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सर्वकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 364 में से

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पृष्ठ 218

१९२ उपदेशसाहस्री
अहंकर्त्रात्मनि न्यस्तं चैतन्ये कर्तृतादि यत् ।
नेति नेतीति तत्सर्वं साहंकर्त्रा निषिध्यते ॥२५॥
अहमिति—चैतन्यस्वरूप आत्मा में अहंकर्ता (साभास अन्तःकरण) के द्वारा जिन कर्तृत्वादि का आरोप
किया जाता है, उन सबका अहंकर्ता के सहित 'नेति-नेति' श्रुति से क्रमशः निषेध किया जाता है ॥ २५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
तस्मात् अध्यस्त का ही निषेध कहना चाहिये। चैतन्यस्वरूप आत्मा में अहंकर्ता (साभास अन्तःकरण के
साथ अविवेक रहने से) ने जिन कर्तृत्वादि का आरोप किया है, उन सबका अहंकर्ता के सहित 'नेति नेति' के द्वारा निषेध
किया गया है ॥ २५ ॥
उपलब्धिः स्वयंज्योतिर्दृशिः प्रत्यक्सदक्रियः* ।
साक्षात्सर्वान्तरः साक्षी चेता नित्योऽगुणोऽद्वयः ॥२६॥
उपलब्धिरिति—यह आत्मा ज्ञानस्वरूप है, स्वयंप्रकाश है, चित्स्वरूप है, प्रत्यक्, सत्, एवं अक्रिय है।
वह साक्षात् सर्वान्तर्यामी, सभी का द्रष्टा, प्रकाशक, नित्य, निर्गुण और अद्वितीय है ॥ २६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि शास्त्र के द्वारा अध्यस्त का ही निषेध किया जाता है तो आत्मस्वरूप की उपलब्धि कैसे होगी ?
उसपर कहते हैं कि आत्मा को अनुपलब्धिस्वरूप मानने में कोई प्रमाण नहीं है। उसके विपरीत 'साक्षात्' इत्यादि
उत्तरार्ध में सूत्रित श्रुतियां प्रमाणरूप में उपस्थित रहने से 'आत्मा' स्वप्रकाश ही है अर्थात् स्वतःसिद्ध ही है, उसके
ज्ञानार्थ प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। वह आत्मा ज्ञानस्वरूप है, स्वयंप्रकाश है, चित्स्वरूप है, प्रत्यक्, सत् और
अक्रिय है। वह साक्षात् अन्तर्यामी, सर्वद्रष्टा, प्रकाशक, नित्य, निर्गुण और अद्वितीय है ॥ २६ ॥
सन्निधौ सर्वदा तस्य स्यात्तदाभोऽभिमानकृत् ।
आत्मात्मीयं द्वयं चातः स्यादहंममगोचरः ॥२७॥
सन्निधाविति—सर्वदा उस चेतन की सन्निधि में रहने से अहंकार भी उसी के समान चेतन-सा प्रतीत होता
है। अतएव अहम्-ममविषयक आत्मभाव और आत्मीयभाव दोनों होने लगते हैं ॥ २७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा-आत्मीय ये दोनों अहं और मम प्रत्यय के गोचर (विषय) हुआ करते हैं, यह तो प्रसिद्ध ही है। अतः
आत्मा को स्वतःसिद्ध कैसे कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह होगा कि उपाधिवशात् व्यवहार में वैसी प्रसिद्धि है,
वस्तुतः तो आत्मा स्वतःसिद्ध ही है। अहंकार का काम है अभिमान करना। वह चिदात्मा की सन्निधि में सर्वदा रहता
है, उस कारण उसी के समान चैतन्य प्रकाश से युक्त होने से चेतन-सा अर्थात् चेतनाकार-सा ज्ञात होता है, उसी कारण
आत्मभाव और आत्मीयभाव अर्थात् 'अहं' 'मम'—'मैं और मेरा'—यह व्यवहार चलता रहता है। एवंच मैं और मेरा यह
व्यवहार, साभास अन्तःकरण और उसकी वृत्ति से अतिरिक्त आत्मा है, इस प्रकार के ज्ञान के न होने से चलता है। अतः
आत्मा स्वभावतः स्वतःसिद्ध है ॥ २७ ॥
जातिकर्मादिमत्त्वाद्धि तस्मिञ्शब्दास्त्वहंकृति ।
न कश्चिद्वर्तते शब्दस्तदभावात्स्व आत्मनि ॥२८॥
जातीति—जाति और कर्म आदि 'अहंकार' में ही हुआ करते हैं। अतः उसी में (अहंकार में ही) शब्द-
प्रवृत्ति होती है। किन्तु आत्मा में जाति-कर्म आदि का अभाव रहने से उसमें (आत्मा में) शब्द की प्रवृत्ति नहीं
होती ॥ २८ ॥

  • सदाक्रियः—पाठान्तरम् ।