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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 208

१६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
यथा पित्तप्रदुष्टाक्षो बहिः पीतं प्रपश्यति ।
यथा तैमिरिकोऽन्यस्तु पश्यत्येकं द्विधा स्थितम् ॥ २५ ॥
एवं विचित्रदुष्टाक्षाः पश्यन्ति विविधं जगत् ।
अस्ति पूर्वसमुद्रस्य मध्ये करण्डकाह्वयः ॥ २६ ॥
द्वीपस्तत्र जना भावान् रक्तान् पश्यन्ति वै सदा ।
एवं रमणकद्वीपे सदा पश्यन्ति वै जनाः ॥ २७ ॥
व्यत्यस्तमूर्ध्वाधरतो निखिलं भावमण्डलम् ।
एवमन्येषु द्वीपेषु विविधा भावमण्डलम् ॥ २८ ॥
जना नेत्रस्वभावेन पश्यन्ति खलु सर्वदा ।
तत्र तेषामन्यथा तु दृश्यते यदि कुत्रचित् ॥ २९ ॥
नेत्रं सुसाध्यौषधेन पश्यन्ति प्राग्वदेव हि ।
अतस्तु चक्षुषा यावद् दृश्यते जगतीतले ॥ ३० ॥
तावद्द्रवेच्चाक्षुषोंऽशः पीतवत् पीतचक्षुषः ।
जिस प्रकार पित्तदोषयुक्त नेत्र बाहर पीला ही पीला देखते हैं वैसे
ही तिमिर दोषवाले नेत्रोंको एक ही वस्तु दो दिखायी देती है। इसी
तरह और भी तरह-तरहके दोषोंसे दूषित नेत्रोंवाले जगत्को तरह-
तरहका देखते हैं ॥ २५-२६ पू० ॥
पूर्व समुद्रमें करण्डक नामका एक द्वीप है। वहाँ सब पदार्थोंको
लोग सर्वदा लाल रंगका ही देखते हैं ॥ २६ उ०-२७ पू० ॥
इसी तरह रमणक द्वीपमें सब लोग सब पदार्थोंको उल्टे-नीचेकी
ओर सिर और ऊपरकी ओर पैरवाले देखते हैं ॥ २७ उ०-२८ पू० ॥
इसी प्रकार अन्य द्वीपोंमें भी तरह-तरहके लोग अपने नेत्रोंके स्वभा-
वानुसार ही सर्वदा सब पदार्थोंको देखा करते हैं ॥ २८ उ०-२६ पू० ॥
यहाँ उन्हें यदि कोई वस्तु कहीं दूसरे प्रकारसे दिखायी देती है तो
वे ओषधिके द्वारा अपने नेत्रोंको ठीक करके उसे पहले ही की तरह
देखने लगते हैं ॥ २६ उ०-३० पू० ॥
अतः संसारमें नेत्रके द्वारा जो कुछ देखा जाता है वह, पीलिया रोग-
ग्रस्त नेत्रोंसे दिखायी देनेवाले पीलेपन की तरह, उस नेत्रका ही अंश
होता है ॥ ३० उ०-३१ पू० ॥