उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पद्यभाग २: प्रतिषेधप्रकरणम्
प्रतिषेधप्रकरणम्
प्रतिषेद्धुमशक्यत्वान्नेति नेतीति शेषतम् ।
इदं नाहमिदं नाहमित्यद्धा प्रतिपद्यते ॥१॥
प्रतिषेद्धुमिति—'स एष नेति नेत्यात्मा गृह्यते'— यह आत्मा नहीं है, यह आत्मा नहीं है, इस प्रकार अनात्म-
रूप देह, इन्द्रिय आदि का निषेध करते करते, जिसका निषेध नहीं हो पाया अर्थात् निषेध के योग्य न होने के कारण जो शेष
(बच) रहा, वही आत्मा है। 'यह मैं नहीं हूँ, यह मैं नहीं हूँ' इस रीति से प्रतिषेध करते करते ही उस आत्मा की साक्षात्
उपलब्धि हो जाती है ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रथम प्रकरण के द्वारा यह बताया गया था कि मोक्ष की साधनभूत ब्रह्मात्मविद्या ( ब्रह्मात्मक्यज्ञान )
के अवगम के लिये वेदान्त का आरम्भ करना आवश्यक है। किन्तु एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि विद्योपदेश
( ब्रह्मविद्या के उपदेश ) के लिये वेदान्त का आरम्भ करना तब संगत हो सकता है कि जब विद्योदय ( ज्ञानोदय )
की संभावना हो । आत्मा का संसारित्व तो ( मैं संसारी हूँ ) सभी को प्रत्यक्ष ( अनुभव ) सिद्ध है। ऐसी स्थिति में
संसारित्वग्राहक प्रत्यक्षादि प्रमाण के विरुद्ध वेदान्त के सैकड़ों वाक्य भी उपदेश करें तो भी ब्रह्मात्मैकत्वविद्या
( ब्रह्मात्मैक्यज्ञान ) का उदय होना कभी संभव नहीं हो सकता । यदि यह कहें कि प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह आगम
( शब्द ) भी तो प्रमाण है। प्रत्यक्ष प्रमाण आत्मा के संसारित्व को बताता है तो आगम प्रमाण उसकी ब्रह्म के साथ
एकता ( ब्रह्मात्मैक्य ) को बता रहा है। अतः दोनों बातें प्रमाणसिद्ध होने से दोनों को माना जा सकता है। किन्तु
यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण असंजातविरोधी है और आगम ( शब्द ) प्रमाण प्रत्यक्षोपजीवी है।
अतः असंजातविरोधिन्याय से प्रत्यक्षप्रमाण को ही प्रबल कहा जायगा और आगम प्रमाण तदुपजीवी होने से दुर्बल
रहेगा । एवंच दोनों प्रमाण होनेपर भी उनमें समानता नहीं है, अपितु प्रबल-दुर्बल भाव है। अतः दुर्बल आगम प्रमाण
से ब्रह्मात्मविद्या का उदय कैसे संभव हो सकता है ? जिसके लिये वेदान्त के आरम्भ करने की आवश्यकता होगी ।
तुष्यतुदुर्जनन्याय से दुर्बल आगम प्रमाण के द्वारा ब्रह्मात्मविद्या ( ब्रह्मात्मैक्यज्ञान ) का उदय ( उत्पत्ति ) होना
मान लिया जाय और उससे प्रत्यक्ष प्रमाणसिद्ध संसारित्व का प्रतिषेध यदि कहा जाय तो दुर्बल आगम प्रमाण से
सिद्ध प्रत्यगात्मा की ब्रह्मरूपता का भी बाध प्रबल प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा क्यों न माना जाय ?
