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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

तत्त्वमसिप्रकरणम् १८९
तस्मादिति-इसलिए शमादिषट्सम्पत्तिमान् पुरुष को 'प्रसंख्यान' से निष्पन्न होनेवाले ब्रह्मात्मैक्य के
विरुद्ध जो कर्मनिष्ठता है, उसका त्याग करके आत्मस्वरूप के अनुभवार्थ प्रयत्नपूर्वक प्रसंख्यान का ही अभ्यास करना
चाहिए ॥ १८॥
हृदयस्पर्शिनी
अतः शम-दमादि से सम्पन्न व्यक्ति को, प्रसंख्यानरूप साधन और उससे होने वाले ब्रह्मात्मैक्यरूप साध्य के
विरोधी कर्मनिष्ठत्व का त्याग कर आत्मसाक्षात्कार के लिये प्रयत्नपूर्वक प्रसंख्यान का ही अभ्यास करना चाहिये । अर्थात्
प्रसंख्यानरूप साधन और तत्साध्य (फल) आत्मैक्यसाक्षात्कार इन दोनों का विरोधी जो कर्मनिष्ठत्व है, उसका त्याग करे ।
यह सब वही कर सकता है, जो शम-दम-उपरति आदि षड्गुणों से युक्त होता है ॥ १८ ॥
नैतदेवं रहस्यानां नेति नेत्यवसानतः ।
क्रियासाध्यं पुरा श्राव्यं न मोक्षो नित्यसिद्धतः ॥१९॥
नैतदिति—उपर्युक्त पूर्व पक्ष के उपस्थित होने पर सिद्धान्ती का कहना है कि तुम जैसा समझ रहे हो, वैसी
बात नहीं है, क्योंकि उपनिषद् वाक्यों का तात्पर्य, दृश्य पदार्थों के निषेध को अवधि जहाँ समाप्त हो जाता है, उस
'परब्रह्म' में है। अतः प्रसंख्यान-विधि में उनका तात्पर्य नहीं है। क्रिया (कर्म) से साध्य होनेवाले फल को वेद के
पूर्वकाण्ड ने बता दिया है। 'मोक्ष' तो नित्य सिद्ध फल है। अतः उसे क्रियासाध्य नहीं कह सकते ॥ १९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकार पूर्वपक्ष करने पर सिद्धान्ती उत्तर देता है-आप जैसा कह रहे हैं वैसी बात नहीं है, क्योंकि
उपनिषद्ववाक्यों के तात्पर्य का पर्यवसान दृश्य का निषेध करते हुए उसके अवधिभूत परब्रह्म में होता है, प्रसंख्यान
विधि में नहीं। जो फल, क्रिया (कर्म) से प्राप्य होने वाला है, उसका उल्लेख वेद के पूर्वकाण्ड में किया गया है, वहीं
वह सुनाई देता है। उपनिषदों में उसका उल्लेख नहीं है। मोक्ष तो नित्यसिद्ध है, उसकी प्राप्ति कर्मानुष्ठान से नहीं
हो सकती। पूर्वपक्षी बताये कि वेदान्तवाक्यों में प्रसंख्यान का साक्षात् विधान है या वर्तमानोपदेश होने से फलवचना-
नुपत्या विधान की कल्पना की जाती है? प्रथम पक्ष का स्वीकार करना उचित न होगा क्योंकि रहस्यभूत उपनिषद्ववाक्यों
की विध्यर्थता तो हो नहीं सकती, उन वेदान्तवाक्यों के द्वारा दृश्य का निषेध करते-करते निषेधावधिभूत ब्रह्मात्मस्वरूप
में उन वाक्यों का पर्यवसान होता है। द्वितीय पक्ष इसलिये उचित न होगा, जो क्रियासाध्य फल है, वह पुरा (पूर्वं)
काण्ड में श्राव्य है, उपनिषदों में नहीं। उपनिषदों में श्रूयमाण मोक्ष, क्रियासाध्य नहीं है, क्योंकि वह तो नित्यसिद्ध
है, नित्यसिद्ध होने से वह साध्य नहीं है ॥ १९ ॥
पुत्रदुःखं यथाऽध्यस्तं पित्राऽदुःखे स्व आत्मनि ।
*अहंकर्त्रा तथाऽध्यस्तो नित्यादुःखे स्व आत्मनि ॥२०॥
पुत्रेति-जिस प्रकार पिता के द्वारा अपने दुःखरहित आत्मा में पुत्र के दुःख का आरोप कर लिया जाता
है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य अपने दुःखरहित आत्मा में 'मैं कर्ता हूँ' यह आरोप (अध्यास) कर लेता है ॥ २० ॥
हृदयस्पर्शिनी
तत्त्वमस्यादि वाक्य, अपरोक्ष, अद्वितीय ब्रह्मात्मज्ञान द्वारा उस अज्ञान की और उसके द्वारा अध्यस्त
हुए दुःखित्वादि संसार की निवृत्ति कराता है, यह बताने के लिये अज्ञान से अध्यस्त दुःखादि के विषय में दृष्टान्त बता
रहे हैं-जिस प्रकार पिता अपने ज्वरादिदुःखरहित आत्मा में पुत्र के दुःख का आरोप कर लेता है, उसी प्रकार यह
मानव प्राणी अपने नित्य दुःखरहित अर्थात् सर्वदा दुःखादिसंसाररहित अपने स्वरूपभूत निरुपाधिक आत्मा में
'मैं कर्ता हूँ'-ऐसा अध्यास करता रहता है। क्योंकि इसने अपने स्वरूपभूत आत्मा को साभास अन्तःकरण से अविविक्त
समझ लिया है। अर्थात् अविवेकलक्षण अविद्या से उसे दुःखादिधर्मवाला मान लिया है। इस पद्य में आनन्दगिरि ने
'अहं कर्ता' पाठ लिया है, अतः 'स्वे आत्मनि' दुःखादिः, जोड़ लेना चाहिये । रामतीर्थ ने 'अहं कर्ता' पाठ रखा है।

  • अहं कर्ता० - पाठान्तरम् ।

१९० उपदेशसाहस्री
आत्मा तो सदा ही दुःखशून्य है, वह दुःखादि का साक्षी है, परिशुद्ध है, ऐसा रहने पर भी अविवेक (अज्ञान) के
कारण दुःखादि उसमें कल्पित किये जाते हैं ॥ २० ॥
सोऽध्यासो नेति नेतीति प्राप्तवत्प्रतिषिध्यते ।
भूयोऽध्यासविधिः कश्चित्कुतश्चिन्नोपपद्यते ॥२१॥
स इति—प्राप्त हुई वस्तु के समान उस अध्यास का 'यह स्थूल देह आत्मा नहीं है, यह सूक्ष्म देह भी आत्मा
नहीं है'—इस प्रकार 'नेति-नेति' श्रुति से निषेध किया जाता है। इस परिस्थिति में किसी प्रकार के अध्यास के लिए
पुनः विधि करना किसी तरह भी उपपन्न नहीं हो सकता ॥ २१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अपरोक्ष ब्रह्मात्मा में अज्ञान से प्राप्त हुए अध्यास की ब्रह्मात्मविषयक विज्ञान से अज्ञाननिवृत्तिपूर्वक निवृत्ति
की जाती है। तात्पर्य यह है कि आत्मा ब्रह्मस्वरूप है, यह ज्ञान न रहने से अध्यस्त हुआ संसार, उसके स्वरूप का ज्ञान
होते ही, जो ज्ञान 'नेति नेति' और 'तत्त्वमसि' शास्त्र से उत्पन्न हुआ है, उससे निवृत्त होता है। तब आत्मा की समस्त
क्रियाओं के अधिकार की निवृत्ति हो जाने से सुषुप्ति के समान पुनः अध्यासबीज के न होने से कृतकृत्य होने वाले उसे
प्रसंख्यान विधि का अवसर ही नहीं है। 'प्राप्तवत्' यहाँ पर 'वति' प्रयोग करने से वस्तुवृत्त्या प्राप्ति का अभाव रहने से
आरोपितत्व दृढ़ किया गया है। उस अध्यास को प्राप्त हुई वस्तु के समान यह स्थूल देह आत्मा नहीं है, यह सूक्ष्म देह
आत्मा नहीं है, इस क्रम से निषेध किया जाता है—ऐसी अवस्था में पुनः किसी प्रकार के अध्यास के लिये विधि करना
तो किसी तरह भी युक्तियुक्त नहीं है ॥ २१ ॥
आत्मनीह यथाऽध्यासः प्रतिषेधस्तथैव च।
मलाध्यासनिषेधौ खे क्रियेते च यथाऽबुधैः ॥२२॥
आत्मनीति—जिस प्रकार आत्मा में देह और उसके जरामरणादि धर्म का अध्यास और प्रतिषेध होता है
तथा जिस प्रकार प्राकृत अज्ञानी लोग इन्द्रियों के अविषयभूत आकाश में मलिनता का आरोप और निषेध करते हैं,
उसी प्रकार अविषयभूत प्रत्यगात्मा ब्रह्म में भी संसार का अध्यास और निषेध किया जा सकता है ॥ २२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
किन्तु यह शंका हो सकती है कि सामने उपस्थित विषयभूत शुक्तिका आदि में रजतादि का अध्यास होता
देखा जाता है, किन्तु अविषयभूत प्रत्यगात्मा ब्रह्म में विषय के दुःखित्वादि धर्म का अध्यास कैसे हो सकता है ? यह शंका
करना उचित नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार देहातिरिक्त आत्मवादी नैयायिकों के मतानुसार आत्मा में देह और उसके जरा-
मरणादि धर्मों का अध्यास और प्रतिषेध होता है, अथवा जिस प्रकार अज्ञानी लोग इन्द्रियों के अविषयभूत आकाश में
मलिनता का आरोप एवं निषेध करते हैं, उसी प्रकार अविषयभूत प्रत्यगात्मा ब्रह्म में भी संसार का अध्यास और निषेध
हो सकता है। मूल पद्य में 'यथाऽध्यासः' के स्थान पर यदि 'तथाऽध्यासः' पाठ उपलब्ध हो तो वहाँ पूर्वार्द्ध का दार्ष्टान्त
और उत्तरार्ध का दृष्टान्तपरक अर्थ करना चाहिये । अध्यास में अधिष्ठानस्वरूप का स्फुरणमात्र अपेक्षित रहता है। उसका
विषयत्वेन स्फुरण अपेक्षित नहीं होता। स्वप्रकाश आत्मा में वह स्वतः सिद्ध है। अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ॥ २२ ॥
प्राप्तश्चेत्प्रतिषिध्येत मोक्षोऽनित्यो भवेद्ध्रुवम् ।
अतोऽप्राप्तनिषेधोऽयं दिव्यग्निचयनादिवत् ॥२३॥
प्राप्तेति—आत्मा में प्राप्त हुए बन्ध का प्रतिषेध यदि माना जाय तो उसका मोक्ष अवश्य ही अनित्य सिद्ध
होगा। इसलिए आकाश में अग्निचयनादि के प्रतिषेध के समान इसे अप्राप्त बन्ध का प्रतिषेध कहना चाहिए ॥ २३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि आत्मा में प्राप्त हुए बन्ध का प्रतिषेध माना जाय तो संसारबन्धनिवृत्तिरूप जो मोक्ष है, वह आगन्तुक
हो जाने से अनित्य सिद्ध होगा, यह निश्चित है। अतः आकाश में अग्निचयनादि के प्रतिषेध के समान यह अप्राप्तबन्ध का

