त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः । १६६
निमित्तोपादानहीनं द्वितीयमतिचित्रितम् ॥ ५३ ॥
यथाऽनेकरूपविधे भासमानेऽपि दर्पणे ।
एकत्वं भासते स्पष्टमविशेषाददूषितम् ॥ ५४ ॥
तथा विचित्रे जगति भासमानेऽप्यनेकधा ।
अनुसन्धानसंसिद्धमेकं दोषविवर्जितम् ॥ ५५ ॥
राजन् स्वात्मनि सम्पश्य मनोराज्यदशास्थितिम् ।
अनेकवैचित्र्यवपुरपि चैतन्यमात्रकम् ॥ ५६ ॥
सृष्टौ वा प्रलये वाऽपि निर्विकल्पैव सा चितिः ।
प्रतिबिम्बस्य भावे वाऽप्यभावे वेव दर्पणः ॥ ५७ ॥
एवंविधैकरूपाऽपि चितिः स्वातन्त्र्यहेतुतः ।
स्वान्तर्विभासयेद्वाह्यमादर्शे गगनं यथा ॥ ५८ ॥
एषा हि प्रथमा सृष्टिरविद्या तम उच्यते ।
द्वैतको, जिसका कोई निमित्त या उपादान कारण नहीं है और जो
परस्पर अत्यन्त विलक्षण है, भासित कर रही है ॥ ५२ उ०-५३ ॥
जिस प्रकार [ प्रतिबिम्बके कारण ] अनेकरूप प्रतीत होनेवाले
दर्पणमें अपने सामान्यरूपसे अबाधित एकत्व स्पष्ट भासता है, उसी
प्रकार [ जाग्रदादि अवस्थाओंके कारण ] यह विचित्र जगत् अनेक-
रूपसे भासित होनेपर भी, इसमें किसी प्रकार भी बाधित न
होनेवाला एक तत्त्व सिद्ध है ही, क्योंकि इसकी विभिन्न अवस्थाओंका
एक ही के द्वारा स्मरण होता है ॥ ५४-५५ ॥
राजन् ! तुम अपनेमें ही अपने मनोराज्यके समयकी स्थितिका
विचार करो। वह अनेक प्रकारके रूपोंवाली होनेपर भी वास्तवमें
चैतन्यमात्र ही तो होती है ॥ ५६ ॥
वह चिति, सृष्टि हो अथवा प्रलय, निर्विकल्पा ही रहती है, जैसे
प्रतिबिम्ब हो अथवा न हो दर्पण शुद्ध ही रहता है ॥ ५७ ॥
इस प्रकार एकरूपा होकर भी यह चिति अपने स्वातन्त्र्यके कारण
दर्पणमें आकाशके समान अपने आन्तरिक स्वरूपको ही बाह्यरूपसे
भासित करती है ॥ ५८ ॥
यही पहली सृष्टि है, यह अविद्या या तम कही जाती है ।