उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१० उपदेशसाहस्री
अध्यक्षस्येति—यदि यह कहें कि साक्षी चेतन के सन्निध रहने मात्र से प्रत्ययों का प्रकाशन हो जायगा,
चिदाभास की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं होगी । किन्तु यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि अध्यक्ष में अर्थात्
निर्विकार कूटस्थ साक्षी में उपकारित्व की सम्भावना नहीं कर सकते, क्योंकि उसमें उपकारित्व को मानने पर अन्यत्र
लोष्ठकाष्ठादि में भी प्रत्ययप्रकाशकत्व मानना होगा, क्योंकि साक्षी की सन्निधि तो सर्वत्र समान ही है ॥ ७५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि यह कहें कि स्वप्रकाश साक्षी के न रहने पर प्रत्ययों का भावाभाव (उत्पत्ति-विनाश) नहीं हो पायेगा,
तो साक्षी के सान्निध्यमात्र से ही प्रत्ययों का भावाभाव (प्रकाशनादि) का होना उपपन्न हो जायगा, तब आभास
(चिदाभास) को मानने की क्या आवश्यकता ? किन्तु यह शंका उचित नहीं प्रतीत हो रही है। क्योंकि निर्विकार कूटस्थ
साक्षी में किसी प्रकार के उपकारकत्व की संभावना नहीं हो सकती। यदि हठात् उसमें उपकारकत्व धर्म को स्वीकार
करें तो उसकी सन्निधि सभी के साथ समान रहने से काष्ठ-लोष्ठादि में भी प्रत्ययप्रकाशन का सामर्थ्य मानना होगा ॥ ७५ ॥
अर्थी दुःखी च यः श्रोता स त्वध्यक्षोऽथवेतरः ।
अध्यक्षस्य च दुःखित्वमर्थित्वं च न ते मतम् ॥७६॥
अर्थीति—इसी प्रसंग में एक प्रश्न यह भी हो सकता है कि मुमुक्षु, जो अर्थी कहलाता है, वह संसार के
दुःखों से दुःखी हुआ जो गुरुपदेश का श्रोता है, वह कौन है ? क्या वह बुद्धि है ? साक्षी है ? अथवा कोई अन्य है ?
तुम्हें अध्यक्ष का यानी साक्षी का दुःखित्व और मुमुक्षुत्व तो मान्य नहीं है ॥ ७६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आभास के न मानने पर बौद्ध मत की समानता के दोष का परिहार नहीं हो सकेगा, यह कहने पर शास्त्रीय
बन्ध-मोक्ष व्यवहार भी नहीं हो पायगा। मोक्ष की इच्छा करने वाला और सांसारिक दुःखों से दुःखी हुआ जो गुरुपदेश
का श्रोता है, वह कौन है ? जो श्रोता है, वही अध्यक्ष है या उससे अन्य और कोई है ? प्रथम कल्प (पक्ष) में तुम्हारे
निरनुग्राह्याध्यक्षवादी सिद्धान्त का भंग हो जायगा, अर्थात् तुम्हें साक्षी का दुःखित्व और मुमुक्षत्व तो स्वीकार है नहीं।
आत्माभास का अंगीकार न करने वाले तुम्हारे मत में द्वार न होने से अविद्यातत्कार्य सम्बन्ध की सिद्धि नहीं होगी, उसके
बिना मोक्षार्थित्व भी सिद्ध नहीं होगा, अर्थात् आभास के स्वीकार करने का प्रसंग प्राप्त होगा ॥ ७६ ॥
कर्ताध्यक्षः सदस्मीति नैव सद्ग्रहमर्हति ।
सदेवासीति मिथ्योक्तिः श्रुतेरपि न युज्यते ॥७७॥
कर्तेति—'मैं कर्ता और साक्षी सत् हूँ'—यह कहने से 'आत्मा' का, 'सत्' शब्द से निर्दिष्ट जो 'ब्रह्म' है,
उस रूप से ग्रहण नहीं हो सकता, और 'तू सत् ही है'—इस वेदवचन को तो मिथ्या कहना भी उचित नहीं है। इसलिये
शुद्ध चेतन में कर्तृत्व, दुःखित्व तथा अर्थित्वादि विकारी धर्मों का होना संभव नहीं हो सकता ॥ ७७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
द्वितीय कल्प को दूषित करते हैं—'मैं कर्ता और साक्षी सत् हूँ' ऐसा स्वीकार करने से आत्मा का 'सत्'
शब्द से निर्दिष्ट हुए ब्रह्मरूप से ग्रहण नहीं किया जा सकता। और 'तू सत् ही है' यह श्रुतिवाक्य भी मिथ्या नहीं माना
जा सकता। अतः शुद्ध चेतन में कर्तृत्व, दुःखित्व एवं अर्थित्वादि विकारी धर्मों का होना असंभव है। क्योंकि एक
ही वस्तु एक साथ 'कर्ता' और 'साक्षी' नहीं होती है। ये दोनों धर्म परस्परविरुद्ध हैं। एक ही वस्तु में दो
विरोधी धर्मों का एक साथ रहना संभव नहीं है। कर्ता कर्तृत्वधर्म से युक्त होने से विकारी होता है, किन्तु साक्षी
कर्तृत्वादि धर्म से रहित होता है ॥ ७७ ॥
अविविच्योभयं वक्ति श्रुतिश्चेत्स्याद्ग्रहस्तथा ।
अस्मदस्त्व विविच्यैव त्वमेवेति वदेद्यदि ।
प्रत्ययान्वयिनिष्ठत्वमुक्तदोषः प्रसज्यते ॥७८॥