सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

१८० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
अतीता बन्धवो नष्टाः पितामहमुखाः खलु ।
तत् सर्वदा शोचितव्यं कुतः सर्वं न शोचितम् ॥ ३४ ॥
अथ ते बन्धवः कस्य बन्धुत्वं वा कुतस्तव ।
मातापित्रोः स्वस्य वाऽपि पुरीषक्रमयो हि ये ॥ ३५ ॥
असङ्ख्याताः स्वदेहोत्था देहसम्बन्धिनोऽपि च ।
न ते स्युर्बन्धवः कस्मात् कुतो वा ते न शोचिताः ॥ ३६ ॥
राजन् विमृश कस्त्वं वै कान् विनष्टान् प्रशोचसि ।
देहस्त्वं देहभिन्नो वा देहः सङ्घातरूपकः ॥ ३७ ॥
सङ्घातस्यैकदेशस्य वा नाशानाश उच्यते ।
प्रतिक्षणं त्वेकदेशनाशो देहस्य भावितः ॥ ३८ ॥
मूत्रोच्चारश्लेष्मनखकेशादेः सन्ततं च यः ।
सर्वात्मना तु सङ्घातनाशो न हि विभाव्यते ॥ ३९ ॥
आवश्यक हो, तो सुनो । तुम्हारे दादा आदि और भी अनेकों
भूतकालीन सम्बन्धी मर ही चुके हैं; तब तुम्हें सर्वदा शोक ही
करते रहना चाहिये था । तुमने उन सबके लिये शोक क्यों नहीं
किया ? ॥ ३३-३४ ॥
अच्छा, तुम्हारे वे सम्बन्धी भी वास्तवमें किसके थे और तुम्हारे
साथ भी उनका कैसे सम्बन्ध हुआ ? देखो, माता-पिता अथवा अपने भी
विष्ठामें जो अगणित कीड़े होते हैं वे अपने देहसे ही होते हैं और
देहके सम्बन्धी भी हैं ही, फिर वे तुम्हारे स्वजन क्यों न हुए और
उनके लिये तुम शोक क्यों नहीं करते ? ॥ ३५-३६ ॥
राजन् ! तुम सोचो कि वास्तवमें तुम कौन हो और किन मरे हुओं-
के लिये तुम शोक कर रहे हो ? तुम देह हो या देहसे भिन्न ? देह तो
अनेक तत्त्वोंका संघात ( समूह ) है ॥ ३७ ॥
उस सम्पूर्ण संघातके अथवा उसके एक अंशके नाशको ही नाश
कहते हैं । और देहके एक-एक अंशका नाश तो प्रत्येक क्षणमें माना
जाता है । जैसे मूत्र, मल, कफ, नख और केश आदिका नाश निर-
न्तर होता ही रहता है । तथा इस संघातका पूर्णतया नाश कभी माना
नहीं जाता ॥ ३८-३९ ॥

त्रयोदशोऽध्यायः। १८१
भ्रात्रादेस्तव देहांशः स्यात् पृथिव्यादिषु स्फुटम् ।
अन्ततो देहगगनमविनाश्यस्ति केवलम् ॥ ४० ॥
न त्वं देहः किं तु देही मदेह इति भाषसे ।
यथा मद्वस्त्रमित्येवं स देहस्त्वं कथं वद ॥ ४१ ॥
यदि त्वं देहभिन्नोऽसि सम्बन्धः कोऽन्यदेहकैः ।
यथा भ्रात्रादिवासोभिर्नास्ति सम्बन्धलेशकः ॥ ४२ ॥
अविशेषात्तच्छरीरैर्विनष्टैस्तैः कथं शुचा ।
मच्छरीरं मदक्षाणि मत्प्राणो मन्मनस्त्विति ॥ ४३ ॥
वदन् भवान् किंस्वरूपो वद मे पृच्छते नृप ! ।
एवमुक्तो महासेनो मुहूर्तं सुविचार्य तु ॥ ४४ ॥
अप्राप्य तं मुनेः प्रश्ने प्राह दीनतरस्ततः ।
न जाने भगवन् कोऽहमिति सर्वात्मनाऽप्यहम् ॥ ४५ ॥
तुम्हारे भ्राता आदिके देहोंका अंश पृथिवी आदि भूतोंमें स्पष्ट
है ही। [ इन पृथिवी आदिका भी नाश माना जाय तो ] अन्ततः विशुद्ध
देहाकाश तो अविनाशी है ही ॥ ४० ॥
वास्तवमें तो तुम देह नहीं देही (देहके स्वामी) हो, क्योंकि
तुम जिस प्रकार 'मेरा वस्त्र' कहते हो वैसे ही 'मेरा देह' भी कहते
हो। फिर बताओ तुम देह कैसे हो सकते हो ? ॥ ४१ ॥
यदि तुम इस देहसे भी भिन्न हो तो अन्य देहोंके साथ तुम्हारा
क्या सम्बन्ध हो सकता है ? जिस प्रकार कि भाई आदिके वस्त्रोंसे
तुम्हारा लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। और [ उनके ममतास्पद
होनेमें ] उनके शरीरोंसे उनके वस्त्रोंका कोई भेद है नहीं। फिर शरीरों-
के मरनेपर ही तुम्हें क्यों शोक होता है ? ॥ ४२-४३ पू० ॥
राजन् ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, बताओ, जब तुम 'मेरा
शरीर' 'मेरी इन्द्रियाँ' 'मेरा प्राण' 'मेरा मन' ऐसा कहते हो तब तुम्हारा
क्या स्वरूप हुआ ?" ॥ ४३ उ०-४४ पू० ॥
ऐसा प्रश्न होनेपर महासेनने एक मुहूर्त्त खूब विचार किया और
जब मुनिके उस प्रश्नका कोई उत्तर न मिला तो अत्यन्त दीन
होकर बोला—"भगवन् ! सब प्रकार विचारनेपर भी मैं यह नहीं जान

