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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पद्यभाग १३: अचक्षुष्ट्वप्रकरणम्

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम्
अचक्षुष्ट्वान्न दृष्टिर्मे तथाऽश्रोत्रस्य का श्रुतिः ।
अवाक्त्वात्न तु वक्तिः स्यादामनस्त्वान्मतिः कुतः ॥१॥
अचक्षुष्ट्वादिति— चक्षुर्विहीन [नेत्रहीन] होने से मेरी कोई दृष्टि नहीं है, उसी तरह मैं श्रोत्रहीन हूँ, अतः
मुझमें श्रवण शक्ति भी कैसे हो सकती है ? तथा वाक् (वाणी) रहित होने के कारण मुझमें वचन शक्ति भी नहीं है, और
मनोहीन (अमना) होने के कारण मुझमें मननशक्ति भी कैसे हो सकती है ? ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
लोगों को पदार्थ के स्वरूप का ठीक-ठीक परिचय न होने से ही वाक्य के अर्थ का ज्ञान नहीं हो पाता,
किन्तु पदार्थ का परिचय होते ही वाक्य के ठीक-ठीक अर्थ का ज्ञान हो जाता है। अतः प्रसंख्यानविधि अनर्थक और
अनुपपन्न है, यह पहले कह चुके हैं। पूर्व प्रकरण के अन्त में 'निर्विकारो ऽ चलः शुद्धः' के द्वारा आत्मा का शुद्धत्व
और अचलत्व जो बताया गया था, उसी को और अधिक स्पष्ट करने के लिये इस नवीन प्रकरण का आरंभ किया
जा रहा है। इस प्रकरण में आत्मा को सर्वकरणशून्य बताया गया है। चक्षुरिन्द्रिय के माध्यम से बाहर की ओर
प्रसृत (फैली हुई) और रूपादि विषयों से उपरञ्जित (रूपादि विषयाकार हुई) 'जानामि' जानता हूँ—यह क्रिया ही
'दृष्टि' शब्द से यहाँ विवक्षित है। इस प्रकार की वह दृष्टि मुझमें नहीं है अर्थात् वह मेरा विकार यानी मेरा धर्म
नहीं है। क्योंकि 'अचक्षुष्ट्वात्' अर्थात् चक्षु तो देह (शरीर) देश के आश्रित है, अतः वह भौतिक कारण है। वह मेरे
आश्रित नहीं है, यह अन्वय-व्यतिरेक से निश्चित है, अतः हेतु के असिद्ध होने की (हेत्वसिद्धि की) शंका नहीं करनी
चाहिये। इसी प्रकार श्रुति (श्रोत्र) आदि के विषय में समझ लेना चाहिये। तथाच तत्तदिन्द्रियद्वारक बुद्धिवृत्तिरूप
दृष्टि आदि क्रिया से हीन होने के कारण आत्मा की अचलता और शुद्धता१ स्पष्ट हो जाती है। अर्थात् उसके
(आत्मा के) निश्चल होने से ही उसकी शुद्धता समझनी चाहिये ॥ १ ॥
अप्राणस्य न कर्मास्ति बुद्धयभावे न वेदिता।
विद्याविद्ये ततो न स्तश्चिन्मात्रज्योतिषो मम ॥२॥
अप्राणस्येति— मैं प्राणरहित हूँ, अतः मेरा कोई कर्म नहीं है, तथा बुद्धि का अभाव होने के कारण मुझमें
ज्ञातृत्व भी नहीं है, अतएव मुझ चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप में ज्ञान और अज्ञान भी नहीं हैं ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
कर्तृत्व, ज्ञातृत्व आदि विकारों के हेतुभूत प्राण, बुद्धि के अभाव से (न रहने के कारण) भी मैं शुद्ध हूँ।
मैं तो चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप अर्थात् सदा प्रकाशमान चिदेकरस हूँ। मुझमें न विद्या न अविद्या अर्थात् ज्ञान और
उसका अभाव या ज्ञान और क्रिया नहीं है, क्योंकि वे दोनों बुद्धि की ही विशेष अवस्थारूप हैं। आत्मा में बुद्धि के न
होने से उसकी शुद्धता सिद्ध हो जाती है। एवंच आत्मा में कर्तृत्व, ज्ञातृत्व न होने से उसकी निश्चलता और निश्चलता
होने से शुद्धता है। उससे बुद्धि का संबंध न होने से उसमें ज्ञातृत्व नहीं है। उसमें ज्ञातृत्व न होने से उसकी चिन्मात्रता
स्पष्ट है, उस चिन्मात्र आत्मा से विद्या-अविद्या का कोई संबन्ध न होने से भी उसकी शुद्धता स्पष्ट है ॥ २ ॥
नित्यमुक्तस्य शुद्धस्य कूटस्थस्याविचालिनः ।
अमृतस्याऽक्षरस्यैवमशरीरस्य सर्वदा ॥३॥
१. (बृह. उ. ३।८।८)
९

६६ उपदेशसाहस्री
नित्येति—इसी प्रकार मुझ नित्यमुक्त, शुद्ध, कूटस्थ, अविचल, अमृतस्वरूप, अविनाशी और अशरीरी में
[विद्या, अविद्या नहीं है, इस प्रकार पूर्व श्लोक से सम्बन्ध है ] ॥ ३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्वप्रतिपादित धर्मों का आत्मा में अभाव होने से उसकी शुद्धता बताई गई थी, एवं च उसकी शुद्धता में