तत्त्वमसिप्रकरणम् १९१
प्रतिषेध है। तात्पर्य यह है कि यदि प्राप्त बन्ध का प्रतिषेध किया जायगा, तो सादि होने के कारण मोक्ष की अनित्यता
का प्रसंग उपस्थित होगा। किन्तु ऐसा कोई नियम नहीं है कि प्राप्त वस्तु का ही प्रतिषेध किया जाता हो। 'नान्तरिक्षे
न दिवि अग्निश्चेतव्यः' इससे अन्तरिक्ष और आकाश में अप्राप्त अग्निचयन का ही प्रतिषेध किया जाता है। उसी प्रकार
आकाश में नीलिमा, रज्जु में सर्प, तथा शुक्ति में रजत भी अप्राप्त हैं। अतः आत्मा में भी अप्राप्त बन्ध की ही निवृत्ति की
जाती है। उस कारण आत्मा की नित्य मुक्तरूपता सिद्ध होती है। सबका निष्कर्ष यह है कि संसार यदि प्रमाणसिद्ध हो
तो प्राप्तवत् प्रतिषेध हो सकता है, उससे मोक्ष को अनित्य कहना होगा। परमार्थवृत्ति से (वस्तुतः) आत्मगत बन्ध की
परमार्थतः (वास्तविक) ही निवृत्ति कहने पर उस आत्मा में अवस्थान्तर की आपत्ति होगी, जिससे उसे विकारी कहना
होगा और विकारी होने से उसे अनित्य भी अवश्य मानना होगा। तथा अनादि भावरूप बन्ध को पारमार्थिक कहने पर
उसकी निवृत्ति असंभव ही रहेगी। यदि बन्ध को सादि कहें तो वह आत्मा के द्वारा अपने आप ही कृत होने से पुनः
उसमें निवृत्तसजातीय (निवृत्त हुए के तुल्य) दूसरे बन्ध की उत्पत्ति होगी, जिससे मोक्ष की अनित्यता अवश्य ही प्रसक्त
होगी। अतः बन्ध को आविद्यक ही अवश्य मानना चाहिये। और उस आविद्यक बन्ध की निवृत्ति तो ज्ञान से ही हो
जायगी, इसलिये प्रसंख्यान निरर्थक है—इस अभिप्राय से उपसंहार कर रहे हैं कि यह अप्राप्तनिषेध है। जैसे—"नान्तरिक्षे
न दिव्यानिश्चेतव्यः"¹—कहकर पृथिवी के तुल्य अन्तरिक्षादि में अग्निचयन का आरोप करने से अप्राप्त का ही प्रतिषेध
किया जा रहा है। उसी तरह संसारबन्ध से रहित आत्मा में उसका आरोप और निषेध किये जा रहे हैं ॥ २३ ॥
संभाव्यो गोचरे शब्दः प्रत्ययो वा न चान्यथा ।
न संभाव्यौ तदात्मत्वादहंकर्तुस्तथैव च ॥२४॥
संभाव्य इति—शब्द से तथा प्रत्यक्षादि प्रमाण से होनेवाला ज्ञान, किसी विषय का ही हो सकता है।
वह अन्यथा अर्थात् निर्विषयक नहीं होगा। इसलिए ब्रह्मस्वरूप होने के कारण अहंकर्ता (प्रमाता) को ब्रह्मविषयक ज्ञान,
शब्द से अथवा प्रत्यक्षादि किसी प्रमाण से होना असम्भव है। क्योंकि 'ब्रह्म' तो किसी का विषय नहीं है ॥ २४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा में बन्ध के सम्बन्ध का बोधक प्रमाण न होने से भी उस आत्मा का बन्ध वास्तविक नहीं है।
क्योंकि आत्मा के बन्ध के सम्बन्ध का बोधक प्रमाण 'शब्द' होगा या कोई 'अन्य प्रमाण' होगा ? अर्थात् शब्दजन्य ज्ञान
अथवा प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धिजनित ज्ञान, किसी न किसी विषय के ही आश्रय से हो सकते
हैं, विषयरहित नहीं हो सकते। किन्तु 'ब्रह्म' किसी का विषय नहीं है। शब्द की प्रवृत्ति के हेतु (निमित्त) भूत जाति, गुण,
क्रिया आदि का अभाव होने के कारण उसमें शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, जिससे 'यह आत्मा संसारी है'—ऐसा बोध
शब्द से हो पायेगा। रूपादि से रहित (हीन) होने के कारण उसे बाह्य इन्द्रियों का भी विषय नहीं कहा जा सकता। किसी
अनुमापक लिङ्गविशेष के न होने के कारण उसका अनुमान भी नहीं किया जा सकता। अवयवरहित (निरवयव) होने
के कारण वह उपमानप्रमाण का भी विषय नहीं हो सकता। अविकारी (विकारशून्य) होने से उसे अर्थापत्तिप्रमाणगम्य
भी नहीं कह सकते। और भावरूप होने से उसे अनुपलब्धिप्रमाण का भी विषय नहीं कहा जायगा। अतः परिशेषात्
प्रतीतिमात्र वह रहता है, इसलिये उसमें बन्धसंबंध प्रमाणसिद्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त 'प्रमाता' जो अहंकर्ता है, वह
भी 'ब्रह्म' में ही अध्यस्त है। अतः अपने अधिष्ठानरूप 'ब्रह्म' को वह विषयरूप से नहीं जान सकता। तात्पर्य यह है
कि शब्दज्ञान तथा प्रत्यक्षादि प्रमाणजन्य ज्ञान, विषय में ही हो सकते हैं, अन्यथा अर्थात् अविषय में नहीं हो सकते।
अतः ब्रह्मस्वरूप होने के कारण अहंकर्ता (प्रमाता) को ब्रह्मविषयक शब्द या प्रत्यक्षादि अन्य ज्ञान का होना संभव ही
नहीं है। क्योंकि ब्रह्म तो विषय होने योग्य ही नहीं है। आत्मा का ज्ञान, शब्द से या अन्य किसी भी प्रमाण से नहीं
हो सकता। क्योंकि वे सभी आत्मरूप ही हैं। चिदात्मा का स्वरूप उनसे पृथक् नहीं है ॥ २४ ॥
१. (तै० सं० ५।२।७) अयमभिप्रायः—प्रसक्तमेव सर्वत्र निषेध्यं भवति, नाऽप्रसक्तम् । यत्तु क्वचिदप्रसक्तस्यापि निषेधो
दृश्यते, यथा—"नान्तरिक्षे न दिवि" इत्यत्र, तत्र गत्यन्तराभावः । वस्तुतः तत्रापि निषेधपरत्वं नास्ति, अर्थवादोऽयं
रुक्मोपधानस्य,—"रुक्ममुपदधाति" इत्यनेन एकवाक्यत्वात् । तस्माद्यथा कथंचन तत्स्तुतावेव तात्पर्यम् । अत्र तु
द्वैतनिषेधपरत्वमिति वैषम्यम् । तदिहापि प्रसक्तद्वैतप्रपंचनिषेधपरत्वं युक्तं, नाऽप्रसक्तेश्वरनानात्वनिषेधपरत्वमिति ॥

१९२ उपदेशसाहस्री
अहंकर्त्रात्मनि न्यस्तं चैतन्ये कर्तृतादि यत् ।
नेति नेतीति तत्सर्वं साहंकर्त्रा निषिध्यते ॥२५॥
अहमिति—चैतन्यस्वरूप आत्मा में अहंकर्ता (साभास अन्तःकरण) के द्वारा जिन कर्तृत्वादि का आरोप
किया जाता है, उन सबका अहंकर्ता के सहित 'नेति-नेति' श्रुति से क्रमशः निषेध किया जाता है ॥ २५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
तस्मात् अध्यस्त का ही निषेध कहना चाहिये। चैतन्यस्वरूप आत्मा में अहंकर्ता (साभास अन्तःकरण के
साथ अविवेक रहने से) ने जिन कर्तृत्वादि का आरोप किया है, उन सबका अहंकर्ता के सहित 'नेति नेति' के द्वारा निषेध
किया गया है ॥ २५ ॥
उपलब्धिः स्वयंज्योतिर्दृशिः प्रत्यक्सदक्रियः* ।
साक्षात्सर्वान्तरः साक्षी चेता नित्योऽगुणोऽद्वयः ॥२६॥
उपलब्धिरिति—यह आत्मा ज्ञानस्वरूप है, स्वयंप्रकाश है, चित्स्वरूप है, प्रत्यक्, सत्, एवं अक्रिय है।
वह साक्षात् सर्वान्तर्यामी, सभी का द्रष्टा, प्रकाशक, नित्य, निर्गुण और अद्वितीय है ॥ २६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि शास्त्र के द्वारा अध्यस्त का ही निषेध किया जाता है तो आत्मस्वरूप की उपलब्धि कैसे होगी ?
उसपर कहते हैं कि आत्मा को अनुपलब्धिस्वरूप मानने में कोई प्रमाण नहीं है। उसके विपरीत 'साक्षात्' इत्यादि
उत्तरार्ध में सूत्रित श्रुतियां प्रमाणरूप में उपस्थित रहने से 'आत्मा' स्वप्रकाश ही है अर्थात् स्वतःसिद्ध ही है, उसके
ज्ञानार्थ प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। वह आत्मा ज्ञानस्वरूप है, स्वयंप्रकाश है, चित्स्वरूप है, प्रत्यक्, सत् और
अक्रिय है। वह साक्षात् अन्तर्यामी, सर्वद्रष्टा, प्रकाशक, नित्य, निर्गुण और अद्वितीय है ॥ २६ ॥
सन्निधौ सर्वदा तस्य स्यात्तदाभोऽभिमानकृत् ।
आत्मात्मीयं द्वयं चातः स्यादहंममगोचरः ॥२७॥
सन्निधाविति—सर्वदा उस चेतन की सन्निधि में रहने से अहंकार भी उसी के समान चेतन-सा प्रतीत होता
है। अतएव अहम्-ममविषयक आत्मभाव और आत्मीयभाव दोनों होने लगते हैं ॥ २७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा-आत्मीय ये दोनों अहं और मम प्रत्यय के गोचर (विषय) हुआ करते हैं, यह तो प्रसिद्ध ही है। अतः
आत्मा को स्वतःसिद्ध कैसे कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह होगा कि उपाधिवशात् व्यवहार में वैसी प्रसिद्धि है,
वस्तुतः तो आत्मा स्वतःसिद्ध ही है। अहंकार का काम है अभिमान करना। वह चिदात्मा की सन्निधि में सर्वदा रहता
है, उस कारण उसी के समान चैतन्य प्रकाश से युक्त होने से चेतन-सा अर्थात् चेतनाकार-सा ज्ञात होता है, उसी कारण
आत्मभाव और आत्मीयभाव अर्थात् 'अहं' 'मम'—'मैं और मेरा'—यह व्यवहार चलता रहता है। एवंच मैं और मेरा यह
व्यवहार, साभास अन्तःकरण और उसकी वृत्ति से अतिरिक्त आत्मा है, इस प्रकार के ज्ञान के न होने से चलता है। अतः
आत्मा स्वभावतः स्वतःसिद्ध है ॥ २७ ॥
जातिकर्मादिमत्त्वाद्धि तस्मिञ्शब्दास्त्वहंकृति ।
न कश्चिद्वर्तते शब्दस्तदभावात्स्व आत्मनि ॥२८॥
जातीति—जाति और कर्म आदि 'अहंकार' में ही हुआ करते हैं। अतः उसी में (अहंकार में ही) शब्द-
प्रवृत्ति होती है। किन्तु आत्मा में जाति-कर्म आदि का अभाव रहने से उसमें (आत्मा में) शब्द की प्रवृत्ति नहीं
होती ॥ २८ ॥

  • सदाक्रियः—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् १९३
हृदयस्पर्शिनी
तथापि 'शब्द' का प्रमेय होनेसे 'आत्मा' को स्वतःसिद्ध नहीं कह सकते । अर्थात् अहम्प्रत्यय जो होता
है, वह आत्मविषयक न होकर अन्यविषयक है। इसी प्रकरण के २४ वे श्लोक 'संभाव्यो गोचरे शब्दः' से आत्मा को
प्रत्यय का अविषय होना बताया गया है । अब इस श्लोक से बता रहे हैं कि वह 'शब्द' का भी विषय नहीं होता, 'शब्द' का
विषय भी कोई अन्य ही होता है । जाति, कर्म आदि शब्दों की प्रवृत्ति होने में निमित्त 'साभास अहंकार' है, अतः 'शब्द'
का विषय साभास अहंकार है अर्थात् आभास-विशिष्ट अहंकार है। एवंच शब्द का प्रमेय विशिष्ट रहने पर भी केवल
शुद्ध आत्मा, शब्द का विषय न होने से वह (आत्मा) स्वतःसिद्ध है। उस निरुपाधिक आत्मा में कोई भी शब्द, प्रवृत्त
नहीं होता, क्योंकि जाति, कर्मादि शब्दों की प्रवृत्ति में निमित्त तो साभास अन्तःकरण अर्थात् विशिष्ट अन्तःकरण
(अहंकार) होता है। अतः आत्मा, किसी शब्द के द्वारा सिद्ध नहीं है, अपितु स्वतःसिद्ध है ॥ २८ ॥
आभासो यत्र तत्रैव शब्दाः प्रत्यग्दृशि स्थिताः ।
लक्षयेयुर्न साक्षात्तमभिदध्युः कथंचन ॥२९॥
आभास इति—'आत्मा' को किसी शब्द के द्वारा नहीं बताया जा सकता, क्योंकि वह अनिर्देश्य है । तब
वेदान्तवाक्य भी उसको कैसे बता पायेंगे ? क्योंकि वे वाक्य भी शब्दरूप ही हैं। इस जिज्ञासा का समाधान यह है कि
जहाँ अहंकारादि में चैतन्य का प्रतिबिम्ब स्फुरित होता है, वहीं पर रहनेवाले आत्मादि शब्द उस प्रत्यगात्मा को
लक्षित कराते हैं। वे शब्द किसी भी प्रकार से उसका साक्षात् प्रतिपादन नहीं करते ॥ २९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उपर्युक्त कथनानुसार तो स्वरूपभूत शुद्ध केवल आत्मा में प्रवृत्तिनिमित्त जाति आदि के अभाव के कारण
किसी शब्द की प्रवृत्ति न होने से तो वेदान्तवाक्य भी उसका बोध नहीं करा पायेंगे । क्योंकि वेदान्तवाक्य भी शब्दरूप
ही हैं। ऐसी स्थिति में उस आत्मा को वेदान्तवेद्य या औपनिषद कैसे कह सकते हैं? इसका समाधान यह है कि जब
अहंकारादि में आभास अर्थात् चैतन्य का प्रतिबिम्ब स्फुरित होता है, तब वह प्रतिबिम्बित आत्मा (चैतन्य) और
अन्तःकरण दोनों एकाकार (अविविक्त, अपृथक्) हुए से ज्ञात होते हैं। उसी को लोग 'आत्मा' शब्द से कहा करते हैं ।
अर्थात् आत्मादि शब्द उसी के वाचक होते हैं और प्रत्यक्तया भासमान जो 'दृशि' अर्थात् शुद्ध आत्मा है, उसे वे
आत्मादि शब्द लक्षणा के द्वारा ज्ञापित करते हैं, उसे साक्षात् अभिधा से नहीं बताते । अतः आत्मा को औपनिषद कहने
में कोई विरोध नहीं है ॥ २९ ॥
न ह्यजात्यादिमान्कश्चिदर्थः शब्देनिरूप्यते ॥३०॥
नेति—क्योंकि जाति आदि से रहित किसी भी पदार्थ को शब्द नहीं बता सकते ॥ ३० ॥
हृदयस्पर्शिनी
क्योंकि किसी भी जाति आदि से शून्य (रहित) वस्तु का शब्द से प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ॥ ३० ॥
आत्माभासो यथाऽहंकृदात्मशब्दैस्तथोच्यते ।
उल्मुकादौ यथान्यर्थाः परार्थत्वान्न चाञ्जसा ॥३१॥
आत्मेति—आत्मा के समान 'अहंकार' की प्रतीति जैसे होती है, उसी तरह 'आत्मा' आदि शब्दों के द्वारा
उसको बताया भी जाता है । अग्नि के कार्यरूप 'दाह' आदि का प्रयोग जैसे 'उल्मुक' (अंगार) में किया जाता है ।
क्योंकि वे दाह आदि परार्थ (अन्यन्यर्थक) हैं, अतः उनका प्रयोग उल्मुक आदि में साक्षात् नहीं किया जाता ॥ ३१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा यदि अहंकार से अतिरिक्त हो तो लक्षणा के द्वारा वेदान्तवाक्य उसको बता पायेंगे, तब अहंकार
में आत्मशब्द का प्रयोग लोग कैसे कर सकते हैं ? लक्षणा से भी जहाँ शब्द का तात्पर्य होता है, वहीं शब्द का अर्थ माना
जाता है । जिस प्रकार अहंकार आत्मा के तुल्य प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मादि शब्दों के द्वारा उसका प्रतिपादन भी
२५

