तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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आकाङ्क्षा योग्यता सन्निधिश्च वाक्यार्थज्ञाने हेतुः ।
पदस्य पदान्तरव्यतिरेकप्रयुक्तान्वयाननुभावकत्वमाकाङ्क्षा ।
आकाङ्क्षा-योग्यता और सन्निधि ये तीनों ही वाक्यार्थज्ञान के प्रति हेतु हैं ।
एक पद का दूसरे पद के अभाव के कारण अन्वयबोध न कराना आकाङ्क्षा है ।
न्यायबोधिनी
यथा—काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्यत्र काकपदस्य दध्युपघातके लक्षणा ।
लक्ष्यतावच्छेदकं दध्युपघातकत्वम्, तेन रूपेण दध्युपघातकानां सर्वेषां
काकबिडालकुक्कुटसारमेयादीनां शक्यलक्ष्याणां बोधात् । जहदजहल्ल-
क्षणा—यथा तत्त्वमसीत्यत्र सर्वज्ञत्वकिञ्चिज्ज्ञत्वपरित्यागेन व्यक्तिमात्रबोध-
नात् वेदान्तिनां मते । सा च शक्यतावच्छेदकपरित्यागेन व्यक्तिमात्रबोध-
प्रयोजिका ।
आकाङ्क्षां लक्षयति—पदस्येति । अव्यवहितोत्तरत्वादिसम्बन्धेन यत्पदे
यत्पदप्रकारकज्ञानव्यतिरेकप्रयुक्तो यादृशशाब्दबोधाभावस्तादृशशाब्दबोधे
तत्पदे तत्पदवत्त्वमाकाङ्क्षा । यथा घटमित्यादिस्थलेऽव्यवहितोत्तरत्वादि-
हिन्दी-कला
अजहल्लक्षणा है । जैसे, "काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्" यहाँ पर काकपद की दध्युपघा-
तक में लक्षणा है । यहाँ लक्ष्यतावच्छेदक दध्युपघातकत्व है । अतः दध्युपघातकत्व-
रूप से जितने भी दध्युपघातक हैं; काक सहित बिडाल-कुक्कुट-कुत्ता आदि, इन सभी
शक्य एवं लक्ष्यों का बोध हो जाता है । यह अजहल्लक्षणा है
जहदजहल्लक्षणा वह है, जहाँ शक्यार्थ का ही कुछ अंश छोड़ दिया जाय और कुछ
अंश न छोड़ा जाय, अर्थात् गृहीत कर लिया जाय । जैसे, 'तत्त्वमसि' इस वेदान्त-
वाक्य में 'तत्' पद का शक्य अर्थ है—'सर्वज्ञत्वविशिष्ट आत्मा' तथा 'त्वम्' पद का
शक्य अर्थ है—'किञ्चिज्ज्ञत्वविशिष्ट आत्मा' । किन्तु जहदजहल्लक्षणावृत्ति से
सर्वज्ञत्व एवं किञ्चिज्ज्ञत्वधर्म का परित्याग कर आत्ममात्र का बोध होता है और
जीव और ब्रह्म का अभेदबोध संपन्न हो जाता है । शक्यतावच्छेदक का परित्याग
कर व्यक्तिमात्र के बोध की प्रयोजिका जहदजहल्लक्षणा है, यह तात्पर्य हुआ ।
"पदस्य पदान्तरव्यतिरेकप्रयुक्तान्वयाननुभावकत्वम् आकाङ्क्षा" यह मूलोक्त
आकाङ्क्षालक्षण है । अर्थात् एक पद दूसरे पद के बिना अन्वयबोध न करा सके,
यही उन पदों में परस्पर आकाङ्क्षा है । इसे न्यायबोधिनीकार नव्यन्याय की भाषा
में परिष्कृत करते हैं—अव्यवहितोत्तरत्वसम्बन्ध से जिस पद में यत्पदप्रकारक ज्ञान
न होने के कारण यादृशशाब्दबोध नहीं हो पाता, तादृशशाब्दबोध के प्रति उस पद
में ऽव्यवहितोत्तरत्वसम्बन्ध से तत्पद का वैशिष्ट्य आकाङ्क्षा है ।