इसी आशंका के समाधानार्थ इस द्वितीय प्रकरण का आरम्भ किया जा रहा है, जिसमें ब्रह्मात्मैक्य-
ज्ञानोत्पादन द्वारा कार्यसहित अज्ञान की निवृत्ति करनेवाले वेदान्तवाक्यों का अर्थ संक्षेप में बताया जायगा । 'नेति नेति'
ऐसी वीप्सा (द्विरुक्ति) करने से आरोपित सकल दृश्य-अदृश्य जड़ वस्तुओं का प्रतिषेध करते-करते एक अवधितक पहुँच
जानेपर अन्त में शेष बचा हुआ जो तत्त्व है, वही आत्मतत्त्व है, उसका प्रतिषेध नहीं हो पाता। क्योंकि वहीं तक प्रतिषेध
की अवधि है। अर्थात् प्रतिषेध करने वाला वही ( आत्मा ) है ( प्रतिषेध की साक्ष देनेवाला वही है ) । उसका प्रतिषेध
करनेवाला कोई अन्य न होने से उसका प्रतिषेध करना अशक्य (असंभव) है। अन्त में वही एक ( प्रतिषेध करनेवाला )
शेष रह जाता है। अतः उसकी बिना किसी सन्देह के साक्षात् उपलब्धि हो जाती है। यह जो स्थूल शरीर ( देह ) है,
वह मैं ( आत्मा ) नहीं हूँ, यह जो सूक्ष्मशरीर ( मन, बुद्धि, प्राण और इन्द्रिय समुदाय ) है, वह भी मैं ( आत्मा )
नहीं हूँ, और तदुपादानक जितना भी अचेतन वर्ग है, वह भी मैं ( आत्मा ) नहीं हूँ, बल्कि मैं तो इन सबका प्रकाशक
अव्यभिचारी, स्वयंप्रकाश, कूटस्थ, अक्षर हूँ, जिसमें समस्त जगत् का आश्रय कहा जाने वाला अव्याकृत आकाश
ओत-प्रोत है, वही मैं पर अक्षर (अहं ब्रह्माऽस्मि) हूँ। इस प्रकार से उस (आत्म तत्त्व) की असन्दिग्ध रूप से उपलब्धि
हो जाती है। इस विवेचन से पूर्वोक्त शंका (विद्या तो उत्पन्न हो ही नहीं सकती) का पूर्णतया निराकरण हो जाता है।
'प्रतिषेद्धुमशक्यत्वात्' कहने से वह (आत्मा) बाध के योग्य नहीं है, यह बताया गया है। एवंच यह प्रत्यगात्मा,
प्रतिषेध की अवधि तथा प्रतिषेध का साक्षी होने से उसमें प्रतिषेध की प्रसक्ति नहीं होती है ॥२॥
प्रतिषेधप्रकरणम् १७
अहं धीरिदमात्मोत्था वाचारम्भणगोचरा ।
निषिद्धात्मोद्भवत्वात्सा न पुनर्मांनतां व्रजेत् ॥२॥
अहं धीरिति- 'अहं' यह ज्ञान (बुद्धि), 'इदमात्मा' अर्थात् अन्तःकरणादि अनात्मवस्तु से उत्पन्न होने के कारण
वह वाणी से आरम्भ होनेवाले विकार के अन्तर्गत ही है। वह (अहम्) बुद्धि (ज्ञान) निषेध किये जाने वाले आत्मा (देहादि)
से उत्पन्न होने के कारण प्रमाण नहीं मानी जा सकती ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिज्ञासु के मन में यह शंका हो सकती है कि 'अहं ब्रह्म' यह ज्ञान निर्दिष्ट रीति से उत्पन्न होने पर भी
उसे कैसे प्रमाण कहा जा सकता है ? क्योंकि देह, इन्द्रिय आदि में अभिमान तो निरन्तर होता रहता है। किन्तु ऐसी
शंका करना ठीक नहीं है। क्योंकि देहादि में होनेवाले आत्माभिमान का निरन्तर बाध होता रहता है। और जिसका