१८२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
स्वभावतस्तु शोचामि कारणं तत्र नाविदम् ।
प्रपन्नस्त्वामहं दीनः किमिदं भगवन् वद ॥ ४६ ॥
सर्वे शोचन्ति यत् कस्मिन्नपि बन्धौ मृते सति ।
न स्वात्मानं विजानन्ति नाऽन्यं शोचन्ति चैव हि ॥ ४७ ॥
एतन्मे ब्रूहि भगवन् शिष्याय तव वै स्फुटम् ।
इति पृष्टो मुनिसुतो महासेनमथाऽब्रवीत् ॥ ४८ ॥
राजन् शृणु महादेव्या मायया मोहिता जनाः ।
स्वात्मानमविदित्वाैव व्यर्थं शोचन्ति सर्वदा ॥ ४९ ॥
यावन्न विदितं स्वात्मसतत्त्वं तावदेव वै ।
जनाः शोचन्ति विज्ञाय भूयः शोचन्ति न क्वचित् ॥ ५० ॥
यथा निद्रामोहितात्मा स्वमविज्ञाय शोचति ।
ऐन्द्रजालिकमन्त्रोत्थमायया मोहितो नरः ॥ ५१ ॥
तत्प्रकल्पितसर्पादिभीत्या यद्वद्धि शोचति ।
सका कि मैं कौन हूँ। मैं केवल स्वभाववश ही शोक कर रहा हूँ, किन्तु
उसका कारण नहीं जानता। मैं दीन आपकी शरणमें हूँ। भगवन् !
बताइये, यह सब क्या रहस्य है ॥ ४४ उ०-४६ ॥
कोई भी सम्बन्धी मर जाता है तो सभी लोक शोक किया करते
हैं। वे भी न तो अपने स्वरूपको जानते हैं और न दूसरेके ही स्वरूप-
को। तथापि शोक करते ही हैं ॥ ४७ ॥
भगवन् ! मैं आपका शिष्य हूँ। यह बात आप मुझे स्पष्ट समझा
दीजिये ।” इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिपुत्रने महासेनसे कहा—॥४८॥
“राजन् ! सुनो, देवी महामायाके कारण मोहमें पड़े हुए लोग
अपने वास्तविक स्वरूपको न जानकर सर्वदा व्यर्थ ही शोक किया
करते हैं ॥ ४९ ॥
जबतक आत्माके स्वरूपका ज्ञान नहीं होता तभीतक लोगोंको शोक
होता है। उसको जान लेनेपर तो फिर कभी शोक नहीं होता ॥ ५० ॥
जिस प्रकार निद्रासे मूर्च्छित हुआ पुरुष [ स्वप्नावस्थामें कल्पित
अनर्थकी आशंकासे ] अपनेको न जाननेके कारण ही शोक करने
लगता है, तथा किसी मायावीकी मन्त्रजनित मायासे मोहित हुआ
पुरुष मायाकल्पित सर्पादिके भयसे शोकाकुल हो उठता है,

त्रयोदशोऽध्यायः। १८३
तथैव मायया मुग्धः स्वमज्ञात्वा प्रशोचति ॥ ५२ ॥
यथा स्वप्नात् प्रबुद्धो वा ज्ञातैन्द्रजालिकागमः ।
न शोचति क्वचिच्चान्याञ्छुचा युक्तान् हसत्यपि ॥ ५३ ॥
एवं स्वात्मविदो मायामुक्ताः शोचन्ति न क्वचित् ।
शोचतस्त्वादृशान् मायामूढान् प्रविहसन्ति च ॥ ५४ ॥
तत्त्वं विज्ञाय्यात्मतत्त्वं मायामुत्तीर्य दुर्गमाम् ।
जहि शोकं महाबाहो ! मोहोत्थं सद्विमर्शनात् ॥ ५५ ॥
इत्युक्तः पुनरप्याह महासेनो मुनीश्वरम् ।
भगवन् यस्त्वया प्रोक्तो दृष्टान्तो विषमः स हि ॥ ५६ ॥
स्वाप्नो वा मायिको वाऽपि शून्यात्मा भासते परम् ।
अयं जाग्रत्प्रपञ्चस्तु सत्यः सर्वार्थसाधकः ॥ ५७ ॥
अबाधितः स्थिरश्चापि कथं स्वाप्नसमो भवेत् ।
उसी प्रकार मायासे मुग्ध हुआ पुरुष अपनेको न जाननेके कारण ही
शोक करता है ॥ ५१-५२ ॥
जैसे स्वप्नसे जगा हुआ तथा इन्द्रजालविद्याको जाननेवाला
पुरुष कभी शोक नहीं करता, प्रत्युत अन्य शोकयुक्त पुरुषोंको देखकर
हँसता भी है, इसी प्रकार आत्मतत्त्वको जाननेवाले मायामुक्त महापुरुष
कभी शोक नहीं करते, प्रत्युत तुम-जैसे शोक करनेवाले मायामुग्ध
पुरुषको देखकर हँसते हैं ॥ ५३-५४ ॥
अतः तुम आत्मतत्त्वको जानकर इस दुर्गम मायाको पार कर
लो और हे महाबाहो ! सत्स्वरूप आत्मतत्त्वका विचार करके इस
मोहजनित शोकको दूर कर दो" ॥ ५५ ॥
इस प्रकार कहे जानेपर महासेनने पुनः उन मुनिराजसे कहा,
“भगवन् ! आपने जो स्वप्न और इन्द्रजालका दृष्टान्त दिया वह तो
यहाँ ठीक नहीं बैठता ॥ ५६ ॥
स्वप्न और मायाका जो प्रपञ्च होता है वह तो पीछे शून्यरूप
ही भासता है। किन्तु यह जाग्रत् प्रपञ्च तो सत्य और सब प्रकारके
प्रयोजनोंकी पूर्ति करनेवाला है। इसका कभी बाध (मिथ्यात्व निश्चय)
नहीं होता और यह स्थिर भी है। फिर यह स्वप्नके समान कैसे

१८४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
इत्युक्तः पुनराचख्यौ मुनिपुत्रोऽतिबुद्धिमान् ॥ ५८ ॥
शृणु राजन् ! यच्चयोक्तं दृष्टान्तो विषमस्त्विह ।
एष मोहो द्वितीयस्ते स्वप्ने स्वाप्नस्य यादृशः ॥ ५९ ॥
स्वाप्नवृक्षोऽपि तत्काले किं न साधयते हितम् ।
पान्थानां किं न हरति तापं छायाप्रदानतः ॥ ६० ॥
फलाद्यैः स्वाप्नमर्त्यादीन्न तर्पयति किं वद ।
स्वप्ने क बाधितः स्वाप्नः कास्थिरश्चोपलक्षितः ॥ ६१ ॥
अखिलं बाधितं जाग्रद्दशायामिति चेच्छृणु ।
जाग्रत्प्रपञ्चोऽपि सर्वः सुपुप्तौ किं न बाधितः ॥ ६२ ॥
न बाधितः परदिनेऽप्यनुवृत्तेस्तथेति चेत् ।
स्वाप्नस्यापि परदिने नाऽनुवृत्तिः क वा वद ॥ ६३ ॥
हो सकता है ?” उसके ऐसा कहनेपर परम बुद्धिमान् मुनिपुत्रने
कहा—॥ ५७-५८ ॥
“राजन् ! सुनो, तुमने जो कहा कि स्वप्न और इन्द्रजालका
दृष्टान्त यहाँ ठीक नहीं बैठता यह तुम्हें दूसरा भ्रम हो गया है, जैसे
स्वप्नमें स्वाप्न पुरुषको [ रज्जु में सर्पादि प्रतीत होने की ] कोई दूसरी
भ्रान्ति उत्पन्न हो जाय ॥ ५६ ॥
स्वप्नमें प्रतीत होनेवाला वृक्ष भी क्या स्वप्न-कालमें उपयोगी
नहीं होता ? क्या उस समय छाया देकर वह यात्रियोंकी थकावट दूर
नहीं करता ॥ ६० ॥
अथवा फलादि के द्वारा वह स्वप्नके मनुष्योंको तृप्त नहीं करता।
भला, स्वप्नका पदार्थ कभी स्वप्नमें बाधित होता है अथवा कभी
अस्थिर देखा जाता है ? ॥ ६१ ॥
यदि कहो कि [ स्वप्नमें भले ही बाधित न हो ] वह सब जाग्रत्
दशामें तो बाधित हो ही जाता है, तो सुनो, क्या जाग्रत्का सारा प्रपञ्च
सुषुप्तिमे बाधित नहीं हो जाता ॥ ६२ ॥
यदि कहो कि दूसरे दिन भी उसकी अनुवृत्ति होती है इसलिये
उसका बाध नहीं होता, तो बताओ, क्या स्वप्नके पदार्थ दूसरे दिन
अनुभवमें नहीं आते ? ॥ ६३ ॥