‘अशरीरत्व’ को ही हेतु कहना होगा। इसी अभिप्राय से आत्मा के चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप को अनेक विशेषणों से
स्पष्ट कर रहे हैं। इन सब विशेषणों से विशिष्ट आत्मा में विद्या-अविद्या नहीं है, ऐसा अन्वय पूर्व श्लोक के साथ
लगाना चाहिये। आत्मा की नित्यता में ‘शुद्धत्व’ हेतु है, उसकी कूटस्थता में ‘अविचालित्त्व’ हेतु है, उसके अमृतत्व में
‘अक्षरत्व’ हेतु है। इस प्रकार विशेषणों को लगाना चाहिये। उक्त तीनों में ‘अशरीरत्व’ हेतु है। क्योंकि शरीर
का संबंध हुए बिना उसमें अशुद्धि, चलनक्रिया, क्षरणक्रिया की उपपत्ति नहीं हो सकती। आत्मा तो सर्वदा ही
अशरीर होने से वह सर्वदा शुद्ध है ॥ ३ ॥
जिघत्सा वा पिपासा वा शोकमोहौ जरामृतो ।
न विद्यन्तेऽशरीरत्वाद् व्योमवद्व्यापिनो मम ॥४॥
जिघत्सेति—उक्त विशेषणों के द्वारा प्रतिपादित आत्मा में क्षुत् [भूख], पिपासा [प्यास], शोक, मोह, जरा,
मृत्यु भी नहीं है, क्योंकि मैं अशरीर [ शरीर रहित ] तथा आकाश के समान व्यापक हूँ ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा के साथ छह ऊर्मियों (षडूमियों) का सम्बन्ध न रहने से भी उसकी शुद्धता सिद्ध होती है।
खादितुमिच्छा = जिघत्सा = खाने की इच्छा, पातुमिच्छा = पिपासा = पीने की इच्छा। 'अशरीरत्वात्' यह उपलक्षण है
(सूचक है), अर्थात् अशरीरत्वात् कहने से अप्राणत्वात्, अमनस्त्वात् को भी समझना चाहिये। कहा भी है—
'प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे मनसः शोकमोहकौ।
जरामृत्यू शरीरस्य षडूर्मीरहितः शिवः॥' इति।
क्षुत् और पिपासा 'प्राण' के धर्म हैं, शोक और मोह 'मन' के धर्म हैं, जरा और मृत्यु 'शरीर' के धर्म हैं, इन छह
विकारों (ऊर्मियों) से रहित 'शिव' है ॥ ४ ॥
अस्पर्शत्वान्न मे स्पृष्टिर्नाजिह्वत्वादरसज्ञता ।
नित्यविज्ञानरूपस्य ज्ञानाज्ञाने न मे सदा ॥५॥
अस्पर्शत्वादिति—मैं स्पर्शशून्य हूँ इस कारण मुझमें 'स्पर्शगुण' नहीं है, रसनाहीन हूँ, इसलिये मुझमें रसज्ञता
नहीं है, तथा नित्य विज्ञानस्वरूप होने के कारण मुझमें सर्वदा ही ज्ञान और अज्ञान का अभाव है ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
स्पर्श-रसनसम्बन्धप्रतिषेध, अनुक्त सकल इन्द्रियवृत्तियों के प्रतिषेध का उपलक्षण है। एवंच आविर्भाव-
तिरोभाव रहित होने से उसकी विशुद्ध चिद्रूपता कही गई है। एवंच अनिषिद्ध इन्द्रियनिषेध द्वारा उनसे (उन
इन्द्रियों से) प्राप्त दृष्टादि विकार का आत्मा में निषेध किया गया है। वह (आत्मा) नित्य विज्ञानरूप होने से
उसमें विद्या-अविद्या भी नहीं हैं ॥ ५ ॥
या तु स्यान्मानसी वृत्तिश्चाक्षुषका रूपरञ्जना ।
नित्यमेवात्मनो दृष्ट्या नित्यया दृश्यते हि सा ॥६॥
यात्विति—चक्षुरिन्द्रिय के द्वारा निर्गत होने वाली रूपविषयिणी जो मानसी वृत्ति है, वह सर्वदा ही आत्मा
के नित्य चैतन्य से प्रकाशित होती है ॥ ६ ॥

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ६७
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा में दृष्टि आदि नहीं होते हैं, यह पहले बताया गया है, उसी में उपपत्ति दे रहे हैं—इन्द्रिय का
विषय के साथ सम्बन्ध होने पर अन्तःकरण, विषय के आकार में परिणत हो जाता है। अन्तःकरण के इस परिणाम
को ही ‘वृत्ति’ कहते हैं। चक्षुरादि इन्द्रियों से होने वाले समस्त ज्ञान, तत्तदाकार में परिणत हुई अन्तःकरण की वृत्ति
से ही होते हैं। वह वृत्ति, आत्मरूप नित्य चैतन्यप्रकाशलक्षण दृष्टि से नित्य ही प्रकाशित होती रहती है। इसका
सभी को अनुभव है। अन्तःकरण की दृष्टि, आत्मचैतन्य की दृश्य है ॥ ६ ॥
तथाऽन्येन्द्रिययुक्ता या वृत्तयो विषयाञ्जनाः ।
स्मृती रागादिरूपा च केवलाऽन्तर्मनस्यपि ॥७॥
तथेति—इसी प्रकार जो अन्यान्य इन्द्रियों से युक्त विषयाकार वृत्तियाँ हैं, तथा जो [इन्द्रियसम्बन्धरहित]
केवल मन के भीतर होनेवाली स्मरणात्मिका, रागात्मिका आदि वृत्तियाँ हैं [ वे भी आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित
