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सर्वकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 199 में से

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पृष्ठ 98

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ७९
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽन्योन्याभावः, यथा-
घटः पटो नेति ।
सर्वेषां पदार्थानां यथायथमुक्तेष्वन्तर्भावात्सप्तैव पदार्था इति
सिद्धम् ।
तादात्म्यसम्बन्ध से अवच्छिन्न है प्रतियोगिता जिस अभाव की, वह अभाव
अन्योन्याभाव है। जैसे—"घटः पटो न, पटो घटो न" इत्यादि अभाव अन्योन्या-
भाव है।
न्यायसूत्रोक्त प्रमाण-प्रमेयादि सोलह तथा अन्यों द्वारा स्वीकृत शक्ति-सादृश्य-
स्वत्व आदि सभी पदार्थों का यथायोग्य उक्त द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवाय
और अभाव में ही अन्तर्भाव हो जाने से पदार्थ के सात ही भेद हैं, यह सिद्ध हुआ।
न्यायबोधिनी
योगिताकाभावत्वम् । ध्वंसप्रागभावयोश्च न संसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक-
त्वमिति तेनैव तद्वारणे त्रैकालिकेति स्वरूपाख्यानमेवेति बोध्यम् )
अन्योन्याभावं निरूपयति—तादात्म्येति । अभावत्रयवारणाय विशेष-
णम् । घटाभाववान्नेति प्रतीतिविषयघटादिवारणाय विशेष्यम् ।
ननु सादृश्यादीनामतिरिक्तपदार्थानामनिरूपणेन न्यूनतेत्यत आह —
हिन्दी-कला
लक्षणोक्त सभी पदों का उपादान सार्थक है। वस्तुतः मूलोक्त संसर्गाभावत्व का अभिप्राय
है—तादात्म्य से भिन्नसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावत्व । और यही अत्यन्ताभाव
का मूलानुसारी लक्षण है। ध्वंस और प्रागभाव तो ससर्गविच्छिन्नप्रतियोगिताक नहीं
होते हैं अर्थात् इनकी प्रतियोगिता संसर्गविच्छिन्ना नहीं होती है, इसी से उनका वारण
हो जायगा। अतः मूलोक्त लक्षण में जो त्रैकालिक-पद दिया है, वह केवल स्वरूप-
कथन के लिये है, न कि ध्वंस ओर प्रागभाव में अतिव्याप्तिवारण करने के लिये है।
अतः लक्षण में त्रैकालिकत्व का सन्निवेश नहीं है । "भूतले घटो नास्ति" यह अत्यन्ता-
भाव का उदाहरण है।
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव अन्योन्याभाव है। इसमें तादात्म्य-
सम्बन्धावच्छिन्नत्वविशेषण देने से शेष तीनों अभावों का वारण हो गया। यदि
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकत्व न कह कर तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रति-
गितावगाहिज्ञानविषयत्व लक्षण किया जाय तो "घटाभाववान्न" इस ज्ञान के विषय
घटादि में भी अन्योन्याभावलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। अतः "प्रति-
योगिताक" यह विशेष्य पद दिया। यहाँ प्रतियोगितानिरूपक घट नहीं हो सकता।
शङ्का—मीमांसकोक्त सादृश्य-शक्ति आदि तथा न्यायसूत्रोक्त प्रमाण आदि अतिरिक्त
पदार्थों का यहाँ निरूपण नही करने से ग्रन्थकार की न्यूनता क्यों न सिद्ध हुई ?