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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पद्यभाग ६: विशेषापोहप्रकरणम्

विशेषापोहप्रकरणम्
छित्त्वा त्यक्तेन हस्तेन स्वयं नात्मा विशेष्यते ।
तथा शिष्टेन सर्वेण येन येन विशेष्यते ॥१॥
छित्वेति—काटकर डाल दिये हुए हाथ द्वारा स्वयं आत्मा ('मैं हाथवाला हूँ') इस प्रकार विशेषित नहीं
होता, उसी प्रकार त्यक्तहस्तातिरिक्त सभी से अर्थात् छिन्न हाथ के अतिरिक्त शेष (बचे हुए) मनुष्यत्वादि जिन जिन
विशेषणों से विशेषित किया जाता है, उनमें से किसी से भी वास्तव में वह विशिष्ट नहीं है ॥१॥
हृदयस्पर्शिनी
वेदान्तवाक्य से 'अहं ब्रह्मा' मैं ब्रह्म हूँ, यह ज्ञान पदार्थविवेकवान् को होता है, यह पूर्व प्रकरण में बता
चुके । वहीं पर 'अहम्' में स्थित 'इदमंश' के प्रहाण से साक्षितत्त्व (आत्मतत्त्व) के शोधन का सूक्ष्म उपाय भी बता चुके,
किन्तु उस सूक्ष्म उपाय को अपनाने में जो असमर्थ हो, उसके लिये पदार्थशोधन के स्थूल उपाय को बताने के उद्देश्य
से इस प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है।
जो वस्तु अपने स्वरूप को अलग करके ज्ञात नहीं हो सकती, जैसे अग्नि की उष्णता; उष्णता तो अग्नि का
स्वरूप ही है, वह अग्नि का विशेषण नहीं है, तथापि कहीं कहीं भेद की कल्पना कर विशेषणता का भी व्यवहार लोग
किया करते हैं। सत् आत्मा में सत्ता, चैतन्य, आनन्द का कभी भी अभाव (विनाश) न होने से वे आत्मा के विशेषण
नहीं हैं, अपितु वे आत्मा के स्वरूप हैं। और कृश, स्थूल, कृष्ण, गौर, मनुष्य, श्रोता, द्रष्टा, वक्ता, कामी, क्रोधी, ज्ञानी,
कर्त्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी ऐसे ही अन्य भी आत्मा के विशेषण कहे जाते हैं, क्योंकि ये सत्ता आदि के समान आत्मा के
स्वरूपभूत नहीं हैं। क्योंकि सुषुप्ति अवस्था में आत्मा की सत्ता रहने पर भी कृश, स्थूल आदिकों का अभाव रहता
है। इन सबसे पृथक् रहने वाले में कूटस्थता का निश्चय करना चाहिये। जैसे हाथ कटने के बाद 'मैं हाथ वाला हूँ'
ऐसा विशिष्ट प्रत्यय किसी को नहीं होता, वैसे ही 'मैं पैर वाला हूँ' ऐसा विशिष्ट प्रत्यय भी नहीं करना चाहिये ॥१॥
तस्मात्त्यक्तेन हस्तेन तुल्यं सर्वं विशेषणम् ।
अनात्मत्वेन तस्माज्ज्ञो मुक्तः सर्वैर्विशेषणैः ॥२॥
तस्मादिति—आत्मस्वरूप के अतिरिक्त समस्त वस्तुएँ अनात्म होने के कारण, वे सभी विशेषण, काटकर
फेंक दिये गये हाथ के समान ही हैं। अतः आत्मा, अखिल (समस्त) विशेषणों से रहित है ॥२॥
हृदयस्पर्शिनी
श्रोत्र आदि स्थूलदेहाश्रय होने से आत्मा के विशेषण नहीं हो सकते तो न हों, सुख-दुःखादि जो स्थूल-