त्रयोदशोऽध्यायः । १८५
नाऽनुवृत्तिर्भाति स्वप्ने इति चेन्नृपते ! शृणु ।
जाग्रत्यपि कानुवृत्तिभासो नव्याऽवभासके ॥ ६४ ॥
नव्येऽनुवृत्त्यभानेऽपि भात्यन्यत्रेति चेच्छृणु ।
तथा स्वप्नेऽपि भान्येवाऽनुवृत्तिः स्थिरभासने ॥ ६५ ॥
मृषानुवृत्तिस्तत्रेति चेज्जाग्रत्यपि सा तथा ।
सूक्ष्मबुद्ध्या विमृश तद्वस्तु जाग्रति संस्थितम् ॥ ६६ ॥
देहवृक्षनदीदीपादिकं क्षणविभेदितम् ।
कथं तदनुवृत्तिर्वै भवेदवितथात्मिका ॥ ६७ ॥
अचलानामपि न हि द्वितीयक्षणसङ्गतम् ।
रूपमस्ति सर्वदैव निर्भरैर्भैदितात्मनाम् ॥ ६८ ॥
मूषकैरुपदीकाभिः शूकरैर्निर्झरादिभिः ।
सर्वतस्तु विभिद्यन्ते पर्वताः सर्वदैव हि ॥ ६९ ॥
यदि कहो कि स्वप्नमें तो पूर्व पदार्थोंकी ही अनुवृत्ति नहीं भासती,
तो राजन् ! सुनो, जाग्रत्में भी अनुवृत्तिका भान कहाँ होता है, उस
अवस्थामें भी तो नये पदार्थ ही भासते हैं ॥ ६४ ॥
यदि तुम कहो कि नये-नये पदार्थोंकी प्रतीति होनेपर भी पृथ्वी
आदि अन्य पदार्थ तो वे ही रहते हैं, तो स्वप्नमें भी [देश-कालादि ]
स्थिर पदार्थोंके भासनेके साथ ही कुछ पदार्थोंकी अनुवृत्ति भासती
है । ६५ ॥
यदि तुम्हारे विचारसे स्वप्नकी अनुवृत्ति मिथ्या है तो जाग्रत्
की भी तो वैसी ही है। तुम जाग्रत्कालकी उन स्थिर वस्तुओंके विषयमें
विचार तो करो ॥ ६६ ॥
शरीर, वृक्ष, नदी और दीपक आदि पदार्थ क्षण-क्षणमें बदलते
रहते हैं। फिर उनकी अनुवृत्ति सत्य कैसे हो सकती है ॥ ६७ ॥
पर्वतादि अचल माने जानेवाले पदार्थोंका भी द्वितीय क्षणमें
रहनेवाला रूप ज्योंका त्यों नहीं होता। वे भी झरने आदिके कारण
बदलते रहते हैं ॥ ६८ ॥
चूहों, दीमकों, सूअरों और झरनों आदिके कारण पर्वतोंमें सर्वदा

१८६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
पर्वताम्बुधिभूमूख्या अप्येवं क्षणभेदिनः ।
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि पश्य सूक्ष्मधिया नृप ! ॥ ७० ॥
परिच्छिन्नाऽनुवृत्तिर्हि समैव स्वाप्नजाग्रतोः ।
अपरिच्छिन्नाऽनुवृत्तिः कार्येष्वत्यन्तदुर्लभा ॥ ७१ ॥
अनुवृत्तिः कारणेन रूपेणास्ति हि सर्वदा ।
इति चेत्कारणं रूपं पृथिव्यादिमयं किल ॥ ७२ ॥
तच्चाऽनुवृत्तंस्वप्नेऽपि पृथिव्यादेर्हि भासनात् ।
अथ स्वाप्नस्य बाधो हि जाग्रति ह्यनुभूयते ॥ ७३ ॥
न जागरस्य बाधस्तु भासते कस्यचित् क्वचित् ।
इति चेच्छृणु वक्ष्यामि बाधो ह्यनवभासनम् ॥ ७४ ॥
सुषुप्तौ सर्वजगतोऽप्यनुभूतं ह्यभासनम् ।
अथ बाधो ह्यप्रमाणदर्शनं चेत्तदा शृणु ॥ ७५ ॥
अप्रमाणदर्शिनास्ति भ्रान्तानां त्वादृशां खलु ।
सर्वत्र परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार पर्वत और समुद्रादि भी
क्षण-क्षण में बदलनेवाले हैं ॥ ६६-७० पू० ॥
अब मैं तुमसे जो कहता हूं उसपर सूक्ष्म दृष्टिसे विचार
करो। आंशिक अनुवृत्ति तो स्वप्न और जाग्रत्में समान रूपसे ही
होती है। हाँ, कार्यवर्गमें सर्वांशमें अनुवृत्तिकी प्रतीति होनी तो
अत्यन्त कठिन ही है ॥ ७० उ०-७१ ॥
यदि कहो कि कारणरूपसे तो जाग्रत्कालमें सर्वदा ही पदार्थोंकी
अनुवृत्ति होती है, तो कारणका स्वरूप तो पृथिवी आदि पञ्चभूतमय
ही है, सो वे तो स्वप्नमें भी अनुवृत्त होते ही हैं, क्योंकि वहाँ भी पृथिवी
आदिका भान होता ही है ॥ ७२-७३ पू० ॥
यदि ऐसा कहो कि स्वप्नके पदार्थोंका तो जाग्रत्कालमें अभाव
जान पड़ता है, किन्तु जाग्रत्कालका बाध कभी किसीको नहीं
भासता—तो सुनो, इसका उत्तर देता हूं। 'बाध' का अर्थ है 'न
भासना', सो सुषुप्तिमें तो सम्पूर्ण जगत्का 'न भासना' अनुभवमें
आता है ॥ ७३ उ०-७४ पू० ॥
और यदि तुम 'बाध' का अर्थ 'अप्रमाण दर्शन'¹ करो तो सुनो,
१. प्रमाणसे सिद्ध न देखना अर्थात् 'असत्य देखना' ।