होती हैं ॥७॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व प्रतिपादन के अनुसार यह अनुमान प्रयोग कर सकते हैं कि 'न दृष्ट्यादयः चिदात्मीयाः, तद्दृश्यत्वात्,
यो येन दृश्यते न स तदीयः, यथा रूपादिः ।' इससे यह सिद्ध होता है कि आत्मा दृष्टि आदि विकारों से रहित होने के
कारण उसमें शुद्धता है, इसी अभिप्राय से नेत्रद्वारक वृत्ति में कहे गये न्याय का अतिदेश अन्य वृत्तियों में कर रहे हैं।
विषयाञ्जना वृत्ति का अर्थ है विषयोपाधिका अर्थात् विषयाकारा वृत्ति। जो स्मृति, राग आदि वृत्ति, चक्षुरादि
बाह्येन्द्रियों की अपेक्षा किये बिना ही शरीरान्तर्वर्ती चित्त में हुआ करती है, वह भी पूर्वोक्त आत्मदृष्टि के द्वारा
देखी जाती है, अर्थात् प्रकाशित होती है ॥ ७॥
मानस्यस्तद्वदन्यस्य दृश्यन्ते स्वप्नवृत्तयः ।
द्रष्टुर्दृष्टिस्ततो नित्या शुद्धाऽनन्ता च केवला ॥८॥
मानस्य इति—उसी तरह मन की परिणाम रूप जो स्वप्नवृत्तियाँ हैं, वे भी सबसे भिन्न आत्मा की ही दृश्य
हैं, इस कारण द्रष्टा की दृष्टि नित्य, शुद्ध, अनन्त और अन्यसंसर्गरहित [केवल] है ॥ ८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अभिप्राय यह है कि स्वप्नावस्था में विद्यमान मनःपरिणामरूप जो विषयाकार वृत्तियाँ हैं, वे सब, अपने
से भिन्न द्रष्टा की ही दृश्य जिस प्रकार मानी जाती हैं, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में सभी वृत्तियाँ (दृष्टियाँ) उनसे
भिन्न द्रष्टा की दृश्य होती हैं, क्योंकि स्वाप्निक दृश्य एवं जागरित दृश्य दोनों में समान दृश्यता है। समस्त वृत्तियाँ
(दृष्टियाँ) कूटस्थदृष्टिभास्य हैं। इससे निष्कर्ष यह निकला कि द्रष्टा की दृष्टि (ज्ञान) नित्य, शुद्ध, अनन्त और संसर्ग-
शून्य है। इन्द्रिय का विषय (वस्तु) के साथ संसर्ग होनेपर अन्तःकरण, विषय के आकार में परिणत हो जाता है।
अन्तःकरण के इस परिणाम को ही ‘वृत्ति’ कहते हैं। इन्द्रियों से होनेवाले सभी ज्ञान उन-उन आकारों में परिणत हुई
अन्तःकरण की वृत्ति से ही होते हैं ॥ ८ ॥
अनित्या साऽविशुद्धेति गृह्यतेऽत्राविवेकतः ।
सुखी दुःखी तथा चाहं दृश्ययोपाधिभूतया ॥९॥
अनित्येति—उपाधिरूप जो दृश्यदृष्टि है, उसके साथ आत्मदृष्टि का अविवेक रहने से लोग उसे अनित्य और
अशुद्ध समझते हैं, उस कारण 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ' ऐसा समझते हैं ॥ ९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शंका—यदि आत्मदृष्टि ही कूटस्थ है तो उसे अन्यथा (अनित्य, अशुद्ध) क्यों समझा जाता है ?

६८ उपदेशसाहस्री
समा०—वृत्तिमत् (वृत्तिविशिष्ट) अन्तःकरण के साथ अविवेक के होने से वैसा (अन्यथा) समझते हैं ।
अर्थात् उपाधिभूत दृश्यदृष्टि के साथ विवेक न होने के कारण (विवेकाऽग्रह होने से) व्यवहार दशा में उस नित्य शुद्ध
आत्मदृष्टि को ही अविशुद्ध अनित्य समझते रहते हैं और अपने को सुखी-दुःखी मानते हैं ॥ ९ ॥
मूढया मूढ इत्येवं शुद्धया शुद्ध इत्यपि ।
मन्यते सर्वलोकोऽयं येन संसारमृच्छति ॥१०॥
मूढयेति—मूढ़ वृत्ति के साथ आत्मदृष्टि का अविवेक होने से 'मैं मूढ़ हूँ'—ऐसा संपूर्ण संसार समझता है । और
शुद्ध वृत्ति का संसर्ग होने पर 'मैं शुद्ध हूँ'—ऐसा समझने लगता है। उस कारण उसे संसार की प्राप्ति होती है अर्थात् मिथ्या-
भिमान [अविवेकनिबन्धन] ही संसारप्राप्ति है ॥ १० ॥
अचक्षुष्कादिशास्त्रोक्तं सबाह्याभ्यन्तरं त्वजम् ।
नित्यमुक्तमिहात्मानं मुमुक्षुश्चेत्सदा स्मरेत् ॥११॥
अचक्षुष्कादीति—यदि मोक्ष की इच्छा हो तो उसे “अचक्षुष्कम् अश्रोत्रम् अवाक् अगमनः” इत्यादि श्रुति
के द्वारा बताये गये बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा एवं नित्यमुक्त आत्मा का स्मरण [मनन] करना चाहिये । अभिप्राय
यह है कि संसारनिवृत्ति (मोक्ष) की यदि किसी को इच्छा हो तो उसे श्रुतिप्रतिपादित आचार्योपदिष्ट आत्मस्वरूप का
अनवरत [निरन्तर] अनुसन्धान करते रहना चाहिये । इस प्रकार मोक्ष का उपाय [साधन] बताते हुए मुमुक्षु को इस