देहाश्रय नहीं हैं, उन्हें तो आत्मा के विशेषण समझा ही जा सकेगा। किन्तु विचार करने पर वे भी आत्मविशेषण
नहीं बन पाते। स्थूल, सूक्ष्म दोनों देहों के धर्मों का आत्मा में व्यभिचार पाया जाता है, यह बात सभी के स्वानुभव-
गम्य है। ऐसे व्यभिचारी धर्मों को आत्मविशेषण मानकर उनसे आत्मा को विशेषित नहीं समझना चाहिये। ये
जितने भी अनात्मधर्म, अनात्मवस्तुएँ हैं, वे सब देह के ही विशेषण होते हैं, आत्मा के नहीं; वे सत्, चित्, आनन्द के
समान आत्मा के स्वरूप भी नहीं हैं। इसीलिये ऐसा अनुमान प्रयोग भी करते हैं—'विमतानि विशेषणानि नात्म-
स्वभावभूतानि विशेषणत्वात् छित्त्वा त्यक्तहस्तवत्।' इस कारण यह 'ज्ञ' अर्थात् विवेकज्ञानवान् समस्त विशेषणों से
रहित चित्-सत्-आनन्दमात्रस्वरूप से ही अवशिष्ट रहता है ॥२॥

२८ उपदेशसाहस्री
विशेषणमिदं सर्वं साध्वलङ्करणं यथा ।
अविद्याध्यक्षस्तमतः सर्वं ज्ञात आत्मन्यसद्भवेत् ॥३॥
विशेषणमिति—अविद्या से उत्पन्न हुए अध्यास के कारण होनेवाले ये समस्त विशेषण भी पुरुष के आभूषणों
के समान ठीक ही हैं। किन्तु आत्मज्ञान होने पर ये सब असत् ही हैं, ऐसा निश्चय होता है ॥ ३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उपर्युक्त रीति से विशेषणों के अनात्मरूप रहने पर भी उनका आत्मा से वियोग नहीं है, क्योंकि आगम
तथा अपाय के द्वारा उनका आत्मा से सम्बन्ध निरन्तर बना रहता है। तथापि ये सब विशेषण अलंकार की तरह हैं।
जैसे अलंकारों का अलंकार्य व्यक्ति के साथ सम्बन्ध रहने पर भी, वे अलंकार्य व्यक्तिस्वरूप या उसके धर्म नहीं समझे
जाते, केवल उनका औचित्य समझा जाता है। अन्यथा उनका निकालना-पहिनना (आगम-अपाय) नहीं बन सकेगा।
यदि ऐसी बात है तो 'मनुष्योऽहम्' मैं मनुष्य हूँ, ऐसी मनुष्यत्व के साथ तादात्म्य प्रतीति क्योंकर होती है ? तो उत्तर
होगा कि मोह से ही वैसी प्रतीति होती है। ये सभी विशेषण आत्मा में अविद्या के द्वारा अध्यस्त हैं। अतः आत्मा
के ज्ञात होने पर जब अविद्या की निवृत्ति हो जाती है, तब असत् पदार्थों का बाध हो जाता है। अर्थात् किसी भी
काल में वे विद्यमान नहीं हैं यह निश्चय हो जाता है ॥ ३ ॥
ज्ञातैवात्मा सदा ग्राह्यो ज्ञेयमुत्सृज्य केवलः ।
अहमित्यपि यद्ग्राह्यं व्यपेताङ्गसमं हि तत् ॥४॥
ज्ञातैवेति—अतः ज्ञेय ( दृश्य ) का बाघ करके आत्मा का केवल ज्ञातारूप से ही सर्वदा अनुभव करना
चाहिये। 'अहम्' इस प्रकार ग्राह्य ( ज्ञेय ) रूपसे आत्मा का जो अनुभव हो रहा है, वह भी कटे हुए अंग के समान ही
वस्तुतः अनात्मा ही है ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व श्लोक में "ज्ञात आत्मन्यसद् भवेत्" कहा गया है। 'तब ज्ञाते आत्मनि' अर्थात् आत्मा के ज्ञात होनेपर