१९४ उपदेशसाहस्री
किया जाता है। जिस प्रकार उल्मुक आदि में अग्नि के दाहादि कार्य का प्रयोग किया जाता है। जिस समय खूब
तपे हुए लोहे से त्वचा का स्पर्श होने पर दाह होता है, तो 'लोहे ने जला दिया' ऐसा लोग कहा करते हैं किन्तु यदि विचार
करें तो मानना होगा कि जलाना लोहे का धर्म (काम) नहीं है, किन्तु व्यवहार के समय लोहे में अग्नि के धर्म का
आरोप करते हैं। वैसेही आत्मवत् प्रतीत होनेवाले अहंकार में आत्मत्व का आरोप होता है और उसे ही आत्मा शब्द
से कहने लगते हैं। तात्पर्य यह है कि आत्माभास से युक्त अहंकार आदि में वर्तमान शब्द, उसके साक्षी को लक्षित करते
हैं, साक्षात् नहीं बताते हैं। जैसे 'उल्मुकं दहति' 'अयो दहति'—इत्यादि प्रयोगों में उल्मुकादि शब्दों का प्रयोग साक्षात्
अग्नि में नहीं होता है, उनका अर्थ तो अंगार आदि है। तथापि दाह को अनुपपत्ति के कारण उनका 'अग्नि' अर्थ मान लिया
जाता है। उसी तरह लक्षणा के द्वारा अहं, आत्मा आदि शब्द, ब्रह्मात्मप्रतिपत्त्यर्थक होते हैं ॥ ३१ ॥
मुखादन्यो मुखाभासो यथाऽऽदर्शानुकारतः ।
आभासान्मुखमप्येवमादर्शाननुवर्तनात् ॥३२॥
मुखादिति—जिस प्रकार मुख का 'प्रतिबिम्ब' दर्पण का अनुवर्ती होने के कारण मुख से पृथक् है, उसी
प्रकार 'मुख' भी दर्पण का अनुवर्ती न होने के कारण अपने 'प्रतिबिम्ब' से भिन्न ही रहता है ॥ ३२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्वोक्त २९ वें श्लोक में सिद्धान्ती ने 'आभास' का अंगीकार किया है। भेदविपर्यासवशिष्टरूप से भासित होने
वाला वह अहंकार, पारमार्थिक है या अपारमार्थिक है ? ऐसा सन्देह होने पर सिद्धान्त बताते हैं कि वह परमार्थतः नहीं है,
उसमें दृष्टान्त बता रहे हैं—जैसे मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण का अनुवर्तन करने के कारण मुख से भिन्न होता है, वैसे ही
दर्पण का अनुवर्तन न करने के कारण मुख भी अपने प्रतिबिम्ब से भिन्न ही है। तथा बिम्ब की चेष्टा के बिना भी प्रति-
बिम्ब की चेष्टा हो सकेगी, क्योंकि आभास से मुख भी अन्य ही है। वह आदर्श (दर्पण) के अन्वय-व्यतिरेक का अनुविधायी
नहीं है। उसकी सत्ता का स्फुरण आदर्शनिरपेक्ष होता है। इसलिये वह (मुख) आदर्शानिनुवर्ति है। तथाच आदर्श में
प्रतिबिम्बित हुए ग्रीवास्थ मुख का आदर्शस्थतावैशिष्ट्य से भासमान होना ही 'आभास' कहा जाता है। वह आभास
सत्य नहीं है, क्योंकि आदर्श, मुख से वियुक्त होने पर अथवा तिर्यक् निरीक्षण करने पर उस आदर्श में नहीं दिखाई
पड़ता। उसे असत् भी नहीं कह सकते, क्योंकि उसका अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) प्रतिभास होता है। अतः आभास को अनिर्व-
चनीय ही कहा जाता है। तस्मात् उस आभास से मुख अन्य ही है ॥ ३२ ॥
अहंकृत्यात्मनिर्भासो मुखाभासवदिष्यते ।
मुखवत्स्मृत आत्माऽन्योऽविविक्तौ तौ तथैव च ॥३३॥
अहमिति—अहंकार में आत्मा का जो प्रतिबिम्ब है, वह मुख के प्रतिबिम्ब के ही तुल्य है, और उस
प्रतिबिम्ब से भिन्न जो आत्मा है, वह मुख के तुल्य बताया गया है। एवञ्च मुख और मुखाभास के समान ही वे परस्पर
भिन्न हैं ॥ ३३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अहंकार में आत्मा का प्रतिबिम्ब (चेतनावत्त्व का अवभास) मुख के प्रतिबिम्ब के तुल्य है और उससे भिन्न
आत्मा, मुख के तुल्य बताया गया है। उन मुख और मुखाभास के समान ही वे प्रातिभासिक दृष्टि से परस्पर भिन्न हैं।
वस्तुतः आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, अतः भेद वस्तुतः नहीं है। आत्मा, आत्माभास तथा मुख और मुखाभास वास्तव
में अविविक्त हैं अर्थात् परमार्थतः भेदरहित हैं। 'च' कार से आभासाश्रय अन्तःकरण भी उस से विविक्त नहीं है ॥ ३३ ॥
संसारी च स इत्येक आभासो यस्त्वहंकृतिः ।
वस्तुच्छाया स्मृतेरन्यन्माधुर्यादि च कारणम् ॥३४॥
संसारीति—कुछ विद्वान्, आत्मा के आभासरूप अहंकार को (चिदाभास को) ही 'संसारी जीव' कहते हैं।
स्मृतिवचन के अनुसार छाया भी भावरूप पदार्थ (वस्तु) है तथा उसके वस्तुरूप होने में माधुर्य, शीतलता भी कारण
हैं ॥ ३४ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् १९५
हृदयस्पर्शिनी
अनादि अविद्या और उसके कार्यभूत अहंकारादि में प्रतिबिम्बित हुआ चिन्मात्र ही चिदात्मस्वरूप है, उसी
को उपाधिस्थतारूप वैशिष्ट्य के अध्यास के कारण संसारी कहते हैं, इस प्रकार अपना मत बताकर, उसे ही दृढ़ करने के
लिये मतान्तर बता रहे हैं। हमने अहंकार में जिस आभास को पृथक् बताया है, उसी को कुछ लोग 'संसारी' कहते हैं।
किन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि आभास तो अवस्तुरूप है, उसे बन्ध-मोक्ष का भागी मानकर संसारी कैसे कहा जा
सकता है ? उक्त प्रश्न का उत्तर यह है कि 'आभास' शब्द से 'चिच्छाया' अभिप्रेत है। और वह वस्तुरूप है, अवस्तु
नहीं है। अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है। स्मृति ने भी 'नाक्रमेत् कामतश्छायां गुर्वादि:'१ कहकर बताया है कि जानबूझकर
गुरु आदि की छाया का अतिक्रमण न करे। याज्ञवल्क्य स्मृति में भी कहा है—
'देवत्विक्स्नातकाचार्यराज्ञां छायां परस्त्रियः।
नाक्रमेद्रक्तविण्मूत्रष्ठीवनोद्वर्तनादिकम्२ ।।'
देवता, ऋत्विज्, स्नातक, आचार्य, राजा, परस्त्री की छाया, रक्त, विष्ठा, मूत्र, थूँक, उद्वर्तनादि को न
लांघे—इस प्रकार छाया के अतिक्रमण का निषेध किया है। इससे स्पष्ट है कि 'छाया' वस्तुरूप है, अवस्तु नहीं है। यदि
छाया वस्तुरूप न होती तो उसका अतिक्रमण करने पर कोई दोष नहीं हो सकता था। उसी प्रकार छाया के वस्तु होने में
एक अन्य कारण माधुर्यादि भी है। ग्रीष्म से संतप्त होने पर छाया में बैठे हुए मनुष्यादि प्राणी का मुख, मधुर दिखाई देता
है, तथा उसे शीतलता का अनुभव होता है, इस से भी छाया का वस्तुत्व स्पष्ट होता है ॥ ३४ ॥
जैकदेशो विकारो वा तदभासाश्रयः परे।
अहंकर्तैव संसारी स्वतन्त्र इति केचन ॥३५॥
जैकदेश इति—कुछ विद्वान् परमात्मा के एक देश को ही संसारी जीव कहते हैं। कुछ लोग उसके विकार
को संसारी जीव कहते हैं। कुछ लोग चिदाभासविशिष्ट अहंकार को और कुछ लोग स्वतन्त्र आत्मा को ही संसारी
जीव कहते हैं ॥ ३५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पुनः एकदेशियों के तीन मतों को बता रहे हैं—कुछ लोग चित्-सत्-आनन्दरूप 'परमात्मा के एक देश' को
'संसारी' कहते हैं, क्योंकि “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः”३ यह स्मृति कह रही है। कुछ लोग अग्निविस्फुलिंग
का दृष्टान्त देकर उस परमात्मा के 'विकार' को 'संसारी' कहते हैं।४ कुछ लोग चिदाभास के आश्रय को अर्थात् चिदात्मा-
भासविशिष्ट अहंकार (साभास अन्तःकरण) को ही 'संसारी' कहते हैं।५ भाट्टमत के अनुसार अहम् अर्थात् अहंकार ही
'संसारी' है, जो स्वतन्त्र है, परमात्मा का अंशादिरूप नहीं है ॥ ३५ ॥
अहंकारादिसंतानः संसारी नान्वयी *पृथक् ।
इत्येवं सौगता आहुस्तत्र न्यायो विचार्यताम् ॥३६॥
अहंकारेति—बौद्ध विद्वान् कहते हैं कि अहंकारादि क्षणिकविज्ञानसन्तति ही संसारी जीव है, उसमें कोई
अन्वयी नहीं है। किन्तु इन सब मतों में कौन-सा मत न्यायोचित है, उसका विचार करना चाहिए ॥ ३६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अहंकारेति—बौद्धमत के अनुसार अहंकारादि क्षणिकविज्ञानसन्तति (अविरल उदित होते रहने से जो
विच्छिन्न नहीं है) अर्थात् क्षणिकज्ञानधारा ही संसारी है, उनसे पृथक् कोई एक अन्वयी (सबसे सम्बन्ध रखने वाला),

  • क्वचित्—पाठान्तरम् ।
    १. (मनु. स्मृ. ४।१३०)
    २. (या. स्मृ. आचा. अध्या. ६।१५२)
    ३. (भग. गी. १५।७)
    ४. (बृ. उ. २।१।२०) माध्यन्दिन पाठ के अनुसार । काण्व पाठ के अनुसार “सर्वाणि भूतानिव्युच्चरन्ति” इति ।
    ५. “तन्मनो दिशं दिशं पतित्वा”—(छां. उ. ६।८।२)

१९६ उपदेशसाहस्री
जो विज्ञानों की उत्पत्ति-विनाशों का द्रष्टा हो, ऐसा कोई नहीं है, यह सौगतों (बौद्धों) का कथन है। इन उक्त पक्षों में
वस्तुविषय की दृष्टि से तथा विरोध को दृष्टि से विकल्प और समुच्चय का असंभव रहने के कारण किसी एक पक्ष की
उपादेयता अथवा हमारे कथन के अनुसार अहंकारादिगत आभास का अविद्या के कारण विवेक न हो पाने से ब्रह्म ही
संसारी है, इन सब मतों में कौनसा न्याययुक्त है, इसका विचार करना चाहिए ॥ ३६ ॥