पद्य के द्वारा शिक्षा दी गई है ॥ ११ ॥
अचक्षुष्कादिशास्त्राच्च नेन्द्रियाणि सदा मम ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र इति चाथर्वणं* वचः ॥१२॥
अचक्षुष्कादीति—अचक्षुष्कादि शास्त्र [बृहदारण्यक श्रुति] की प्रामाणिकता सुनिश्चित होने से सर्वदा ही मेरे
इन्द्रियाँ नहीं हैं और उसी प्रकार 'आत्मा प्राणहीन, मनो-हीन, एवं शुद्ध है” ऐसा अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद् का भी
वाक्य है ॥ १२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व श्लोक में आत्मा की जो चक्षुरादिशून्यता बताई गई थी, उसी में अचक्षुष्कादि शास्त्ररूप बृहदारण्यक१
श्रुति को प्रमाण रूप में उपस्थित किया गया है । उसी प्रकार मुण्डकोपनिषद्२ में भी कहा गया है । एवंच आत्मा का
प्राण से या मन से सम्बन्ध नहीं है ॥ १२ ॥
शब्दादीनामभावश्च श्रूयते मम काठके ।
अप्राणो ह्यमना यस्मादविकारी सदा ह्यहम् ॥१३॥
शब्दादीनामिति—मुझमें शब्दादि का अभाव सुना जाता है, तथा मैं प्राणहीन और मनो-हीन भी हूँ, अतः
मैं सर्वदा ही अविकारी हूँ ॥ १३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा की निर्विशेषता में श्रुति का प्रमाण दे रहे हैं—
“अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥” (कठ उ० १।३।१५)
यह उपर्युक्त प्रमाण अचक्षुष्कादि का भी उपलक्षण है । एवंच प्राणादिकों के साथ सम्बन्ध न रहने से तथा
अविकारी होने से मुमुक्षुत्व सिद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥
१. ( 'अचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनः'—बृ. उ. ३।८।८ )
२. ( मुं. उ. २।१।२ )

  • णेर्व०—पाठान्तरम् ।

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ६९
विक्षेपो नास्ति तस्मान्मे न समाधिस्ततो मम ।
विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः ॥१४॥
विक्षेप इति—मुझमें विकार न होने से ही मुझमें विक्षेप भी नहीं है और विक्षेप न होने से समाधि भी नहीं
है। विक्षेप और समाधि तो विकारी मन के ही हो सकते हैं ॥ १४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा की अविकारिता का जब निश्चय हो जाता है, तब विक्षेप भी नहीं होता। विक्षेप की निवृत्ति
होनेपर समाधि भी नहीं होती अर्थात् विक्षेप के अभाव में समाधि का भी अभाव रहता है। विक्षेप और समाधि दोनों
विकारवान् मन में ही हुआ करते हैं। अविकारी में उन दोनों का अभाव रहता है ॥ १४ ॥
अमनस्कस्य शुद्धस्य कथं तत्स्याद्द्वयं मम ।
अमनस्त्वाविकारित्वे विदेहव्यापिनो मम ॥१५॥
अमनस्कस्येति—मैं मनःशून्य और शुद्ध हूँ, मुझे वे दोनों [समाधि और विक्षेप] कैसे हो सकते हैं? मुझमें
मनःशून्यता और शुद्धता तो मेरे देहहीन और व्यापक होने के कारण है ॥ १५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा यदि मन की तरह विकारी होता या मन के साथ उसका यदि तादात्म्य रहता तो उसमें (आत्मा
में) विक्षेप-समाधि का संभव हो सकता था। किन्तु दोनों न होने से विक्षेप, समाधि दोनों नहीं हो पाते। आत्मा
विदेह होने से उसमें अमनस्कत्व और व्यापित्व (व्यापकता) होने से अविकारित्व है ॥ १५ ॥
इत्येतद्यावदज्ञानं[तं] तावत्कार्यं ममाभवत् ।
नित्यमुक्तस्य शुद्धस्य बुद्धस्य च सदा मम ॥१६॥
इतीति—नित्यशुद्ध, नित्यमुक्त और सर्वदा बोधस्वरूप होने पर भी जब तक मुझे अपने स्वरूप का अज्ञान
था तब तक ही मेरे लिये समाधि आदि कर्त्तव्यकार्य थे ॥ १६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यद्यपि मैं नित्य, मुक्त, बुद्ध, शुद्ध हूँ तथापि जबतक मुझे अपने नित्यत्व, शुद्धत्व-मुक्तत्वादि का अज्ञान था,
तबतक मेरी समाधि आदि में कर्तव्यबुद्धि थी, किन्तु अब नित्यत्व शुद्धत्व, मुक्तत्व का ज्ञान होने पर उसकी मुझे कोई
आवश्यकता नहीं है। अर्थात् अब उसमें मेरी कर्तव्यबुद्धि नहीं रही है ॥ १६ ॥
समाधिर्वाऽसमाधिर्वा कार्यं चान्यत्कुतो भवेत् ।
मां हि ध्यात्वा च बुद्ध्वा च मन्यन्ते कृतकृत्यताम् ॥१७॥
