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तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

६० तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः
यस्य साध्याभावः प्रमाणान्तरेण निश्चितः, स बाधितः । यथा-
वह्निरनुष्णो द्रव्यत्वादिति । अत्रानुष्णत्वं साध्यं, तदभाव उष्णत्वं
स्पर्शनप्रत्यक्षेण गृह्यत इति बाधितत्वम् ।
जिस हेतु के साध्य का अभाव प्रत्यक्षादि प्रमाणान्तर से पक्ष में निश्चित हो,
वह हेतु बाधितनामक हेत्वाभास है । जैसे— "वह्निरनुष्णो द्रव्यत्वात्" इस अनुमान
में द्रव्यत्व-हेतु बाधित है । क्योंकि यहाँ अग्नि में अनुष्णत्व (उष्णत्वाभाव) साध्य
है, और उष्णत्वाभाव का अभाव उष्णत्व स्पर्शनप्रत्यक्ष से सभी को अग्नि में गृहीत
होता है । इसलिये यहाँ का द्रव्यत्व-हेतु बाधितनामक हेत्वाभास होगा ।
॥ इत्यनुमानपरिच्छेदः ॥
न्यायबोधिनी
फलम् । तथाच धूमाभाववद्वृत्तित्वाभावरूपधूमव्यभिचारे गृहीते वह्नौ
धूमाभाववद्वृत्तित्वरूपव्याप्तिज्ञानप्रतिबन्धः फलम् ।
न च व्याप्यत्वासिद्धेः व्यभिचारादभेद इति वाच्यम्, धूमाभाववद्वृत्ति-
त्वाभावाभावत्वेन व्याप्यत्वासिद्धत्वं, धूमाभाववद्वृत्तित्वेन व्यभिचारित्व-
मिति भेदात् ।
यस्येति । यस्य हेतोः साध्याभावः—साध्यबाधः, प्रमाणान्तरेण—प्रत्य-
क्षादिप्रमाणेन पक्षे निश्चितः, स बाधित इत्यर्थः । तथा च प्रात्यक्षिकसाध्य-
बाधनिश्चये जाते साध्यानुमितिप्रतिबन्धः फलम् । बाधितसाध्यकत्वाद्
बाधितहेतुरित्युच्यते ।
॥ इति न्यायबोधिन्यामनुमानपरिच्छेदः ॥
हिन्दी-कला
वृत्तित्वाभावरूप धूम-व्यभिचार का ग्रहण होने पर धूमाभाववद्वृत्तित्वरूप व्याप्ति के
ज्ञान का प्रतिबन्ध हो जाना व्याप्यत्वासिद्धि-हेत्वाभास का फल है ।
यहाँ यह आपत्ति नहीं दी जा सकती कि "व्याप्यत्वासिद्धि का व्यभिचार के साथ
अभेद हो गया" क्योंकि धूमाभाववद्वृत्तित्वाभावाभावत्व रूप से व्याप्यत्वासिद्धि होती
है । यही दोनों में भेद है ।
जिस हेतु का साध्याभाव अर्थात् साध्य का बाध प्रत्यक्षादि-प्रमाण से पक्ष में पहले
से ही निश्चित है, वह हेतु बाधित कहाता है । अतः प्रत्यक्ष-प्रमाण से साध्य के बाध
का निश्चय होने पर साध्या नुमिति का प्रतिबन्ध हो जाता है । यही बाधज्ञान का
फल है । यद्यपि साध्य ही बाधित होता है, फिर भी उपचार से हेतु को बाधित कहा
जाता है ।
इति तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कलायाम्' अनुमानपरिच्छेदः ।

अथोपमानपरिच्छेदः
उपमितिकरणमुपमानम् । संज्ञासंज्ञिसम्बन्धज्ञानमुपमितिः,
तत्करणं सादृश्यज्ञानम् । तथाहि—कश्चिद् गवयपदार्थमजानन्
कुतश्चिदारण्यकपुरुषात् 'गोसदृशो गवय' इति श्रुत्वा वनं गतो
वाक्यार्थं स्मरन् गोसदृशं पिण्डं पश्यति । तदनन्तरमसौ गवयशब्द-
वाच्य इत्युपमितिरुत्पद्यते ।
उपमितिनामक प्रमा का करण उपमान प्रमाण है । संज्ञा-संज्ञि के सम्बन्ध का
ज्ञान उपमिति है । उसका करण ( असाधारण कारण ) सादृश्यज्ञान है । जैसे -- कोई
व्यक्ति गवयपदार्थ को नहीं जानता हुआ किसी वनवासी व्यक्ति से यह सुनकर कि—
गो के सदृश गवय होता है--वन में गया और वहाँ गोसदृश गवय होता है, इस
वाक्यार्थ का स्मरण करता हुआ गोसदृश पिण्ड को देखता है । उसके बाद वह
दृश्यमान जानवर 'गवयशब्दवाच्य है' ऐसी उपमिति उत्पन्न हो जाती है ।
॥ इत्युपमानपरिच्छेदः ॥
न्यायबोधिनी
उपमानं लक्षयति—उपमितिकरणमिति । उपमिति लक्षयति—संज्ञा-
संज्ञीति । संज्ञा नाम पदम्, संज्ञी अर्थः, तयोः सम्बन्धः शक्तिः । तथा च पद-
पदार्थसम्बन्धज्ञानमुपमितिरित्यर्थः । उपमानं नामातिदेशवाक्यार्थज्ञानम् ।
अतिदेशवाक्यार्थस्मरणं व्यापारः । उपमितिः फलम् । गोसदृशो गवयपद-
वाच्य इत्याकारकवाक्याद् गोसादृश्यावच्छिन्नविशेष्यकगवयपदवाच्यत्वप्रका-
रेण यज्ज्ञानं जायते, तदेव करणम् ।
॥ इति न्यायबोधिन्यामुपमानपरिच्छेदः ॥
हिन्दी-कला
उपमिति के करण को उपमान-प्रमाण कहते हैं । संज्ञा और संज्ञी के सम्बन्ध का
ज्ञान ही उपमिति है । संज्ञा = पद और संज्ञी = अर्थ कहाता है । इन दोनों का अर्थात्
पद और उसके अर्थ का सम्बन्ध शक्ति है । इस प्रकार पद-पदार्थ के सम्बन्ध ( शक्ति )
का ज्ञान उपमिति है । "गोसदृशो गवयपदवाच्यः" इस अतिदेशवाक्य के अर्थ का
ज्ञान उपमान है । उक्त अतिदेशवाक्यार्थ का ज्ञान होने के अनन्तर उक्त वाक्यार्थ का
स्मरण व्यापार है और गवयपदवाच्यत्व ( शक्ति ) ज्ञानरूप उपमिति इस प्रमाण का
फल है । इस प्रकार "गोसदृशो गवयपदवाच्यः" इत्याकारक अतिदेशवाक्य से गोसा-
दृश्यावच्छिन्नविशेष्यक गवयपदवाच्यत्वप्रकारक जो ज्ञान पैदा होता है, वही उपमिति-
प्रमा का करण है ।
इति तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कलायाम्' उपमानपरिच्छेदः ।

अथ शब्दपरिच्छेदः
आप्तवाक्यं शब्दः । आप्तस्तु यथार्थवक्ता । वाक्यं पदसमूहः,
यथा—गामानयेति । शक्तं पदम् । अस्मात्पदादयमर्थो बोद्धव्य
इतीश्वरसङ्केतः शक्तिः ।
आप्तजन का वाक्य शब्द-प्रमाण है । जो यथार्थ ( सत्य ) बोले, वह आप्त है ।
पदों के समूह को वाक्य कहते हैं, जैसे - ‘गाम् आनय’ इत्यादि वाक्य है । क्योंकि यहाँ
पर ‘गाम्’ यह सुबन्त-पद और ‘आनय’ यह तिङन्त-पद एक साथ प्रयुक्त हैं । पदार्थ का
बोध कराने में जो शक्तिमान् है, उसे पद कहते हैं । “इस पद से इस अर्थ का बोध
करना चाहिये” इस प्रकार का ईश्वरीय-संकेत शक्ति है ।
न्यायबोधिनी
शब्दं लक्षयति—आप्तेति । आप्तोच्चरितत्वे सति वाक्यत्वं शब्दस्य
लक्षणम् । ( प्रमाणशब्दत्वं लक्ष्यतावच्छेदकम् ) । वाक्यत्वमात्रोक्तावनाप्तो-
च्चरितवाक्येऽतिव्याप्तिरत आप्तोच्चरितत्वनिवेशः तावन्मात्रोक्तौ जबगड-
दशादावतिव्याप्तिरतो वाक्यत्वम् । आप्तत्वं च प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञान-
वत्त्वम् । तथा च प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानजन्यशब्दत्वमिति पर्यवसन्नोऽर्थः ।
वस्तुतस्तु पदज्ञानं करणम् । वृत्तिज्ञानसहकृतपदज्ञानजन्यपदार्थोपस्थि-
हिन्दी-कला
‘आप्तोच्चरितत्वे सति वाक्यत्व’ शब्दप्रमाण का लक्षण है । यहाँ केवल शब्द
लक्ष्य नहीं है, किन्तु प्रमाणशब्द लक्ष्य है और प्रमाणशब्दत्व लक्ष्यता का अवच्छेदक है ।
यदि केवल वाक्यत्व शब्दप्रमाण का लक्षण माना जाय तो अनाप्तजन से उच्चारित
शब्द में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः आप्तोच्चरितत्व-विशेषण दिया ।
यदि उक्त विशेषणमात्र लक्षण माना जाय और ‘वाक्यत्व’ यह विशेष्यभाग न दिया
जाय तो जबगडदश् आदि में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि उक्त सूत्र
पाणिनि ( आप्तपुरुष ) से उच्चरित है। किन्तु वाक्यरूप न होने से शब्दप्रमाण
के अन्तर्गत नहीं है । आप्त का लक्षण है—प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानवत्त्व । अर्थात्
शब्द का प्रयोग यथार्थज्ञान के बाद ही होता है । इसलिये शब्दप्रयोग का हेतु जो
यथार्थज्ञान, वह जिसे हो, वह आप्त है। इस प्रकार शब्दप्रमाण का पर्यवसित
लक्षण है—प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानजन्य शब्दत्व । उक्त लक्षण प्राचीन मतानुसार है ।
नव्यों के अनुसार तो पद करण नहीं होता किन्तु पदज्ञान ही शाब्दबोध का
करण होता है । इसलिये इस मत में पदज्ञान शब्दप्रमाण है । वृत्तिज्ञानसहकृत