संसारिणां कथा त्वास्तां प्रकृतं त्वधुनोच्यते ।
मुखाभासो य आदर्शे धर्मो नान्यतरस्य सः ।
द्वयोरेकस्य चेद्धर्मो *वियुक्तोऽन्यतरे भवेत् ॥३७॥

संसारिणामिति — संसारियों की बात तो यहीं रहने दें। प्रस्तुत विषय को (आभास के सम्बन्ध में) बताते
हैं। दर्पण में मुख का जो प्रतिबिम्ब पड़ता है, वह 'दर्पण और मुख' इन दोनों में से किसी एक का धर्म नहीं है। यदि
(वह) दोनों में से किसी एक का धर्म होता तो अन्य के न रहने पर भी वह हो सकता था ॥ ३७ ॥

हृदयस्पर्शिनी
प्रसंगप्राप्त संसारियों की चिन्ता को यहीं पर त्यागकर प्रकृत आभासनिरूपण की प्रतिज्ञा कर रहे हैं—यहाँ से
प्रतिपक्षी के मत का खण्डन आरंभ कर रहे हैं—दर्पण में मुख का जो प्रतिबिम्ब (आभास) दिखाई देता है, क्या वह
मुख और आदर्श दोनों में से किसी एक का धर्म है, या मुख का ही धर्म है, अथवा दोनों का ही धर्म है, या दोनों से
भिन्न कोई वस्त्वन्तर है? इतने पक्ष (विकल्प) उपस्थित होने पर 'धर्मो नान्यतरस्य सः' से प्रथम पक्ष का खण्डन कर
रहे हैं—वह प्रतिबिम्ब, दर्पण और मुख इन दोनों में से किसी एक का धर्म नहीं है। यदि वह दोनों में से किसी एक का
(अन्यतर का) धर्म होता तो अन्यतर के अभाव में भी वह प्रतिबिम्ब पड़ सकता था, किन्तु ऐसा होता नहीं। दर्पण या
मुख दोनों में से किसी एक का भी अभाव रहने पर मुखाभास की प्रतीति नहीं होती। इस कारण वह मुखाभास
(प्रतिबिम्ब) अन्यतर (किसी एक का) धर्म नहीं है ॥ ३७ ॥

मुखेन व्यपदेशात्स मुखस्यैवेति चेन्मतम् ।
नादर्शानुविधानाच्च मुखे †सत्यविभावतः ॥३८॥

मुखेनेति—यदि यह कहें कि मुख के द्वारा उसका उल्लेख होने के कारण वह 'मुख' का ही धर्म है किन्तु
यह कहना उचित न होगा, क्योंकि वह दर्पण का अनुवर्ती है। दर्पण के न रहने पर मुख के रहते हुए भी वह (प्रतिबिम्ब)
नहीं दीखता ॥ ३८ ॥

हृदयस्पर्शिनी
'मुखेन व्यपदेशात् स मुखस्यैवेति चेन्मतम्' से द्वितीय पक्ष को उपस्थित कर 'नादर्शानुविधानाच्च' से उसका
खण्डन करते हैं। उसका (आभास-प्रतिबिम्ब का) मुख के द्वारा उल्लेख होता यदि माना जाता हो तो उसे (प्रतिबिम्ब
को) मुख का ही धर्म कहते, किन्तु वैसा कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि वह (प्रतिबिम्ब) दर्पण का अनुवर्ती है, और
दर्पण के अभाव में मुख के रहते हुए भी वह दृष्टिगत नहीं हो पाता है ॥ ३८ ॥

द्वयोरेवेति चेत्तन्न द्वयोरेवाप्यदर्शनात् ।
अदृश्यस्य सतो दृष्टिः स्याद्राहोरिन्दुसूर्ययोः ॥३९॥

द्वयोरिति—यदि उसे दोनों का धर्म कहें तो भी ठीक न होगा, क्योंकि दोनों के रहने अथवा न रहने पर
भी वह नहीं दिखाई देता। यदि उसे दोनों से भिन्न सत्य वस्तु कहें तो जिस प्रकार पूर्वसिद्ध राहु की प्रतीति, सूर्य और
चन्द्रमा के अस्तित्व में ही होती है, उसी प्रकार अदृश्य किन्तु विद्यमान प्रतिबिम्ब की प्रतीति मुख और दर्पण का संयोग
होने पर ही होती है ॥ ३९ ॥

  • वियुक्तेऽन्य० —पाठान्तरम् । † सत्यप्यभावतः। सत्यप्यभासतः—पाठौ ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् १९७
हृदयस्पर्शिनी
'द्वयोरेवेति चेत्'—यदि कहें कि वह (प्रतिबिम्ब) दोनों का धर्म है—इस तृतीय पक्ष का 'तन्न' से खण्डन
करते हैं। उसे दोनों का धर्म नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों के रहने अथवा न रहने में भी उसे देखा नहीं जाता।
मुख और दर्पण में से किसी भी एक के अभाव में तो मुखाभास की प्रतीति न होना स्पष्ट ही है, किन्तु यदि उसे उनके
संयोग का ही धर्म माना जाय तो भी उनका किसी प्रकार भी संयोग होने पर उसकी प्रतीति होनी चाहिये, किन्तु
होती नहीं है। इसलिये उसे उनके संयोग का भी धर्म नहीं कह सकते। अतः प्रतिबिम्ब को दोनों का धर्म नहीं कह
सकते। यदि यह कहें कि 'वह (आभास) इन दोनों से भिन्न सत्य वस्तु है' इस चतुर्थ पक्ष की आशंका को दृष्टान्त के
द्वारा उपस्थित करते हैं—'अदृश्यस्य सतो दृष्टिः'। जिस प्रकार पूर्वसिद्ध राहु की प्रतीति, सूर्य और चन्द्रमा की
विद्यमानता में ही होती है, उसी प्रकार अदृश्य किन्तु विद्यमान प्रतिबिम्ब की प्रतीति मुख और दर्पण का संयोग होने
पर ही होती है ॥ ३९ ॥
राहोः प्रागेव वस्तुत्वं सिद्धं शास्त्रप्रमाणतः ।
छायापक्षे त्ववस्तुत्वं तस्य स्यात्पूर्वयुक्तितः ॥४०॥
राहोरिति—उपर्युक्त आशंका उचित नहीं है, क्योंकि राहु की विद्यमानता तो चन्द्रग्रहणादि के पूर्व भी
शास्त्रप्रमाण से सिद्ध है, किन्तु जो लोग पृथिवी आदि की छाया को ही राहु कहते हैं, उनके अनुसार तो उसका (राहु
का) अवस्तुत्व उपर्युक्त युक्ति से ही सिद्ध हो जाता है ॥ ४० ॥
हृदयस्पर्शिनी
उक्त कथन उचित नहीं है, क्योंकि दृष्टान्त में वैषम्य है। क्योंकि सैंहिकेय राहु की वस्तुता तो चन्द्रग्रहण
के पूर्व से ही ज्योतिःशास्त्रप्रमाण से अथवा पुराणादि शास्त्र प्रमाण से निश्चित है, वैसा यहाँ पर किसी प्रमाण से
प्रतिबिम्ब की वस्तुता का निश्चय नहीं है। अर्थात् मुख-दर्पण के सम्बन्ध से पूर्व या अनन्तर मुखप्रतिबिम्ब की तद्व्य-
तिरिक्त वस्तुता किसी प्रमाण से कहीं पर भी संभावित नहीं हुई है। इस प्रकार राहु की वस्तुता को मानकर दाष्ट्रान्तिक
में अनुगुणता का अभाव (अननुगुणता) बताया गया है। किन्तु अब उस राहु में भी वस्तुता नहीं है अतः प्रतिबिम्ब
को वस्तुसिद्ध करने में उस अवस्तुभूत राहु का दृष्टान्त देना उचित नहीं है, यह बता रहे हैं। कुछ लोग पृथिवी की
छाया को ही राहु कहते हैं, उनके मतानुसार उस राहु का अवस्तुत्व ही निश्चित है। “मुखाभासो य आदर्श” इस
३७ वें श्लोक (पद्य) में उक्त युक्ति को यहाँ भी लगाया जा सकता है । ॥ ४० ॥
छायाक्रान्तेर्निषेधोऽयं न तु वस्तुत्वसाधकः ।
न ह्यर्थान्तरनिष्ठं सद्वाक्यमर्थान्तरं वदेत् ॥४१॥
छायेति—गुरु आदि पूज्य लोगों की छाया के अतिक्रमण का निषेध स्मृति ने किया है। वह निषेध भी
उसके वस्तुत्व को सिद्ध नहीं करता है, क्योंकि कोई भी वाक्य किसी एक अर्थ में स्थित होकर अन्य अर्थ को नहीं
बताता है ॥ ४१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कहें कि इसी प्रकरण के ३४ वें श्लोक 'वस्तुच्छाया स्मृतेः'—छाया की वस्तुतासिद्धि में स्मृति का प्रमाण
बताया है कि 'गुरु आदि की छाया का अतिक्रमण न करें'। किन्तु यह छायातिक्रमण का निषेध भी उसके वस्तुत्व का
साधक नहीं है। यदि उसे वस्तुत्व का साधक कहा जाय तो सोचना होगा कि वह साक्षात् उसका साधक है, या अर्थात्
साधक है। उक्त निषेधवाक्य को वस्तुत्वसाधक साक्षात् नहीं कह सकते, क्योंकि एक ही वाक्य को उभयार्थ मानने पर
वाक्यभेद होगा । 'एकस्य वाक्यस्य उभयार्थत्वे वाक्यभेदः'। अतः किसी एक अर्थ में स्थित हुआ वाक्य, अन्य अर्थ का
प्रतिपादन नहीं करता। अब उसे अर्थात् वस्तुत्वसाधक कहें तो यह द्वितीय पक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि निषेध तो
'प्राप्तिमात्रसापेक्ष' रहता है, अतः निषेध्यविषय में वस्तुत्व के न रहने से निषेध की अनुपपत्ति होने में कोई नियामक नहीं
है। अतः छायालंघनप्रतिषेधपरक वाक्य छाया की वस्तुता को नहीं बता रहा है ॥ ४१ ॥

१९८ उपदेशसाहस्री
माधुर्यादि च यत्कार्यमुष्णद्रव्याद्यसेवनात् ।
छायाया न त्वदृष्टत्वादपामेव च दर्शनात् ॥४२॥
माधुर्यति—उष्ण द्रव्य आदि का सेवन न करने के कारण छाया के माधुर्य आदि कार्य की प्रतीति हुआ
करती है, क्योंकि सन्तप्त शिला की छाया में माधुर्य की प्रतीति नहीं होती । माधुर्य की प्रतीति तो केवल जल में ही
होती है ॥ ४२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह जो कहा था कि छाया के माधुर्यादि कार्य को देखने से अर्थक्रियाकारिता के कारण छाया की वस्तुता
सिद्ध होती है, किन्तु वह भी अन्यथासिद्ध ही है। क्योंकि छाया में बैठे हुए व्यक्ति को छाया का जो माधुर्यादि कार्य
दिखाई देता है, वह भी उष्ण द्रव्यादि का सेवन न करने के कारण है। हेतुभूत छाया का वह माधुर्यादि कार्य नहीं है।
क्योंकि अत्यन्त प्रतप्त शिला की छाया में माधुर्य का अनुभव नहीं होता है, केवल जल में ही मधुरता की प्रतीति होती
है। उसमें कभी व्यभिचार नहीं होता है एवंच छाया में बैठे हुए व्यक्ति को आतप-संसर्ग न रहने के कारण और जल की
स्वाभाविक मधुरता की अभिव्यक्ति के कारण छाया में ही मधुरता का भ्रम होने लगता है ॥ ४२ ॥
आत्माभासाश्रयाश्चैवं मुखाभासाश्रया यथा ।
गम्यन्ते शास्त्रयुक्तिभ्यामाभासासत्त्वमेव च ॥४३॥
आत्मेति—जिस प्रकार मुख, उसका आभास और उसका आश्रय ये तीन विभक्त भासित होते हैं, उसी तरह
आत्मा, उसका आभास और उसका आश्रय भी हुआ करता है। किन्तु वस्तुतः आभास की असत्ता (अवास्तविकता) तो
शास्त्र और युक्ति से सिद्ध ही है ॥ ४३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिस प्रकार मुख, मुख का आभास, और मुखका आश्रय ये तीनों व्यवहार में पृथक्-पृथक् ज्ञात होते हैं,
उसी प्रकार आत्मा, आत्मा का आभास और आत्मा का आश्रय ये तीनों भी परस्पर विलक्षण प्रतीत होते हैं। किन्तु
परमार्थदृष्टि से नहीं, यह सब व्यावहारिक दृष्टि से है। वस्तुतः तो शास्त्र तथा युक्तियों के द्वारा तो आभास की असत्ता
(सत्ता का अभाव) ही सिद्ध होती है। 'आत्मा' तो त्वम् पद से लक्ष्य, चित् धातु है। वह अनादि अविद्या के कार्य में
प्रतिबिम्बित रहने से तदुपाधिस्थत्ववैशिष्ट्य जो जीवत्व है, वही 'आभास' है। अविद्या और उसकी कार्यरूप उपाधि ही
'आश्रय' है—यह 'त्वम्' पद का अर्थ बताया गया । "रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव"१, "इन्द्रोमायाभिः पुरुरूप ईयते"२,
"अनीशया शोचति मुह्यमानः३" तथा "एको वशी सर्वभूतान्तरात्मकं रूपं बहुधा यः करोति४" इत्यादि श्रुतियों से
और नित्य सिद्ध साक्षी आत्मा में बुद्ध्यादि एवं आगमापायी विषयान्तरस्वरूप दृश्य का अध्यास हुए विना उसका स्फुरण
और सत्ता ही उपपन्न नहीं हो पाती, इस युक्ति से एकमात्र प्रत्यगात्मा की ही सत्ता सिद्ध होती है। आभास आदि की
सत्ता नहीं सिद्ध हो रही है, वास्तव में आभास और उसके आश्रय की सत्ता का अभाव ही निश्चित होता है ॥ ४३ ॥
न दृशेरविकारित्वादाभासस्याप्यवस्तुतः ।
नाचित्त्वादहंकर्तुः कस्य संसारिता भवेत् ॥४४॥
नेति—अविकारी होने के कारण चैतन्यैकरस आत्मा में संसारित्व नहीं है, आभास तो अवस्तुरूप है,
इसलिए उसे भी संसारी नहीं कहा जा सकता उसी तरह अहङ्कर्ता, जड़ (अचेतन) होने के कारण उसे भी संसारी नहीं
कह सकते । ऐसी स्थिति में यह कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसारित्व किसका कहा जाय ? ॥ ४४ ॥
१. (बृ. उ. २।५।१९ तथा कठ. उ. ५।९।१०)
२. (बृ. उ. २।५।१९ तथा ऋ. सं. ६।४७।१७, जैमि० उ. ब्रा. १।४४।१)
३. (मुं. उ. ३।१।२, श्वे. उ. ४।७)
४. (कठ. उ. ५।१२)