समाधिर्वेति—अब आत्मबोध हो जाने पर मेरे लिये समाधि, असमाधि अथवा अन्य कोई कर्त्तव्य कैसे हो
सकता है ? मेरा ध्यान करके और मुझे जानकर तो मोक्ष की इच्छा रखने वाले लोग अपने को कृतकृत्य मानते हैं ॥ १७॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मस्वरूप का परिज्ञान होने पर किसी हेतु के न रहने के कारण समाधि आदि साधनों का अभ्यास
करना अथवा न करना कर्तव्य नहीं रह जाता। ध्यान के द्वारा प्रत्यगात्मा का साक्षात्कार हो जाने पर कृतकृत्यता
की सिद्धि हो जाने से कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। क्योंकि प्रत्यगेकरस मुझ ब्रह्म का ध्यान कर, विचार कर,
जान कर, साक्षात्कार कर मुमुक्षु लोग कृतकृत्यता का अनुभव करते हैं। तथाच भगवती श्रुति भी कह रही है—
'एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य । न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्'१ । इति।
१. बृ. उ. ४।४।२३

७० उपदेशसाहस्री
'यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते१' ॥
ब्रह्मवेत्ता की यह महिमा नित्य है, जो कर्म से न तो बढ़ती है और न घटती ही है। जो पुरुष केवल आत्मा में क्रीड़ा
करता है, आत्मा में तृप्त रहता है और आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, उसके लिये कोई कर्तव्य शेष रहता ही नहीं ।
एवं च अज्ञान के अभाव में उसके लिये अब कुछ भी कर्तव्य नहीं है ॥ १७ ॥
अहं ब्रह्मास्मि सर्वोऽस्मि शुद्धो बुद्धोऽस्म्यतः सदा ।
अजः सर्वत एवाहंमजरश्चाक्षयोऽमृतः ॥१८॥
अहम् इति—मैं ब्रह्म हूँ, मैं सर्वरूप हूँ, इस कारण मैं सदा ही शुद्ध [निर्विकार] और बोध [ज्ञान] स्वरूप
हूँ । मैं सब ओर से अजन्मा तथा अजर, अक्षय और अमर हूँ ॥ १८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यद्यपि आत्मज्ञानी के लिये समाधि आदि कुछ भी कर्तव्य नहीं है, तथापि आत्मा में ब्रह्मत्व सम्पादन कर
प्रपञ्च का विलय करना तो अभी अवशिष्ट है ही—यह शंका हो सकती है। अर्थात् परम आत्मा के ध्यान आदि से जो
कृतकृत्यता होती है, वह आत्मा के ध्यान आदि से कैसे होगी ? उक्त शंका का समाधान ग्रन्थकार ने यह दिया है कि
आत्मा की ब्रह्मरूपता तो नित्य सिद्ध है, अर्थात् जो आत्मा है वही परमात्मा है, ब्रह्म और आत्मा ये दो नहीं हैं,
यानी अभिन्न हैं। और प्रपञ्च तो केवल अज्ञान का विलास मात्र है। अज्ञान की निवृत्ति होने के समय में ही वह
प्रपञ्च, अधिष्ठान (ब्रह्म) के रूप में विलीन रहता है। अतः उस आत्मज्ञानी के लिये कुछ अनुष्ठेय (कर्तव्य) नहीं
रहता । वह (मैं) सदा ही ब्रह्मरूप, सर्वरूप, शुद्ध, बुद्ध होने से बन्धहीन है। और वह (मैं) सब प्रकार से अज एवं
अक्षय रहने से जन्म और क्षय के हेतु से रहित है ॥ १८ ॥
मदन्यः सर्वभूतेषु बोद्धा कश्चिन्न विद्यते ।
कर्माध्यक्षश्च साक्षी च चेता नित्योऽगुणोऽद्वयः ॥१९॥
मदन्य इति—अखिल प्राणियों में मेरे अतिरिक्त कोई अन्य बोद्धा नहीं है, तथा मैं ही समस्त कर्मों का द्रष्टा,
साक्षी, प्रकाशक [चेता], नित्य, निर्गुण और अद्वय हूँ ॥ १९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न चेतन (चैतन्य) भासता है, ऐसी स्थिति में आत्मा को 'अहं ब्रह्मास्मि' = मैं
ब्रह्म हूँ—इस प्रकार पूर्णता का अनुभव कैसे हो सकता है ? अर्थात् आत्मा को ब्रह्मरूप कैसे समझ सकते हैं ? इसके
उत्तर में आचार्यचरण श्वेताश्वतरोपनिषद् की एक श्रुति का अर्थ पद्य के द्वारा बता रहे हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद् की
श्रुति इस प्रकार है—
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च२” ॥
उपर्युक्त श्रुति ने यह बताया है कि एक ही चेतन (चैतन्य) समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा है अर्थात् सर्वभूतान्तरात्मा
है। भिन्न-भिन्न चेतन नहीं है। चेतन में जो भिन्नता भासित होती है, वह उपाधि की भिन्नता से भासित होती है; जैसे
आकाश एक है तथापि घट-मठादि उपाधियों की भिन्नता से उसमें (आकाश में) भी भिन्नता भासित होने लगती है;