त्रयोदशोऽध्यायः। १८७
ज्ञातविज्ञेयतत्त्वाना मप्रामाण्यदृशिः स्फुटा ॥ ७६ ॥
तस्मादिदं दृश्यजालं स्वाप्नदृश्यसमस्थिति ।
दीर्घकालोऽपि च स्वप्ने भासते निर्विशेषतः ॥ ७७ ॥
तस्मादबाधितो ह्यर्थक्रियाकारी स्थिरोऽपि च ।
स्वाप्नभावस्तेन तुल्यो जाग्रद्भावोऽपि सर्वशः ॥ ७८ ॥
यथा जाग्रति जाग्रत्त्वं गृहीतं जागरे स्फुटम् ।
स्वप्नेऽपि जागरत्वं तु गृहीतं तद्वदेव हि ॥ ७९ ॥
एवं स्थिते कुतो राजन् विशेषः स्वप्नजाग्रतोः ।
तत्स्वाप्नान्निजबन्धूंस्त्वं न हि शोचसि वै कुतः ॥ ८० ॥
केवलं भावनामात्रात् सत्यता जगति स्थिता ।
शून्यताभावनेनाऽपि शून्यं निष्प्रतिघं भवेत् ॥ ८१ ॥
तुम-जैसे भ्रान्त पुरुषोंको वह अप्रमाणदर्शन करनेकी दृष्टि प्राप्त नहीं
है। जो महापुरुष ज्ञेयतत्त्वको पहचानते हैं उन्हें स्पष्ट ही यह अप्रमा-
णदर्शनकी दृष्टि प्राप्त है ॥ ७५ उ०-७६ ॥
इसलिये यह दृश्यप्रपञ्च स्वप्नकालके दृश्यके समान ही है।
स्वप्नमें भी समान रूपसे दीर्घकालकी प्रतीति होती ही है ॥ ७७ ॥
अतः स्वप्नकालमें स्वप्नसृष्टि भी बाधित न होनेवाली, प्रयोजन-
की पूर्ति करनेवाली और स्थिर ही है। जाग्रत्सृष्टि भी सर्वथा उसके
समान ही है ॥ ७८ ॥
जिस प्रकार जाग्रत् अवस्थामें ‘यह जाग्रत् है’ ऐसा भान स्पष्ट होता
है उसी प्रकार स्वप्नावस्थामें भी जागृतिका ग्रहण होता ही है।
[ अर्थात् उस समय भी यही जान पड़ता है कि यह जाग्रत् है ] ॥ ७९ ॥
राजन् ! ऐसी स्थितिमें भला, जाग्रत् और स्वप्नका अन्तर कहाँ
है ? फिर तुम अपने स्वप्नावस्थाके सम्बन्धियोंके लिये शोक क्यों
नहीं करते हो ? ॥ ८० ॥
केवल भावनासे ही संसारमें सत्यता बनी हुई है। यदि इसमें
शून्यताकी भावना की जाय तो यह शून्य और निष्प्रतिघ ( सब प्रकार
की रुकावटसे रहित ) जान पड़ेगा ॥ ८१ ॥

१८८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
भावना ह्यप्रमाणत्ववैधुर्येण स्थिरीकृता ।
भवेत्तदात्मभावेन सत्यमेतन्महीपते ! ॥ ८२ ॥
निदर्शनं त्वत्र चेदं यज्जगद् दृष्टमेव ते ।
इमं शैलं परिक्रम्य यौ हि पश्याव सम्प्रति ॥ ८३ ॥
इत्युक्त्वा नृपतिं हस्ते गृहीत्वा परिचक्रमे ।
परिक्रम्य गण्डशैलं राज्ञा सह समेत्य तु ॥ ८४ ॥
पुनः प्राह महासेनं मेधावी मुनिनन्दनः ।
राजन् ! दृष्ट एष शैलः पादगव्यूतिमात्रकः ॥ ८५ ॥
दृष्ट श्वास्य गर्भे ते लोकः सुविततः स्फुटः ।
एष जाग्रदुत स्वप्नः सत्यो मिथ्यात्मकोऽपि वा ॥ ८६ ॥
शैललोके यदिनेकं तदत्र द्वादशाऽर्बुदाः !
वत्सरास्त्वनुभूतास्ते सत्यासत्ये विवेचय ॥ ८७ ॥
विवेचनं नास्य भवेत् स्वप्नयोर्भिन्नयोरिव ।
वह भावना इसमें अप्रमाणत्व (असत्यत्व) बुद्धि न होनेके कारण
पुष्ट हो गयी है। राजन् ! आत्मभाव होनेपर तो यह सचमुच भावना ही
जान पड़ेगी ॥ ८२ ॥
इस समय तुमने जो संसार देखा है वह इसमें दृष्टान्त है। [यदि
इच्छा हो तो] इस पर्वतकी परिक्रमा करके अब पुनः देख लें” ॥ ८३ ॥
ऐसा कहकर मुनिपुत्रने राजाका हाथ पकड़कर परिक्रमा की और
राजाके साथ शिलाकी परिक्रमा कर उस महाबुद्धि मुनिपुत्रने महा-
सेनसे पुनः कहा—॥ ८४-८५ पू० ॥
“राजन् ! देखा, यह पहाड़ी केवल चौथाई गव्यूतिमात्र है, किन्तु
इसके भीतर स्पष्ट ही तुमने विस्तृत संसार देखा था। यह जाग्रत् था या
स्वप्न, सत्य था या मिथ्या ?” ॥ ८५ उ०-८६ ॥
पहाड़ीके संसारमें जो एक दिन था वही यहाँ तुम्हारे अनुभवमें
बारह अरब वर्ष हुए। इन दोनों अनुभवोंमें तुम सत्य और असत्यका
निर्णय करो ॥ ८७ ॥
भिन्न-भिन्न दो स्वप्नोंके समान इनका विवेचन नहीं हो सकता।
१. गव्यूति दो कोशको कहते हैं। अतः चौथाई गव्यूति ‘आधा कोश’ हुई।

त्रयोदशोऽध्यायः । १८६
तस्मादेतद्विद्धि जगद्भावनामात्रसारकम् ॥ ८८ ॥
अभाव्यमानं चैतत्तु लीयेत क्षणमात्रतः ।
तस्माच्छोकं जहि नृपावेक्ष्य स्वाप्नसमं जगत् ॥ ८९ ॥
स्वाप्नचित्रभित्तिभूतं स्वात्मानं संविदात्मकम् ।
दर्पणप्रतिमं मत्वा संस्थितोऽसि यथा तथा ॥ ९० ॥
जाग्रच्चित्रदर्पणं चावेह्यात्मानं चिदात्मकम् ।
परमानन्दितस्वान्तो भव शीघ्रं महीपते ! ॥ ९१ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शैललोकदर्शनं नाम
त्रयोदशोऽध्यायः ॥
―――❖―――
[ अर्थात् इनमेंसे एकको सत्य तथा दूसरेको असत्य नहीं कह सकते ] ।
अतः सार यह है कि यह जगत् भावनामात्र है ॥ ८८ ॥
यदि भावना न हो तो यह एक क्षणमें ही लीन हो जाय । इसलिये
राजन् ! शोक त्याग दो, इस जगत्‌को स्वप्नका संसार ही समझो ॥८९॥
इस स्वप्नसंसाररूप चित्रकी भित्ति है अपना ही चित्स्वरूप आत्मा ।
उसे दर्पणकी तरह इसका आश्रय समझकर तुम चाहे जैसे रहो ॥६०॥
पृथिवीपते ! अपने चेतन आत्माको जाग्रत् अवस्थारूप चित्र ( प्रति-
बिम्ब ) का दर्पण जानकर तुम अपने अन्तःकरणमें परमानन्दका
अनुभव करो' ॥ ६१ ॥
त्रयोदश अध्याय समाप्त ।
―――❖―――

