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तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

अध्याय - ७
[ क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानानि ] क्रोधप्रत्याख्यान,
लोभप्रत्याख्यान, भीरुत्वप्रत्याख्यान, हास्यप्रत्याख्यान अर्थात्
क्रोध का त्याग करना, लोभ का त्याग करना, भय का त्याग
करना, हास्य का त्याग करना [ अनुवीचिभाषणं च ] और
शास्त्र की आज्ञानुसार निर्दोष वचन बोलना [ पञ्च ] ये पाँच
सत्यव्रत की भावनायें हैं।
Giving up anger, greed, cowardice or fearfulness,
and jest, and speaking harmless words are five.
शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्ष्यशुद्धि-
सधर्माविसंवादाः पञ्च ॥६॥
[ शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्ष्यशुद्धि-
सधर्माविसंवादाः ] शून्यागारवास- पर्वतों की गुफा, वृक्ष की
पोल इत्यादि निर्जन स्थानों में रहना, विमोचितावास- दूसरों के
द्वारा छोड़े गये स्थान में निवास करना, किसी स्थान पर रहते
हुये दूसरों को न हटाना तथा यदि कोई अपने स्थान में आवे
तो उसे न रोकना, शास्त्रानुसार भिक्षा की शुद्धि रखना और
साधर्मियों के साथ यह मेरा है-यह तेरा है ऐसा क्लेश न
करना [ पञ्च ] ये पाँच अचौर्यव्रत की भावनायें हैं।
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अध्याय ६: आस्रव तत्व व कर्म बन्ध के कारण

अध्याय - ७
Residence in a solitary place, residence in a
deserted habitation, causing no hindrance to
others, acceptance of clean food, and not
quarrelling with brother monks, are five.
—————
स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहरांगनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरण-
वृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्यागाः पञ्च ॥७॥
[ स्त्रीरागकथाश्रवणत्यागः ] स्त्रियों में राग बढ़ाने वाली कथा
सुनने का त्याग, [ तन्मनोहरांगनिरीक्षणत्यागः ] उनके मनोहर
अंगों को निरखकर देखने का त्याग, [ पूर्वरतानुस्मरणत्यागः ]
अव्रत अवस्था में भोगे हुए विषयों के स्मरण का त्याग,
[ वृष्येष्टरसत्यागः ] कामवर्धक गरिष्ठ रसों का त्याग और
[ स्वशरीरसंस्कारत्यागः ] अपने शरीर के संस्कारों का त्याग
[ पञ्च ] ये पाँच बह्मचर्य व्रत की भावनायें हैं।
Giving up listening to stories that excite
attachment for women, looking at the beautiful
bodies of women, recalling former sexual pleasure,
delicacies stimulating amorous desire, and
adornment of the body, constitutes five.
—————
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अध्याय - ७
मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पञ्च ॥८॥
[ मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि ] स्पर्शन आदि
पाँचों इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट विषयों के प्रति राग-द्वेष का
त्याग करना [ पञ्च ] सो पाँच परिग्रहत्यागव्रत की भावनायें हैं।
Giving up attachment and aversion for agreeable
and disagreeable objects of the five senses
constitutes five.
हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् ॥९॥
[ हिंसादिषु ] हिंसा आदि पाँच पापों से [ इह अमुत्र ] इस
लोक में तथा परलोक में [ अपायावद्यदर्शनम् ] नाश की
(दुःख, आपत्ति, भय तथा निंद्यगति की) प्राप्ति होती है -
ऐसा बारम्बार चिन्तवन करना चाहिये।
The consequences of violence etc. are calamity and
reproach in this world and in the next.
दुःखमेव वा ॥१०॥
[ वा ] अथवा ये हिंसादिक पाँच पाप [ दुःखमेव ] दुःखरूप
ही हैं - ऐसा विचारना।
Or sufferings only (result from injury etc.).