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ६३
न्यायबोधिनी
तिष्ठयापारः । वाक्यार्थज्ञानं शाब्दबोधः फलम् । वृत्तिर्नाम शक्तिलक्षणान्य-
तररूपा । शक्तिर्नाम घटादिविशेष्यकघटादिपदजन्यबोधविषयत्वप्रकारक
ईश्वरसङ्केतः । ईश्वरसङ्केतो नाम ईश्वरेच्छा. सैव शक्तिरित्यर्थः । शक्ति-
निरूपकत्वमेव पदे शक्तत्वम् । विषयतासम्बन्धेन शक्त्याश्रयत्वमर्थे
शक्यत्वम् ।
शक्यसम्बन्धो लक्षणा । सा द्विविधा गौणी शुद्धा चेति । गौणी नाम
सादृश्यविशिष्टे लक्षणा । यथा सिंहो माणबक इत्यादौ सिंहपदस्य सिंहसा-
दृश्यविशिष्टे लक्षणा । शुद्धा त्रिविधा—जहल्लक्षणा अजहल्लक्षणा जहद-
जहल्लक्षणा चेति । लक्ष्यतावच्छेदकरूपेण लक्ष्यमात्रबोधप्रयोजिका लक्षणा
जहल्लक्षणा । यथा गङ्गायां घोष इत्यत्र गङ्गापदवाच्यप्रवाहसम्बन्धस्य
तीरे सत्त्वात्तादृशशक्यसम्बन्धरूपलक्षणाज्ञानाद् गङ्गापदात्तीरोपस्थितिः ।
लक्ष्यतावच्छेदकरूपेण लक्ष्यशक्योभयबोधप्रयोजिका लक्षणा अजहल्लक्षणा ।
हिन्दी-कला
पदज्ञान से जनित जो पदार्थोपस्थिति, वही व्यापार है । और वाक्यार्थज्ञानरूप शाब्द-
बोध इस प्रमाण का फल है । शक्ति-लक्षणा अन्यतर को वृत्ति कहते हैं । साहित्यिकों
की व्यञ्जनावृत्ति न्याय में अमान्य है ।
“अस्मात् पदात् अयमर्थो बोद्धव्यः” यह ईश्वरीय संकेत ही शक्ति है । उसका
परिष्कृत स्वरूप न्यायबोधिनीकार बताते हैं—शक्तिर्नाम इत्यादि । घटादिरूप अर्थ-
विशेष्यक एवं घटादिपदजन्यबोधविषयत्वप्रकारक जो ईश्वर का संकेत, वह शक्ति है ।
ईश्वरेच्छा ही ईश्वरसंकेत है, और वह पद की अर्थगत शक्ति है । अर्थगत शक्ति का
निरूपक होने के कारण पद को शक्त कहते हैं । एवं विषयतासम्बन्ध से ईश्वरेच्छारूप
शक्ति का आश्रय होने के कारण पदार्थ को शक्य या शक्यार्थ कहते हैं ।
शक्य का सम्बन्ध लक्षणावृत्ति है । वह दो प्रकार की होती है, गौणी लक्षणा
और शुद्धा लक्षणा । सादृश्यविशिष्ट में लक्षणा गौणी लक्षणा है । जैसे, सिंहो माण-
वकः’ इत्यादिस्थल में सिंह पद की सिंहसादृश्यविशिष्ट में लक्षणा गौणी लक्षणा है ।
शुद्धा लक्षणा के तीन भेद हैं—जहल्लक्षणा-अजहल्लक्षणा और जहदजहल्ल-
क्षणा । लक्ष्यतावच्छेदकरूप से लक्ष्यमात्र का बोध कराने वाली लक्षणा जहल्लक्षणा
है । जैसे "गङ्गायां घोषः” यहाँ गङ्गपद का वाच्यार्थ जो प्रवाह, उसका सम्बन्ध तीर
में होने से तादृशशक्यसम्बन्धरूप लक्षणा के ज्ञान से गङ्गापद मे तीर की उप-
स्थिति होकर अनन्तर “गङ्गा तीर में घोष है” ऐसा शाब्दबोध हो जायगा । यह जह-
ल्लक्षणा का उदाहरण है
लक्ष्यतावच्छेदकरूप से लक्ष्य और शक्य उभय का बोध कराने वाली लक्षणा

६४ तर्कसंग्रहः [ शब्दपरिच्छेदः
आकाङ्क्षा योग्यता सन्निधिश्च वाक्यार्थज्ञाने हेतुः ।
पदस्य पदान्तरव्यतिरेकप्रयुक्तान्वयाननुभावकत्वमाकाङ्क्षा ।
आकाङ्क्षा-योग्यता और सन्निधि ये तीनों ही वाक्यार्थज्ञान के प्रति हेतु हैं ।
एक पद का दूसरे पद के अभाव के कारण अन्वयबोध न कराना आकाङ्क्षा है ।
न्यायबोधिनी
यथा—काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्यत्र काकपदस्य दध्युपघातके लक्षणा ।
लक्ष्यतावच्छेदकं दध्युपघातकत्वम्, तेन रूपेण दध्युपघातकानां सर्वेषां
काकबिडालकुक्कुटसारमेयादीनां शक्यलक्ष्याणां बोधात् । जहदजहल्ल-
क्षणा—यथा तत्त्वमसीत्यत्र सर्वज्ञत्वकिञ्चिज्ज्ञत्वपरित्यागेन व्यक्तिमात्रबोध-
नात् वेदान्तिनां मते । सा च शक्यतावच्छेदकपरित्यागेन व्यक्तिमात्रबोध-
प्रयोजिका ।
आकाङ्क्षां लक्षयति—पदस्येति । अव्यवहितोत्तरत्वादिसम्बन्धेन यत्पदे
यत्पदप्रकारकज्ञानव्यतिरेकप्रयुक्तो यादृशशाब्दबोधाभावस्तादृशशाब्दबोधे
तत्पदे तत्पदवत्त्वमाकाङ्क्षा । यथा घटमित्यादिस्थलेऽव्यवहितोत्तरत्वादि-
हिन्दी-कला
अजहल्लक्षणा है । जैसे, "काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्" यहाँ पर काकपद की दध्युपघा-
तक में लक्षणा है । यहाँ लक्ष्यतावच्छेदक दध्युपघातकत्व है । अतः दध्युपघातकत्व-
रूप से जितने भी दध्युपघातक हैं; काक सहित बिडाल-कुक्कुट-कुत्ता आदि, इन सभी
शक्य एवं लक्ष्यों का बोध हो जाता है । यह अजहल्लक्षणा है
जहदजहल्लक्षणा वह है, जहाँ शक्यार्थ का ही कुछ अंश छोड़ दिया जाय और कुछ
अंश न छोड़ा जाय, अर्थात् गृहीत कर लिया जाय । जैसे, 'तत्त्वमसि' इस वेदान्त-
वाक्य में 'तत्' पद का शक्य अर्थ है—'सर्वज्ञत्वविशिष्ट आत्मा' तथा 'त्वम्' पद का
शक्य अर्थ है—'किञ्चिज्ज्ञत्वविशिष्ट आत्मा' । किन्तु जहदजहल्लक्षणावृत्ति से
सर्वज्ञत्व एवं किञ्चिज्ज्ञत्वधर्म का परित्याग कर आत्ममात्र का बोध होता है और
जीव और ब्रह्म का अभेदबोध संपन्न हो जाता है । शक्यतावच्छेदक का परित्याग
कर व्यक्तिमात्र के बोध की प्रयोजिका जहदजहल्लक्षणा है, यह तात्पर्य हुआ ।
"पदस्य पदान्तरव्यतिरेकप्रयुक्तान्वयाननुभावकत्वम् आकाङ्क्षा" यह मूलोक्त
आकाङ्क्षालक्षण है । अर्थात् एक पद दूसरे पद के बिना अन्वयबोध न करा सके,
यही उन पदों में परस्पर आकाङ्क्षा है । इसे न्यायबोधिनीकार नव्यन्याय की भाषा
में परिष्कृत करते हैं—अव्यवहितोत्तरत्वसम्बन्ध से जिस पद में यत्पदप्रकारक ज्ञान
न होने के कारण यादृशशाब्दबोध नहीं हो पाता, तादृशशाब्दबोध के प्रति उस पद
में ऽव्यवहितोत्तरत्वसम्बन्ध से तत्पद का वैशिष्ट्य आकाङ्क्षा है ।