तत्त्वमसिप्रकरणम् १९९
हृदयस्पर्शिनी
उपर्युक्त कथन के अनुसार तुम्हारे मत में संसार और मोक्ष का कोई आश्रय न रहने से उनकी अनुपपत्ति ही
रही। क्योंकि आत्मा या उसका आभास या उसका आश्रय, ये सम्मिलित होकर अथवा इनमें से कोई एक भी संसार
आदि का आश्रय नहीं कहा जा सकता। ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादिलक्षण विकाररूप उपचय को ही संसार कहते हैं।
और उसके आत्यन्तिक अपचय को मोक्ष कहते हैं। तथाच क्रमशः उन दोनों से संबन्ध रखने वाला विकारो कहा जायगा।
ऐसी स्थिति में चैतन्यैकरस दृशि में संसारिता नहीं बन सकेगी, क्योंकि वह तो अविकारी (कूटस्थ) है। उसी तरह आभास
में संसारिता नहीं बन सकेगी, क्योंकि पूर्वोक्त युक्ति से उसके अवस्तु होने का निश्चय हो चुका है, अतः जो वस्तु ही
नहीं है अर्थात् शून्य है, उसमें किसी प्रकार का अतिशय होना संभव ही नहीं है। आभास के आश्रयरूप अहंकर्ता अर्थात्
अहंकार में भी जडता (अचितित्व) होने से संसारिता नहीं बन सकेगी। ज्ञातृत्व-सुख-दुःखादि-भोक्तृत्वलक्षण संसार की
जडाश्रयता संभव नहीं है। अतः तुम्हारे मत में किसकी संसारिता होगी या मोक्ष होगा ? कहना होगा कि किसी का
नहीं, तब अनुभवविरोध होगा। अभिप्राय यह है कि अविकारी होने के कारण साक्षी का संसारित्व नहीं होगा, आभास
अवस्तुरूप होने के कारण संसारी नहीं होगा, और अहंकार जड़ होने से संसारी नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में
कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसारित्व किसका कहा जाय ? ॥ ४४ ॥
अविद्यामात्र एवातः संसारोऽस्त्वविवेकतः ।
कूटस्थेनात्मना नित्यमात्मवानात्मनोव सः ॥४५॥
अविद्येति—इसलिए केवल अविद्यामात्र (भ्रान्तिमात्र) ही संसार है। आत्मस्वरूप का विवेक न होने के
कारण वह अविद्या, कूटस्थ आत्मा की सत्ता से स्वयं अपने को ही सत्तावान् समझती रहती है, और यह समझती हुई
ही वह सर्वदा आत्मा में (उसके धर्मरूप में) अवभासित होती है। अर्थात् यह अविद्यारूप संसार, आत्मा में अवभासित
होता रहता है ॥ ४५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि संसार और मोक्ष का कोई आश्रय ही नहीं बन सकता तो वास्तविक संसार और मोक्ष किसी के
लिये भी नहीं है, ऐसा क्यों न कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि अविद्यामात्र ही संसार है, वह स्वप्न
के समान भ्रान्तिमात्र है। आत्मस्वरूप का ज्ञान न होने के कारण संसार उसमें अध्यस्त होता है। अतः कूटस्थ आत्मा की
सत्ता से सत्तावान् होकर सर्वदा आत्मा में उसके धर्मरूप से प्रतिभासित होता है। संसार अवस्तुभूत है तथापि आत्मा में
अपरोक्षतया (प्रत्यक्षतया) सत् रूप से भासित होता है, इसप्रकार भासित होने में निमित्त यही है कि वह आत्मा में
अध्यस्त है, अतः आत्मा की सत्ता से वह भी सत्तावान्-सा प्रतीत होता है ॥ ४५ ॥
रज्जुसर्पो यथा रज्ज्वा सात्मकः प्राग्विबेकतः ।
अवस्तुसन्नपि ह्येष कूटस्थेनात्मना तथा ॥४६॥
रज्जुसर्प इति—विवेक के पूर्व रज्जु में प्रतीयमान सर्प, रज्जु की सत्ता से जिस प्रकार सत्तावान् प्रतीत
होता है, उसी प्रकार यह संसार (अविद्या) अवस्तुरूप होने पर भी कूटस्थ आत्मा की सत्ता से सत्तावान् प्रतीत होता
रहता है ॥ ४६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उक्त कथन को दृष्टान्त से स्पष्ट कर रहे हैं। जिस प्रकार विवेक के पूर्व रज्जु में प्रतीत होनेवाला सर्प,
रज्जु की सत्ता से सत्तावान् होता है, उसी प्रकार संसार अवस्तुरूप रहने पर भी वह कूटस्थ आत्मा की सत्ता से
सत्तावान् प्रतीत होता है ॥ ४६ ॥
आत्माभासाश्रयश्चात्मा प्रत्ययैः स्वैर्विकारवान् ।
सुखी दुःखी च संसारी नित्य एवेति केचन ॥४७॥

२०० उपदेशसाहस्री
आत्मेति—आत्मा ही आत्माभास (जीवत्व) का आश्रय है। वही अपने धर्मभूत प्रत्ययों के कारण
विकारवान् (विकारी) तथा सुखी, दुःखी और संसारी प्रतीत होता है। तथापि कोई वादी उसे नित्य ही कहा करते
हैं ॥ ४७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
एक अन्य मत से कल्पनालाघव प्रदर्शित करते हुए शंका करते हैं—आत्मा ही आत्माभास (जीव) का
आश्रय है। अतः वही अपने धर्मभूत प्रत्ययों के कारण विकारी तथा सुखी, दुःखी और संसारी होता है। तथापि कतिपय
वादीगण उसे 'नित्य ही' कहते हैं। क्योंकि तरंगादिकों से समुद्र के विकारी होने पर भी उसमें स्थैर्य (स्थिरता) दृष्टिगत
होती ही है। अतः आभास और तदाश्रयात्मना भेदकल्पना करने में गौरव होता है। इसलिये आत्मा ही संसारी है, यह
कल्पना क्षुद्र होगी, ऐसा कुछ लोगों का कथन है ॥ ४७ ॥
आत्माभासापरिज्ञानाद्याथात्म्येन विमोहिताः ।
अहंकर्तारमात्मेति मन्यन्ते ते निरागमाः ॥४८॥
आत्मेति—आत्मा और आत्माभास का ठीक-ठीक ज्ञान न होने से जो लोग मोह से ग्रस्त रहते हैं, तथा
अहङ्कार को ही आत्मा मानते हैं, वे लोग शास्त्रबाह्य हैं अर्थात् उन्हें शास्त्र के रहस्य का ज्ञान नहीं है ॥ ४८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इसी प्रकरण के 'संभाव्यो गोचरे शब्दः' (१८।२४ वें) श्लोक से यह बताया था कि आत्मा को संसारी कहने
में कोई प्रमाण नहीं है, उसे नहीं भूलना चाहिये। अतः एकदेशियों की कल्पना केवल उत्प्रेक्षामूलक ही है, प्रमाणमूलक
नहीं है। जो लोग आत्मा और आत्माभास का यथार्थ ज्ञान न होने के कारण मोहग्रस्त हो रहे हैं और अहंकार को ही
आत्मा समझ रहे हैं, वे शास्त्रबाह्य हैं, अर्थात् आगमरहस्यपरिचयशून्य हैं। “निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं
निरञ्जनम्१”, “साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च२”, “कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव३, “अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः४”, इत्यादि
नित्यशुद्धत्वादिपरक श्रुतिसंदर्भ को तथा “अनीशया शोचति मुह्यमानः५”, “अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः६”, “अनृतेन हि
प्रत्यूढाः७” इत्यादि श्रुतिसन्दर्भ को जिन लोगों नहीं देखा है, वे आत्मा और आत्माभास में विवेक न कर पाने के कारण,
अविद्या से संसारी प्रतीत होनेवाले अहंकार को ही अपनी कल्पना से आत्मा समझते हैं ॥ ४८ ॥
संसारो वस्तुसंस्तेषां कर्तृत्वभोक्तृत्वलक्षणः ।
आत्माभासाश्रयाज्ञानात् संसरन्त्यविवेकतः ॥४९॥
संसार इति—उनकी दृष्टि में कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसार भी वस्तुतः सत् है। तथा आत्मा और आत्माभास
तथा आभास का आश्रय इनका ज्ञान न रहने से अविवेक के कारण वे जन्म-मृत्युरूप संसार को प्राप्त होते रहते
हैं ॥ ४९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उन मोहग्रस्त लोगों के मत में कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसार भी परमार्थतः सत् है, तथा च “नासतो विद्यते
भावो नाभावो विद्यते सतः८” इस स्मृति के अनुसार संसार अविनाशी है, अतः उनके मत में मोक्ष की असिद्धि है।
१. (श्वे. उ. ६।१९)
२. (श्वे. उ. ६।११)
३. (बृ. उ. ४।५।१३)
४. (बृ. उ. ४।३।९)
५. (मुं. उ. ३।१।२, श्वे. उ. ४।७)
६. (मुं. उ. १।२।८, कठ. उ. २।५)
७. (छां. उ. ८।३।२)
८. (भ. गी. २।१६)