किन्तु उपाधि के हट जाने पर उस निरुपाधिक की स्वाभाविक एकता का ज्ञान होने लगता है। अतः मेरे (चेतन के)
अतिरिक्त अन्य कहीं कोई नहीं है। कर्म के कर्ता के रूप में जो लोग मुझे समझते हैं, वह उनका भ्रम है। क्योंकि मैं कर्म
का कर्ता नहीं हूँ, अपितु समस्त कर्मों का द्रष्टामात्र हूँ। चेता अर्थात् विशेषतः विज्ञाता हूँ, साक्षीमात्र हूँ। अतः आत्मा
में पूर्णता (ब्रह्मरूपता) का अनुभव, आत्मज्ञानी को होता रहता है ॥ १९ ॥
१. भ. गी. ३।१७
२. श्वे. उ. ६।११

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ७१
न सच्चाऽहं न चासच्च नोभयं केवलः शिवः।
न मे सन्ध्या न रात्रिर्वा नाहर्वा सर्वदा दृशेः ॥२०॥
न सदिति—न मैं 'सत्' हूँ अर्थात् व्यक्तभूत [पृथ्वी, जल और तेज] स्वरूप हूँ, और न 'असत्' [वायु और
आकाश—दो अव्यक्तभूत] स्वरूप हूँ, तथा न 'सदसत्' [पञ्चभूतात्मक शरीर] उभयस्वरूप हूँ। मैं तो केवल [निर्विशेष],
शिव-स्वरूप [त्रिगुणातीत] हूँ। न मेरे लिये सन्ध्या है, न रात्रि है और न दिन है, क्योंकि मैं नित्यसाक्षी स्वरूप हूँ ॥ २० ॥
हृदयस्पर्शिनी
'अहं ब्रह्मास्मि' के द्वारा प्रतिपादित आत्मा की ब्रह्मरूपता तो उचित है, क्योंकि वह (आत्मा) निर्विशेष
(समस्त विशेषताओं से रहित) होने से किसी भी क्रिया में वह शेष (अंग, साधन) नहीं हो सकता—इसी अभिप्राय को
पूर्वार्ध के द्वारा बताया है। इस पद्य के पूर्व अठारहवें पद्य में 'सर्वोऽस्मि' कहा था, उसे किसी अनुपपत्ति के उपस्थित
होने पर सामानाधिकरण्य के अभिप्राय से समझना चाहिये। प्रत्यक्ष के योग्य मूर्त पृथिव्यप्तेजोरूप तीन भूतों को 'सत्'
कहते हैं। और 'त्यत्' शब्द से निर्दिष्ट अमूर्त वाय्वाकाशात्मक दो भूतों को 'असत्' कहते हैं। तथा मूर्ताऽमूर्तात्मक
भूतपञ्चक अर्थात् पञ्चभूतों के परिणामस्वरूप शरीरसंस्थान को उभय (सदसद्रूप) कहते हैं। 'तत्सर्वं नाहम्' = वह सब
मैं नहीं हूँ, ऐसा कहने पर 'नेति नेति' से मुझपर आरोपित का ही निषेध होने से मेरे अतिरिक्त और मुझमें भी अन्य
की सत्ता न रहने के कारण 'मैं ही यह सब कुछ हूँ'—यह उचित ही कहा गया है। 'केवल' का अर्थ सर्वविशेषशून्य और
'शिव' का अर्थ निस्त्रैगुण्य होता है। मुझमें सन्ध्या आदि कालविशेष का भी सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि मैं अलुप्तप्रकाशरूप
हूँ। अथवा 'सन्ध्यादि' शब्दों से क्रमशः स्वप्न, सुषुप्ति, जागरण अवस्थाओं को समझना चाहिए। मैं तो सदैव एक-सा
प्रकाशमान हूँ। अतः स्वरूपावरण-विक्षेपरूप अवस्थाएँ मुझसे कैसे सम्बन्धित हो सकती हैं ? एवञ्च सर्वविशेषशून्यता
के कारण परिशुद्ध रहनेवाले मुझ आत्मा में ब्रह्मरूपता उपपन्न होती है ॥ २० ॥
सर्वमूर्तिवियुक्तं यद्यथा खं सूक्ष्ममद्वयम् ।
तेनाप्यस्मि विना भूतं ब्रह्मैवाहं तथाऽद्वयम् ॥२१॥
सर्वैति—जैसे आकाश सर्वविध आकारों से रहित, सूक्ष्म और अद्वितीय है, वैसे ही मैं भी अद्वय ब्रह्मरूप हूँ,
और उस आकाश के विना भी विद्यमान रहता हूँ ॥ २१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इसके पूर्व पद्य में बताया था कि चिदेकतान (सर्वदा एकरूपेण प्रकाशमान) निर्विशेष आत्मा, ब्रह्मरूप
होने से (वह) पूर्ण है। इसी बात को दृष्टान्त के द्वारा हृदयंगम करा रहे हैं। जैसे आकाश, सभी परिच्छिन्न आकार
वाले आकाशों से विलक्षण है, इस कारण वह (आकाश) सूक्ष्म लक्षित होता है, वैसे ही यह ब्रह्म, परिपूर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म
तथा द्वैताभावोपलक्षित माना जाता है। एवञ्च ब्रह्म के अद्वितीय रहने से और आत्मा का उससे भेद न होने से
(अनन्यता रहने से) 'ब्रह्मैवाऽस्मि'—यह अनुभव होता है। उक्त युक्ति से आत्मा की पूर्णता सिद्ध होने पर भी पुनः एक
शङ्का उत्पन्न होती है कि ब्रह्म और आकाश दोनों में एक दृष्टान्त है और एक दाष्ट्रान्त है, अर्थात् दोनों में दृष्टान्त-
दाष्ट्रान्तिकभाव (उपमानोपमेयभाव) है, उस कारण ब्रह्म से भिन्न आकाश की सत्ता सिद्ध होने से दोनों में भेद ही