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ६५
अर्थाबाधो योग्यता ।
पदानामविलम्बेनोच्चारणं सन्निधिः ।
तथा च आकाङ्क्षाविरहितं वाक्यमप्रमाणम् । यथा—गौरश्वः
पुरुषो हस्तीति न प्रमाणम्—आकाङ्क्षाविरहात् । वह्निना सिञ्च-
तीति न प्रमाणम्—योग्यताविरहात् । प्रहरे प्रहरेऽसहोच्चारितानि
गामानयेत्यादिपदानि न प्रमाणम्—सान्निध्याभावात् ।
वाक्यार्थ का बाधित न होना योग्यता है। बिना विलम्ब किये पदों का उच्चारण
करना सन्निधि है । इसलिये आकाङ्क्षारहित वाक्य अप्रमाण है। जैसे—"गौः
अश्वः पुरुषो हस्ती" यह वाक्य अप्रमाण है, क्योंकि यहाँ पदों में परस्पर आकाङ्क्षा
नहीं है । "वह्निना सिञ्चति" यह वाक्य प्रमाण नहीं है, क्योंकि वह्निद्वारा सेचन
क्रिया के बाधित होने से वहाँ योग्यता नहीं है । पहर-पहर पर बोले गये, इसीलिये
एक साथ नहीं उच्चारित हुए "गाम्—आनय" इत्यादि पद प्रमाण नहीं हैं, क्योंकि
इन पदों में सान्निध्य का अभाव है ।
न्यायबोधिनी
सम्बन्धेन अम्-पदं घटपदवदित्याकारक 'अम्'पदविशेष्यकघटपदप्रकारकज्ञान-'
सत्त्वे घटीयं कर्मत्वमिति बोधो जायते । अम्-घट इति विपरीतोच्चारणे तु
तादृशज्ञानाभावात् तादृशशाब्दबोधो न जायतेऽतस्तादृशाकाङ्क्षाज्ञानं
शाब्दबोधे कारणम् ।
अर्थाबाध इति । बाधाभावो योग्यतेत्यर्थः । अग्निना सिञ्चतीत्यत्र
सेककरणत्वस्य जलादिधर्मस्य वह्नौ बाधनिश्चयसत्त्वान्न तादृशवाक्याच्छा-
हिन्दी-कला
जैसे 'घटम्' इत्यादि स्थल में अव्यवहितोत्तरत्वसम्बन्ध से 'अम्' यह विभक्तिपद
'घट' इस नामपद से विशिष्ट होने के कारण अम्-पदविशेष्यक घटपदप्रकारक
ज्ञान होने से 'घटीयं कर्मत्वम्' अर्थात् 'घटगत कर्मता' ऐसा बोध हो जाता है ।
किन्तु इसके विपरीत 'अम् घट' ऐसा उच्चारण करने पर घटपद के अव्यवहित
उत्तर में अम्-पद का ज्ञान नहीं होने से 'घटीयं कर्मत्वम्' यह शाब्दबोध नहीं
उत्पन्न होता है । इसलिये उक्त प्रकार का आकाङ्क्षा-ज्ञान शाब्दबोध के प्रति कारण
है । विशेष स्पष्टीकरण 'संस्कृत-कला' में द्रष्टव्य है ।
वाक्यार्थज्ञान के प्रति दूसरा कारण योग्यताज्ञान है । अर्थ में बाध का अभाव
योग्यता है । जहाँ अर्थ बाधित होगा, वहाँ शाब्दबोध नहीं होगा । जैसे, 'अग्निना
५

६६ तर्कसंग्रहः [ शब्दपरिच्छेदः
वाक्यं द्विविधम्—वैदिकं लौकिकं च । वैदिकमीश्वरोक्तत्वात्
सर्वमेव प्रमाणम् । लौकिकं त्वाप्तोक्तं प्रमाणम् । अन्यदप्रमाणम् ।
वाक्यार्थज्ञानं शाब्दज्ञानम् । तत्करणं तु शब्दः ।
वाक्य दो प्रकार के होते हैं—वैदिक-वाक्य और लौकिक-वाक्य । वैदिक-वाक्य
ईश्वरोक्त होने के कारण सभी प्रमाण है । किन्तु लौकिक-वाक्य आप्तजनद्वारा कहा
हुआ ही प्रमाण है, शेष ( अनाप्तजनद्वारा कथित ) वाक्य अप्रमाण है ।
वाक्य के अर्थ का बोध शाब्दज्ञान या शाब्दबोध कहाता है । और शाब्दज्ञान
का करण ( असाधारण कारण ) शब्द प्रमाण है ।
॥ इति शब्दपरिच्छेदः ॥
न्यायबोधिनी
ब्दबोधः । सन्निधिं निरूपयति—पदानामिति । असहोच्चारितानि = विल-
म्बोच्चारितानि ।
वैदिकमिति । वेदवाक्यमित्यर्थः । इदमुपलक्षणम् । वेदमूलस्मृत्यादी-
न्यपि ग्राह्याणि । लौकिकं त्विति । वेदवाक्यभिन्नमित्यर्थः । ( आप्तत्वं
च प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानवत्त्वम् ) ।
॥ इति न्यायबोधिन्यां शब्दपरिच्छेदः ॥
हिन्दी-कला
सिञ्चति' यहां पर सेक-करणत्व का अग्नि में बाधनिश्चय है, क्योंकि वह जल का धर्म
है, इसलिये उक्तवाक्य से शाब्दबोध नहीं हो सकेगा ।
प्रमाणभूत आप्तवाक्य दो प्रकार का है—वैदिक और लौकिक । वैदिकवाक्य
का अर्थ है—वेदवाक्य । किन्तु 'वैदिक' यह कहना उपलक्षण मात्र है, इससे वेद-
मूलक स्मृति-पुराणादिवाक्य भी प्रमाण के अन्तर्गत हैं । वेदवाक्य तो ईश्वरोक्त
होने के कारण सब प्रमाण हैं । किन्तु लौकिक वाक्य वे ही प्रमाण हैं, जो आप्तजन
द्वारा उक्त हैं । आप्त वह है, जो शब्दप्रयोग के लिए अपेक्षित यथार्थज्ञान वाला हो ।
इति तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कलायाम्' शब्दपरिच्छेदः ।
••••०••••

अथावशिष्टपरिच्छेदः
अयथार्थानुभवस्त्रिविधः—संशय-विपर्यय-तर्कभेदात् ।
एकस्मिन्धर्मिणि विरुद्धनानाधर्मवैशिष्ट्यावगाहिज्ञानं संशयः ।
यथा—स्थाणुर्वा पुरुषो वेति ।
मिथ्याज्ञानं विपर्ययः । यथा—शुक्तौ 'रजतम्' इति ।
अयथार्थानुभव तीन प्रकार का होता है—संशय-विपर्यय और तर्क के भेद से ।
एक धर्मी में विरुद्ध नानाधर्म के वैशिष्ट्य (सम्बन्ध) का अवगाहन करने
वाला ज्ञान संशय है । जैसे—"यह स्थाणु है या पुरुष है" इस प्रकार का अनिश्च-
यात्मक ज्ञान संशय कहाता है ।
मिथ्याज्ञान को विपर्यय कहते हैं । जैसे—शुक्ति में हुआ रजत का ज्ञान मिथ्या-
ज्ञान (भ्रमज्ञान) होने से विपर्यय है ।
न्यायबोधिनी
यथार्थानुभवं निरूप्यायथार्थानुभवं विभजते—संशयेत्यादिना ।
एकेति । एकधर्मावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपितभावाभावप्रकारकज्ञानं
संशय इत्यर्थः । भावद्वयकोटिकसंशयाप्रसिद्धेः (पुरुषो वा) स्थाणुर्वेत्यत्र
स्थाणुत्वस्थाणुत्वाभावपुरुषत्वपुरुषत्वाभावकोटिक एव संशय इत्यर्थः ।
मिथ्याज्ञानमिति । अयथार्थज्ञानमित्यर्थः । विपर्ययो नाम भ्रमः ।
हिन्दी-कला
अब तक यथार्थानुभव का निरूपण हुआ । बुद्धि के दूसरे भेद अयथार्थानुभव का
विभाग मूलकार करते हैं—अयथार्थानुभव तीन प्रकार का होता है—संशय-विपर्यय
और तर्क के भेद से । मूलोक्त संशयलक्षण का परिष्कृत स्वरूप यों है—एकधर्मा-
वच्छिन्ना जो विशेष्यता, उससे निरूपिता जो भावाभावनिष्ठा प्रकारता, तादृश-
प्रकारताशाली जो ज्ञान, वह संशय है । जैसे, तमो द्रव्यं न वा' इस संशय में एक तम
विशेष्य है, तथा द्रव्यत्व और द्रव्यत्वाभाव ये दो प्रकार हैं । इसलिये एक ही विशेष्य
में भावाभावरूप दो विशेषणों का ज्ञान होने से यह संशय है ।
इस प्रकार संशय में एक कोटि भाव की होती है और दूसरी कोटि अभाव की ।
अतः भावद्वयकोटिक संशय के अप्रसिद्ध होने से "स्थाणुर्वा पुरुषो वा" इस स्थल में
स्थाणुत्व और पुरुषत्वकोटिक संशय न होकर स्थाणुत्व-स्थाणुत्वाभाव एवं पुरुषत्व-
पुरुषत्वाभावरूप भावाभावकोटिक ही संशय होता है, ऐसा अभिप्राय है ।
विपर्यय का अर्थ है—मिथ्याज्ञान अर्थात् भ्रम ।