कहने से आत्मा में 'ज्ञेयत्व' धर्म की प्रतीति होगी, और अन्य विशेषणों की तरह 'ज्ञेयत्व' में अनात्मत्व कहना होगा।
अतः 'ज्ञायमानत्व धर्म' से वस्तु में अनात्मत्व समझना उचित नहीं है। अर्थात् ज्ञेय पदार्थों को अनात्मा कहना ठीक
नहीं है। क्योंकि 'आत्मा' भी ज्ञेय है।
किन्तु इस शंका का समाधान इस प्रकार होगा कि 'ज्ञेय' ( दृश्य ) अंश का त्याग कर जो सर्वदा सबका
ज्ञाता है, वही 'आत्मा, है। ग्राह्यांश (ज्ञेयांश) आत्मा नहीं है। इतना ही नहीं, वह 'केवल' है, अर्थात् 'ज्ञातृत्व' विशेषण
से भी रहित है। 'ज्ञातृत्व' तो उसका उपलक्षक है। एवं च ज्ञातृत्व से उपलक्षित ( सूचित ), अलुप्तप्रकाशस्वभाव होने
से सर्वानुस्यूत, चिन्मात्र जो वस्तु है, वही 'आत्मा' है, इस प्रकार का ज्ञान विवेकी पुरुष को होता है। 'अहम्' इस
प्रकार अनुभूयमान होने से ( अनुभव का विषय होने से ) ज्ञाता को ही 'आत्मा' कैसे कहा जाय ? शंका करनेवाला
यद्यपि 'इदम् अहम्' 'यह मैं, इस प्रकार 'ग्राह्य' को ही आत्मा समझता है, तथापि वह ( इदमंश ) तो कटे हुए हाथ
की तरह ही है। क्योंकि सुषुप्ति, मूर्छा की अवस्था में आत्मा के रहनेपर भी उसकी 'अहम्'-मैं-के द्वारा प्रतीति नहीं
होती। अतः 'आत्मा' के रहनेपर उसकी 'अहम्' से प्रतीति अवश्य होती ही है, ऐसा कोई नियम नहीं है। वह तो
आत्मा के द्वारा दृश्य है, इसलिये उसे आत्मा नहीं कह सकते। एवं च 'आत्मा' अहंप्रत्यय से भी ग्राह्य नहीं है ॥ ४ ॥
यावान् स्यादिदमंशो यः स स्वतोऽन्यो विशेषणम् ।
विशेषक्षयो यत्र सिद्धो ज्ञश्चित्रगुर्यथा ॥५॥
यावानिति—'अहम्' इस प्रत्यय में जितना 'इदम् अंश' ( दृश्यत्व ) है, वह आत्मा से पृथक् होने के कारण
उसका विशेषण ही है। इस विशेषांश का भी जहाँ क्षय हो जाता है, वहाँ चित्रगु के समान आत्मा का निश्चय हो
जाता है ॥ ५ ॥

विशेषापोहप्रकरणम् २९
हृदयस्पर्शिनी
जब कि 'आत्मा' अहं प्रत्यय से भी ग्राह्य नहीं, चक्षुरादि इन्द्रियों से भी ग्राह्य नहीं, तब उसके अस्तित्व
में क्या प्रमाण है ? इस प्रकार शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मा की सिद्धि स्वयमेव ही है, उसकी सिद्धि में
अन्य की अपेक्षा नहीं होती । चिदचिदात्मक 'अहम्' प्रत्यय में जितना अचिदात्मक अहंकारादि इदमंश है, वह जिसका
विशेषण हो, वही प्रत्यगात्मा है । एवं च अहंकारादि विशेषणों से अतिरिक्त, तथा समस्त विशेषणों की व्यावृत्ति (प्रक्षय)
जहाँ हो जाती है, अर्थात् निर्विशेष और किसी अन्य की अपेक्षा किये बिना ही जिसका स्वरूप स्फुरित (लब्धसत्ताक)