बाध होता है, उसे आभास कहते हैं, इसलिये दोनों (अभिमान-बुद्धि और ब्रह्मबुद्धि) की समानता नहीं है अपितु वेदान्त-
वाक्योत्पन्न ज्ञान ही प्रबल है। देहादि अनात्मा में होनेवाली आत्मबुद्धि को 'अहंधी' कहते हैं। उसकी उत्पत्ति अहंकर्त्ता
के बाधित स्वरूपवाले 'इदं' अंश से होती है। अर्थात् पूर्व-पूर्व अहंकार-वासना-वासित-अन्तःकरणरूप इदमात्मा से
उत्पन्न होती है। अतः वह (अहं धी) अध्यासरूप है। किन्तु वेदान्तवाक्य से उत्पन्न 'अहं ब्रह्म' बुद्धि यथार्थ है, अर्थात्
अध्यासरूप नहीं है। निष्कर्ष यह है कि दोनों बुद्धियाँ एक नहीं हैं। एवञ्च 'अहं धी' यह बुद्धि अयथार्थ है और 'अहं-
ब्रह्म' यह बुद्धि यथार्थ है। अतः 'अहं धी' स्वरूपतः दुर्बल है। उसी प्रकार दोनों बुद्धियों के विषय भी भिन्न होने से
वह (अहं धी) दुर्बल प्रतीत होती है। अहं बुद्धि का विषय अनृत, जड़, अनात्मरूप (वाचारंभण) है। उसकी (अहं-
बुद्धि के विषय की) स्वतः सत्ता न रहने पर भी अपरोक्ष व्यवहार (प्रत्यक्ष व्यवहार) का विषय बनती है। इसी कारण
'नेति-नेति' शास्त्र से अहं बुद्धि के विषयस्वरूपों का निषेध (बाध) किया जाता है। ऐसे निषिद्ध (बाधित) स्वरूपों से
उत्पन्न हुई इदमात्मबुद्धि (अहं धी), आत्मा का यथार्थ ज्ञान होने पर कैसे प्रमाण हो सकेगी? क्योंकि स्वप्नावस्था
के ज्ञान की तरह वह इदमात्मबुद्धि (अहं बुद्धि) (१) अवस्तुरूप है, (२) अवस्तुजन्य है, (३) अवस्तुविषयक है।
अतः वेदान्तवाक्योत्पन्न 'अहं ब्रह्मास्मि' ज्ञान ही प्रबल है। अहं बुद्धि (अहं धी) का स्वरूप भी निषिद्ध है और कारण
भी निषिद्ध है, इसलिये ब्रह्मात्मज्ञान के हो जाने पर उस अहंबुद्धि में प्रामाण्यबुद्धि नहीं रहती ॥२॥
पूर्वबुद्धिमबाधित्वा नोत्तरा जायते मतिः ।
दृशिरेका स्वयं सिद्धः फलत्वात्स न बाध्यते ॥३॥
पूर्वबुद्धिमिति - प्रथम उत्पन्न हुए ज्ञान (बुद्धि) का बाध किये बिना उत्तर (द्वितीय) ज्ञान (आत्मबुद्धि) उत्पन्न
नहीं हो सकता। किन्तु साक्षी चेतन, एक और स्वयंसिद्ध है। वह स्वयं फलरूप है, अतः उसका बाध नहीं होता ॥३॥
हृदयस्पर्शिनी
'मैं कर्त्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ' इस ज्ञान के रहते 'मैं अकर्त्ता, अभोक्ता ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान कैसे हो सकता है ?
कर्तृत्व, भोक्तृत्व ज्ञान प्रथमतः होता है, प्रथम होने के कारण उसे ही प्रबल मानना होगा; अकर्तृत्व-अभोक्तृत्व ज्ञान
पश्चात् होता है, पश्चात् होने से उसे दुर्बल कहना होगा, तब प्रबल से दुर्बल का ही बाध होगा तो 'मैं ब्रह्म हूँ' यह
बुद्धि कैसे होगी ?