६८ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
व्याप्यारोपेण व्यापकारोपस्तर्कः । यथा—यदि वह्निर्न स्यात्तर्हि
धूमोऽपि न स्यादिति ।
स्मृतिरपि द्विविधा—यथार्था अयथार्था च । प्रमाजन्या
यथार्था, अप्रमाजन्या अयथार्था ।
सर्वेषामनुकूलवेदनीयं सुखम् ।
प्रतिकूलवेदनीयं दुःखम् ।
व्याप्य के आरोप से व्यापक का आरोप तर्क है । जैसे—"पर्वत में यदि वह्नि न
हो तो धूम भी न हो" इस प्रकार का आरोप करना तर्क है । यहाँ वह्न्यभाव व्याप्य
है और धूमाभाव व्यापक है ।
स्मृति भी दो प्रकार की होती है—यथार्थ स्मृति और अयथार्थ स्मृति । प्रमात्मक
ज्ञान से हुई स्मृति यथार्थ स्मृति है और अप्रमात्मक ज्ञान ( भ्रमात्मक ज्ञान ) से हुई
स्मृति अयथार्थ स्मृति है ।
सभी के लिये अनुकूल प्रतीत होने वाला सुख है, और प्रतिकूल प्रतीत होने वाला
दुःख है ।
न्यायबोधिनी
व्याप्यारोपेणेति । तर्के व्याप्यस्य व्यापकस्य च बाधनिश्चयः कारणम्,
अन्यथा बाधनिश्चयाभाव इष्टापत्तिदोषेण तर्कानुत्पत्तेः ।
सुखं निरूपयति—सर्वेषामिति । इतरेच्छानधीनेच्छाविषयत्वमिति
निष्कर्षः । यथाश्रुते घटोऽनुकूल इत्याकारकज्ञानदशायामनुकूलत्वप्रकारक-
हिन्दी-कला
व्याप्य के आरोप से व्यापक का आरोप तर्क है । जैसे—पर्वत में यदि वह्नि का
अभाव हो तो धूम का भी अभाव होना चाहिये । यहाँ वह्न्यभाव व्याप्य है । इसलिये
उसका आरोप होने पर व्यापकीभूत धूमाभाव का भी आरोप होगा । तर्क में वादी
प्रतिवादी दोनों को व्याप्य और व्यापक का बाधनिश्चय होना चाहिये, तभी
तर्कप्रयोग हो सकता है । इसलिए तर्क में उक्त बाधनिश्चय कारण है ( यदि बाध-
निश्चय न हो तो इष्टापत्तिदोष के कारण तर्क उत्पन्न ही न हो सकेगा ।
सुख का निष्कृष्ट लक्षण है—इतरेच्छानधीनेच्छाविषयत्व । अर्थात् जो स्वतः
एव इच्छा का विषय हो, अन्य इच्छा के अधीन इच्छा विषय न हो, वह सुख है । यहाँ
यदि मूलोक्त यथाश्रुत लक्षण रहने दिया जाय तो "घटोऽनुकूलः" इस प्रकार के
अनुकूलत्वप्रकारक ज्ञान की विशेष्यता के घट में भी होने से घट में भी सुख-लक्षण
की अतिव्याप्ति हो जायगी । इसलिये 'अनुकूलत्व' सुख का लक्षण नहीं है । परिष्कृत

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ६१
इच्छा कामः । क्रोधो द्वेषः । कृतिः प्रयत्नः ।
कामना को इच्छा कहते हैं । किसी के प्रति क्रोध को द्वेष कहते हैं । कृति को
प्रयत्न कहते हैं ।
न्यायबोधिनी
ज्ञानविशेष्यत्वस्य घटादावपि सत्त्वाद् घटादावतिव्याप्तिरिति । सुखेच्छाधीने
भोजनादावतिव्याप्तिवारणाय इतरेच्छानधीनेतीच्छाविशेषणम् । सुखेच्छा
तु सुखत्वप्रकारकज्ञानमात्रजन्यैव ।
दुःखं निरूपयति—प्रतिकूलेति । अत्रापीतरद्वेषानधीनद्वेषविषयत्वमिति
निष्कृष्टलक्षणम् । द्वेषविषयत्वमात्रोक्तौ सर्पादावतिव्याप्तिस्तत्रापि द्वेष-
विषयत्वसत्त्वादतस्तत्रातिव्याप्तिवारणायेतरद्वेषानधीनेति द्वेषविशेषणम् ।
सर्पजन्यदुःखादौ द्वेषात्सर्पेऽपि द्वेष इति सर्पद्वेषस्य सर्पजन्यदुःखद्वेषजन्यत्वा-
दन्यद्वेषाजन्यद्वेषविषयत्वरूपदुःखलक्षणस्य सर्पादौ नातिव्याप्तिः । फलेच्छा
हिन्दी-कला
लक्षण में भी यदि केवल इच्छाविषयत्व ही कहा जाय तो सुखेच्छाधीन-भोजनादि में
भी सुखलक्षण की अतिव्याप्ति होने लगेगी । अतः 'इतरेच्छानधीन' यह द्वितीय इच्छा
का विशेषण कहा । सुखेच्छा तो केवल सुखत्वप्रकारक ज्ञान से ही उत्पन्न होती है,
न कि वह दूसरी इच्छा के अधीन होती है । अतएव सुख स्वतः काम्य होता है और
इतर पदार्थ की कामना सुखेच्छा के अधीन होती है ।
'प्रतिकूलवेदनीयत्व' दुःख का लक्षण मूल में कहा गया है । किन्तु यहाँ भी "इतर
द्वेषानधीनद्वेषविषयत्व" ही दुःख का निष्कृष्ट लक्षण है । इस लक्षण में भी यदि
केवल 'द्वेषविषयत्व' दुःख का लक्षण कहा जाय तो सर्प आदि में भी दुःखलक्षण की
अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि सर्प में भी द्वेषविषयता है । अतः इस अतिव्याप्ति
के निवारणार्थ 'इतरद्वेषानधीन' यह द्वेष का विशेषण कहा गया । सर्प से होने वाले
दुःख के प्रति द्वेष के कारण ही सर्प में भी द्वेष होता है । इसलिये सर्पजन्य दुःख के
प्रति द्वेष के अधीन ही सर्प के प्रति द्वेष होने से इतरद्वेषानधीनद्वेषविषयत्वरूप
दुःखलक्षण की सर्पादि में अतिव्याप्ति न होगी ।
सुख और दुःख के उक्त निष्कृष्टलक्षण बनाने का रहस्य यह है कि फलेच्छा
उपायेच्छा का कारण होती है, इसी लिये फलेच्छा के अधीन उपायेच्छा होती है ।
इसी प्रकार फल के प्रति द्वेष होने से उपाय के प्रति द्वेष उत्पन्न होता है, इसलिये
फलद्वेष के अधीन उपायद्वेष होता है । फल दो हैं—अनुकूल फल सुख तथा प्रति-
कूल फल दुःख ।

७० तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
विहितकर्मजन्यो धर्मः । निषिद्धकर्मजन्यस्त्वधर्मः ।
बुद्ध्यादयोऽष्टावात्ममात्रविशेषगुणाः । बुद्धीच्छाप्रयत्ना नित्या
अनित्याश्च । नित्या ईश्वरस्य, अनित्या जीवस्य ।
संस्कारस्त्रिविधः—वेगो भावना स्थितिस्यापकश्चेति ।
वेगः पृथिव्यादिचतुष्टयमनोवृत्तिः ।
अनुभवजन्या स्मृतिहेतुर्भावना, आत्मामात्रवृत्तिः ।
अन्यथाकृतस्य पुनस्तदवस्थापादकः स्थितिस्थापकः,
कटादिपृथिवीवृत्तिः । इति गुणाः ।
वेदविहित कर्म के अनुष्ठान से उत्पन्न होने वाला धर्म है, और वेद द्वारा निषिद्ध
कर्म के अनुष्ठान से उत्पन्न होने वाला अधर्म कहाता है ।
बुद्धि आदि आठ (बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म और अधर्म) आत्मा-
मात्र के विशेषगुण हैं। इनमें बुद्धि, इच्छा और प्रयत्न, ये तीन गुण नित्य भी हैं,
अनित्य भी हैं। ईश्वर के ये तीनों गुण नित्य हैं और जीव के अनित्य हैं ।
संस्कार तीन प्रकार का होता है—वेग भावना और स्थितिस्थापक । वेग-
नामक संस्कार पृथिवी-जल-तेज-वायु और मनमें रहता है । अनुभव से जो उत्पन्न हो
और स्मृति का हेतु हो, उसे भावना कहते हैं । वह केवल आत्मा में रहती है । अन्य
स्थिति में बना दी गई वस्तु को पुनः उसकी पहली अवस्था में ला देनेवाले संस्कार को
स्थितिस्थापकनामक संस्कार कहते हैं । वह चटाई आदि पृथिवी-द्रव्य में रहता है ।
न्यायबोधिनी
उपायेच्छां प्रति कारणम्, अतः फलेच्छावशादुपायेच्छा भवति । एवं फले
द्वेषादुपाये द्वेषः ।
धर्माधर्मौ निरूपयति—विहितेति । वेदविहितेत्यर्थः । निषिद्धेति । वेद-
निषिद्धेत्यर्थः ।
बुद्ध्यादयोऽष्टाविति । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मा इत्यर्थः ।
संस्कारं विभजते संस्कार इति । भावनां लक्षयति—अनुभवेति ।
अनुभवजन्यत्वे सति स्मृतिहेतुत्वं भावनालक्षणम् । अत्रानुभवजन्यत्वे सतीति
हिन्दी-कला
वेद में विहित कर्म से उत्पन्न धर्म है और वेद में निषिद्ध कर्म से उत्पन्न अधर्म है ।
बुद्धि से लेकर अधर्म तक अर्थात् बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म और अधर्म
ये आठ विशेषगुण आत्मा मात्र के हैं ।
संस्कार के तीन भेद हैं—वेग-भावना और स्थितिस्थापक । अनुभव से जो जन्य
हो और स्मृति का हेतु हो, वह भावना है । इस लक्षण में यदि "अनुभव-जन्यत्वे

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ७१
न्यायबोधिनी
विशेषणानुपादाने आत्ममनःसंयोगेऽतिव्याप्तिरात्ममनःसंयोगस्य ज्ञानमात्रं
प्रत्यसमवायिकारणत्वेन स्मृतिं प्रत्यपि कारणत्वादतस्तदुपादानम्। आत्ममनः-
संयोगस्यानुभवजन्यत्वाभावान्नातिव्याप्तिः। तावन्मात्रे कृतेऽनुभवध्वंसेऽति-
व्याप्तिः, ध्वंसं प्रति प्रतियोगिनः कारणत्वेनानुभवध्वंसस्याप्यनुभवजन्य-
त्वात्, अतः स्मृतिहेतुत्वोपादानम्। अनुभवध्वंसे स्मृतिहेतुत्वाभावान्नाति-
व्याप्तिः।
ननु विशिष्टबुद्धिं प्रति विशेषणज्ञानस्य कारणता सकलतान्त्रिकमत-
सिद्धा, यथा दण्डविशिष्टबुद्धिं प्रति दण्डज्ञानं कारणम्। दण्डविशिष्टबुद्धि-
र्नाम दण्डप्रकारकबुद्धिः। तथाच दण्डप्रकारकबुद्धित्वावच्छिन्नं प्रति दण्डज्ञा-
नत्वेन कारणत्वमित्यापतितम्। दण्डप्रकारकबुद्धिः दण्डी पुरुष इत्याकारक-
बुद्धिस्तत्र दण्डज्ञानं कारणम्। न हि दण्डमजानानः पुमान् 'दण्डी पुरुषः' इति
प्रत्येति। एवं च यत्रायं दण्ड इति प्रत्यक्षं जातं, तदनन्तरं दण्डी पुरुष इत्या-
कारकप्रत्यक्षमुत्पन्नं, तत्र दण्डी पुरुष इत्याकारकप्रत्यक्षेऽतिव्याप्तिः। तद्धि
हिन्दी-कला
सति" ऐसा विशेषण न दिया जाय तो आत्मा-मन के संयोग में भावनालक्षण की
अतिव्याप्ति हो जायगी। क्योंकि आत्मा-मन का संयोग ज्ञानमात्र के प्रति असमवायि-
कारण होने से स्मृति के प्रति भी हेतु होगा। अतः उक्त विशेषण के उपादान
करने से उक्त अतिव्याप्ति नही हुई, क्योंकि आत्मा मन के संयोग में अनुभवजन्यत्व
नहीं है। एवं यदि अनुभवजन्यत्वमात्र भावना का लक्षण किया जाय तो अनुभव-
ध्वंस में भावनालक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। क्योंकि ध्वंस के प्रति प्रतियोगी
कारण होता है, इसलिये अनुभवध्वंस भी अनुभवरूप अपने प्रतियोगी से जन्य है।
अतः भावना के लक्षण में स्मृतिहेतुत्व का भी उपादान किया। अनुभवध्वंस में स्मृति-
हेतुत्व नहीं होने से उक्त अतिव्याप्ति नहीं होगी।
शङ्का--विशिष्टबुद्धि के प्रति विशेषणज्ञान कारण होता है, यह सर्वमतसिद्ध
है। जैसे, दण्डविशिष्ट बुद्धि (दण्डी-बुद्धि) के प्रति दण्डज्ञान कारण होता है।
दण्डविशिष्ट बुद्धि का मानी है-दण्डप्रकारक बुद्धि। अतः दण्डप्रकारकबुद्धित्वा-
वच्छिन्न के प्रति दण्डज्ञानत्वेन रूपेण कारणता प्राप्त हुई। दण्डप्रकारक बुद्धि "दण्डी
पुरुषः" इत्याकारक बुद्धि है, उसके प्रति दण्डज्ञान कारण है। क्योंकि दण्ड को नहीं
जानने वाला पुरुष "दण्डी पुरुषः" ऐसी प्रतीति नहीं करता है।
अतः जहां "अयं दण्डः" ऐसा प्रत्यक्ष हुआ और उसके बाद 'दण्डी पुरुषः' इत्या-
कारक प्रत्यक्षज्ञान उत्पन्न हुआ, वहां उस 'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक प्रत्यक्ष में

७२ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
न्यायबोधिनी
स्वाव्यहितपूर्वक्षणोत्पन्नदण्डज्ञानात्मकानुभवजन्यं जनिष्यमाणे दण्डी पुरुष
इत्याकारकस्मरणे कारणं च, स्मृतिं प्रत्यनुभवस्य कारणत्वात् । तथा चानु-
भवजन्यत्वे सति स्मृतिहेतुत्वरूपभावनालक्षणस्य यथोक्त 'दण्डी पुरुष' इत्या-
कारकानुभवे विद्यमानत्वादतिव्याप्तिरिति चेत्—
अत्र ब्रूमः—अनुभवजन्यत्वं हि अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्य-
ताश्रयत्वम् । तत्र कारणतायामनुभवत्वावच्छिन्नत्वं निवेश्यते । तथा चानु-
भवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वमिति फलितम्, अतो नोक्ताति-
व्याप्तिः । तथा हि - दण्डप्रकारकबुद्धित्वावच्छिन्नकार्यता निरूपितदण्डज्ञान-
निष्ठा या कारणता, तस्या न दण्डानुभवत्वमवच्छेदकं, दण्डानुभवादिव दण्ड-
स्मरणादपि दण्डप्रकारकबुद्धेरुत्पत्तेः । अतो दण्डप्रकारकबुद्धित्वावच्छिन्नं
प्रति अनुभवस्मरणसाधारणदण्डज्ञानत्वेनैव दण्डज्ञानस्य कारणतायाः स्वीक-
रणीयत्वेन दण्डज्ञानत्वस्यैव तदवच्छेदकत्वात् । तथा चानुभवत्वावच्छिन्न-
कारणतानिरूपितकार्यत्वस्योक्तप्रत्यक्षेऽभावान्नातिव्याप्तिः ।
हिन्दी-कला
पूर्वोक्त भावनालक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि 'दण्डी पुरुषः' यह प्रत्यक्ष-
ज्ञान अपने अव्यवहित पूर्वक्षण में उत्पन्न दण्डज्ञानरूप अनुभव से जन्य है, तथा भावी
'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक स्मृति के प्रति हेतु भी है, क्योंकि स्मृति के प्रति अनुभव
कारण होता है । इस प्रकार "अनुभवजन्यत्वे सति स्मृतिहेतुत्व" रूप भावनालक्षण के
'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक अनुभव में वर्तमान होने से यहाँ भावनालक्षण की अति-
व्याप्ति हो गयी ।
समाधान — लक्षण में उक्त अनुभवजन्यत्व का अर्थ है— अनुभवत्वावच्छिन्न जो
कारणता, उससे निरूपितकार्यता का आश्रयत्व । यहाँ कारणता में अनुभवत्वा-
वच्छिन्नत्व का निवेश किया गया है। इसीलिये पूर्वोक्त अतिव्याप्ति नहीं होगी ।
क्योंकि दण्डप्रकारक ( 'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक ) बुद्धित्वावच्छिन्नकार्यता निरूपिता जो
दण्डज्ञाननिष्ठा कारणता है, उसमें दण्डानुभवत्व अवच्छेदक नहीं है । अर्थात् उक्त
कारणता दण्डानुभवत्वावच्छिन्ना नहीं है । क्योंकि जैसे दण्डानुभव से दण्डप्रकारक
बुद्धि उत्पन्न होती है, वैसे ही दण्डस्मरण से भी वह होती है । इसलिये दण्डप्रकारक-
बुद्धित्वावच्छिन्न के ( 'दण्डी पुरुषः' इस बुद्धि के ) प्रति अनुभव-स्मरणसाधारण दण्ड-
ज्ञानस्वरूप से ही दण्डज्ञान की कारणता स्वीकार्य होने से दण्डज्ञानत्व ही कारणता
का अवच्छेदक होगा, न कि दण्डानुभवत्व । अतः "अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपित-
कार्यताश्रयत्व" लक्षण की अतिव्याप्ति 'दण्डी पुरुष' इस प्रत्यक्ष में नहीं होगी ।