होता रहता है, वही प्रत्यगात्मा है। जैसे 'चित्रगुः देवदत्तः' में 'चित्रगुः' देवदत्त का विशेषण है। उस विशेषण से
देवदत्त बिलकुल पृथक् है । उक्त विशेषण से सम्बन्ध होने के पूर्व ही उसका अस्तित्व सिद्ध है, अपनी सिद्धि
(अस्तित्व) के लिये उसे विशेषण से सम्बन्ध रखने की आवश्यकता नहीं होती, उसी तरह 'आत्मा' भी अहंकारादि से
सम्बन्ध होने के पूर्व से ही अपनी महिमा (प्रभाव) के द्वारा ही सिद्ध है। उसे अपने अस्तित्व के लिये अहंकार
आदि की अपेक्षा नहीं होती । इसी अभिप्राय को अनुमान-प्रयोग के द्वारा भी कहा जा सकता है—'विमतं विशेषणं
स्वविलक्षणविशेष्यनिष्ठं विशेषणत्वात् चित्रगुत्ववत् ।' एवं च प्रत्यगात्मा का अस्तित्व स्वतः सिद्ध है ॥ ५ ॥
इदमंशोऽहमित्यत्र त्याज्यो नात्मेति पण्डितैः ।
अहं ब्रह्मेति शिष्टांशो भूतपूर्वगतेर्भवेत् ॥ ६ ॥
इदमिति—'अहम्' इस प्रतीति में केवल 'इदमंश' ही पण्डितों के लिये त्याज्य है । 'आत्मा' का त्याग अभीष्ट
नहीं है । 'अहं ब्रह्मास्मि' इस वाक्य में पूर्व प्रसंग के ( भूतपूर्वगति के ) अनुसार अवशिष्ट अंश का ही ग्रहण किया
गया है ॥ ६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जब कि 'अहम्' भी अनात्मा है तब 'अहं ब्रह्म' यह तादात्म्यबोधक श्रुति कैसे उपपन्न हो सकेगी ? यह
शंका, श्रुति के तात्पर्य को न समझने के कारण हो रही है । 'अहं ब्रह्म' यह श्रुति अध्यस्त अहंकार के मूल की निवृत्ति
के लिये है, 'अहंकार' में आत्मत्वप्रतिपत्ति कराने के लिये नहीं है, अर्थात् अहम् (अहंकार ) आत्मा है, यह बताने
के लिये नहीं है । 'अहम्' कहने पर अहंकार का अवभास होता है, उसमें जो इदमंश है, वह दृश्य होने से 'आत्मा'
नहीं है, इस बात को बुद्धिमान् लोग अच्छी तरह समझ लें, अर्थात् उस अहम् ( अहंकार ) में आत्माभिमान न करें ।
अहंकार के त्यागने पर अवशिष्ट अनिर्दरूप अंश है, वही अहं शब्द से लक्षित ब्रह्म है, इस प्रकार वह जाना जाता है ।
यदि अहम् में आत्माभिमान नहीं करना है, तो 'अहम् ब्रह्म' श्रुति वैसा निर्देश क्यों कर रही है ? इसका उत्तर तो
यह है कि 'अहं ब्रह्म' में जो अहंकार का उल्लेख है, वह भूतपूर्व गति के कारण है । अर्थात् 'भूता सञ्जाता पूर्वमविद्याव-
स्थायाम्' अविद्यावस्था में 'अहमात्मा' इस प्रकार जो गति (बुद्धि) हुई थी, यानी ब्रह्मज्ञान होने के पूर्व अविद्यादशा में
'अहमात्मा' अहंकार को ही आत्मा समझ रहे थे, इस दृढ़ परिचय के कारण ही अब वाक्यार्थज्ञान के समय भी
अहम् का उल्लेख किया गया है । अहंकार से लक्षित जो वस्तु है, उसका साक्षी 'अहम्' मैं—इस प्रकार श्रुति उल्लेख
कर रही है ॥ ६ ॥
॥ इति षष्ठं विशेषापोहप्रकरणं समाप्तम् ॥