सिद्ध होता है, तब ब्रह्म को अद्वितीय कैसे कह सकते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर आचार्यचरण इस प्रकार दे रहे हैं—
'तेनाप्यस्मि विनाभूतम्' मैं (आत्मा-ब्रह्म) उसके (आकाश के) बिना भी विद्यमान रहता हूँ। यद्यपि 'आकाश' सबसे
सूक्ष्म है, व्यापक है, कल्पान्त तक स्थायी है, इसलिए व्यावहारिक दृष्टि से उसे (आकाश को) नित्य कहते हैं, तथापि
कल्पान्त में आकाश की स्थिति नहीं रहती, इस कारण उसकी नित्यता वास्तविक नहीं है। वास्तविक नित्य तो ब्रह्म
ही है, क्योंकि वह सृष्टि के आदि में और कल्पान्त (प्रलय) में भी अर्थात् दोनों ही समय समान रूप से वर्तमान रहता
है। अतः उसके अद्वैत भाव में कोई क्षति नहीं है। उपर्युक्त पद्य में 'सूक्ष्ममद्वयम्' और 'तथाऽद्वयम्'—इस प्रकार 'अद्वय'
पद की पुनरावृत्ति की शंका का निरसन इस प्रकार होगा कि प्रथम 'अद्वय' पद का सम्बन्ध 'आकाश' के साथ और
द्वितीय 'अद्वय' पद का सम्बन्ध 'ब्रह्म' के साथ समझना चाहिये ॥ २१ ॥

७२ उपदेशसाहस्री
ममात्माऽस्य त आत्मेति भेदो व्योम्नो यथा भवेत् ।
एकस्य सुषिरभेदेन तथा मम विकल्पितः ॥२२॥
ममेति—जिस प्रकार छिद्रभेद से एक ही आकाश का भेद समझा जाता है उसी प्रकार 'मेरा आत्मा और स्वयं
आत्मा' इस प्रकार भेद की कल्पना मुझमें की जाती है । अर्थात् ब्रह्म [आत्मा] तो पूर्ण ही है तथापि औपाधिक भेद की
कल्पना उसमें की जाती है ॥ २२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'मेरा आत्मा ब्रह्मरूप है, मैं स्वयं ब्रह्मरूप हूँ'—इस प्रकार जो यह आत्माऽत्मीयभाव के रूप में भेदप्रतिभास
होता रहता है, ऐसी स्थिति में अद्वितीय ब्रह्मत्व कैसे माना जाय ? उक्त आशंका का समाधान यह है कि 'मैं' तो एक
ही हूँ, किन्तु अन्तःकरण आदि उपाधिकृत भेद का मुझपर आरोप किया जाता है । जैसे आकाश स्वयं एक ही है किन्तु
छिद्रभेद से अंशांशिभावरूप भेद का आरोप उस एक आकाश में करते हैं, उसी तरह मेरे विषय में समझो । अतः मेरी
वास्तविक एकता में कोई विरोध नहीं है ॥ २२ ॥
भेदोऽभेदस्तथा चैको नाना चेति विकल्पितः ।
ज्ञेयं ज्ञाता गतिर्गन्ता मध्येकस्मिन्कुतो भवेत् ॥२३॥
भेदोऽभेद इति—मुझ एक में ही भेद-अभेद तथा एक-अनेक की कल्पना की जाती है । वस्तुतः एकाकी रहने
वाले मुझ आत्मा में ज्ञेय, ज्ञाता और फल, फलभोक्ता की कल्पना कैसे की जा सकती है ? ॥ २३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अविद्या दशा में भेदव्यवहार के रहने पर भी अब आत्मज्ञान के होने पर वह भेदव्यवहार भी नहीं होता ।
वस्तुतः 'मैं' तो एक ही हूँ, किन्तु आत्मज्ञान होने के पूर्व अर्थात् अज्ञान दशा में मेरे विषय में यह बुद्धि, भेद-अभेद तथा
एक और अनेक का व्यवहार किया करती थी, किन्तु विचार (आत्मजिज्ञासा) करने पर मुझ अकेले (एकाकी) में ही
ये सब व्यवहार किस प्रकार हो सकते हैं ? अर्थात् 'मैं' ही ज्ञेय और मैं ही ज्ञाता और मैं ही फल (गति) तथा मैं ही
फल पानेवाला भोक्ता (गन्ता) कैसे हो सकता हूँ । परंतु यह सब विचार करने पर (आत्मज्ञान होने पर) समझ में
आता है; विचार के पूर्व नहीं ॥ २३ ॥
न मे हेयं न चादेयमविकारी यतो ह्यहम् ।
सदा मुक्तस्तथा शुद्धः सदा बुद्धोऽगुणोऽद्वयः ॥२४॥
न म इति—मेरे लिये न कुछ त्याज्य है और न कुछ ग्राह्य है, क्योंकि मैं [आत्मा ] विकाररहित हूँ, नित्य
मुक्त, शुद्ध तथा नित्य ज्ञानरूप [बोधरूप], निर्गुण और अद्वितीय हूँ ॥ २४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा को जो निर्विशेष कहा, वह अभी समझ में नहीं आ रहा है, क्योंकि 'संसारित्व' को त्याज्य (हेय)
कहा है और 'ब्रह्मत्व' को उपादेय (ग्राह्य) बताया है । ऐसी स्थिति में उसे (आत्मा को) निर्विशेष कैसे कह सकते
हैं ? मेरी सर्वविशेषशून्यता (निर्विशेषता) इस प्रकार है कि मैं अविकारी हूँ। उस अविकारिता को 'अविकारी यतो
ह्यहम्' में जो 'ही' शब्द है, उससे सूचित किया गया है । क्योंकि 'अविकार्योऽयमुच्यते' १ ऐसी स्मृति है । अविकारी रहने