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ७३
चलनात्मकं कर्म । ऊर्ध्वदेशसंयोगहेतुरुत्क्षेपणम् । अधोदेश-
संयोगहेतुरपक्षेपणम् । शरीरस्य सन्निकृष्टसंयोगहेतुराकुञ्चनम् ।
विप्रकृष्टसंयोगहेतुः प्रसारणम् । अन्यत्सर्वं गमनम् ।
चलनात्त्मक क्रिया को कर्म कहते हैं । कर्म के पाँच भेद हैं । उनमें ऊपर देश में
संयोग का हेतु कर्म उत्क्षेपण है । नीचे के देश में संयोग का हेतु कर्म अपक्षेपण है ।
शरीर के निकट-देश में संयोग का हेतु कर्म आकुञ्चन है । शरीर के दूरवर्ती देश में
संयोग का हेतु कर्म प्रसारण है । तथा इन चारों से भिन्न सभी प्रकार का कर्म गमन
कहाता है ।
न्यायबोधिनी
भावनायां तु लक्षणमिदं वर्तते । तथाहि—अनुभवेनैव भावनाख्य-
संस्कारोत्पत्त्या भावनात्वावच्छिन्नं प्रत्यनुभवस्यानुभवत्वेनैव कारणतया
भावनात्वावच्छिन्नकार्यतानिरूपितानुभवनिष्ठकारणतायामनुभवत्वमवच्छेद-
कम् । अतोऽनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वं भावनायां
वर्तते इति नासम्भवः ।
नन्वेवं स्मृतिहेतुत्वविशेषणवैयर्थ्यम् । तद्ध्यनुभवध्वंसेऽतिव्याप्तिवारणाय
प्रागुपात्तम् न हि यथोक्तानुभवजन्यत्वविवक्षायामनुभवध्वंसेऽतिव्याप्तिः
प्रसज्यते । तथाहि—ध्वंसत्वावच्छिन्नं प्रति प्रतियोगिनः कारणत्वं प्रतियोगि-
त्वेन रूपेण, तत्तद्ध्वंसत्वावच्छिन्नं प्रति च तत्तत्प्रतियोगिव्यक्तेस्तत्तद्व्य-
क्तित्वेनेत्येव ध्वंसप्रतियोगिनोः कार्यकारणभावः । तथा च ध्वंसनिष्ठकार्य-
हिन्दी-कला
भावना में तो उक्त परिष्कृत लक्षण संगत ही है। क्योंकि अनुभव से ही भावनाख्य
संकार की उत्पत्ति होने से भावनात्वावच्छिन्न कार्य के प्रति केवल अनुभवत्वेन रूपेण
अनुभव कारण होता है । इसलिये भावनात्वावच्छिन्ना जो भावनानिष्ठा कार्यता,
उस कार्यता से निरूपिता जो अनुभवनिष्ठा कारणता, उसमें अनुभवत्व अवच्छेदक
होगा । अतः “अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्व” लक्षण भावना में
वर्तमान है । इसलिये उक्त लक्षण में असंभवदोष नहीं होगा ।
शङ्का—उक्त प्रकार से लक्षण का परिष्कार करने पर लक्षण में ‘स्मृतिहेतुत्व’
विशेषण देना व्यर्थ है । यह विशेषण अनुभवध्वंस में भावनालक्षण की अतिव्याप्ति का
वारण करने के लिए पहले दिया गया था । किन्तु अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपित-
कार्यताश्रयत्वरूप अनुभवजन्यत्व स्वीकार करने पर अनुभवध्वंस में लक्षण की
अतिव्याप्ति प्रसक्त ही नहीं है । क्योंकि ध्वंसत्वावच्छिन्न के प्रति प्रतियोगित्वरूप से

७४ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
न्यायबोधिनी
तानिरूपिता याऽनुभवनिष्ठा कारणता, तस्यां प्रतियोगित्वमवच्छेदकं तत्त-
द्व्यक्तित्वं च, न त्वनुभवत्वमपीत्यनुभवध्वंसेऽनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानि-
रूपितकार्यताश्रयत्वरूपानुभवजन्यत्वविरहेणैवातिव्याप्तिवारणसम्भवात् कृतं
स्मृतिहेतुत्वविशेषणेनेति चेत्—
न, स्मृतावतिव्याप्तिवारणायैव तदुपादानात् । तथाहि-स्मृतिं प्रत्यनुभव
एव कारणं न तु स्मृतिरप्यतो घटस्मृतित्वावच्छिन्नं प्रति घटानुभवत्वेनैव
कारणत्वं न तु घटज्ञानत्वेन । तथा च घटस्मृतिनिष्ठकार्यतानिरूपिता या
घटानुभवनिष्ठा कारणता, तस्यां घटानुभवत्वमवच्छेदकम् । तेनानुभवत्वाव-
च्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वस्य स्मृतौ विद्यमानत्वादतिव्याप्तिवार-
णाय स्मृतिहेतुत्वमुक्तम् । न हि स्मृतिः स्मृतिहेतुः, अतो न तत्रातिव्याप्ति-
रित्यलं पल्लवतल्लजकल्पानल्पजल्पनेन ।
हिन्दी-कला
ही प्रतियोगी कारण होता है। तथा तत्तद्ध्वंसत्वावच्छिन्न के प्रति तत्तद्-
व्यक्तित्वरूप से ही तत्तत्प्रतियोगिव्यक्ति कारण होता है। ऐसा ही कार्यकारण-
भाव ध्वंस और प्रतियोगी में माना गया है। प्रकृत में अनुभवध्वंसनिष्ठकार्यतानिरू-
पिता जो अनुभवनिष्ठां कारणता है, उसमें प्रतियोगित्व या तत्तद्व्यक्तित्व अवच्छेदक
होगा, न कि अनुभवत्व अवच्छेदक होगा । इस प्रकार अनुभवध्वंस में अनुभवत्वाव-
च्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वरूप परिष्कृत अनुभवजन्यत्व नहीं रहने से
अनुभवध्वंस में अतिव्याप्ति का वारण सुतरां हो जाता है। इसलिये 'स्मृतिहेतुत्व'
विशेषण देना व्यर्थ है।
समाधान--स्मृति में भावनालक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये ही
'स्मृतिहेतुत्व' विशेषण का उपादान है। क्योंकि स्मृति के प्रति अनुभव ही कारण
होता है, न कि स्मृति भी । अतः घटस्मृतित्वावच्छिन्न ( घटस्मृति ) के प्रति घटानुभव
घटानुभवत्वरूप से ही कारण होता है, घटज्ञानत्वरूप से नहीं। इसलिये घटस्मृति-
निष्ठकार्यतानिरूपिता जो घटानुभवनिष्ठ कारणता है, उसमें घटानुभवत्व ही
अवच्छेदक होगा। इस प्रकार अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्व के
स्मृति में भी विद्यमान होने से उसमे प्रसक्त जो भावनालक्षण की अतिव्याप्ति, उसके
वारणार्थ स्मृतिहेतुत्व-विशेषण लक्षण में कहा गया। स्मृति तो अनुभवजन्य होती
हुई भी स्मृति का हेतु नहीं है, अतः उसमें परिष्कृत भावनालक्षण की अति-
व्याप्ति नहीं हुई। इसे अधिक पल्लवित करना अनावश्यक है।