चतुर्दशोऽध्यायः
इत्याकर्ण्य मुनिवचो विचार्य शुभया धिया ।
जगत्स्थितिं स्वाप्नसमां ज्ञात्वा शोकं जहौ द्रुतम् ॥ १ ॥
धैर्यमालम्ब्य निःशोको भूयोऽपृच्छन्मुनेः सुतम् ।
मुनिपुत्र ! महाबुद्धे ! त्वं पराऽवरदर्शनः ॥ २ ॥
ततोऽप्यविदितं किञ्चिन्मन्ये स्यादिति लेशतः ।
पृच्छामि यदहं तन्मे कृपया वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
भावनाप्रभवं ह्येतत् सर्वं वदसि तत् कथम् ।
मया भूयो भाविते च न वहिः सर्वथा भवेत् ॥ ४ ॥
त्वया तु भावनासिद्ध्या शैललोकः प्रकल्पितः ।
अथाऽपि देशः कालश्च युगपद् द्विविधः कथम् ॥ ५ ॥
चतुर्दश अध्याय ॥ १४ ॥
सङ्कल्पसिद्धि और उसका साधन
मुनिपुत्रके ये वचन सुनकर महासेनने शुद्ध बुद्धिसे विचार किया
और इस जगत्की स्थितिको स्वप्नके समान समझकर तत्काल शोक
त्याग दिया ॥ १ ॥
फिर धैर्य धारण कर शोकहीन हो मुनिपुत्रसे पूछा, "परमबुद्धिमान्
मुनिपुत्र ! आप परावरदर्शी हैं। [ आपको इन्द्रियातीत और इन्द्रिय-
गोचर दोनों ही प्रकारकी वस्तुओंका ज्ञान है ] ॥ २ ॥
तथापि मुझे अभी जो थोड़ी-सी बात अविदित-सी जान पड़ती है
उसके विषयमें कुछ प्रश्न करता हूँ, आप उसे कृपापूर्वक बताइये ॥ ३ ॥
आप कहते हैं कि यह सब भावनासे ही हुआ है, सो कैसे ?
क्योंकि मैं जिसकी भावना करता हूँ वह वस्तु तो बाहर बिलकुल
दिखायी नहीं देती ॥ ४ ॥
भावनाकी सिद्धि होनेके कारण आपने अवश्य पहाड़ीके भीतर स्थित
लोककी कल्पना कर ली है। तथापि यह लोक और शिलालोक साथ
होनेपर भी इनमें दो प्रकारके देश और काल क्यों हैं ? ॥ ५ ॥

चतुर्दशोऽध्यायः। ' १६१
तत्राऽसत्यमन्यतरत् कतमं तन्ममेरय ।
इति पृष्टो मुनिसुतः प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ६ ॥
सङ्कल्पो भावना प्रोक्ता सिद्धाऽसिद्धेति सा द्विधा ।
सिद्धिर्विकल्पासम्भेदो(ऽ)विकल्पस्त्वेकनिष्ठितेः ॥ ७ ॥
ब्रह्मभावनया पश्य जातं जगदिदं ननु ।
एतत् सर्वैः सत्यरूपं भावितं सुदृढत्वतः। ८ ॥
तथा स्वसङ्कल्पभवे नास्ति कस्याऽपि भावना ।
विकल्पसम्भेद एषोऽसिद्धा तस्माद्विभावना ॥ ९ ॥
भावनायाः सिद्धिरत्र बहुधा संस्थिता भवेत् ।
जन्मना मणिना तद्वदौषधेन च योगतः ॥ १० ॥
तपसा मन्त्रसिद्ध्या च वरेण च भवेन्नृपः ।
जन्मना ब्रह्मणः सा वै मणिना यक्षरक्षसाम् ॥ ११ ॥
औषधेन तु देवानां योगिनां योगतो भवेत् ।
तपसा तापसानां सा मान्त्रिकाणां तु मन्त्रतः ॥ १२ ॥
इनमें एक तो असत्य होगा ही, सो कौन-सा है—यह मुझे बतला-
इये।” इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिपुत्रने कहना आरम्भ किया—॥ ६ ॥
“भावना संकल्पको ही कहते हैं और वह सिद्ध एवं असिद्ध दो
प्रकारकी होती है। जिस भावनामें विकल्प (संशय) का संश्लेष नहीं
होता वह सिद्ध होती है, विकल्प न होनेका अर्थ है किसी एकमें लग
जाना ॥ ७ ॥
इस संसारको तुम निश्चय ही ब्रह्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ
समझो। अत्यन्त दृढ़ताके कारण सबने इसे सत्य मान रखा है ॥ ८ ॥
तथा तुम्हारे अपने संकल्पसे उत्पन्न हुए संसारमें किसी दूसरेकी
सत्यत्व भावना नहीं होती ! अतः इसमें [यह सत्य नहीं है] ऐसे तुम्हारे
ही विकल्पका मेल रहनेके कारण यह भावना सिद्ध नहीं होती ॥ ९ ॥
यहाँ भावनाकी सिद्धि अनेक प्रकारसे होती है। राजन् ! यह
भावनासिद्धि जन्मसे, मणिसे, ओषधिसे, योगसे, तपसे, मन्त्रसिद्धिसे तथा
वरके द्वारा भी हो सकती है ॥ १०-११ पू० ॥
यह जन्मके द्वारा ब्रह्माको, मणिसे यक्ष और राक्षसोंको, ओषधिसे

१६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
विश्वकर्ममुखानां च वरप्राप्त्या हि साऽऽभवत् ।
सङ्कल्पिते तथा भाव्यं पूर्वविस्मरणे सति ॥ १३ ॥
स्थिरं तावद्भवत्येव यावत् पूर्वं न हि स्मरेत् ।
एवमेव निर्विकल्पभावना यदि सुस्थिरा ॥ १४ ॥
अनिच्छया विकल्पस्य यावत् सम्भेदनं न हि ।
तावत् सा भावना सिद्धा साधयेद्वै महाफलम् ॥ १५ ॥
सम्भेदात्तु विकल्पेन न सिद्धा तव भावना ।
भावनां साधय क्षिप्रं यदि स्रष्टुं समीहसि ॥ १६ ॥
शृणु राजन् ! देशकालद्वैविध्यं वदतो मम ।
अव्युत्पन्नोऽसि लोकस्य व्यवहारे ह्यतस्तव ॥ १७ ॥
एतच्चित्रं भासते वै शृणु सम्यग् ब्रवीमि ते ।
जगद्भावस्वभावोऽयं विविधत्वेन भासनम् ॥ १८ ॥
देवताओंको, योगसे योगियोंको, तपसे तपस्वियोंको मन्त्रसे मान्त्रिकोंको
और वरसे विश्वकर्मा आदिको प्राप्त हुई थी ॥ ११ उ०-१३ पू० ॥
संकल्प ऐसा होना चाहिये कि मैं संकल्प कर रहा हूँ—इस पूर्व-
संकल्पकी भी स्मृति न रहे। ऐसा संकल्प तबतक स्थिर रहता है
जबतक कि पूर्वसंकल्प न फुरे ॥ १३ उ०-१४ पू० ॥
इस प्रकार ही जब निर्विकल्प भावना अच्छी तरहसे स्थिर हो
जाती है और इच्छा न होनेके कारण ही जबतक उससे विकल्पका
संसर्ग नहीं होता, तबतक वह सिद्ध भावना बड़ा भारी फल प्रदान
करती रहती है ॥ १४ उ०-१५ ॥
विकल्पका सम्पर्क रहनेके कारण ही तुम्हारी भावना सिद्ध नहीं हुई
है। अतः यदि तुम सृष्टिरचना करना चाहते हो तो तुरन्त ही अपनी
भावनाको सिद्ध करो ॥ १६ ॥
राजन् ! सुनो, अब मैं इस लोक और शैललोकके देश-कालोंकी
द्विविधताका रहस्य बतलाता हूँ। क्योंकि तुम लोकव्यवहारको ठीक-ठीक
नहीं समझते हो इसीसे तुम्हें यह बात विचित्र जान पड़ती है। मैं तुम्हें
यह स्पष्ट करके समझाता हूँ, सुनो। इस तरह अनेक रूपसे भासना
तो जगत्का स्वभाव ही है ॥ १७-१८ ॥