किन्तु यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि 'पौर्वापर्ये पूर्वदौर्बल्यं प्रकृतिवत्' इस नियम के अनुसार उत्तर-
कालिक ब्रह्मात्मज्ञान से पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्वज्ञान का बाध हो जायगा। जैसे शुक्ति के अज्ञान से उत्पन्न होने
वाली रजतबुद्धि का बाध किये बिना शुक्तिबुद्धि नहीं हुआ करती । वैसे ही पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि
का बाध किये बिना उत्तरकालिक आत्मतत्त्वज्ञान उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि प्रसक्त का (प्राप्त का) निषेध करना
ही 'बाध' का स्वरूप है। पूर्व के काल में उत्तरकालिक पदार्थ की प्रसक्ति (प्राप्ति) ही न होने के कारण पूर्व से
उत्तर का बाध हो ही नहीं सकता। अर्थात् पूर्व से पर का बाध नहीं हो सकता, बल्कि प्रसक्त हुए पूर्व का ही पर
(उत्तर) से बाध होना उचित है। एवंच उत्तरकालिक ब्रह्मात्मबुद्धि से पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि का बाध
३
१८ उपदेशसाहस्री
होना ही उचित है। तथापि विपरीत ही क्यों न माना जाय ? अर्थात् कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि के द्वारा ब्रह्मात्मबुद्धि का
ही बाध होना क्यों न माना जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि ज्ञप्तिस्वरूप ब्रह्मात्मा को ही 'दृशि' कहते हैं,
अर्थात् ब्रह्मात्माकार अन्तःकरणवृत्ति में प्रतिफलित होनेवाले अपरोक्ष स्फुरण को 'दृशि' कहते हैं। वह एक है अर्थात्
किसी पर (द्वितीय) के न होने से उसे अद्वितीय कहते हैं। वह स्वयं सिद्ध है, अर्थात् किसी अन्य की अपेक्षा किये
बिना भी उसकी सत्ता का स्फुरण होता है। इन निर्दिष्ट विशेषणों से स्पष्ट होता है कि वह ( आत्मतत्व ) बाध होने
योग्य नहीं हैं, क्योंकि उसका कोई बाधक ही नहीं है। उसका ज्ञान भी परमार्थविषयक होने से बाध के योग्य नहीं
है। उस ज्ञान का फल भी बाध होने योग्य नहीं है, अर्थात् अबाध्य है। ज्ञान से अभिव्यक्त होने वाले एवं बाधरहित
ब्रह्मात्मतत्त्व को ही औपचारिक फल कहा गया है। अर्थात् नित्यसिद्ध ब्रह्मात्मतत्त्व में 'फल' शब्द का प्रयोग लाक्षणिक
है, क्योंकि विषयाकार वृत्ति के द्वारा उसकी अभिव्यक्ति होती है। एवं च वस्तु, उसका ज्ञान और उसके फल का बाध न
हो सकने से उसके द्वारा कर्त्रादिबुद्धि का ही बाध होना उचित है। यदि कहें कि पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि का
उत्तरकालिक आत्मज्ञान के द्वारा बाध मानने पर उपजीव्य विरोध होगा, अतः कर्तृत्व बुद्धि को बाध्य कैसे कहा
जाय ? किन्तु यह शंका अधिक देर टिक नहीं पाती, क्योंकि पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि के व्यवहार में अंगरूप
अंश का उत्तरकालिक आत्मज्ञान से बाध नहीं किया जाता, अतः उपजीव्य विरोध की शंका करना ठीक नहीं है।
शब्द प्रमाण को पदार्थ का ज्ञान कराने में प्रमाणान्तर की अपेक्षा रहने पर भी, वाक्यार्थ का ज्ञान कराने में उसे
अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं रहती। पदार्थ बोध में भी केवल व्यवहार की ही अपेक्षा रहती है। एवं च अत्यन्त
अबाध्य अर्थ होने से औपनिषद आत्मज्ञान ही तत्त्वावेदक है॥ ३॥
इदं वनमतिक्रम्य शोकमोहादिदूषितम् ।
वनाद् गान्धारको यद्वत्स्वात्मानं प्रतिपद्यते ॥४॥
इदमिति- जिस प्रकार गान्धार देश निवासी कोई पुरुष वन को पार कर अपने देश पहुँच गया। उसी
प्रकार शोकमोहादि दोषों से दूषित इस देहरूप वन को पार कर मुमुक्षु पुरुष अपने आत्मस्वरूप को पा लेता है ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
वेदान्तवाक्य से ब्रह्मात्मज्ञान की अनुत्पत्ति की आशंका का उन्मूलन कर, तथा वेदान्तवाक्यजन्य ब्रह्मात्म-
ज्ञान की प्रबलता का उपपादन कर पूर्वप्रवृत्त प्रत्यक्ष आदि के द्वारा उसके बाधित होने की आशंका का उन्मूलन
किया गया। अब एक श्रौत दृष्टान्त देकर पदार्थपरिशोधन द्वारा उस ब्रह्मात्मज्ञान की उत्पत्ति का निरूपण इस
श्लोक के द्वारा किया जा रहा है। एक वन का रूपक देकर शरीर को बता रहे हैं। वन में जैसे व्याघ्र, तस्कर आदि
होते हैं, उसी तरह इस शरीररूपी वन में व्याघ्र, तस्कर आदि के स्थानापन्न राग, द्वेष, मोह, शोक आदि बसे हुए हैं।
इन राग, द्वेषादि से व्याप्त होने के कारण दूषित इस शरीररूपी वन को पार कर आचार्य से किञ्चिन्मात्र निर्देश पाकर
अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा पदार्थशोधन करते हुए देह आदि को अनात्मा जानकर त्यागते हैं और सर्वत्र अनुस्यूत एवं
अबाधित आत्मतत्त्व को प्राप्त करते हैं। अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' इस प्रकार औपनिषद पुरुष को जानते हैं। जैसे
गान्धारदेश-निवासी किसी पुरुष को तस्करों ने उसकी आँखें बाँधकर किसी घोर जंगल में लाकर छोड़ दिया।
वह पुरुष बन्धन से छुटकारा पाने के लिये चिल्लाने लगा, तो उसी जगह कोई दयालु महापुरुष आ पहुँचा, और
उसने उसको बन्धन से मुक्त कर दिया। उस दयालु महापुरुष ने उसे अपने स्वदेश जाने का मार्ग बता दिया। तब वह
बुद्धिमान् पुरुष गाँव-गाँव पूछता हुआ वन से अपने स्वदेश पहुँच जाता है। उसी तरह इस संसारी पुरुष की आँखों पर
मिथ्या अज्ञान की पट्टी, इन अविद्या, राग आदि तस्करों ने बाँध दी है। अर्थात् इसकी विवेकदृष्टि को मिथ्या अज्ञान-
रूपी वस्त्र से ढँक दिया है। और उसको अपने स्वदेश से लाकर देहरूपी अरण्य में छोड़ दिया है। तब वह अपनी
आँख पर बंधी पट्टी को दूर करने की इच्छा से आक्रोश कर रहा है, उसके उस आक्रोश को सुनकर कदाचित् कोई
परमकारुणिक ब्रह्मवित् आचार्य वहाँ पहुँचकर उसकी आँख पर बंधी मिथ्या अज्ञानरूपी वस्त्र की पट्टी खोल देते हैं
और उसे उसके स्वदेशरूप ब्रह्मात्मा का निर्देश कर देते हैं, तब वह स्वयं अन्वयव्यतिरेक के सहारे ऊह करता हुआ
अपने स्वरूप को पा लेता है और कृतकृत्य हो जाता है ॥४॥
॥ इति द्वितीयं प्रतिषेधप्रकरणं समाप्तम् ॥