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ७५
नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यम्। द्रव्यगुणकर्मवृत्ति। परं
सत्ता, अपरं द्रव्यत्वादि।
जो नित्य हो, एक हो और अनेक में समवायसम्बन्ध से रहे, वह सामान्य है।
वह द्रव्य, गुण और कर्म में रहता है। सामान्य दो प्रकार का होता है—परसामान्य
और अपरसामान्य। सत्ता परसामान्य (परजाति) है तथा द्रव्यत्व आदि अपर-
सामान्य (अपरजाति) है।
न्यायबोधिनी
सामान्यं निरूपयति—नित्यमेकमिति। नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वं सामा-
न्यलक्षणम्। नित्यत्वविशेषणानुपादानेऽनेकसमवेतत्वस्य संयोगादौ सत्त्वा-
तत्रातिव्याप्तिस्तद्वारणाय नित्यत्वविशेषणम्। अनेकसमवेतत्वानुपादाने
नित्यत्वमात्रोपादाने आकाशादावतिव्याप्तिस्तद्वारणायनेकसमवेतत्वम्।
अनेकसमवेतत्वानुपादाने नित्यत्वविशिष्टसमवेतत्वमात्रोक्तावाकाशगतैकत्व-
परिमाणादौ जलपरमाणुगतरूपादौ चातिव्याप्तिः, जलपरमाणुगतरूपादेरा-
काशगतैकत्वपरिमाणादेर्नित्यत्वात् समवेतत्वाच्च, अतः अनेकेति समवेत-
विशेषणम्।
हिन्दी-कला
“नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यम्” यह मूलोक्त सामान्य का स्वरूप है। “नित्यत्वे
सति अनेकसमवेतत्वं सामान्यत्वम्” यह सामान्य का परिष्कृत लक्षण है। इसमें
“नित्यत्वे सति” यह पद न दिया जाय तो अनेकसमवेतत्व (समवायसम्बन्ध से अनेक
में रहना) संयोगादि में भी है, अतः उसमें सामान्यलक्षण की अतिव्याप्ति हो
जायगी। उसके वारण के लिये नित्यत्वविशेषण दिया। संयोग तो द्विष्ठ होने से अनेक-
समवेत है। यदि “अनेकसमवेतत्व” विशेषण न दिया जाय और नित्यत्वमात्र लक्षण
किया जाय तो आकाशादि नित्यपदार्थ में अतिव्याप्ति हो जायगी, उसके वारणार्थ
'अनेकसमवेत' पद दिया। आकाश के नित्य होने पर भी समवेत (समवायसम्बन्ध
से वर्तमान) नहीं होने से अतिव्याप्ति नहीं हुई। 'अनेकसमवेतत्व' के अन्तर्गत
'अनेक' पद न दिया जाय, अर्थात् “नित्यत्वविशिष्टसमवेतत्व” मात्र लक्षण किया
जाय तो आकाशगत एकत्व एवं परिमाण आदि में तथा जलीयपरमाणुगत रूपादि में
भी सामान्यलक्षण की अ तव्याप्ति होने लगेगी। क्योंकि जलीयपरमाणुगतरूप
आदि तथा आकाशगत एकत्व-संख्या एवं परिमाण आदि नित्य होते हुए समवेत
(समवायसम्बन्ध से रहने वाला) पदार्थ है। अतः 'अनेक' यह समवेत का विशेषण
दिया। जलीयपरमाणुगत रूपादि एवं आकाशगत एकत्व-परिमाण आदि एक एक
में समवेत होने से अनेकसमवेत नहीं हैं। अतः अतिव्याप्तिदोष का वारण हो गया।

७६ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
नित्यद्रव्यवृत्तयो व्यावर्तका विशेषाः ।
जो नित्य द्रव्य में रहने वाला एवं इतर का व्यावर्तक ( भेदक ) है, वह विशेष-
नामक पदार्थ कहाता है ।
न्यायबोधिनी
नित्यद्रव्यवृत्तय इति । नित्यद्रव्येषु परमाण्वादिषु वर्तमानाः, अत एव
व्यावर्तकाः = इतरभेदानुमितिहेतवः = नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूपपक्षधर्मताप्रयो-
ज्येतरभेदानुमापकताशालिन इत्यर्थः । नित्यद्रव्यनिष्ठविशेष्यता निरूपितैक-
मात्रवृत्तिभेदानुमितिजनकतावच्छेदकप्रकारताश्रयत्वं विशेषाणां लक्षणमिति
भावः ।
पार्थिवपरमाणौ जलादिभेदानुमापकगन्धेऽतिव्याप्तिवारणाय एकमात्र-
वृत्तित्वं भेदविशेषणम् । घटादौ तदितरभेदानुमापके तद्रूपादावतिव्याप्ति-
हिन्दी-कला
नित्य द्रव्य में वर्तमान हों और इतर व्यावर्तक हों, वे विशेष हैं। इस मूलोक्त
विशेषलक्षण का स्पष्टार्थ यों है—नित्य द्रव्य जो परमाणु आदि हैं, उनमें वर्तमान
हों, और इसीलिये व्यावर्तक अर्थात् इतरभेदानुमिति के हेतु हैं। तात्पर्य यह है कि
नित्य द्रव्य पक्ष है, उसमें विशेष-हेतु का वर्तमान रहना ही पक्षधर्मता है। इस
प्रकार नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूप पक्षधर्मता के बल से विशेषपदार्थ इतरभेदानुमापक
होता है। इस प्रकार विशेष का यह लक्षण हेतुगर्भ है। अर्थात् नित्यद्रव्यवृत्ति
होने के कारण इतरव्यावर्तक ( इतरभेदानुमापक ) विशेष हैं ।
विशेष का परिष्कृत लक्षण यह है—नित्यद्रव्यनिष्ठ जो विशेष्यता, उससे
निरूपिता तथा एकमात्रवृत्तिभेदानुमितिजनकता की अवच्छेदिका जो प्रकारता,
उसका आश्रयत्व विशेष का लक्षण है । इस परिष्कृत लक्षण का स्पष्टीकरण 'संस्कृत-
कला' व्याख्या में द्रष्टव्य है ।
भेद में एकमात्रवृत्तित्वविशेषण देने का यह प्रयोजन है कि नित्यद्रव्य पार्थिव
परमाणु में जलादिभेद का अनुमापक गन्ध होता है, ( जैसे, पार्थिवपरमाणुः जलादि-
भिन्नः गन्धवत्त्वात् ) वहाँ गन्ध में विशेषलक्षण की अतिव्याप्ति न हो । "तद्घटः
तदितरभिन्नः, तदीयरूपात्" यहाँ पर एक द्रव्य तद्घट में इतरभेद का अनुमापक तद्रूप
में विशेषलक्षण की अतिव्याप्ति न हो जाय, इसके लिये लक्षण में "नित्यद्रव्यनिष्ठ-
विशेष्यतानिरूपित" यह प्रकारता का विशेषण कहा । घट के अनित्य द्रव्य होने से
तद्रूपनिष्ठा प्रकारता नित्यद्रव्यनिष्ठविशेष्यतानिरूपिता नहीं है । इसलिये अति-
व्याप्ति नहीं हुई ।
मूलोक्त लक्षण में "नित्यद्रव्यवृत्तयः" यह पद प्रयोजकत्व के अभिप्राय से दिया
गया है, तथा 'व्यावर्तकाः' यह पद प्रयोज्यत्व के अभिप्राय से दिया गया है । अर्थात्