चतुर्दशोऽध्यायः। १६३
एक एव हि सर्वस्य प्रकाशो द्विविधः स्थितः ।
दिवान्धानामान्धकार इतरेषां तु भासकः ॥ १९ ॥
जलं मनुष्यपश्वादेः श्वासस्य प्रतिरोधकम् ।
मत्स्यादीनां बहिः श्वासप्रतिरोधो जले न हि ॥ २० ॥
अग्निर्दहति मर्त्यादींस्तं भक्षयति तित्तिरिः ।
वह्निर्नश्यति तोयेन स जले ज्वलति क्वचित् ॥ २१ ॥
एवं सर्वे जागतास्तु भावा द्वैरूप्यतः स्थिताः ।
एवं सेन्द्रियधृत्तान्तास्त्वन्ये कैऽपि निरिन्द्रियाः ॥ २२ ॥
स्वभावतो विरुद्धा वै शतशोऽथ सहस्रशः ।
अत्रोपपत्तिं वक्ष्यामि समाहितमनाः शृणु ॥ २३ ॥
एते हि चाक्षुषा भावाश्चक्षुर्विंकृतिमात्रकाः ।
न चाक्षुपादंशतोऽन्यद् दृश्यमस्ति क्वचिद्बहिः ॥ २४ ॥
प्रकाश सबके लिये एक ही होता है, किन्तु वह दो रूपमें ज्ञान
पड़ता है। उल्लू आदि दिनमें अन्धे रहनेवाले जीवोंको वह अन्धकाररूप
है तथा दूसरोंको ज्योतिस्वरूप ॥ १९ ॥
जल मनुष्य और पशु आदिके लिये तो साँस लेनेमें बाधा डालने-
वाला है, किन्तु मत्स्यादिका श्वास बाहर निकलनेपर तो घुटता है पर
जलमें नहीं ॥ २० ॥
अग्नि मनुष्यादिकों तो जला देती है, पर तीतर उसे खा जाता
है। तथा आग बाहर होनेपर तो जलसे बुझ जाती है, किन्तु कहीं
बड़वानल कुण्डादिमें वह जलमें रहती भी है ॥ २१ ॥
इस प्रकार जगत्के सभी पदार्थ दो रूपोंमें स्थित हैं। इसी प्रकार
कुछ पदार्थ तो ऐसे हैं जो इन्द्रियोंसे जाने जा सकते हैं और कुछ
ऐसे भी हैं जो इन्द्रियोंके विषय नहीं होते ॥ २२ ॥
इस तरह सैकड़ों-हजारों पदार्थ परस्पर स्वभावसे विरुद्ध हैं। मैं
इसकी उपपत्ति बतलाता हूँ, सावधान चित्तसे सुनो ॥ २३ ॥
ये नेत्रोंसे प्रतीत होनेवाले पदार्थ केवल नेत्रके विकार ही हैं। नेत्रों-
का दृश्य नेत्रोंके अंशसे भिन्न बाहर और कहीं कुछ भी नहीं होता ॥२४॥

१६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
यथा पित्तप्रदुष्टाक्षो बहिः पीतं प्रपश्यति ।
यथा तैमिरिकोऽन्यस्तु पश्यत्येकं द्विधा स्थितम् ॥ २५ ॥
एवं विचित्रदुष्टाक्षाः पश्यन्ति विविधं जगत् ।
अस्ति पूर्वसमुद्रस्य मध्ये करण्डकाह्वयः ॥ २६ ॥
द्वीपस्तत्र जना भावान् रक्तान् पश्यन्ति वै सदा ।
एवं रमणकद्वीपे सदा पश्यन्ति वै जनाः ॥ २७ ॥
व्यत्यस्तमूर्ध्वाधरतो निखिलं भावमण्डलम् ।
एवमन्येषु द्वीपेषु विविधा भावमण्डलम् ॥ २८ ॥
जना नेत्रस्वभावेन पश्यन्ति खलु सर्वदा ।
तत्र तेषामन्यथा तु दृश्यते यदि कुत्रचित् ॥ २९ ॥
नेत्रं सुसाध्यौषधेन पश्यन्ति प्राग्वदेव हि ।
अतस्तु चक्षुषा यावद् दृश्यते जगतीतले ॥ ३० ॥
तावद्द्रवेच्चाक्षुषोंऽशः पीतवत् पीतचक्षुषः ।
जिस प्रकार पित्तदोषयुक्त नेत्र बाहर पीला ही पीला देखते हैं वैसे
ही तिमिर दोषवाले नेत्रोंको एक ही वस्तु दो दिखायी देती है। इसी
तरह और भी तरह-तरहके दोषोंसे दूषित नेत्रोंवाले जगत्को तरह-
तरहका देखते हैं ॥ २५-२६ पू० ॥
पूर्व समुद्रमें करण्डक नामका एक द्वीप है। वहाँ सब पदार्थोंको
लोग सर्वदा लाल रंगका ही देखते हैं ॥ २६ उ०-२७ पू० ॥
इसी तरह रमणक द्वीपमें सब लोग सब पदार्थोंको उल्टे-नीचेकी
ओर सिर और ऊपरकी ओर पैरवाले देखते हैं ॥ २७ उ०-२८ पू० ॥
इसी प्रकार अन्य द्वीपोंमें भी तरह-तरहके लोग अपने नेत्रोंके स्वभा-
वानुसार ही सर्वदा सब पदार्थोंको देखा करते हैं ॥ २८ उ०-२६ पू० ॥
यहाँ उन्हें यदि कोई वस्तु कहीं दूसरे प्रकारसे दिखायी देती है तो
वे ओषधिके द्वारा अपने नेत्रोंको ठीक करके उसे पहले ही की तरह
देखने लगते हैं ॥ २६ उ०-३० पू० ॥
अतः संसारमें नेत्रके द्वारा जो कुछ देखा जाता है वह, पीलिया रोग-
ग्रस्त नेत्रोंसे दिखायी देनेवाले पीलेपन की तरह, उस नेत्रका ही अंश
होता है ॥ ३० उ०-३१ पू० ॥