तत्त्वमसिप्रकरणम् २०९
यदि मोक्ष की अप्राप्ति के भय से संसार को वे भी अवस्तुरूप कहें तो हमारे मत को ही उन्होंने मान लिया, यही कहना
होगा। किन्तु मोहग्रस्त होने के कारण आत्मा, आभास और आभास के आश्रय का ज्ञान न होने के कारण वे अविवेक के
अधीन होकर जन्म-मृत्यु रूप संसार को प्राप्त होते रहते हैं ॥ ४९ ॥
चैतन्याभासता बुद्धेरात्मनस्तत्स्वरूपता ।
स्याच्चेत्तं ज्ञानशब्दैश्च वेदः शास्तीति युज्यते ॥५०॥
चैतन्येति—बुद्धि में चैतन्य का आभास और आत्मा का चित्स्वरूपत्व माना जाता है। चैतन्य तो आत्मा
का स्वरूप है, धर्म नहीं है। अचेतन बुद्धि में आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ने से वह चैतन्यधर्मवती प्रतीत होती है। इसलिए
यह उचित ही कहा जाता है कि वेद ज्ञानमय शब्दों के द्वारा उसका (आत्मा का) उपदेश करते हैं। केवल आत्मा
अथवा बुद्धि में शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि आत्मा निर्धर्मक है और बुद्धि जड़ है। अतः बुद्धि में आत्मा
का आभास माना जाता है। अतः चिदाभासविशिष्ट बुद्धि ही वेद के उपदेश को ग्रहण करती है। उसी के द्वारा लक्षणा
से वेद आत्मा का बोध कराते हैं ॥ ५० ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व श्लोक के द्वारा यह बताया गया कि आत्मा, आभास, और आश्रय इनका विवेक न होने से बन्ध होता
है और उनका विवेक होनेपर मोक्ष होता है। अब यह बता रहे हैं कि आभास का स्वीकार करने पर एक अन्य लाभ
होगा : 'चैतन्य' आत्मा का धर्म नहीं है, वह तो उसका स्वरूप ही है। किन्तु 'बुद्धि' जड़ है। उसमें आत्मा का
प्रतिबिम्ब पड़ने से वह चैतन्यधर्मवती अवगत होती है। यदि बुद्धि में आत्मा का आभास न स्वीकार किया जाय,
तो केवल आत्मा या बुद्धि में शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि 'आत्मा' निर्धर्मक और 'बुद्धि' जड़ है। अतः
चिदाभासविशिष्ट बुद्धि ही वेद के उपदेश को ग्रहण करती है। और उसी के द्वारा लक्षणा से वेदवाक्य, आत्मा का ज्ञान
कराता है। अतः आभास का अपलाप नहीं किया जा सकता । इस कारण बुद्धि (अन्तःकरण) की चैतन्याभास्यता
और आत्मा की चैतन्यस्वरूपता मानने पर ही वेद, आत्मा को ज्ञान, सत्य, अनन्त, आनन्द आदि शब्दों से बता पाता है ।
प्रकाशस्वभाव वस्तु जहाँ प्रतिबिम्बित होती है, वहाँ उसके प्रतिबिम्बित होने में प्रकाशाभासोदय ही हेतु होता है।
जैसे जल में प्रतिबिम्बित सविता, उसी तरह बुद्धि में जब चैतन्य प्रतिबिम्बित होता है, तब उसमें चित्प्रकाशोदय ही
हेतु होता है । तभी तो साभास बुद्धि में गृहीत सम्बन्ध के कारण ज्ञानादि शब्दों के द्वारा वेद, आत्मा को लक्षणा की
सहायता से बोधन कर पाता है, अन्यथा निर्धर्मक आत्मा में शब्दप्रवृत्ति हो ही नहीं पायेगी, तब वह वेदान्तवेद्य भी
कैसे कहा जायगा ? अन्य कोई प्रमाण भी उसे नहीं बता पाता, उस स्थिति में आत्मा का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं
हो सकेगा। अतः आभास को स्वीकार करना ही होगा ॥ ५० ॥
प्रकृतिप्रत्ययार्थौ यौ भिन्नावेकाश्रयौ यथा ।
करोति गच्छतीत्यादौ दृष्टौ लोकप्रसिद्धितः ॥५१॥
प्रकृतीति—प्रकृति और प्रत्यय के अर्थ भिन्न-भिन्न होने पर भी उनका आश्रय एक ही रहता है, उसी प्रकार
लोकप्रसिद्धि के अनुसार करोति, गच्छति इत्यादि में भी भिन्न-भिन्न अर्थ हैं, किन्तु उनका आश्रय एक ही है ॥ ५१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आभास के स्वीकार करने पर यद्यपि आत्मा में वेद की प्रवृत्ति का होना उपपन्न हो जाता है, तथापि
उसमें 'जानाति' आदि शब्दों की प्रवृत्ति न हो पायेगी, तब व्यवहार ही नहीं चल सकेगा । अथवा 'ज्ञान' शब्द की
व्युत्पत्ति करने पर आत्मा में उसकी मुख्यवृत्तिता तो संभव हो ही जाती है, अतः उसे साभास बुद्धिवाचक बताकर
आत्मा में लक्षणा से उसकी वृत्ति की कल्पना क्यों की जा रही है ? ऐसी शंका उपस्थित कर, उसका समाधान दे
रहे हैं। जैसे—'देवदत्तो गच्छति' इस वाक्य के 'गच्छति' पद में दो अंश हैं, एक 'गम्' और दूसरा 'ति' । इनमें 'गम्'
धातु प्रकृति है, उसका अर्थ गमन क्रिया है। तथा 'ति' प्रत्यय कर्तृत्व को सूचित करता है। इस प्रकार प्रकृति और
प्रत्यय का अर्थ भिन्न रहने पर भी उन दोनों का आश्रय एकमात्र देवदत्त है । इसी प्रकार 'जानाति' 'करोति' आदि
में भी एकमात्र 'आत्मा' को ही आश्रय समझना चाहिये ॥ ५१ ॥
२६

२०२ उपदेशसाहस्री
नानयोद्व्यर्थाश्रयत्वं च लोके दृष्टं स्मृतौ तथा ।
जानात्यर्थेषु को हेतुर्द्वयाश्रयत्वे निगद्यताम् ॥५२॥
नानयोरिति—लोकव्यवहार और व्याकरणस्मृति में भी प्रकृति-प्रत्ययों का द्वयाश्रयत्व (दो आश्रय) नहीं
देखा गया, तब 'जानाति' पदार्थ के दो आश्रयवाला होने में ही क्या हेतु हो सकता है ? उसे बताओ ॥ ५२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रकृत्यर्थ और प्रत्ययार्थ दोनों का एकाश्रयत्व जैसे दृष्ट है, वैसे ही क्वचित् भिन्नाश्रयत्व भी क्यों नहीं
हो सकेगा ? उत्तर यही है कि लोकव्यवहार में तथा व्याकरण-स्मृति में भी प्रकृति-प्रत्ययों का द्वयाश्रयत्व (दो आश्रय)
नहीं दिखाई देते । अतः 'जानाति' पदार्थ के दो आश्रय मानने में ही कौन हेतु है ? उसे बताओ ॥ ५२ ॥
आत्माभासस्तु तिङ्वाच्यो धात्वर्थश्च धियः क्रिया ।
उभयं चाविवेकेन जानातीत्युच्यते मृषा ॥५३॥
आत्माभास इति—आत्मा का आभास 'तिङ्' प्रत्यय का वाच्य है तथा धातु का अर्थ 'बुद्धि की क्रिया' है ।
ये दोनों प्रकृति और प्रत्यय, आत्मा और आत्माभास के अविवेक के कारण 'जानाति' के रूप में एक आश्रयवाले कहे
जाते हैं, किन्तु वह मिथ्या है ॥ ५३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रश्नकर्ता पूछता है कि प्रकृति-प्रत्यय के एकाश्रयत्वमात्र का निषेध कर रहे हो या परमार्थतः उनका
एकाश्रयत्व नहीं है, यह बता रहे हो ? सिद्धान्ती उत्तर देता है कि 'जानाति' 'करोति' आदि पदों में बुद्धिगत आत्मा का
आभास, 'तिङ्' प्रत्यय का वाच्य है, तथा 'धातु' का अर्थ (प्रकृत्यर्थ), बुद्धि की वृत्तिरूपा क्रिया है । तथाच आत्माभास
और बुद्धि ये दोनों (प्रकृति-प्रत्यय) आत्मा और आत्माभास के अविवेक के कारण मिथ्या ही—'जानाति' इत्यादि रूप से
एक आश्रय वाले कहे जाते हैं। सिद्धान्ती के कहने का तात्पर्य यह है कि तुम जो एकमात्र आत्मा को 'जानाति, करोति'
आदि पदों के अर्थों का आश्रय बताते हो, वह अध्यास के कारण है, वास्तव में नहीं है। क्योंकि 'बुद्धिवृत्ति' क्रियारूप है
और 'बुद्धिगत चिदाभास' प्रत्ययरूप है, उन दोनों में अविवेकवशात् आत्मत्व का अध्यास होने से ही आत्मा को 'जानाति'
आदि का आश्रय कहा जाता है ॥ ५३ ॥
न बुद्धेरवबोधोऽस्ति नात्मनो विद्यते क्रिया ।
अतो नान्यतरस्यापि जानातीति च युज्यते ॥५४॥
न बुद्धेरिति—क्योंकि बुद्धि में 'बोध' (ज्ञान) नहीं है और आत्मा में क्रिया (कर्म) नहीं है। अतः दोनों में
से किसी के लिए भी 'जानाति' यह प्रयोग करना उचित नहीं कहा जा सकता ॥ ५४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
द्वितीय विकल्प का उत्तर यह है कि ठीक-ठीक विचार करने पर ज्ञात होता है कि क्रियावाली बुद्धि का
अवबोध (चित्प्रकाश) नहीं है, तथा अवबोधस्वभाव आत्मा की क्रिया नहीं है । अतः दोनों में से किसी के लिये भी
'जानाति, अवगच्छति' आदि कहना उचित नहीं है । तथाच लोकव्यवहार तो प्रतीति के बल पर चलता है, अतः
'जानाति' आदि में आरोपित ऐक्यविषयता समझ लेने से लोकविरोध भी नहीं और स्मृतिविरोध भी नहीं होता है ॥ ५४ ॥
नाऽप्यतो भावशब्देन ज्ञप्तिरित्यपि युज्यते ।
न ह्यात्मा विक्रियामात्रो* नित्य आत्मेति शासनात् ॥५५॥

  • मात्रं—पाठान्तरम् ।
    १. तुलना कीजिये—(तै. उ. वार्तिक २।१।९०-९४, गद्य प्र. वाक्य ७६-८५ ।)

तत्त्वमसिप्रकरणम् २०३
नापीति—इसीलिए 'ज्ञप्तिः ज्ञानम्' इस भावव्युत्पत्ति के द्वारा भी आत्मा के अर्थ में 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग
नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'आत्मा नित्य है'—यह उपदेश श्रुति ने दिया है। अतः आत्मा को विकारमात्र नहीं कहा
जा सकता ॥ ५५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'ज्ञ' की व्युत्पत्ति 'जानातीति ज्ञः' अर्थात् जो जानता है—ज्ञान का कर्ता है, वह 'ज्ञ' है—ऐसी कर्तृव्युत्पत्ति
(कर्तृवाच्य व्युत्पत्ति) करके 'आत्मा' के लिये 'जानाति' पद का प्रयोग नहीं कर सकते, क्योंकि 'आत्मा' निर्धर्मक है। तथा
'जानाति' पद का प्रयोग 'बुद्धि' के लिये भी नहीं कर सकते, क्योंकि 'बुद्धि' जड़ है। और बुद्धि तथा आत्मा मिलकर
भी 'जानाति' आदि क्रिया के कर्ता नहीं हो सकते, क्योंकि तम और आलोक (अंधकार और प्रकाश) के समान जड़ और
अजड़ (चेतन) का ऐक्य नहीं हो सकता। और न ही दोनों में से किसी एक की सन्निधि के कारण अन्यतर में
उभयाश्रयता संगत हो पाती है, क्योंकि अध्यास के बिना सन्निधि नहीं देखी जाती। उसी प्रकार 'ज्ञप्तिः ज्ञानम्' इस
भावव्युत्पत्ति (भाववाच्यव्युत्पत्ति) के द्वारा भी 'आत्मा' के लिये 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता। क्योंकि
'भाव' शब्द धात्वर्थमात्र का वाचक होता है। अतः यदि आत्मा को भाववाचक शब्द का वाच्य कहा जाय तो निश्चय ही
उसे क्रियात्मक मानना होगा, क्रियात्मक होने से उसे विकारी कहना होगा, और विकारी होने पर वह 'अनित्य' होगा।
किन्तु 'आत्मा' को तो नित्य माना जाता है, इसीलिये उसे निर्विकार कहा जाता है। अतः उसे भाव शब्द का वाच्य नहीं
कह सकते। एवं च 'भाव' शब्द धात्वर्थसामान्य का वाचक होने से 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस व्युत्पत्ति से भी 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग
आत्मा में संगत नहीं होता। क्योंकि क्रियामात्र रहने पर पारतन्त्र्य होने से अनित्यता का प्रसंग प्राप्त होगा, वह तो ठीक
न होगा, क्योंकि १श्रुति ने 'आत्मा' को नित्य बताया है, वह विकारमात्र नहीं है ॥ ५५ ॥
न बुद्धेर्बुद्धिवाच्यत्वं करणं न ह्यकर्तृकम् ।
नापि ज्ञायत इत्येवं कर्मशब्देनिरुच्यते* ॥५६॥
नेति—'बुध्यते अनया इति बुद्धिः'—ऐसी करणवाच्य व्युत्पत्ति के द्वारा भी 'आत्मा' के अर्थ में बुद्धि (ज्ञान)
शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते, क्योंकि 'करण' कभी भी कर्ता के बिना नहीं होता। अतः 'बुद्धि' शब्द का वाच्य 'बुद्धि'
ही है, 'आत्मा' नहीं। उसी तरह 'ज्ञायते इति ज्ञानम्'—इस कर्मवाच्य व्युत्पत्ति के द्वारा भी 'आत्मा' को नहीं बताया
जा सकता, क्योंकि वह स्वयं अपना 'कर्म' बने, यह सम्भव नहीं है ॥ ५६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जैसे 'जानातीति ज्ञः' इस कर्तृव्युत्पत्ति से और 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस भावव्युत्पत्ति से भी ज्ञान शब्द का वाच्य
आत्मा नहीं होता, वैसे ही 'ज्ञायते अनेन' इस करणव्युत्पत्ति से और 'ज्ञायते इति ज्ञानम्' इस कर्मव्युत्पत्ति से भी ज्ञान
शब्द का वाच्य आत्मा नहीं हो सकता। 'बुध्यते अनया इति बुद्धिः' इस करण व्युत्पत्ति से बुद्धि शब्द का वाच्य आत्मा
नहीं है। किन्तु बुद्धि ही वाच्य है। क्योंकि कर्ता के बिना करण नहीं होता। तथा 'ज्ञायते इति ज्ञानम्' इस कर्मव्युत्पत्ति
के द्वारा भी आत्मा का निरूपण नहीं किया जा सकता। बुद्धि शब्द, ज्ञान का पर्याय है। अतः 'बुध्यते अनया' अथवा
'ज्ञायते अनया'—इसके द्वारा जाना जाता है इसलिये वह ज्ञान है—ऐसी करणव्युत्पत्ति करें तो उसका कोई कर्ता होना
चाहिये। किन्तु ऐसा कोई पदार्थ नहीं है, जिसका करण आत्मा हो सके। अतः करणवाच्य 'बुद्धि' या 'ज्ञान' शब्द का
प्रयोग भी केवल अन्तःकरण के लिये ही हो सकता है। यदि 'ज्ञायते इति ज्ञानम्'—जाना जाता है, इसलिये ज्ञान है—ऐसी
कर्मव्युत्पत्ति करें तो स्वयं ही अपना कर्म बने—ऐसा संभव नहीं है। इसलिये 'आत्मा' कर्मव्युत्पत्ति का भी विषय नहीं
हो सकता। यदि 'ज्ञायते अस्मिन् इति ज्ञानम्'—इसमें जाना जाता है, इसलिये वह ज्ञान है—ऐसी अधिकरण व्युत्पत्ति
करें तो ज्ञात घटादि के अधिकरण भूतलादि में भी 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग होगा। यदि कहें कि ज्ञातृत्व होते हुए ज्ञेयाधार
होने पर ही 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग हो सकता है तो जिस प्रकार भूतलादि में जड़ होने के कारण ज्ञातृत्व नहीं है, उसी
प्रकार आत्मा में कोई धर्म न होने के कारण ज्ञातृत्व का अभाव है ॥ ५६ ॥