का फल यह है कि 'मैं' सदैव बन्धसंसर्गशून्य (मुक्त) हूँ, उसी तरह तद्धेतुभूत अविद्यासम्बन्ध से रहित हूँ अर्थात् शुद्ध
हूँ । शुद्ध रहने में कारण यह है कि मैं सदैव बुद्ध हूँ। किन्तु बोध (ज्ञान) को नैयायिकों की तरह मेरा गुण न समझना ।
क्योंकि मैं तो अगुण अर्थात् निर्गुण (गुणरहित) हूँ, अतः बोध (ज्ञान) रूप हूँ । बोधरूप कहने से यह न समझना कि
कुछ मेरे लिये बोध्य (ज्ञेय) है, क्योंकि मैं तो अद्वय हूँ अर्थात् मेरे अतिरिक्त कोई अन्य है ही नहीं, ऐसी स्थिति में कौन
ज्ञेय होगा ? कोई नहीं, क्योंकि सर्वत्र मैं ही मैं हूँ ॥ २४ ॥
१. भ. गी. २।२५

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ७३
इत्येवं सर्वदाऽऽत्मानं विद्यात्सर्वं समाहितः ।
विदित्वा मां स्वदेहस्थमृषिर्मुक्तो ध्रुवो भवेत् ॥२५॥
इतीति—इस प्रकार सर्वदा समाहित चित्त से सबको आत्मस्वरूप समझे और अपने देह में स्थित मुझको
जानकर वह सर्वदर्शी ऋषि निश्चय ही मोक्ष को प्राप्त हो जाय ॥ २५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकार शास्त्र और आचार्य के द्वारा नित्य-मुक्तत्वादिलक्षण आत्मा का ज्ञान कराया गया। अतः उक्त-
लक्षण अद्वितीय आत्मा के श्रवण-मनन-निदिध्यासन से युक्त होकर मुमुक्षु व्यक्ति सर्वदा 'अहं ब्रह्मास्मि'=मैं ब्रह्म हूँ
ऐसा समझे। अपने को ब्रह्म समझनेवाला वह सर्वदर्शी ऋषि निश्चित ही मुक्त हो जाता है ॥ २५ ॥
कृतकृत्यश्च सिद्धश्च योगी ब्राह्मण एव च।
य* एवं वेद तत्त्वार्थमन्यथा ह्यात्महा भवेत् ॥२६॥
कृतकृत्य इति—जो मनुष्य इस वास्तविक सत्य को समझता है, वही कृतकृत्य, सिद्ध, योगी और वास्तविक
ब्राह्मण है, अन्यथा मनुष्य आत्मघाती ही होगा ॥ २६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'स ब्राह्मणः' इस श्रुति१ से यह स्पष्ट है कि वही मुख्य (वास्तविक) ब्राह्मण है, जो उक्त सत्य को समझता
है अर्थात् अपने स्वरूप (आत्मस्वरूप) को यानी 'मैं ब्रह्म हूँ' समझता है। इस प्रकार की आत्मनिष्ठा जिसमें नहीं होती
उसे आत्महा अर्थात् आत्मघाती कहा गया है। श्रीमद्भागवत में कहा है—
'नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् ।
मयाऽनुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा२ ॥
यह मनुष्य शरीर समस्त शुभफलों की प्राप्ति का मूल है, यह सत्कर्मियों के लिये सुलभ, और दुष्कर्मियों
के लिए अत्यन्त दुर्लभ है। इस संसारसागर से पार जाने के लिए यह एक सुदृढ़ नौका है। शरणग्रहणमात्र से ही
गुरुदेव इसके केवट बनकर पतवार का संचालन करने लगते हैं। और स्मरणमात्र से ही मैं अनुकूल वायु के रूप में
इसे लक्ष्य की ओर बढ़ाने लगता हूँ। इतनी सुविधा होनेपर भी जो इस शरीर के द्वारा संसारसागर से पार नहीं हो
जाता, वह तो अपने हाथों अपने आत्मा का हनन—अधःपतन कर रहा है। यह समझना चाहिये ॥ २६ ॥
वेदार्थो निश्चितो ह्येष समासेन मयोदितः ।
संन्यासिभ्यः प्रवक्तव्यः शान्तेभ्यः शिष्टबुद्धिना ॥२७॥
वेदार्थ इति—मैंने वेद का यह निश्चित अर्थ संक्षेप से बताया। शास्त्र और आचार्य के द्वारा जिसकी बुद्धि
सुशिक्षित है ऐसा शिष्टबुद्धि पुरुष, शम-दमादिसाधनसम्पन्न संन्यासियों के प्रति उपर्युक्त वेदार्थ का उपदेश करे ॥ २७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
ग्रन्थकार अपने ग्रन्थोक्त प्रकरण की उक्तियों की प्रामाणिकता तथा प्रतिपत्तिसौकर्य को सूचित कर रहे हैं—
जो कुछ मैंने कहा है, वह वेदार्थ है। अतः उसकी प्रामाणिकता में कोई सन्देह ही नहीं है। और उस वेदार्थ का ज्ञान
प्राप्त करने में अब कोई कठिनाई भी नहीं है, क्योंकि मैंने उसे संक्षेप से बता दिया है। अतः आचार्य से उपदिष्ट एवं
शास्त्रपरिशीलन से परिपक्व बुद्धिसम्पन्न पुरुष, शमादिसाधनसम्पन्न संन्यासियों के प्रति उस वेदार्थ का उपदेश किया
करे। संन्यासाश्रम प्राप्त किये संन्यासीमात्र को नहीं ॥ २७ ॥
॥ इति त्रयोदशमचक्षुष्ट्वप्रकरणं समाप्तम् ॥
१. (बृ. उ. ३।८।१०)
२. (श्रीमद्भागवत—११।२०।१७)

  • यदेवं—पाठान्तरम् ।
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