चतुर्दशोऽध्यायः। १६५
एवं घ्राणादीन्द्रियाणामंशा गन्धादयोऽपि हि ॥ ३१ ॥
मानसाश्च मनोमात्रास्तथैवाऽखिलजगतः ।
क्रमोऽप्यक्षस्वभावोत्थस्ततः किञ्चिद् बहिर्न हि ॥ ३२ ॥
शृणु राजन् ! बहिरिति यल्लोके भाति केवलम् ।
तदाद्यं सर्वजगतां जगच्चित्रस्थभित्तिवत् ॥ ३३ ॥
तस्य वाह्यस्य वक्तव्यमपादानं ध्रुवं ननु ।
शरीरं स्यादपादानं नेतरद्भवितुं क्षमम् ॥ ३४ ॥
तस्याऽपि बहिराभासादपादानं कथं नु तत् ।
पर्वताद् बहिरित्युक्ते पर्वतो न बहिर्भवेत् ॥ ३५ ॥
यथा घटो भासते हि प्राहुस्तद्वच्छरीरकम् ।
भासकाद् बहिरित्येवं वक्तुं वाऽपि न सम्भवेत् ॥ ३६ ॥
दीपसूर्यालोकबहिर्गतान्तं न हि भासनम् ।
इसी तरह गन्धादि भी घ्राणादिके ही अंश हैं तथा सम्पूर्ण जगत्के
जो मानसिक भाव हैं वे सब मनोमात्र हैं। एवं देश-काल और बड़े-
छोटे आदिका जो क्रम है वह भी इन्द्रियस्वभावके ही अन्तर्गत है, उससे
बाहर कुछ नहीं है ॥ ३१ उ०-३२ ॥
राजन् ! सुनो, लोकमें जो 'बाहर' इस तरह भास रहा है
वही सम्पूर्ण जगत्का मूल है और इस जगत्-रूप चित्रकी भित्तिके
समान है ॥ ३३ ॥
किन्तु 'उस 'बाह्य' का कोई निश्चित अपादान १ भी तो बनाना
चाहिये। [ तब यही कहना होगा कि ] वह अपादान शरीर ही है, और
कोई वस्तु तो हो नहीं सकती ॥ ३४ ॥
किन्तु वह शरीर भी तो बाहर ही भासता है। ऐसी अवस्थामें
यह कैसे अपादान हो सकता है ? क्योंकि यदि 'पर्वतसे बाहर' ऐसा
कहें तो पर्वत तो बाहर नहीं माना जायगा। पर शरीर तो जिस प्रकार
घट भासता है उसी प्रकार भासनेवाला कहा जाता है ॥ ३५-३६ पू० ॥
ऐसा भी कह नहीं सकते कि वह भासकसे बाहर है, क्योंकि जो वस्तु
दीपक या सूर्यके प्रकाशसे बाहर होती है वह तो भासित ही नहीं हो
१. 'अपादान' उसे कहते हैं जिससे वह बाह्य वस्तु बाहर है।

१६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
अतस्तु भासकस्यान्तर्भास्यमस्तीति युज्यते ॥ ३७ ॥
भासकं तु न देहादिर्भास्यत्वात् पर्वतादिवत् ।
न सर्वथा यत्तु भास्यं भासकं तद्धि युज्यते ॥ ३८ ॥
भासकस्याऽपि भास्यत्वे भासकस्याऽनवस्थितिः ।
स्वस्यैव भासकत्त्वं च भास्यत्वं न हि युज्यते ॥ ३९ ॥
अतस्तु भासकं शुद्धं भासकैकस्वरूपकम् ।
तच्च भारूपमेवेह पूर्णमेकरसात्मकम् ॥ ४० ॥
तेन व्याप्ता देशकाला भासनात्तस्य पूर्णता ।
अभारूपस्य चाऽभानाद्भारूपैकरसं हि तत् ॥ ४१ ॥
सकती। अतः यही कहना ठीक है कि भासित होनेवाले पदार्थ भासकके
अन्तर्गत ही होते हैं ॥ ३६ उ०-३७ ॥
देहादि भासक हो नहीं सकते, क्योंकि वे पर्वतादिके समान भासित
होने वाले हैं। भासक तो वही हो सकता है जो किसी प्रकार भासित
होनेवाला न हो ॥ ३८ ॥
यदि भासक भासित होनेवाला भी हो तो भासकका निर्णय करनेमें
अनवस्था दोष उपस्थित होगा। और स्वयं वही अपना भासक तथा
अपना ही भास्य हो नहीं सकता ॥ ३९ ॥
अतः जो भासक है वह एकमात्र शुद्ध भासकरूप ही है। वह
केवल भारूप ( प्रकाशस्वरूप ), पूर्ण और एकरसात्मक है ॥ ४० ॥
उस भारूप भासकके द्वारा देश और काल भी व्याप्त हैं, क्योंकि
उसीकी सत्तासे वे भासते हैं, इसीसे उसकी पूर्णता सिद्ध होती है।
१. यदि भासक भासित होनेवाला भी माना जाय तो यह प्रश्न होगा कि
वह किससे भासित होता है। उसका कोई भासक मानेंगे तो उसे भी भासित होने
वाला मानना होगा और फिर उसके विषयमें भी यही प्रश्न होगा। अतः कोई
भी चरम भासक सिद्ध नहीं हो सकेगा। इसीको अनवस्था दोष कहते हैं।
२. भास्य और भासकका प्रकारसे घटसे पटादिके भेदके समान भेद नहीं
समझना चाहिये; प्रत्युत दर्पण और प्रतिबिम्बके समान उन दोनोंका अभेद है।
जिस प्रकार दर्पणके बिना प्रतिबिम्बकी सत्ता ही नहीं होती उसी प्रकार चिन्मात्र
आत्मासे व्यतिरिक्त दृश्य प्रपञ्चकी सत्ता ही नहीं है। अतः दृश्यरूपसे भी चिति
ही प्रकाशित होती है। यही उसकी पूर्णता है।

३. अध्याय ११-१६: शुद्ध संवित् तत्त्व, जीवन्मुक्ति एवं समाधि-दशा विचार

चतुर्दशोऽध्यायः । १६७
अन्तर्बहिर्वा यत् किञ्चिद्भारूपोदरसंस्थितम् ।
अतस्तन्नापादानं स्यात् शृङ्गस्येव हि पर्वतः ॥ ४२ ॥
एवंविधं हि भारूपं ग्रस्तसर्वप्रपञ्चकम् ।
भाति स्वतन्त्रतः स्वस्मिन् सर्वत्राऽपि च सर्वदा ॥ ४३ ॥
एतत् परा चितिः प्रोक्ता त्रिपुरा परमेश्वरी ।
ब्रह्मेत्याहुर्वेदविदो विष्णुं वैष्णवसत्तमाः ॥ ४४ ॥
शिवं शैवोत्तमाः प्राहुः शक्तिं शक्तिपरायणाः ।
एतद्रूपादृते किञ्चिद् यदि ब्रूयुस्तदल्पकम् ॥ ४५ ॥
तया व्याप्तं तु चिच्छक्त्या दर्पणप्रतिबिम्बवत् ।
तस्य भास्यकृतं भासकत्वं च न स्वतः स्थितम् ॥ ४६ ॥
जो अप्रकाशरूप होगा उसका तो भान ही नहीं हो सकता। इसलिये वह
एकरस प्रकाशस्वरूप ही है ॥ ४१ ॥
भीतर और बाहर जो कुछ भी है वह सब उस प्रकाशस्वरूपके
पेटमें ही स्थित है। इसलिये जैसे पर्वत अपने शिखरका अपादान
नहीं हो सकता, उसी प्रकार वह उसका अपादान नहीं हो सकता।
[ तात्पर्य यह कि जिस प्रकार शिखरको पर्वतसे पृथक् या पर्वतसे
बाहर नहीं कह सकते उसीप्रकार प्रपञ्चको प्रकाशस्वरूप चेतनसे पृथक्
या बाहर नहीं कह सकते ] ॥ ४२ ॥
इस प्रकारके इस प्रकाशस्वरूपने सम्पूर्ण प्रपञ्चको अपनेमें ग्रस्त
किया हुआ है। वह सर्वदा सर्वत्र स्वतन्त्रतासे अपनेमें आप ही प्रकाश-
मान है ॥ ४३ ॥
यह पराचिति ही भगवती त्रिपुरा कही गयी है। वैदिक विद्वान्
इसीको ब्रह्म कहते हैं और वैष्णव विष्णु ॥ ४४ ॥
श्रेष्ठ शैव इसे शिव बताते हैं और शाक्त लोग शक्ति। इस चिद्रूपसे
भिन्न जो कुछ कहा जायगा वह अपूर्ण ही होगा ॥ ४५ ॥
प्रतिबिम्ब जिस प्रकार दर्पणसे व्याप्त रहता है उसी प्रकार यह
सब उस चेतन शक्तिसे व्याप्त है। इसका जो भासकत्व है वह भास्यके
कारण है, स्वतः नहीं ॥ ४६ ॥