  • निरुप्यते०—पाठान्तरम् । १. (कठ. उ. २।१८, ३।१३, मुं. उ. १।६, नृ. उ. ९)

२०४ उपदेशसाहस्री
न येषामेक एवात्मा निर्दुःखोऽविक्रियः सदा ।
तेषां स्याच्छब्दवाच्यत्वं ज्ञेयत्वं चात्मनः सदा ॥५७॥
नेति—जिनके मत में 'आत्मा' एक है, सर्वदा ही निर्दुःख और निर्विकार है, उनके अनुसार आत्मा का
शब्दवाच्यत्व और ज्ञेयत्व होना कदापि सम्भव नहीं है ॥ ५७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकार मुख्यवृत्ति से 'आत्मा' जानादि शब्दों का वाच्य नहीं है, यह कहने पर यदि कहें कि यह तो
तुम्हारे मत में भी होगा, तो उसका इष्टापत्ति के द्वारा परिहार करते हैं। जिनके मत में सर्वदा एक ही निर्दुःख और
निर्विकार आत्मा है, उनके सिद्धान्त के अनुसार आत्मा का शब्दवाच्य होना और ज्ञेय होना कभी संभव नहीं है। अथवा
आत्मा में बताये गये मुख्य शब्दप्रवृत्ति के अभाव को ही व्यतिरेक के द्वारा बता रहे हैं—जिनके मत में एक ही अर्थात्
यथानिर्दिष्ट आत्मा नहीं है, उनके मत में वह शब्द से वाच्य और ज्ञेय सर्वदा हो सकता है। क्योंकि वहाँ कर्त्रादि
व्युत्पत्तियों का संभव है। किन्तु श्रौत एकात्मवाद में उसका संभव नहीं है ॥ ५७ ॥
यदाऽहंकर्तुरात्मत्वं तदा शब्दार्थमुख्यता ।
नाशनायादिमत्त्वात्तु श्रुतौ तस्यात्मतेष्यते ॥५८॥
यदेति—जब अहङ्कार को 'आत्मा' माना जाय, तभी शब्दार्थ की मुख्यता हो सकती है। किन्तु वह भूख-
प्यास से युक्त है। इसलिए श्रुति के द्वारा उसका आत्मत्व नहीं माना जाता ॥ ५८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कहें कि शब्दार्थ की मुख्यता के लिये आत्मा को सविकार ही मान लिया जाय, इस आशंका का
उत्तर दे रहे हैं कि शब्दार्थ की मुख्यता तो तभी हो सकती है, जब अहंकार को आत्मा माना जाय। वह अहंकार तो
क्षुधा-पिपासादि से युक्त है। अतः उसे श्रुति ने 'आत्मा' शब्द से नहीं कहा। 'अहं कर्ता' इस प्रकार अभिमन्यमान आकार
को आत्मा कहा ही नहीं जा सकता। क्योंकि श्रुति¹ ने तो उसे अशनाया आदि से परे बताया है। अतः ज्ञान आदि
शब्दों की आत्मा में साक्षात् प्रवृत्ति नहीं होती, इसीलिये आभास द्वारा उनकी प्रवृत्ति बताई गई है ॥ ५८ ॥
हन्त तर्हि न मुख्यार्थो नापि गौणः कथंचन ।
जानातीत्यादिशब्दस्य गतिर्वाच्या तथापि तु ॥५९॥
हन्तेति—हे भगवन् ! तब तो 'जानाति' आदि शब्द का मुख्यार्थ या गौणार्थ कुछ भी सम्भव नहीं है,
तथापि उसकी कोई न कोई गति तो बतानी ही होगी ॥ ५९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शब्द के मुख्यार्थ के अभाव में गौण अर्थ भी नहीं हो सकेगा। अर्थात् जानाति आदि शब्दों की आत्मा में
और अन्यत्र भी मुख्यता यदि संभव नहीं है तो अन्य वृत्ति से भी आत्मा में उसकी प्रवृत्ति अनुपपन्न ही होगी। क्योंकि
जो अमुख्य है उसका अन्यत्र उपचार भी संभव नहीं होता है। अतः जानाति आदि शब्द का मुख्यार्थ या गौणार्थ कुछ
भी संभव नहीं है, तथापि उसकी कोई गति तो बतानी ही चाहिये ॥ ५९ ॥
शब्दानामयथार्थत्वे वेदस्याप्यप्रमाणता ।
सा च नेष्टा ततो ग्राह्या गतिरस्य प्रसिद्धितः ॥६०॥
शब्दानामिति—इस प्रकार शब्दों की अयथार्थता स्वीकार करने पर वेद को अप्रामाण्य प्राप्त होगा, किन्तु
वह अभीष्ट नहीं है। अतः लोकप्रसिद्धि के माध्यम से ही उनकी गति समझनी चाहिए। अर्थात् लोकव्यवहार में जो शब्द
जिस अर्थ में प्रसिद्ध हो, वही उस शब्द का वाच्य समझना चाहिए ॥ ६० ॥
१. (बृ. उ. ३।५।१)

तत्त्वमसिप्रकरणम् २०५
हृदयस्पशिनी
यदि जानाति आदि लौकिक शब्दों की कोई गति नहीं बताई जायगी तो केवल लौकिक शब्दों की ही
अप्रमाणता नहीं होगी अपितु वेद की भी अप्रमाणता सिद्ध होगी। वैदिक शब्द भी लोकसिद्ध व्युत्पत्ति की ही अपेक्षा
रखते हैं। इस प्रकार वेद का अप्रामाण्य तो किसी को अभीष्ट नहीं है। आत्मा के विषय में तो वेद का ही प्रामाण्य सभी
को अभीष्ट है। अतः वेदप्रामाण्यांगीकार के लोभ से ही इन लौकिक शब्दों की गति बतानी ही होगी। एवं च लोक-
प्रसिद्धि से ही उन शब्दों की गति स्वीकार करनी चाहिये। अर्थात् लोकव्यवहार में जो शब्द जिस अर्थ में प्रसिद्ध है, उसी
को उसका अर्थ मानना चाहिये ॥ ६० ॥
प्रसिद्धिमूढलोकस्य यदि ग्राह्या निरात्मता।
लोकायतिकसिद्धान्तः *स चानिष्टः प्रसज्यते ॥६१॥
प्रसिद्धिरिति-यदि मूर्ख लोगों को प्रसिद्धि का स्वीकार करते हैं, तो लोकायतिक (नास्तिक) के देहात्मवाद
का सिद्धान्त प्रसक्त होगा, जो किसी को अभीष्ट नहीं है ॥ ६१ ॥
हृदयस्पशिनी
पूर्वपक्षवादी ने जो ऊपर कहा कि 'जानाति' आदि शब्दों की गति को लोकप्रसिद्धि से ही समझनी चाहिये ।
किन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि लौकिक शब्दों की गति जानने के लिये प्राकृत पुरुषों की प्रसिद्धि का स्वीकार
किया जाय, या पाणिनि आदि अभियुक्त (विद्वान्) को प्रसिद्धि को माना जाय ? उनमें प्रथम प्रसिद्धि का खण्डन
करते हैं-यदि प्राकृत (मूर्ख) पुरुषों की प्रसिद्धि को मानते हैं तो देहात्मप्रसिद्धि का भी अभ्युपगम हो जाने से नास्तिकों
के अनात्मवाद का सिद्धान्त प्रसक्त होता है। किन्तु वह किसी को अभीष्ट नहीं है। क्योंकि अज्ञानी लोग तो देहादि को ही
आत्मा मानते हैं ॥ ६१ ॥
अभियुक्तप्रसिद्धिश्चेत्पूर्ववद्दुर्विवेsingle।
गतिशून्यं न वेदोऽयं प्रमाणं संवदत्युत ॥६२॥
अभियुक्तति-यदि अभियुक्तों (पण्डितों) के प्रसिद्ध व्यवहार का ग्रहण करते हैं, तो आत्मा और बुद्धि में
किसका ज्ञातृत्व है ? यह विवेक करना कठिन है। प्रमाणभूत वेद भी गतिशून्य के समान आत्मा के ज्ञातृत्व का अनुवाद
नहीं कर सकता ॥ ६२ ॥
हृदयस्पशिनी
द्वितीय पक्ष का अनुवाद करके उसका भी उत्तर दे रहे हैं-यदि पाणिनि आदि विद्वानों की प्रसिद्धि का
स्वीकार करते हैं तो पूर्ववत् (आत्मा और बुद्धि इनमें से किसका ज्ञातृत्व है इस बात का) विवेक करना कठिन है, क्योंकि
पूर्वोक्त दोषों की प्रसक्ति होगी। यदि कहें कि गतिशून्य के समान आत्मा के ज्ञातृत्व का अनुवाद वेद करेगा, तो वह भी
ठीक नहीं है। क्योंकि वेद प्रमाण हैं, अतः प्रमाणभूत वेद आत्मा के ज्ञातृत्व का गतिशून्य के समान अनुवाद नहीं
कर सकता ॥ ६२ ॥
†आदर्शमुखसामान्यं मुखस्येष्टं हि मानवैः।
मुखस्य प्रतिबिम्बो हि मुखाकारेण दृश्यते ॥६३॥
आदर्श इति-शीशे में प्रतिफलित हुए मुख के साथ अपने ग्रीवास्थ मुख की समानता समझते हैं। मुख के
प्रतिबिम्ब को ही अपने मुख के रूप में देखते हैं ॥ ६३ ॥
हृदयस्पशिनी
लौकिक 'जानाति' आदि शब्दों की गति लगाने की पद्धति को बता रहे हैं। चिदात्मा में ही 'जानाति'
आदि शब्दों का औपाधिक प्रयोग संभव हो सकता है, उसे दृष्टान्त देकर समझाते हैं। लोग दर्पण में प्रतिबिम्बित मुख
के साथ ग्रीवास्थ मुखबिम्ब की समानता (एकता) समझते हैं, किन्तु वहाँ मुख का प्रतिबिम्ब ही मुख के रूप में देखा