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अध्याय - ७
मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थानि च सत्त्वगुणाधिक-
क्लिश्यमानाविनेयेषु ॥११॥
[ सत्त्वेषु मैत्री ] प्राणीमात्र के प्रति निर्वैर बुद्धि [ गुणाधिकेषु
प्रमोदं ] अधिक गुणवानों के प्रति प्रमोद (हर्ष)
[ क्लिश्यमानेषु कारुण्यं ] दुःखी-रोगी जीवों के प्रति करुणा
और [ अविनेयेषु माध्यस्थ्यं ] हठाग्रही मिथ्यादृष्टि जीवों के
प्रति माध्यस्थ भावना - ये चार भावना अहिंसादि पाँच व्रतों
की स्थिरता के लिये बारम्बार चिन्तवन करने योग्य हैं।
Benevolence towards all living beings, joy at the
sight of the virtuous, compassion and sympathy for
the afflicted, and tolerance towards the insolent
and ill-behaved.
जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम् ॥१२॥
[ संवेगवैराग्यार्थम् ] संवेग अर्थात् संसार का भय और वैराग्य
अर्थात् राग-द्वेष का अभाव करने के लिये
[ जगत्कायस्वभावौ वा ] क्रम से संसार और शरीर के
स्वभाव का चिन्तवन करना चाहिये।
Or the nature of mundane existence (the universe)
and the body (may also be contemplated) in order
to cultivate awe at the misery of worldly existence
and detachment to worldly things.
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अध्याय - ७
प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा ॥१३॥
[ प्रमत्तयोगात् ] कषाय-राग-द्वेष अर्थात् अयत्नाचार
(असावधानी-प्रमाद) के सम्बन्ध से अथवा प्रमादी जीव के
मन-वचन-काय योग से [ प्राणव्यपरोपणं ] जीव के
भाव-प्राण का, द्रव्य-प्राण का अथवा इन दोनों का वियोग
करना सो [ हिंसा ] हिंसा है।
The severance of vitalities out of passion is injury.
असदभिधानमनृतम् ॥१४॥
प्रमाद के योग से [ असदभिधानं ] जीवों को दुःखदायक
अथवा मिथ्यारूप वचन बोलना सो [ अनृतम् ] असत्य है।
Speaking what is not commendable is falsehood.
अदत्तादानं स्तेयम् ॥१५॥
प्रमाद के योग से [ अदत्तादानं ] बिना दी हुई किसी भी
वस्तु को ग्रहण करना सो [ स्तेयम् ] चोरी है।
Taking anything that is not given is stealing.
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अध्याय - ७
मैथुनमब्रह्म ॥१६॥
[ मैथुनमब्रह्म ] जो मैथुन है सो अब्रह्म अर्थात् कुशील है।
मूर्च्छा परिग्रहः ॥१७॥
[ मूर्च्छा परिग्रहः ] जो मूर्च्छा है सो परिग्रह है।
निश्शल्यो व्रती ॥१८॥
[ व्रती ] व्रती जीव [ निःशल्यः ] शल्य रहित ही होता है।
अगार्यनगारश्च ॥१९॥
[ अगारी ] अगारी अर्थात् सागार (गृहस्थ) [ अनगारः च ]
और अनगार (गृहत्यागी भावमुनि) इस प्रकार व्रती के दो भेद
हैं।
नोट- निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञानपूर्वक महाव्रतों को पालने वाले
मुनि अनगारी कहलाते हैं और देशव्रत को पालने वाले श्रावक
सागारी कहलाते हैं।
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अध्याय - ७
The householder and the homeless ascetic are the
two kinds of votaries.
अणुव्रतोऽगारी ॥२०॥
[ अणुव्रतः ] अणुव्रत अर्थात् एकदेश व्रत पालनेवाले
सम्यग्दृष्टि जीव [ अगारी ] सागार कहे जाते हैं।
One who observes the small vows is a householder.
दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिकप्रोषधोपवासोपभोग-
परिभोगपरिमाणातिथिसंविभागव्रतसंपन्नश्च ॥२१॥
[ च ] और फिर वे व्रत [ दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिक-
प्रोषधोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसंविभाग-
व्रतसंपन्नः ] दिग्व्रत, देशव्रत तथा अनर्थदण्डव्रत ये तीन
गुणव्रत और सामायिक, प्रोषधोपवास, उपभोग-परिभोग
परिमाण (मर्यादा) तथा अतिथिसंविभागव्रत ये चार शिक्षाव्रत
सहित होते हैं अर्थात् व्रतधारी श्रावक पाँच अणुव्रत, तीन
गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत, इन बारह व्रतों सहित होता है।
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अध्याय - ७
Abstaining from activity with regard to directions,
country, and purposeless sin, periodical
concentration, fasting at regular intervals, limiting
consumable and non-consumable things, and
partaking of one’s food after feeding an ascetic, are
the minor or supplementary vows.
मारणान्तिकीं सल्लेखनां जोषिता ॥२२॥
व्रतधारी श्रावक [ मारणान्तिकीं ] मरण के समय होने वाली
[ सल्लेखनां ] सल्लेखना को [ जोषिता ] प्रीतिपूर्वक सेवन
करें।
The householder courts voluntary death at the end
of his life.
शंकाकांक्षाविचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः
सम्यग्दृष्टेरतीचाराः ॥२३॥
[ शंकाकांक्षाविचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः ] शंका,
कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यदृष्टि की प्रशंसा और अन्यदृष्टि का
संस्तव - ये पाँच [ सम्यग्दृष्टेः अतिचाराः ] सम्यग्दर्शन के
अतिचार हैं।
102

अध्याय - ७
Doubt in the teachings of the Jina, desire for
worldly enjoyment, repugnance or disgust at the
afflicted, admiration for the knowledge and conduct
of the wrong believer, and praise of wrong
believers, are the five transgressions of the right
believer.
व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् ॥२४॥
[ व्रतशीलेषु ] व्रत और शीलों में भी [ यथाक्रमं ] अनुक्रम
से प्रत्येक में [ पञ्च पञ्च ] पाँच-पाँच अतिचार हैं।
There are five, five transgressions respectively for
the vows and the supplementary vows.
बन्धवधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः ॥२५॥
[ बन्धवधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः ] बन्ध, वध,
छेद, अधिक भार लादना और अन्न-पान का निरोध करना -
ये पाँच अहिंसाणुव्रत के अतिचार हैं।
Binding, beating, mutilating limbs, overloading,
and withholding food and drink.
103

अध्याय - ७
मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहार-
साकारमन्त्रभेदाः ॥२६॥
[ मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहार-
साकारमन्त्रभेदाः ] मिथ्या उपदेश, रहोभ्याख्यान,
कूटलेखाक्रिया, न्यासापहार और साकारमन्त्रभेद - ये पाँच
सत्याणुव्रत के अतिचार हैं।
Perverted teaching, divulging what is done in
secret, forgery, misappropriation, and proclaiming
others’ thoughts.
स्तेनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिक-
मानोन्मानप्रतिरूपकव्यवहाराः ॥२७॥
चोरी के लिये चोर को प्रेरणा करना या उसका उपाय बताना,
चोर से चुराई हुई वस्तु खरीदना, राज्य की आज्ञा के विरुद्ध
चलना, देने-लेने के बाँट तराजू आदि कम-ज्यादा रखना और
कीमती वस्तु में कम कीमत की वस्तु मिलाकर असली भाव
से बेचना - ये अचौर्याणुव्रत के अतिचार हैं।
Prompting others to steal, receiving stolen goods,
under-buying in a disordered state, using false
weights and measures, and deceiving others with
artificial or imitation goods.
