स्वयं भी तो नहीं हो; जब स्वयं तुम ही
नहीं, तब तुम्हारी चेष्टाएँ और उनका फल तो दूर ही रहा। तुम तो मेरे स्वरूप (ब्रह्मात्मैक्य) के अज्ञान से कल्पित
हो। मेरा स्वरूप ही तो तुम्हारा अधिष्ठान है, उस अधिष्ठान से तुम अतिरिक्त नहीं हो। उपकार्योपकारक भाव
(अंगांगिभाव) तो भेद होनेपर (दो वस्तुओं में) होता है, अभेद में (एक वस्तु में) नहीं। इसलिये व्यर्थ की कल्पनाएं
मत करो, शान्त हो जाओ । मुझ प्रत्यगात्मा में तुम्हारा शान्त होना ही उचित है ॥ ४ ॥
फले च हेतौ च जनो विषक्तवान् इति प्रचिन्त्याहमतो विमोक्षणे ।
जनस्य संवादमिमं प्रक्लृप्तवान् स्वरूपतत्त्वार्थविबोधकारणम् ॥५॥
फलेचेति-सर्वसाधारण अज्ञानी लोग कार्य-कारण रूप (फल-हेतुरूप) संसार में विशेष (अधिक) आसक्त
हैं, यह सोचकर उन्हें इस आसक्ति से छुड़ाने के लिये मैंने आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध कराने वाले 'आत्म-बुद्धि
संवाद' प्रकरण की रचना की है ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पाठकों के मन में यह जिज्ञासा हो सकती है कि भगवत्पूज्यपाद आर्चायचरण तो स्वयं कृतार्थ हैं, तब
इस प्रकरणग्रन्थ के लिखने की उन्हें क्या आवश्यकता पड़ी ? उन्हें ख्याति (लोकैषणा) की अपेक्षा (इच्छा) तो थी
नहीं । इस जिज्ञासा के समाधानार्थ ही कहा जा रहा है कि स्वानुभवसिद्ध अर्थ के आविष्कारक इस प्रकरणग्रन्थ की
रचना में उनकी प्रवृत्ति होने का एकमात्र कारण 'दुखी लोगों को देखकर हृदय में उमड़नेवाली करुणा' ही है, ख्याति
(लोकप्रसिद्धि) प्राप्त करना नहीं¹ । यह अज्ञानीवर्ग हेतुफलात्मक संसार में अत्यधिक आसक्त है, यह सोचकर उस
अज्ञानीवर्ग को इस संसार (पुनरपि जननं पुनरपि मरणम्) से मुक्त कराने के लिए 'मत्यात्मसंवाद' रूप ग्रन्थ का
प्रणयन (रचना) श्री आचार्यचरण ने किया है। इस संवाद के द्वारा आत्मा के नित्यचैतन्यस्वरूप की ब्रह्मता का
सुस्पष्ट बोध हो जाता है। पदार्थविवेक के द्वारा यह संवाद ही आत्मा के स्वरूप में ब्रह्मरूपता का ज्ञान कराने में
कारण है। अर्थात् आत्मा और ब्रह्म दोनों का स्वरूप एक ही है। आत्मा और ब्रह्म भिन्न-भिन्न नहीं हैं ॥ ५ ॥
संवादमेतं यदि चिन्तयेन्नरो विमुच्यतेऽज्ञानमहाभयाद्गमात् ।
विमुक्तकामश्च तथा जनः सदा चरत्यशोकः सम आत्मवित्सुखी ॥६॥
संवादमिति-यदि मनुष्य इस संवाद का निरन्तर चिन्तन करता रहे तो वह अज्ञानरूप महान् भय की
प्राप्ति से मुक्त हो सकता है, और तब समस्त कामनाओं से मुक्त हुआ वह मनुष्य सदा शोकरहित, समदर्शी, आत्मज्ञ
और सुखी होकर अपने ब्रह्मस्वरूप में ही विचरता (रममाण) रहता है ॥ ६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा की ब्रह्मात्माधिगति में हेतुभूत यह संवाद है। अतः साध्य-साधनपर्यावर्तलक्षण संसार से मुक्ति की
इच्छा करने वाले को इस संवाद का चिन्तन बराबर करते रहना चाहिये, जिससे ब्रह्मात्मज्ञान की प्राप्ति होगी, तब
वह जीवित रहता हुआ ही कृतकृत्य हो जायगा । संसाररूप महान् भय के हेतुभूत अज्ञान से छुटकारा पा सकेगा ।
जब अज्ञानरूप कारण की निवृत्ति हो जायगी तब कार्य की निवृत्ति होना अर्थात् ही सिद्ध है। तब वह बन्धप्रतिभास-
रहित होकर जीवित रहता हुआ भी अपने ब्रह्मस्वरूप में विचरण करता हुआ (रममाण रहता हुआ) कृतकृत्य हो जाता
है। अतः मुमुक्षु को इस संवाद का अनुसन्धान निरन्तर करते रहना चाहिए ॥ ६ ॥
॥ इति अष्टमम्मतिविलापनप्रकरणं समाप्तम् ॥
१. नै. सि. १।६ ]