उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९८ उपदेशसाहस्री
माधुर्यादि च यत्कार्यमुष्णद्रव्याद्यसेवनात् ।
छायाया न त्वदृष्टत्वादपामेव च दर्शनात् ॥४२॥
माधुर्यति—उष्ण द्रव्य आदि का सेवन न करने के कारण छाया के माधुर्य आदि कार्य की प्रतीति हुआ
करती है, क्योंकि सन्तप्त शिला की छाया में माधुर्य की प्रतीति नहीं होती । माधुर्य की प्रतीति तो केवल जल में ही
होती है ॥ ४२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह जो कहा था कि छाया के माधुर्यादि कार्य को देखने से अर्थक्रियाकारिता के कारण छाया की वस्तुता
सिद्ध होती है, किन्तु वह भी अन्यथासिद्ध ही है। क्योंकि छाया में बैठे हुए व्यक्ति को छाया का जो माधुर्यादि कार्य
दिखाई देता है, वह भी उष्ण द्रव्यादि का सेवन न करने के कारण है। हेतुभूत छाया का वह माधुर्यादि कार्य नहीं है।
क्योंकि अत्यन्त प्रतप्त शिला की छाया में माधुर्य का अनुभव नहीं होता है, केवल जल में ही मधुरता की प्रतीति होती
है। उसमें कभी व्यभिचार नहीं होता है एवंच छाया में बैठे हुए व्यक्ति को आतप-संसर्ग न रहने के कारण और जल की
स्वाभाविक मधुरता की अभिव्यक्ति के कारण छाया में ही मधुरता का भ्रम होने लगता है ॥ ४२ ॥
आत्माभासाश्रयाश्चैवं मुखाभासाश्रया यथा ।
गम्यन्ते शास्त्रयुक्तिभ्यामाभासासत्त्वमेव च ॥४३॥
आत्मेति—जिस प्रकार मुख, उसका आभास और उसका आश्रय ये तीन विभक्त भासित होते हैं, उसी तरह
आत्मा, उसका आभास और उसका आश्रय भी हुआ करता है। किन्तु वस्तुतः आभास की असत्ता (अवास्तविकता) तो
शास्त्र और युक्ति से सिद्ध ही है ॥ ४३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिस प्रकार मुख, मुख का आभास, और मुखका आश्रय ये तीनों व्यवहार में पृथक्-पृथक् ज्ञात होते हैं,
उसी प्रकार आत्मा, आत्मा का आभास और आत्मा का आश्रय ये तीनों भी परस्पर विलक्षण प्रतीत होते हैं। किन्तु
परमार्थदृष्टि से नहीं, यह सब व्यावहारिक दृष्टि से है। वस्तुतः तो शास्त्र तथा युक्तियों के द्वारा तो आभास की असत्ता
(सत्ता का अभाव) ही सिद्ध होती है। 'आत्मा' तो त्वम् पद से लक्ष्य, चित् धातु है। वह अनादि अविद्या के कार्य में
प्रतिबिम्बित रहने से तदुपाधिस्थत्ववैशिष्ट्य जो जीवत्व है, वही 'आभास' है। अविद्या और उसकी कार्यरूप उपाधि ही
'आश्रय' है—यह 'त्वम्' पद का अर्थ बताया गया । "रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव"१, "इन्द्रोमायाभिः पुरुरूप ईयते"२,
"अनीशया शोचति मुह्यमानः३" तथा "एको वशी सर्वभूतान्तरात्मकं रूपं बहुधा यः करोति४" इत्यादि श्रुतियों से
और नित्य सिद्ध साक्षी आत्मा में बुद्ध्यादि एवं आगमापायी विषयान्तरस्वरूप दृश्य का अध्यास हुए विना उसका स्फुरण
और सत्ता ही उपपन्न नहीं हो पाती, इस युक्ति से एकमात्र प्रत्यगात्मा की ही सत्ता सिद्ध होती है। आभास आदि की
सत्ता नहीं सिद्ध हो रही है, वास्तव में आभास और उसके आश्रय की सत्ता का अभाव ही निश्चित होता है ॥ ४३ ॥
न दृशेरविकारित्वादाभासस्याप्यवस्तुतः ।
नाचित्त्वादहंकर्तुः कस्य संसारिता भवेत् ॥४४॥
नेति—अविकारी होने के कारण चैतन्यैकरस आत्मा में संसारित्व नहीं है, आभास तो अवस्तुरूप है,
इसलिए उसे भी संसारी नहीं कहा जा सकता उसी तरह अहङ्कर्ता, जड़ (अचेतन) होने के कारण उसे भी संसारी नहीं
कह सकते । ऐसी स्थिति में यह कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसारित्व किसका कहा जाय ? ॥ ४४ ॥
१. (बृ. उ. २।५।१९ तथा कठ. उ. ५।९।१०)
२. (बृ. उ. २।५।१९ तथा ऋ. सं. ६।४७।१७, जैमि० उ. ब्रा. १।४४।१)
३. (मुं. उ. ३।१।२, श्वे. उ. ४।७)
४. (कठ. उ. ५।१२)