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ७७
नित्यसम्बन्धः समवायः । अयुतसिद्धवृत्तिः । ययोर्द्वयोर्मध्ये
एकमविनश्यदवस्थमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धौ । यथा
अवयवावयविनौ गुणगुणिनौ क्रियाक्रियावन्तौ जातिव्यक्ती विशेष-
नित्यद्रव्ये चेति ।
नित्यसम्बन्ध को समवाय कहते हैं। यह अयुतसिद्ध पदार्थों में रहता है। जिन
दो पदार्थों के मध्य एक अविनाश की अवस्था में रहता हुआ दूसरे के आश्रित ही
रहता है, वे दोनों अयुतसिद्ध कहे जाते हैं। जैसे—अवयव-अवयवी, गुण-गुणी,
क्रिया-क्रियावान्, जाति-व्यक्ति और विशेष-नित्यद्रव्य ये अयुतसिद्ध हैं। अर्थात्
अवयवी जबतक रहेगा, अवयव के आश्रित ही होकर रहेगा। ऐसे ही गुण, क्रिया,
जाति और विशेष क्रमशः गुणी, क्रियावान्, व्यक्ति और नित्यद्रव्य के आश्रित ही रहते
हैं। इसलिये गुण-गुणी आदि भी अयुतसिद्ध पदार्थ हैं।
न्यायबोधिनी
वारणाय निरूपितान्तं प्रकारताविशेषणम् । एतेन 'व्यावर्तका' इत्यस्य नित्य-
द्रव्यविशेष्यकेतरभेदानुमितिप्रयोजका इत्यर्थकतया लक्षणपरत्वेन साफल्ये-
ऽपि नित्यद्रव्यवृत्तय इति विफलमेव, स्वरूपाख्यानस्यापि कृतत्वादिति
प्रत्युक्तम् ।
समवायं निरूपयति नित्येति । सम्बन्धत्वं विशिष्टप्रतीतिनियामक-
त्वम् । तावन्मात्रोक्तौ संयोगेऽतिव्याप्तिरतो नित्य इति विशेषणम् । ययो-
हिन्दी-कला
विशेषपदार्थ के इतरव्यावर्तक होने में नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूप पक्षधर्मता प्रयोजक है।
यही प्रयोज्यप्रयोजकभाव प्रकट करने के लिये "नित्यद्रव्यवृत्तय" यह पद सार्थक
होता है। अन्यथा 'व्यावर्तकाः' इस पद का ही 'नित्यद्रव्यविशेष्यकेतरभेदानुमिति-
प्रयोजकाः' इतना अर्थ होने से लक्षण पर्यवसित हो जाता है, अतः 'नित्यद्रव्यवृत्तयः'
यह पद निष्फल ही हो जाता। यह कहना कि—'नित्यद्रव्यवृत्तयः' यह पद लक्षणपरक
न होने पर भी स्वरूपकथनमात्र के लिये है अर्थात् वस्तुस्थितिमात्र को बताता है,
यही उसकी सार्थकता है—तो यह भी ठीक नहीं है। क्योंकि उक्त प्रयोजन भी
'व्यावर्तकाः' इस पद से ही सिद्ध हो जाता है। अतः प्रयोज्य-प्रयोजकभाव सूचित
करने में ही 'नित्यद्रव्यवृत्तयः' इस पद की सार्थकता जाननी चाहिये।
नित्यसम्बन्धत्व समवाय का लक्षण है। अन्य संयोगादि सम्बन्ध अनित्य होते हैं।
विशिष्टप्रतीति का नियामकत्व सम्बन्ध का लक्षण है। समवाय के लक्षण में यदि
नित्य-पद न दिया जाय, किन्तु सम्बन्धत्वमात्र कहा जाय तो संयोग में समवायलक्षण
की अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वह भी सम्बन्ध है। नित्य-पद देने से संयोग के
अनित्य होने के कारण अतिव्याप्ति का वारण हो गया।

७८ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
अनादिः सान्तः प्रागभावः, उत्पत्तेः पूर्वं कार्यस्य ।
सादिरनन्तः प्रध्वंसः, उत्पत्त्यनन्तरं कार्यस्य ।
त्रैकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽत्यन्ताभावः । यथा-
भूतले घटो नास्तीति ।
जो अनादि होता हुआ सान्त ( अन्तवान् ) हो, उसे प्रागभाव कहते हैं । जैसे—
उत्पत्ति के पूर्व कार्य का प्रागभाव रहता है । जो सादि ( आदिमान् ) होता हुआ
अनन्त हो, उसे प्रध्वंस कहते हैं । जैसे— कार्य का अपनी उत्पत्ति के अनन्तर प्रध्वंस
उत्पन्न होता है ।
त्रैकालिकसंसर्ग से अवच्छिन्न है प्रतियोगिता जिस अभाव की, वह अभाव
अत्यन्ताभाव कहाता है । जैसे—"भूतले घटो नास्ति" यह अभाव अत्यन्ताभाव है ।
न्यायबोधिनी
द्वयोर्मध्य इति । यन्निष्ठकालनिरूपिताधेयतासामान्यं यदवच्छिन्नं तदुभया-
न्यतरत्वमयुतसिद्धत्वमित्यर्थः ।
अत्यन्ताभावं निरूपयति--त्रैकालिकेति । ( प्रागभावाप्रतियोगित्वे सति
ध्वंसाप्रतियोगित्वे सत्यन्योन्याभावभिन्नत्वे सति अभावत्वमत्यन्ताभावस्य
लक्षणम् । ध्वंसप्रागभावान्योन्याभावाकाशादीनां वारणाय यथाक्रमं विशेष-
णोपादानम् । वस्तुतस्तु संसर्गाभावत्वं तादात्म्यभिन्नसम्बन्धावच्छिन्नप्रति-
हिन्दी-कला
यद्वृत्तिकालनिरूपित-आधेयतासामान्य जिससे अवच्छिन्न होकर रहे, वे दोनों
परस्पर में अयुतसिद्ध कहे जाते हैं । जैसे घट-घटत्व दोनों अयुतसिद्ध हैं, अर्थात् जुदा
होकर नहीं रहते । घट को छोड़कर घटत्व कहीं अन्यत्र नहीं रहता और घटत्वविहीन
होकर घट भी नहीं रहता । दोनों साथ-साथ काल में रहते हैं । विशेष स्पष्टीकरण
'संस्कृत-कला' में द्रष्टव्य है ।
पूर्वोक्त चतुर्विध अभावों में अत्यन्ताभाव का लक्षण कहते हैं— त्रैकालिकससर्गा-
वच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव अत्यन्ताभाव है । अर्थात् पूर्वकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियो-
गिताक प्रागभाव होता है तथा ध्वंसोत्तरकालि ससर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक प्रध्वंसा-
भाव होता है । किन्तु अत्यन्ताभाव तो त्रैकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक होता है ।
न्यायबोधिनीकार अत्यन्ताभाव का परिष्कृत लक्षण कहते हैं—जो प्रागभाव का
अप्रतियोगी होता हुआ ध्वंस का भी अप्रतियोगी हो तथा अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव
हो, वह अत्यन्ताभाव है । ध्वंस प्रागभाव का प्रतियोगी होता है तथा प्रागभाव ध्वंस का
प्रतियोगी होता है, इसलिये ये दोनों छूट गये । तृतीय विशेषण से अन्योन्याभाव छूट
गया । और चतुर्थ 'अभावत्व' विशेषण कहने से आकाश का वारण हो गया । इस प्रकार

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ७९
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽन्योन्याभावः, यथा-
घटः पटो नेति ।
सर्वेषां पदार्थानां यथायथमुक्तेष्वन्तर्भावात्सप्तैव पदार्था इति
सिद्धम् ।
तादात्म्यसम्बन्ध से अवच्छिन्न है प्रतियोगिता जिस अभाव की, वह अभाव
अन्योन्याभाव है। जैसे—"घटः पटो न, पटो घटो न" इत्यादि अभाव अन्योन्या-
भाव है।
न्यायसूत्रोक्त प्रमाण-प्रमेयादि सोलह तथा अन्यों द्वारा स्वीकृत शक्ति-सादृश्य-
स्वत्व आदि सभी पदार्थों का यथायोग्य उक्त द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवाय
और अभाव में ही अन्तर्भाव हो जाने से पदार्थ के सात ही भेद हैं, यह सिद्ध हुआ।
न्यायबोधिनी
योगिताकाभावत्वम् । ध्वंसप्रागभावयोश्च न संसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक-
त्वमिति तेनैव तद्वारणे त्रैकालिकेति स्वरूपाख्यानमेवेति बोध्यम् )
अन्योन्याभावं निरूपयति—तादात्म्येति । अभावत्रयवारणाय विशेष-
णम् । घटाभाववान्नेति प्रतीतिविषयघटादिवारणाय विशेष्यम् ।
ननु सादृश्यादीनामतिरिक्तपदार्थानामनिरूपणेन न्यूनतेत्यत आह —
हिन्दी-कला
लक्षणोक्त सभी पदों का उपादान सार्थक है। वस्तुतः मूलोक्त संसर्गाभावत्व का अभिप्राय
है—तादात्म्य से भिन्नसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावत्व । और यही अत्यन्ताभाव
का मूलानुसारी लक्षण है। ध्वंस और प्रागभाव तो ससर्गविच्छिन्नप्रतियोगिताक नहीं
होते हैं अर्थात् इनकी प्रतियोगिता संसर्गविच्छिन्ना नहीं होती है, इसी से उनका वारण
हो जायगा। अतः मूलोक्त लक्षण में जो त्रैकालिक-पद दिया है, वह केवल स्वरूप-
कथन के लिये है, न कि ध्वंस ओर प्रागभाव में अतिव्याप्तिवारण करने के लिये है।
अतः लक्षण में त्रैकालिकत्व का सन्निवेश नहीं है । "भूतले घटो नास्ति" यह अत्यन्ता-
भाव का उदाहरण है।
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव अन्योन्याभाव है। इसमें तादात्म्य-
सम्बन्धावच्छिन्नत्वविशेषण देने से शेष तीनों अभावों का वारण हो गया। यदि
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकत्व न कह कर तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रति-
गितावगाहिज्ञानविषयत्व लक्षण किया जाय तो "घटाभाववान्न" इस ज्ञान के विषय
घटादि में भी अन्योन्याभावलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। अतः "प्रति-
योगिताक" यह विशेष्य पद दिया। यहाँ प्रतियोगितानिरूपक घट नहीं हो सकता।
शङ्का—मीमांसकोक्त सादृश्य-शक्ति आदि तथा न्यायसूत्रोक्त प्रमाण आदि अतिरिक्त
पदार्थों का यहाँ निरूपण नही करने से ग्रन्थकार की न्यूनता क्यों न सिद्ध हुई ?