१६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
भास्यं तु भाननिर्मग्नमादर्शे नगरादिवत् ।
दर्पणे नगरं यद्वद्दर्पणान्नातिरिच्यते ॥ ४७ ॥
तथा चिति जगद्भाति यत्तन्नैवातिरिच्यते ।
दर्पणात्मनि सम्पूर्णे निविडे चैकरूपिणि ॥ ४८ ॥
यथा हि भिन्नं नगरं सर्वथा नोपपद्यते ।
तथा पूर्णेऽस्तु निविडे चैकरूपे चिदात्मनि ॥ ४९ ॥
जगत् सर्वात्मना नैव ह्युपपत्तिं समश्नुते ।
आकाशस्त्ववकाशात्मा शून्यरूपत्वहेतुतः ॥ ५० ॥
द्वैतं जगत् प्रसहते सर्वत्रैव हि सर्वदा ।
सती चितिरशून्यात्मरूपिण्येकरसा कथम् ॥ ५१ ॥
द्वितीयलेशं प्रसहेदादर्शात्मवदञ्जसा ।
तस्मादादर्शवत् संवित् स्वातन्त्र्यभरवैभवात् ॥ ५२ ॥
भासयेदद्वितीये स्वे रूपे सर्वं चराचरम् ।
दर्पणमें दीखनेवाले नगर आदि जैसे दर्पणसे अभिन्न होते हैं वैसे
ही सम्पूर्ण भास्यवर्ग अपने भासकसे अभिन्न है। दर्पणका नगर जैसे
दर्पणसे भिन्न नहीं होता वैसे ही जिस जगत्को चिति प्रकाशित करती है
वह चितिसे भिन्न नहीं है ॥ ४७-४८ पू० ॥
जिस प्रकार एकरूप घनीभूत एवं सम्पूर्ण ( अवकाशहीन ) दर्पणसे
भिन्न उसमें प्रतिबिम्बित नगरकी सत्ता किसी प्रकार सम्भव नहीं है,
उसी प्रकार एकरूप, घनीभूत एवं परिपूर्ण चिदात्मामें जगत्की पृथक्
सत्ता किसी प्रकार नहीं हो सकती ॥ ४८ उ०-५० पू० ॥
आकाश तो अवकाशरूप और शून्यात्मक है, अतः उसमें तो सर्वदा
सर्वत्र ही द्वैतरूप जगत् समा सकता है ॥ ५० उ०-५१ पू० ॥
किन्तु सत्यरूपा चिति, जो अशून्यात्मा एकरूपिणी और एक-
रसा है, स्वभावसे ही दर्पणके समान किस प्रकार लेशमात्र द्वैतको
भी सहन कर सकती है ? ॥ ५१ उ०-५२ पू० ॥
अतः वह चित् शक्ति अपने स्वातन्त्र्यरूप सामर्थ्यके प्रभावसे
दर्पणके समान अपने ही अद्वितीय स्वरूपमें इस सम्पूर्ण चराचर

चतुर्दशोऽध्यायः । १६६
निमित्तोपादानहीनं द्वितीयमतिचित्रितम् ॥ ५३ ॥
यथाऽनेकरूपविधे भासमानेऽपि दर्पणे ।
एकत्वं भासते स्पष्टमविशेषाददूषितम् ॥ ५४ ॥
तथा विचित्रे जगति भासमानेऽप्यनेकधा ।
अनुसन्धानसंसिद्धमेकं दोषविवर्जितम् ॥ ५५ ॥
राजन् स्वात्मनि सम्पश्य मनोराज्यदशास्थितिम् ।
अनेकवैचित्र्यवपुरपि चैतन्यमात्रकम् ॥ ५६ ॥
सृष्टौ वा प्रलये वाऽपि निर्विकल्पैव सा चितिः ।
प्रतिबिम्बस्य भावे वाऽप्यभावे वेव दर्पणः ॥ ५७ ॥
एवंविधैकरूपाऽपि चितिः स्वातन्त्र्यहेतुतः ।
स्वान्तर्विभासयेद्वाह्यमादर्शे गगनं यथा ॥ ५८ ॥
एषा हि प्रथमा सृष्टिरविद्या तम उच्यते ।
द्वैतको, जिसका कोई निमित्त या उपादान कारण नहीं है और जो
परस्पर अत्यन्त विलक्षण है, भासित कर रही है ॥ ५२ उ०-५३ ॥
जिस प्रकार [ प्रतिबिम्बके कारण ] अनेकरूप प्रतीत होनेवाले
दर्पणमें अपने सामान्यरूपसे अबाधित एकत्व स्पष्ट भासता है, उसी
प्रकार [ जाग्रदादि अवस्थाओंके कारण ] यह विचित्र जगत् अनेक-
रूपसे भासित होनेपर भी, इसमें किसी प्रकार भी बाधित न
होनेवाला एक तत्त्व सिद्ध है ही, क्योंकि इसकी विभिन्न अवस्थाओंका
एक ही के द्वारा स्मरण होता है ॥ ५४-५५ ॥
राजन् ! तुम अपनेमें ही अपने मनोराज्यके समयकी स्थितिका
विचार करो। वह अनेक प्रकारके रूपोंवाली होनेपर भी वास्तवमें
चैतन्यमात्र ही तो होती है ॥ ५६ ॥
वह चिति, सृष्टि हो अथवा प्रलय, निर्विकल्पा ही रहती है, जैसे
प्रतिबिम्ब हो अथवा न हो दर्पण शुद्ध ही रहता है ॥ ५७ ॥
इस प्रकार एकरूपा होकर भी यह चिति अपने स्वातन्त्र्यके कारण
दर्पणमें आकाशके समान अपने आन्तरिक स्वरूपको ही बाह्यरूपसे
भासित करती है ॥ ५८ ॥
यही पहली सृष्टि है, यह अविद्या या तम कही जाती है ।