  • सा चानिष्टा० - पाठान्तरम् । † आदर्श० - पाठान्तरम् ।

२०६ उपदेशसाहस्री
जाता है। तात्पर्य यह है कि आदर्श में जो मुख का प्रतिबिम्ब देखते हैं, वह औपाधिक है और वह ग्रीवास्थ मुख से सर्वथा
भिन्न है। तथापि उससे एकता (समानता) होने के कारण लोगों को 'यह मेरा मुख है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। उसी
प्रकार यद्यपि आत्मा और आत्माभास परस्पर भिन्न हैं, तथापि उनका विवेक न होने के कारण साधारण लोगों को
'आत्माभास' में ही आत्मत्व का भ्रम होता है, जिससे वे लोग आत्मा में उसके कर्तृत्वादि का आरोप करते
रहते हैं ॥ ६३ ॥
यत्र यस्यावभासस्तु तयोरेवाविवेकतः ।
जानातीति क्रियां सर्वो लोको वक्ति स्वभावतः ॥ ६४॥
यत्रेति—जिसमें जिसका अवभास होता है, उन दोनों पदार्थों के अविवेक से ही सब लोग स्वाभाविक रूप
से 'जानाति' आदि क्रिया का प्रयोग किया करते हैं ॥ ६४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जैसे कल्पित मुख और वास्तविक मुख दोनों के परस्पर अविवेक से 'मलिनं मुखं, अल्पं मुखं, वक्रं मुखं' आदि
औपाधिक व्यवहार होते हैं, उसी तरह आत्मा में भी ज्ञातृत्वादि व्यपदेश (व्यवहार) उपाधि-निबन्धन ही है। अर्थात्
चिदाभास की उपाधिरूप बुद्धि के कर्तृत्वादि धर्मों का आत्मा में आरोप किया जाता है ॥ ६४ ॥
बुद्धेः कर्तृत्वमध्यक्ष्य जानातीति ज्ञ उच्यते ।
तथा चैतन्यमध्यक्ष्य ज्ञातृत्वं बुद्धेरिहोच्यते ॥६५॥
बुद्धेरिति—बुद्धि के कर्तृत्व का आत्मा में अध्यास (आरोप) करके ही 'आत्मा जानता है'—यह कहा जाता
है, और बुद्धि में चैतन्य का अध्यास (आरोप) करके उसका 'ज्ञत्व' (ज्ञानवत्त्व) कहा जाता है ॥ ६५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अवभास, आभास, प्रतिबिम्बभाव ये सभी समानार्थक हैं। इनके द्वारा आत्मा-अनात्मा के अन्योन्य
धर्माध्यास से 'जानाति' आदि शब्दों का व्यवहार होता रहता है। बुद्धि और आत्मा का परस्पर तादात्म्याध्यास
होने पर अन्योन्य धर्मों का संकर होने से 'आत्मा जानाति', 'अहं जानामि' आदि व्यवहार होते हैं। आत्मा तो चेतन है
और बुद्धि जड़ है। आत्मा में जड़ बुद्धि के कर्तृत्वादि धर्म का आरोप करके उसे 'जानाति' शब्द द्वारा 'ज्ञ' कहा जाता है।
उसी तरह बुद्धि में आत्मचैतन्य का अध्यास (आरोप) होता है, इस कारण उसे भी 'ज्ञ' कहा जाता है ॥ ६५ ॥
स्वरूपं चात्मनो ज्ञानं नित्यं ज्योतिःश्रुतेर्यतः ।
न बुद्ध्या क्रियते तस्मान्नात्मनान्येन वा सदा ॥६६॥
स्वरूपमिति—'ज्ञान' आत्मा का स्वरूप है। इसलिये वह नित्य है। क्योंकि श्रुति ने उसे (आत्मा को)
स्वयंज्योति कहा है। अतः बुद्धि के द्वारा आत्मा में 'ज्ञान' को उत्पन्न नहीं किया जाता, और उसी तरह आत्माके द्वारा
अथवा अन्य किसी इन्द्रिय आदि के द्वारा भी उसको उत्पन्न नहीं किया जाता ॥ ६६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कहें कि बुद्धि आदि के द्वारा तो आत्मा में ज्ञान उत्पन्न किया जाता है, तब यह कैसे कह रहे हैं कि
आत्मचैतन्य का बुद्धि में आरोप (अध्यास) किया जाता है ? इसका समाधान यह है कि बृहदारण्यक श्रुति १ ने बताया
है—'ज्ञान' आत्मा का स्वरूप है। इसी को बताने वाली अन्यान्य श्रुतियाँ २ भी हैं। अतः ज्ञान नित्य है। इससे यह
प्रतीत होता है कि बुद्धि के द्वारा ज्ञान उत्पन्न नहीं किया जाता। तथा आत्मा या अन्य किसी चक्षुरादि के द्वारा भी
उसकी कभी उत्पत्ति नहीं होती है ॥ ६६ ॥
१. "तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।४।१६)
२. "आत्मैवास्य ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।३।६), "अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।३।९), “साक्षी चेता—
(श्वे. उ. ६।११)

तत्त्वमसिप्रकरणम् २०७
देहेऽहंप्रत्ययो यद्वज्जानातीति च लौकिकाः।
वदन्ति ज्ञानकर्तृत्वं तद्वद्बुद्धेस्तथात्मनः॥६७॥
देह इति—बुद्धि और आत्मा दोनों में दोनों का परस्पर अध्यास होता है, उस कारण ज्ञातृत्वादि व्यवहार
होता रहता है। एक दृष्टान्त से यह समझ में आ सकता है—जिस प्रकार प्राकृत पुरुषों को देह (शरीर) में 'अहम्'
प्रत्यय होता है, उसके होने से ही वे पुरुष अपने को मोटा, दुबला, गोरा, साँवला, काला, रोगी, स्वस्थ आदि समझते
रहते हैं। उसी प्रकार लौकिक पुरुष 'बुद्धि' में आत्मत्व का अध्यास करके 'जानाति' शब्द से बुद्धि में ज्ञानकर्तृत्व का
प्रदर्शन करते हैं और बुद्धि के कर्तृत्व का 'आत्मा' में आरोप करके उसे ज्ञानाश्रय कहा करते हैं ॥ ६७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
बुद्धि और आत्मा के अन्योन्यधर्माध्यास से ही ज्ञातृत्व, कर्तृत्वादि व्यवहार होता है, यह बता चुके हैं।
उसी में दृष्टान्त दे रहे हैं—जैसे घट आदि का रूपादिमत्त्वेन व्यवहार होता है, वैसे ही यह देह अहम्प्रत्यय के योग्य न
होते हुए भी उसमें चेतना का अध्यास करके साधारण लोग देह में ही अहम्प्रत्यय करते हैं, और उसी के कारण वे
अपने को कृश, स्थूल, गौर, श्याम, रोगी, निरोग आदि समझते हैं। उसी प्रकार बुद्धि जड़ होने से उसमें ज्ञातृत्व की
योग्यता न रहने पर भी, चिदाभास की व्याप्ति के कारण ज्ञातृत्व का आरोप किया जाता है और 'जानामि' कहकर
ज्ञानकर्तृत्व प्रदर्शित करते हैं। उसी प्रकार बुद्धि के कर्तृत्व का आत्मा में आरोप कर आत्मा को भी ज्ञानाश्रय कह
देते हैं। वस्तुतः आत्मा तो अविकारी (विकाररहित) है और चित्त (बुद्धि) विकारी (विकार सहित) है, किन्तु साधारण
लोगों को उन दोनों में विवेक न हो पाने से वे लोग आत्मा को ही विकारी समझते हैं और कहते भी हैं। तात्पर्य यह
है कि शास्त्रसंस्कार से रहित लोग 'देवदत्तो जानाति मनुते' इस प्रकार देह को ही ज्ञाता समझते हैं। वैसे ही बुद्धि में
ज्ञानकर्तृत्व (बुद्धि ज्ञान की कर्त्री है, ऐसा) कहते हैं और आत्मा को ज्ञान का आश्रय तथा विकारवान् (विकारी)
कहते हैं ॥ ६७ ॥
बौद्धैस्तु प्रत्ययैरेवं क्रियमाणैश्च चिन्निभैः ।
मोहिताः क्रियते ज्ञानमित्याहुस्तार्किका जनाः ॥६८॥
बौद्धैरिति—चेतन के समान प्रतीत होने वाली बुद्धि से प्रत्यय (वृत्तिविशेष) उत्पन्न होते रहते हैं। उन
उत्पद्यमान प्रत्ययों से मोहित हुए तार्किक (नैयायिक) लोग आत्मा से 'ज्ञान' का उत्पन्न होना समझने लगते हैं।
आत्मा तो नित्य ज्ञानस्वरूप ही है। चिदाभासविशिष्ट बुद्धि से वृत्तिज्ञानों की उत्पत्ति होती है। किन्तु तार्किक लोग
इस रहस्य को नहीं समझ पाते ॥ ६८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पुनरपि शंका होती है कि तार्किक लोग ज्ञान की उत्पत्ति और विनाश को देखकर आत्मा के द्वारा ज्ञान
का किया जाना (उत्पन्न होना) बताते हैं, तब ज्ञान को नित्य समझकर उसे आत्मस्वरूप कैसे कहा जाय ? समाधान
यह है कि चेतन के तुल्य प्रतीयमान बुद्धि के उत्पद्यमान प्रत्ययों से मोहित हुए तार्किक लोग 'ज्ञान उत्पन्न होता है'
ऐसा कहते हैं। आत्मा तो नित्यज्ञानस्वरूप है। जब बुद्धि में आत्मा का प्रकाश पड़ता है, तब वह चेतन के समान
प्रतीत होने लगती है और उसी से घटाकार-पटाकार ज्ञान जैसे वृत्तियों (ज्ञानों) की उत्पत्ति होती रहती है। बुद्धि
और आत्मा के परस्पराध्यास से ही यह सब खेल होता है। किन्तु तार्किक लोग (नैयायिक गण) ऐसा न मानकर उस
वृत्तिज्ञान को आत्मकतृत्व ही समझते हैं। वे यह नहीं सोच पाते कि यदि आत्मा में कर्तृत्वादि विकार माना जायगा
तो आत्मा को अनित्य कहना पड़ेगा। अतः इन तार्किकों को अध्यास से मोहित हुए ही समझना चाहिये। कर्तृत्वादि धर्म
तो चिदाभासविशिष्ट बुद्धि के ही हैं। जिस प्रकार एक ही अखण्ड आकाश घटादि से नाना प्रतीत होता है, उसी
प्रकार बुद्धिरूप उपाधि के कारण (अनेकविध वृत्तिज्ञान के कारण) एक ही नित्यज्ञानस्वरूप आत्मा विभिन्न-सा
जान पड़ता है ॥ ६८ ॥

२०८ | उपदेशसाहस्री
तस्माज्ज्ञाभासबुद्धीनामविवेकात्प्रवर्तितः ।
जानातीत्यादिशब्दश्च प्रत्ययो या च तत्स्मृतिः ॥६९॥
तस्मादिति-अतः यह निश्चित रूप से समझना होगा कि 'चेतन' (ज्ञ), चिदाभास, और बुद्धि इन तीनों का
विवेक न हो पाने से ही 'जानाति' इत्यादि शब्द, तद्विषयक ज्ञान, और उसकी स्मृति हुआ करती हैं ॥ ६९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इसलिये चेतन, चिदाभास, बुद्धि इन तीनों के अविवेक के कारण ही 'जानाति' आदि शब्द, तद्विषयक ज्ञान,
और उसकी स्मृति की प्रवृत्ति हुई है। आत्मा की जो कूटस्थता है, वह प्रमाण से सिद्ध है। किन्तु उसका विकारित्व
प्रमाण से सिद्ध नहीं है। जब कि ज्ञान में आत्मस्वरूपता का श्रवण होता है, अतः वह तो नित्य ही है। उसे किसी के
द्वारा उत्पन्न नहीं किया जाता । बुद्धिसंसर्ग हुए बिना आत्मा में ज्ञातृत्व की उपलब्धि नहीं हो पाती, क्योंकि सुषुप्ति
में ज्ञातृत्व की उपलब्धि नहीं होती है। बुद्धि की उपलब्धि भी आत्मा से भिन्न आकार में नहीं होतो। इस कारण आत्मा,
बुद्धि, तत्स्थ आभास इन तीनों का विवेकग्रह न होने से यथाप्रसिद्ध बुद्धि और आत्मा के व्यावहारिक एकत्व का ग्रहण
कर 'जानाति' आदि शब्दों का व्यवहार उपपन्न होता है । कोई भी अन्य आलम्बन परमार्थतः मुख्य नहीं है ॥ ६९ ॥
आदर्शानुविधायित्वं छायाया अस्यते मुखे ।
बुद्धिधर्मानुकारित्वं ज्ञभासस्य तथेष्यते ॥७०॥
आदर्शोति - मुखाभास में दर्पण का अनुविधायित्व रहता है और उसका मुख में आरोप करते हैं, वैसे ही
बुद्धि के धर्मों का अनुकरण करने वाला जो चिदाभास है, उसका चेतन में आरोप किया जाता है ॥ ७० ॥
हृदयस्पर्शिनी
ज्ञ, आभास और बुद्धि के अविवेक से जो समस्त व्यवहार चलता है, वह पारमार्थिक नहीं है, इसे दृष्टान्त के
द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं- जिस प्रकार छाया में (मुखाभास अर्थात् प्रतिबिम्ब में) दर्पण का अनुवर्तन रहता है, उसी का मुख
में आरोप किया जाता है। उसी प्रकार बुद्धि के धर्मों का अनुकरण करने वाले अध्यस्त चिदाभास को भी चेतन में अध्यस्त
मानकर व्यवहार किया जाता है ॥ ७० ॥
बुद्धेस्तु प्रत्ययास्तस्मादात्माभासेन दीपिताः ।
ग्राहका इव भान्ते दहन्तीवोल्मुकादयः ॥७१॥
बुद्धेरिति-अग्नि से व्याप्त हुआ अंगार, दाहक के रूप में प्रतीत होता है, उसी प्रकार चिदाभास से
प्रकाशित होने वाले बुद्धि के प्रत्यय, प्रकाशकर्ता के रूप में जान पड़ते हैं ॥ ७१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिस प्रकार उल्मुक (जलती हुई लकड़ी, अंगार) आदि अग्नि से व्याप्त होने के कारण जलाते हुए से
प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार चिदाभास के द्वारा प्रकाशित हुए बुद्धि के परिणामरूप प्रत्यय प्रकाशकर्ता की तरह प्रतीत
होते हैं ॥ ७१ ॥
स्वयमेवावभास्यन्ते ग्राहकाः स्वयमेव च ।
इत्येवं ग्राहकास्तित्वं प्रतिषेधन्ति सौगताः ॥७२॥
स्वयमिति-ग्राहक (ज्ञान) स्वयं ही प्रकाशित होते हैं और वे स्वयं ही प्रकाशरूप हैं-यह कहनेवाले
बौद्ध विद्वान् प्रत्यय (ज्ञान) के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकाशक के अस्तित्व (सत्ता) का निषेध करते हैं ॥ ७२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आभास से विविक्त (पृथक्) पदार्थ के स्वरूप का ज्ञान न होने से जैसे तार्किकों को व्यामोह होकर वे 'ज्ञानं
क्रियते' कहते हैं, उसी प्रकार बौद्धों को भी 'बुद्धि से व्यतिरिक्त (पृथक्) अन्य कोई ग्राहक नहीं है', इस प्रकार का व्यामोह