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अध्याय - ७
परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीताऽपरिगृहीता-
गमनानंगक्रीड़ाकामतिव्राभिनिवेशाः ॥२८॥
दूसरे के पुत्र-पुत्रियों का विवाह करना-कराना, पति-सहित
व्यभिचारिणी स्त्रियों के पास आना-जाना, लेन-देन रखना,
रागभाव पूर्वक बात-चीत करना, पति-रहित व्यभिचारिणी स्त्री
(वेश्यादि) के यहाँ आना-जाना, लेन-देन आदि का व्यवहार
रखना, अनंगक्रीड़ा अर्थात् कामसेवन के लिये निश्चित् अंगों
को छोड़कर अन्य अंगों से कामसेवन करना और कामसेवन
की तीव्र अभिलाषा - ये पाँच ब्रह्मचर्या वृत के
अतिचार हैं।
Bringing about marriage, intercourse with an
unchaste married woman, cohabitation with a
harlot, perverted sexual practices, and excessive
sexual passion.
क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्य-
प्रमाणातिक्रमाः ॥२९॥
[ क्षेत्रवास्तुप्रमाणातिक्रमाः ] क्षेत्र और रहने के स्थान के
परिमाण का उल्लंघन करना, [ हिरण्यसुवर्णप्रमाणातिक्रमाः ]
चाँदी और सोने के परिमाण का उल्लंघन करना,
[ धनधान्यप्रमाणातिक्रमाः ] धन (पशु आदि) तथा धान्य के
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अध्याय - ७
परिमाण का उल्लंघन करना, [ दासीदासप्रमाणातिक्रमाः ]
दासी और दास के परिमाण का उल्लंघन करना तथा
[ कुप्यप्रमाणातिक्रमाः ] वस्त्र, बर्तन आदि के परिमाण का
उल्लंघन करना - ये पाँच अपरिग्रह अणुव्रत के अतिचार हैं।
Exceeding the limits set by oneself with regard to
cultivable lands and houses, riches such as gold and
silver, cattle and corn, men and women servants,
and clothes.
ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ॥३०॥
[ ऊर्ध्वव्यतिक्रमः ] माप से अधिक ऊंचाई वाले स्थलों में
जाना, [ अधःव्यतिक्रमः ] माप से नीचे (कुँआ, खान आदि)
स्थानों में उतरना, [ तिर्यग्व्यतिक्रमः ] समान स्थान के माप
से बहुत दूर जाना, [ क्षेत्रवृद्धिः ] की हुई मर्यादा में क्षेत्र को
बढ़ा लेना और [ स्मृत्यन्तराधानं ] क्षेत्र की की हुई मर्यादा को
भूल जाना - ये पाँच दिग्व्रत के अतिचार हैं।
Exceeding the limits set in the directions, namely
upwards, downwards and horizontally, enlarging
the boundaries in the accepted directions, and
forgetting the boundaries set, are the five
transgressions of the minor vow of direction.
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अध्याय - ७
आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः ॥३१॥
[ आनयनं ] मर्यादा से बाहर की चीज को मंगाना,
[ प्रेष्यप्रयोगः ] मर्यादा से बाहर नौकर आदि को भेजना,
[ शब्दानुपातः ] खांसी, शब्द आदि से मर्यादा के बाहर जीवों
को अपना अभिप्राय समझा देना, [ रूपानुपातः ] अपना रूप
आदि दिखाकर मर्यादा के बाहर के जीवों को इशारा करना
और [ पुद्गलक्षेपाः ] मर्यादा के बाहर कंकर, पत्थर आदि
फेंककर अपने कार्य का निर्वाह कर लेना - ये पाँच देशव्रत
के अतिचार हैं।
Sending for something outside the country of one’s
resolve, commanding someone there to do thus,
indicating one’s intentions by sounds, by showing
oneself, and by throwing clod etc.


कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोग-
परिभोगानर्थक्यानि ॥३२॥
[ कन्दर्प ] राग से हास्यसहित अशिष्ट वचन बोला,
[ कौत्कुच्यं ] शरीर की कुचेष्टा करके अशिष्ट वचन बोलना,
[ मौखर्यं ] धृष्टतापूर्वक जरूरत से ज्यादा बोलना,
[ असमीक्ष्याधिकरणं ] बिना प्रयोजन मन, वचन, काय की
•••••••••••••••••••••••••
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अध्याय - ७
प्रवृत्ति करना और [ उपभोग-परिभोगानर्थक्यं ] भोग-उपभोग
के पदार्थों का जरूरत से ज्यादा संग्रह करना - ये पाँच
अनर्थदंडव्रत के अतिचार हैं।
Vulgar jokes, vulgar jokes accompanied by
gesticulation, garrulity, unthinkingly indulging in
too much action, keeping too many consumable and
non-consumable objects, are the five transgressions
of the vow of desisting from unnecessary sin.
योगदुष्प्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥३३॥
[ योगदुष्प्रणिधानं ] मन सम्बन्धी परिणामों की अन्यथा प्रवृत्ति
करना, वचन सम्बन्धी परिणामों की अन्यथा प्रवृत्ति करना,
काय सम्बन्धी परिणामों की अन्यथा प्रवृत्ति करना,
[ अनादर ] सामायिक के प्रति उत्साह रहित होना,
[ स्मृत्यनुपस्थानं ] एकाग्रता के अभाव को लेकर सामायिक
के पाठ आदि भूल जाना - ये पाँच सामायिक शिक्षाव्रत के
अतिचार हैं।
Misdirected three-fold activity, lack of earnestness,
and fluctuation of thought, are the five
transgressions of concentration.
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अध्याय - ७
अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादान-
संस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥३४॥
[ अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणानादर-
स्मृत्यनुपस्थानानि ] बिना देखी, बिना शोधी जमीन में
मल-मूत्रादि क्षेपण करना, बिना देखे, बिना शोधे पूजन के
उपकरण ग्रहण करना, बिना देखे, बिना शोधे जमीन पर
चटाई, वस्त्र आदि बिछाना, भूख आदि से व्याकुल हो
आवश्यक धर्म-कार्य उत्साह-रहित होकर करना और
आवश्यक धर्म-कार्यों को भूल जाना - ये पाँच प्रोषधोपवास
शिक्षाव्रत के अतिचार हैं।
Excreting, handling sandalwood paste, flowers etc.,
and spreading mats and garments without
inspecting and cleaning the place and the
materials, lack of earnestness, and lack of
concentration.
सचित्तसम्बन्धसम्मिश्राभिषवदुःपक्वाहाराः ॥३५॥
1- सचित्त-जीववाले (कच्चे फल आदि) पदार्थ, 2- सचित्त
पदार्थ के साथ सम्बन्ध वाले पदार्थ, 3- सचित्त पदार्थ से
मिले हुये पदार्थ, 4- अभिषव - गरिष्ठ पदार्थ, और
5- दुःपक्व अर्थात् आधे पके या अधिक पके हुए या बुरी
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अध्याय - ७
तरह से पके पदार्थ - इनका आहार करना - ये पाँच
उपभोग-परिभोग परिमाण शिक्षाव्रत के अतिचार हैं।
Victuals containing (one-sensed) organisms, placed
near organisms, mixed with organisms, stimulants,
and ill-cooked food.
सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः
॥३६॥
[ सचित्तनिक्षेपः ] सचित्त पत्र आदि में रखकर भोजन देना,
[ सचित्तापिधानं ] सचित्त पत्र आदि से ढके हुये भोजन
आदि को देना [ परव्यपदेशः ] दूसरे दातार की वस्तु को देना
[ मात्सर्य ] अनादरपूर्वक देना अथवा दूसरे दातार की वस्तु
को ईर्ष्यापूर्वक देना और [ कालातिक्रमः ] योग्य काल का
उल्लंघन करके देना - ये पाँच अतिथिसंविभाग शिक्षाव्रत के
अतिचार हैं।
Placing the food on things with organisms such as
green leaves, covering it with such things, food of
another host, envy, and untimely food.
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अध्याय - ७
जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि ॥३७॥
[ जीविताशंसा ] सल्लेखना धारण करने के बाद जीने की
इच्छा करना, [ मरणाशंसा ] वेदना से व्याकुल होकर शीघ्र
मरने की इच्छा करना, [ मित्रानुरागः ] अनुराग के द्वारा मित्रों
का स्मरण करना, [ सुखानुबन्ध ] पहले भोगे हुये सुखों का
स्मरण करना और [ निदानं ] निदान करना अर्थात् आगामी
विषय-भोगों की वांछा करना - ये पाँच सल्लेखनाव्रत के
अतिचार हैं।
Desire for life, desire for death, recollection of
affection for friends, recollection of pleasures, and
constant longing for enjoyment.
अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् ॥३८॥
[ अनुग्रहार्थं ] अनुग्रह-उपकार के हेतु से [ स्वस्यातिसर्गः ]
धन आदि अपनी वस्तु का त्याग करना सो [ दानं ] दान है।
Charity is the giving of one’s wealth to another for
mutual benefit.
विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेषः ॥३९॥
[ विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात् ] विधि, द्रव्य, दातृ और पात्र
की विशेषता से [ तद्विशेषः ] दान में विशेषता होती है।
111

अध्याय - ७
The distinction with regard to the effect of a gift
consists in the manner, the thing given, the nature
of the giver, and the nature of the recipient.
॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥
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अध्याय ७: पञ्च महाव्रत, अणुव्रत व शीलाचरण

अध्याय - ८
अथ अष्टमोऽध्यायः
Bondage of Karma
मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः ॥१॥
[ मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगाः ] मिथ्यादर्शन,
अविरति, प्रमाद, कषाय और योग - ये पाँच [ बंधहेतवः ]
बन्ध के कारण हैं।
Wrong belief, non-abstinence, negligence, passions,
and activities are the causes of bondage.
सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्ते स
बन्धः ॥२॥
[ जीवः सकषायत्वात् ] जीव कषायसहित होने से [ कर्मणः
योग्यान्पुद्गलान् ] कर्म के योग्य पुद्गल परमाणुओं को
[ आदत्ते ] ग्रहण करता है [ स बन्धः ] वह बन्ध है।
The individual self attracts particles of matter
which are fit to turn into karma, as the self is
actuated by passions. This is bondage.
प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशास्तद्विधयः ॥३॥
[ तत् ] उस बन्ध के [ प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशाः ]
प्रकृतिबन्ध, स्थितिबन्ध, अनुभागबन्ध और प्रदेशबन्ध
[ विधयः ] ये चार भेद हैं।
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अध्याय - ८
Bondage is of four kinds according to the nature or
species of karma, duration of karma, fruition of
karma, and the quantity of space-points of karma.
आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नाम-
गोत्रान्तरायाः ॥४॥
[ आद्यो ] पहला अर्थात् प्रकृतिबन्ध [ ज्ञानदर्शनावरण-
वेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाः ] ज्ञानावरण, दर्शनावरण,
वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय - इन आठ
प्रकार का है।
The type-bondage is of eight kinds, knowledge-
obscuring, perception-obscuring, feeling-producing,
deluding, life-determining, name-determining
(physique-making), status-determining, and
obstructive karmas.
पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदा
यथाक्रमम् ॥५॥
[ यथाक्रमम् ] उपरोक्त ज्ञानावरणादि आठ कर्मों के अनुक्रम
से [ पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदाः ]
पाँच, नव, दो, अट्ठाईस, चार, ब्यालीस, दो और पाँच
भेद हैं।
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